राष्ट्रीय खेल दिवस: खेलों में राजनीति का घालमेल

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के जन्मदिवस पर 29 अगस्त को आयोजित किया जाने वाला राष्ट्रीय खेल दिवस हमें यह आत्मावलोकन करने का अवसर देता है कि खेलों को पाठ्यक्रम,कैरियर और इनसे भी बढ़कर जीवन का एक हिस्सा बनाने हेतु हमारे प्रयास किस हद तक गंभीर रहे हैं। गतिविधियों के नाम पर इस दिन राष्ट्रपति भवन में असाधरण प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों और खेल प्रशिक्षकों को राष्ट्रपति खेलों में विशेष योगदान देने के लिए राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं, जिसमें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कारों के अतिरिक्त तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार एवं अर्जुन पुरस्कार मुख्य हैं। मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम दिल्ली में कुछ प्रदर्शनी और रस्मी मैचों का आयोजन किया जाता है जिनमें खेलों की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी व्यवसायी एवं राजनीतिज्ञ अपनी गरिमामयी उपस्थिति देते हैं। देश भर के स्कूलों में विद्यार्थियों के बीच- जैसी कि शासकीय कार्यक्रमों की सफलता के लिए स्कूली बच्चों का उपयोग करने की परंपरा बन गई है- क्रीड़ा प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
खेलों के लिए अलग से मंत्रालय की स्थापना 1982 में हुई और खेल प्रशासन का बहुत जटिल ढांचा भी धीरे धीरे अस्तित्व में आया। देश में विभिन्न खेलों के अलग अलग राष्ट्रीय खेल संघ होते हैं। ये स्वायत्तशासी निकाय होते हैं, जिनका अपना संविधान,नियम,उपनियम और कार्यप्रणाली होती है। इनके अधीन राज्य खेल संघ होते हैं। राष्ट्रीय खेल संघों को उस खेल के अंतरराष्ट्रीय खेल संघ से मान्यता लेनी होती है। यदि वह अंतरराष्ट्रीय खेल संघ इंटरनेशनल ओलंपिक कौंसिल से मान्यता प्राप्त होता है तब इंडियन ओलम्पिक एसोसिएशन उस राष्ट्रीय खेल संघ को मान्यता देती है। इन इंडियन ओलम्पिक एसोसिएशन से मान्यता प्राप्त खेल संघों को भारत सरकार की मान्यता, अनुदान एवं स्टेडियम तथा खेल प्रशिक्षण संस्थाओं के उपयोग की अनुमति आदि सरलता से उपलब्ध हो जाती है। 2016 में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त 49 खेल संघों में कबड्डी , खो-खो, बॉडी बिल्डिंग आदि के खेल संघ भी थे जो इंडियन ओलम्पिक कौंसिल से संबद्ध नहीं हैं। चूंकि सभी खेल संघ स्वतन्त्र संस्थाएं हैं इसलिए अनियमितता की स्थिति में इन पर कार्रवाई सरकार के द्वारा नहीं बल्कि उन खेल संघों और संस्थाओं द्वारा की जाती है जिनसे ये सम्बद्ध होते हैं। जहाँ दूसरे खेल संघ सरकारी मान्यता के लिए तरसते रहते हैं वहाँ देश के मीडिया, उद्योगपतियों और राजनीतिज्ञों तथा स्वाभाविक रूप से जनता के चहेते खेल क्रिकेट का खेल संघ बी सी सी आई सरकारी मान्यता से दूर भागता है ताकि उसकी स्वेच्छाचारी कार्यप्रणाली जारी रह सके और स्थिति यहाँ तक बनती है कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है, लोढ़ा समिति बनती है जिसे अपनी सिफारिशों को लागू कराने हेतु एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है। बी सी सी आई का कहना है कि वह विश्व का सर्वाधिक कार्यकुशल एवं पेशेवर खेल संघ है जो वर्तमान और भूतपूर्व खिलाड़ियों एवं सहयोगी स्टाफ के हित संवर्धन तथा खेल सुविधाओं और स्टेडियम आदि के विकास एवं खेल के प्रचार प्रसार में बेहतरीन काम कर रहा है। इसी पेशेवर प्रवृत्ति का परिचायक आई पी एल है जिसमें आधुनिक युग के शहंशाह कॉर्पोरेट मालिक खिलाड़ियों की नीलामी में उनकी बोली लगाकर उनका क्रय विक्रय करते हैं। आई पी एल के आयोजन चीयर लीडर्स की अदाओं, मैच के बाद होने वाली पार्टियों और टीम मालिकों के अनैतिक आचरण तथा मैच फिक्सिंग के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। हालाँकि इनसे युवाओं में क्रिकेट के प्रति दीवानगी भी बढ़ी है। अब हॉकी, कबड्डी और फुटबॉल में भी आई पी एल की तर्ज पर आयोजन हो रहे हैं किंतु इनसे खेल और खिलाड़ियों को कितना दीर्घकालिक