लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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Shankaracharya—–
डॉ. मधुसूदन
(एक )
“हिमालय का प्रवास” पुस्तक।
“हिमालय नो (का) प्रवास” नामक गुजराती पुस्तक के लेखक, काका कालेलकर के, आदि-शंकराचार्य की प्रशंसा में लिखे, शब्दों ने ध्यान खींचा। वें आदि शंकराचार्य को असामान्य ऐतिहासिक व्यक्तित्व मानते हैं। वें कहते हैं।
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**शंकराचार्य धर्म के क्षेत्र में समुद्रगुप्त और नेपोलियन थे;
**प्रबंधन में, राजा टोडरमल या शिवाजी थे;
**काव्य रचना में तुलसीदास थे;
**बुद्ध भगवान जैसे आत्मविश्वासी थे,
**ज्ञानेश्वर जैसे साहित्याचार्य थे;
और **बुद्धि में बुद्धि की पराकाष्ठा व्यास जैसे विशाल बुद्धि थे।
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तनिक सोचिए-विचारिए।किन किन ऐतिहासिक महानताओं से काका कालेलकर, आचार्य शंकर की समानता दर्शाते हैं?
**समुद्रगुप्त और नेपोलियन जैसे विजेता, राजा टोडरमल और शिवाजी जैसे व्यवस्थापक, तुलसीदास जैसे कवि, बुद्ध जैसे आत्मविश्वासी, ज्ञानेश्वर जैसे साहित्याचार्य  और बुद्धि की पराकाष्ठा व्यास जैसे विशाल बुद्धि।**
इतनी सारी पराकोटि की संपदाएं एक व्यक्ति में, मात्र कुल ३२ वर्ष के जीवन में अभिव्यक्त होना असामान्य में असामान्य चमत्कार ही है।

(दो)
शिवाजी और टोडरमल जैसे प्रबंधक:
आज उनके प्रबंधन को ही सूक्ष्मता सहित जानने का प्रयास करते हैं।
इसके प्रमाण भी सहज मिल जाते हैं।साथ साथ उनकी (Analysis) विश्लेषण की प्रतिभा, संगठन कौशल्य, और  विविधता में एकता की दृष्टि इत्यादि विशेषताएँ भी  उजागर होती है।
इसी पर लक्ष्य केंद्रित कर, कुछ अध्ययन कर पाया। जिसे सामान्य बोध (common Sense) से ही समझा जा सकता है। कोई विशेष विद्वान होने की भी आवश्यकता नहीं।
जब कालेलकर उन्हें  “टोडरमल और शिवाजी जैसे प्रबंधक” मानते हैं,  तो क्यों,  इस का ही उत्तर ढूँढने का प्रयास मैंने किया, मेरी अपनी जिज्ञासा के लिए।

हिम शैल की केवल शिखा  (Tip of the iceberg )जैसा, यह आलेख लिख कर, एक असाधारण प्रतिभा का परिचय कराने में लेखक स्वय़ं धन्यता का अनुभव करता है।
(तीन)
दशनामी संन्यासी परम्परा क्या है?

पाठक ने संन्यासियों के नाम के अंत में भारती, सरस्वती, आश्रम, तीर्थ, सागर, गिरि इत्यादि का प्रयोग सुना होगा। ऐसे दस नाम होते हैं।
जैसे सत्यमित्रानन्द गिरि, ईश्वरानन्द गिरि, स्वामी रामानंद तीर्थ,  स्वामी प्रणव चैतन्यजी पुरी  स्वामी गौरीश्वरानंद पुरी, स्वामी अधोक्षजानंद देव तीर्थ, स्वामी दयानन्द सरस्वती  ऐसे अनेक नाम समाचारों में भी होते हैं। इस परम्परा को आदि शंकराचार्य ने रूढ किया था। ऐसी सागर, गिरि, पुरी इत्यादि भौगोलिक इकाइयों के नाम सन्यासियों के नाम के साथ जोडने का क्या कारण हो सकता है?

पहले  शंकराचार्य जी ने, भारत के भौगोलिक मान-चित्र  (Map) का परिशीलन किया, देखा कि, सारा भारत दस अलग अलग भौगोलिक इकाइयों में फैला है। ऐसे अलग अलग इकाइयों में फैले हुए  भारत को राष्ट्रीयता के संस्कार देने और संगठित करने के लिए दशनामी संन्यासियों की परम्परा चलायी।
जब भारत के मानचित्र का, अवलोकन किया, तो, देखा कि, भारत नदी किनारे तीर्थों में, वनो में, अरण्यों में, पहाडी पर, पर्वतीय क्षेत्रों में, नगरों में, इत्यादि दस इकाइयों में बसा हुआ है। इस लिए दशनामी संन्यासियों का संगठन खडा किया। और सारे भारत में उसका जाल फैला दिया।
ऐसे अनासक्त संन्यासियों ने उस समय जो काम किया, उसे वेतनधारियों से नहीं करवाया जा सकता था। त्याग की प्रेरणा और शंकराचार्य का प्रत्यक्ष नेतृत्व भी काम कर गया होगा। आज संघ का प्रचारक भी निःस्वार्थ भाव से इसी प्रकार प्रेरित होता है; लेखक जानता है।
ऐसे, इन दशनामियों को, नदी किनारे तीर्थों में, वनो में, अरण्यों में, पहाडी पर, पर्वतीय क्षेत्रों में, नगरों में, और अंतमें जिन्हें सर्वत्र भ्रमण करनेका काम दिया गया था, वैसे भारती के नामकरण से क्षेत्र का विभाजन किया गया।
पहले तो चकित हूँ, उनके (१) परिशीलन और विश्लेषण से। (२)दूसरा उनके  स्पष्ट कार्यक्षेत्र के विभाजन से। और उनकी  (३)  राष्ट्रीय दृष्टि से।
पर आज दशनामी परम्परा में भी लेखक को शिथिलता और समय के साथ साथ  आई हुयी क्षीणता दिखाइ देती है। वैसे आज प्रत्यक्ष शंकराचार्य की कोटिका नेतृत्व भी नहीं है।

(चार)
शंकराचार्य की प्रतिभा
विश्लेषक, प्रबंधक, चार आश्रमों के स्थापक, सारे भारत का ३ -४ बार भ्रमण करनेवाले, अनेकानेक वाद विवाद कर प्रतिपक्ष को मतांतरित करनेवाले, कर्मकाण्ड सुधारक, बुद्ध जैन सिद्धान्तों का समन्वयी वृत्ति से स्वीकरण, और अनुकूलन करनेवाले, उपनिषदों के भाष्यकर्ता। (यह सूची लम्बी है; बी. एन. गोयल जी का आलेख आप देख सकते हैं। अधिक विस्तृत चरित्र के लिए आप आध्यात्मिक सुधारक आदि शंकराचार्य निम्न कडि देखें।
http://www.pravakta.com/spiritual-reformer-adi-shankaracharya

(पाँच)
दशनामी संन्यासियों का प्रबंधन ।

तीर्थाश्रमवनारण्यगिरिसागरपर्वताः।
सरस्वती पुरी चैव भारती च दशक्रमात्‌॥

इस श्लोक में तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि,सागर, पर्वत, सरस्वती, पुरी, और भारती ऐसे दस नाम आते हैं।
उनके विषय में, संक्षेप में निम्न कहा जा सकता है।
(१)तीर्थ ,नामी संन्यासी तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा कर समाज को संस्कारित किया करते थे।
(२)आश्रम नामी संन्यासी, भिन्न भिन्न मठों एवं आश्रमों से सम्बंध रखते हुए देश में घुमते थे।
(३)वन नामी संन्यासी वनों मे रहकर और घूमकर वनवासियों का मार्गदर्शन करते थे।
(४) अरण्य नामी संन्यासी  घने अरण्यों में संचार कर अरण्य वासियों को भी राष्ट्रीयता से जोडे रखते थे।
(५)गिरि नामी  संन्यासी पर्वतीय प्रदेशों में भ्रमण कर वहाँ बसे गिरिवासियों को मुख्य धारासे जोड रखते थे।
(६)सागर नामी संन्यासी,  सागर-तटस्थ प्रजा की देखभाल कर संस्कार करने वाले होते थे।
(७) पर्वत नामी संन्यासी दुर्गम पर्वतीय प्रदेशो में भ्रमण कर पर्वतीय प्रजाजनों का भी सम्पर्क बनाए रखते थे।
(८) सरस्वती नामी संन्यासी विद्यालयों और आश्रमों में सरस्वती की उपासना करने वालों से सम्पर्क रखने वाले होते थे।
(९) पुरी नामी नामी संन्यासी नगर-निवासियों को उपदेश देने वाले हुआ करते थे।
(१०) भारती नामी संन्यासी किसी भी एक भू-भाग में सीमित ना रहते हुए अखिल भारत में भ्रमण करने वालेहोते थे।
सारे राष्ट्र को इस ताने बाने में जोडना और संगठित करना कितना प्रचण्ड काम होगा?