फायदा पहुंचेगा यह देखा जाना शेष है। है। देश के अधिकांश खेल संघ ऐसे हैं जिनके बलबूते नहीं बल्कि जिनसे जूझकर खिलाड़ी शिखर तक पहुँचते हैं। टेनिस के अमृतराज बंधु,रमेश कृष्णन एवं पेस-भूपति-सानिया मिर्जा तथा बैडमिंटन के गोपीचंद और उनकी अकादमी से जुड़े सितारे साइना नेहवाल, पी वी सिंधु, पी कश्यप तथा किदाम्बी श्रीकांत, निशानेबाजी के अभिनव बिंद्रा ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जो देश में या देश से बाहर निजी स्तर पर विश्व स्तरीय कोचों और सुविधाओं की व्यवस्था कर शिखर तक पहुँचे हैं। सरकारों का रवैया पदक जीतने के बाद ही उन्हें सम्मान-पुरस्कार देने का रहा है।
खेल संघों पर आधिपत्य पूंजी पतियों एवं राजनेताओं का प्रिय व्यसन रहा है। सुरेश कलमाड़ी,अभय चौटाला (इंडियन ओलम्पिक एसोसिएशन), एन श्रीनिवासन,जगमोहन डालमिया,शरद पवार,अरुण जेटली, राजीव शुक्ला आदि(क्रिकेट संघ),विजय कुमार मल्होत्रा(तीरंदाजी संघ),प्रफुल्ल पटेल(फुटबाल संघ),अभिषेक मटोरिया(बॉक्सिंग संघ),ब्रजभूषण शरण सिंह(कुश्ती संघ),अखिलेश दास गुप्ता( बैडमिंटन संघ) अनिल खन्ना(टेनिस संघ) नरेंद्र बत्रा (हॉकी इंडिया), के डी सिंह(इंडियन हॉकी फेडरेशन) जैसे कितने ही नामों की अंतहीन सूची बनाई जा सकती है। इनमें से कुछ भ्रष्टाचार के क्षेत्र की स्वनामधन्य हस्तियाँ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के जजों टी एस ठाकुर और जे चेलामेश्वर की बेंच ने 2013 में टिप्पणी की थी- यह अत्यंत दुर्भाग्यजनक है कि जो लोग खेल प्रशासक हैं उन्हें खेल से कुछ लेना देना नहीं है। वे अपने संघों का संचालन खेल की कीमत पर कर रहे हैं। खेल संघों का संचालन निजी लोग कर रहे हैं। खेलों पर इनका नियंत्रण है। क्या खेलों को निजी हितों के पास बंधक रखा जा सकता है?
राष्ट्रीय खेल दिवस आता है और चला जाता है किंतु हमेशा की तरह बहुत सारे प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं – सरकारें अपने बजट का न्यूनतम भाग खेलों पर क्यों खर्चती हैं? जो बजट आता भी है उसका अधिकाँश भाग सर्वग्रासी भ्रष्टाचार द्वारा निगल लिए जाने पर हम क्यों चकित नहीं होते? कितने ऐसे स्कूल हैं जिनमें खेल के मैदान की सुविधा(या विलासिता) उपलब्ध है? इन शालाओं में खेल शिक्षक हैं भी या नहीं और यदि हैं तो उन्हें आधुनिक प्रशिक्षण एवं सुविधाएँ उपलब्ध है या नहीं? खेलों के उपकरण और विभिन्न खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयुक्त होने वाली सतहें निहायत महंगी होती हैं, इनके अभाव खिलाड़ी का पूरा प्रशिक्षण एवं युवावस्था बेकार हो जाती है फिर भी इनका घनघोर अभाव क्यों बना रहता है? इन परिस्थितियों में कितने पालक ऐसे होंगे जो अपनी संतानों(बालक- बालिका का प्रश्न तो बहुत बाद में आएगा) के लिए खेल को कैरियर के रूप में चुनने का साहस करेंगे? अधिकाँश खेलों में बाल खिलाड़ी की अभिरुचि और प्रतिभा के अनुरूप उसे शारीरिक प्रशिक्षण देना होता है क्योंकि हर खेल की फिजिकल नीड अलग अलग होती है- हमारे यहां ऐसा क्यों होता है कि 15-16 वर्ष के बालक बालिकाओं को यह तक पता नहीं होता कि उनके लिए कौन सा खेल उपयुक्त है? क्यों अधिकाँश खेल संघों पर राजनीतिज्ञ और पूंजीपति काबिज हैं? क्यों यह समझा जाता है कि जितना ही खेलों का बाजारीकरण किया जाएगा, जितना ही पैसा उनमें निवेश किया जाएगा उतने ही उत्कृष्ट खिलाडियों का प्रोडक्शन होगा? क्यों टेनिस जैसे खेलों में व्यावसायिक स्तर पर शीर्ष को स्पर्श कर चुके खिलाड़ी जब देश के लिए खेलते हैं तो वो जूनून उनमें नहीं दिखता? क्यों हम विजेता खिलाडियों पर धन- दौलत और सम्मानों की वर्षा कर उन्हें एक सेलिब्रिटी, विज्ञापनों का एक चर्चित चेहरा, बाजार का एक बिकाऊ ब्रांड बना देते हैं? क्या यह खेलों की उपेक्षा की नीति से उपजी ग्लानि को धोने का एक तरीका है या बाजार की रणनीति? क्यों हमारे ये सेलिब्रिटी माइकल फेल्प्स और उसेन बोल्ट की भांति अपनी सफलता को दुहरा नहीं पाते? सबसे बढ़कर खेल कब हमारी जीवन शैली का अंग बन पाएंगे?
डॉ राजू पाण्डेय

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