(संदर्भ: श्री. बाबा सहब आपटे, और श्री. ब्रिजमोहन वशिष्ठ )

सोचिए इन नामों के पीछे कारण क्या रहा होगा? लगता है, प्रत्येक के कार्यक्षेत्र के प्रति किसी को कोई  भ्रांति न रहे। जैसे आज जब हम, अर्थ मंत्री, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री इत्यादि नामों से प्रत्येक मंत्रीका कार्यक्षेत्र निर्देशित करते हैं। बस उसी प्रकार शंकराचार्य जी ने, दो निर्णय लिए।

(छः) मठाधिपतियों की नियुक्तियों में राष्ट्रीय वृत्ति
आचार्य जी ने चार धाम स्थापित किए। दक्षिण में शृंगेरी कर्नाटक में एक, पश्चिम द्वारिका में दूसरा, बद्रिकाश्रम उत्तर में तीसरा, और पूर्व में पुरी में चौथा।
मठाधिपतियों की नियुक्ति में भी आपकी राष्ट्रीय दृष्टि का परिचय मिलता है।
सुरेश्वराचार्य जो उत्तर में जन्में थे, उन्हें दक्षिण में मठाधिपति नियुक्त किया।
और दक्षिण के  तोटक को बद्रिकाश्रम दूर उत्तर में भेजा।
आपने केरल  के नंबुद्रियों को भी बद्रीधाम की पूजा का अधिकार अनिवार्य कर दिया।
कर्नाटक के ब्राह्मणों को नेपाल भेजा।
और, दक्षिण में,  रामेश्वरम के पुजारी महाराष्ट्र से नियुक्त किए।

(सात)
अलौकिक राष्ट्रीय दृष्टि ?
इसकी तुलना अनायास हो जाती है,  हमारे स्वातंत्र्योत्तर उस नेतृत्व से,  जिसने भाषावार राज्य रचना कर सारे भारत में आपसी वैमनस्य के लिए संभावना को जन्माया था। कोई इसे द्वेष मूलक विधान ना समझे।बिना द्वेष केवल इतिहास से पाठ लेने के लिए ही लिखा है।

(आठ)
लेखक का  निरीक्षण:
मैं ने भारत के मानचित्र में शृंगेरी कर्नाटक को,  बद्रिकाश्रम से सरल रेखा से जोडा, और द्वारिका के बिंदू को पुरी से जोडा तो गणित का  +, अधिक चिह्न उभर आया। चारों बिन्दुओं को जोडनेपर चतुष्कोण भी बनता है।
ऐसा सारे भारत को जोडनेवाला व्यक्तित्व किस कारण हमारे इतिहास में उचित स्थान नहीं पाता?

(नौ)
जिन प्रदेशों में दशनामी पहुंच नहीं पाए:
जिन प्रदेशों में दशनामी शायद पहुंच नहीं पाए वैसे सुदूर अफगानीस्तान, और निकट का प्रदेश और पूर्वी भारत घर-वापसी  नहीं कर पाया था। ये बुद्ध धर्मी  हो चुके थे। और बुद्ध धर्म में वर्ण-व्यवस्था थी ही नहीं। जातियाँ भी नहीं थी।
जातियों का परस्पर सहायक ढाँचा शिथिल हो चुका था। इसी लिए उत्तरकाल में,  वहाँ मतांतरण हो कर इस्लाम का वर्चस्व हुआ। अफगानीस्तान में बामियाँ बुद्ध मूर्ति भी खण्डित हुयी। पूर्वी भारत में बुद्ध धर्मी ही मतांतरित हो कर इस्लामी धर्म में गए। यही  आज का बंगलादेश है। पश्चिम में अफगानीस्तान और निकट पाकिस्तान भी इसी प्रक्रिया का परिणाम है। इतिहास पुष्टि भी करता है।

(दस) मिशनरियों का गुप्त पत्र व्यवहार।
मिशनरियों का गुप्त पत्र व्यवहार, जो, कोलम्बिया युनिवर्सीटी के, प्रोफ़ेसर निकोलस डर्क्स ने अपनी पुस्तक Castes of Mind (मानसिक जातियाँ) में उजागर किया है। ्वह भी अलग रीति से जातियों को ही धर्मान्तरण के सामने प्रबल अवरोध रहा है।(मानसिक जातियाँ, भाग १.२.३ अवश्य पढें–इसी प्रवक्ता में पाएंगे)

जहाँ जातियाँ शिथिल हुयी थी, और जहाँ बौद्धों की बहुलता हो चुकी थी, वहाँ मतान्तरण हुआ, और आज अफगानीस्तान, बंगलादेश, पाकिस्तान जहां बने हैं, वहाँ जातियाँ शिथिल थीं, जो बुद्ध धर्म से मतांतरित हुयी थीं। सावरकर, विवेकानंद और निकोलस डर्क्स और स्वयं नेहरू भी अलग अलग रीति से यही मानते हैं।
डिस्कवरी ऑफ इण्डिया में भी यही बात लिखी है।

7 Responses to “आचार्य शंकर का ऐतिहासिक योगदान”

  1. डॉ. मधुसूदन

    स्वामी योगात्मानन्दजी--द्वारा

    Namaskar, dear Madhu Ji.
    Enjoyed your short but comprehensive treatment of the great Sankaracharya.
    You have nicely brought out many aspects of his tremendous, unique role as a teacher of Vedanta and getting the Hindu Society better harmonized.
    I was much impressed by your presentation of is creating the dasanami order to carry on the work in future.
    Thanks a lot. Love –
    SY
    ‘Arise Awake and Stop Not Till The Goal is Reached’ – Swami Vivekananda
    For More information on Vedanta Society of Providence or on its Minister Swami Yogatmananda, please visit http://www.vedantaprov.org and facebook Vedanta.Providence

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  2. Rekha Singh

    अभी अभी मैने बी एन गोयल जी का लिखित सुन्दर लेख “दक्षिण भारत के संत (१३) संत माधवाचार्य ( द्वेत सम्प्रदाय )” पढ़ा ।
    यहाँ “आचार्य शंकर का ऐतिहासिक योगदान ” लेख मेरे जैसे साधारण विधार्थी के लिये असीम ज्ञान का स्त्रोत है । बचपन मे अपने पिता के मुख से ऐ नाम और चर्चाए सुनी थी लेकिन आज विस्तार से समझने मे अत्यंत खुशी , आनंद का अनुभव हो रहा है । यह शोध पूर्ण उच्च कोटि का आलेख अत्यंत ज्ञानवर्धक और संग्रहणीय है ।

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  3. दुर्गा शंकर नागदा

    प्रिय डा, मधुसूदन जी: नमश्कार

    बहुत सुन्दर व्याख्या की है आपने। अति सुन्दर । नामो का बहुत महत्व है भारतीय समाज मे। कितनी सुंदरता व निपुणता से पूरे देश को एक छत्रछाया मे आदिशंकराचार्य जी ने सदियो से सरंक्षण कर रखा था। हमारी संस्कृति और सभ्यता मानव मात्र के लिए आदि काल से आदर्श थी व अब भी है या हो सकती है यदि हम वास्तव में स्वराज्य, स्वतंत्र, व स्वावलम्बी हो जाए।

    वैसे आपने दसो पदवीयों या नामो का logical विवरण कीया है और नाम की ही तो महिमा है जिसका विवरण लेखनी से परे है। कहा है, “राम न सकही नाम गुन गाई।”
    उत्तम, अति उत्तम ।
    धन्यवाद ।

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  4. बी एन गोयल

    बी एन गोयल

    दशनामी परंपरा का लेख अत्यंत सुंदर है – इस बारे में मैंने कहीं कुछ पढ़ा था वही यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ –
    आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पूरी, पश्चिम में द्वारका और उत्तर में बद्रीनाथ में मठ स्थापित किए। संन्यासियों की दस श्रेणियां- ‘गिरी, पूरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ और आश्रम आदि गुरु शंकर ने ही बनाई थी जिसके कारण ये दशनामी संन्यास प्रचलित हुआ।
    दशनामियों के दो कार्यक्षेत्र निश्चित किए गए पहला शस्त्र और दूसरा शास्त्र। ये भी कहा जाता है कि शंकराचार्य के सुधारवाद का तत्कालीन समाज में खूब विरोध भी हुआ था और साधु समाज को उग्र और हिंसक विरोध से जूझना पड़ता था। काफी सोच-विचार के बाद शंकराचार्य ने वनवासी समाज को दशनामी परम्परा से जोड़ा, ताकि उग्र विरोध का सामना किया जा सके। वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र चलाने में भी निपुण थे। इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों को नागा साधु कहा जाता है। ये नागा जैन और बौद्ध धर्म भी सनातन हिन्दू परम्परा से ही निकले थे। वन, अरण्य संन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ से जुड़ गए। पश्चिम में द्वारिकापुरी स्थित शारदापीठ के साथ तीर्थ और आश्रम संन्यासियों को जोड़ा गया। उत्तर स्थित बद्रीनाथ के ज्योतिर्पीठ के साथ गिरी, पर्वत और सागर संन्यासी जुड़े, तो सरस्वती, पुरी और भारती नामधारियों को दक्षिण के श्रृंगेरी मठ के साथ जोड़ा गया ।
    मध्यकाल मे चारों पीठों से जुड़ी दर्जनों पीठिकाएं सामने आईं, जिन्हें मठिका कहा गया. इसका देशज रूप मढ़ी के नाम से मशहूर हुआ. देश भर में दशनामियों की ऐसी कुल 52 मढ़ियां हैं, जो चारों पीठों द्वारा नियंत्रित हैं। इनमें सर्वाधिक 27 मठिकाएं गिरि दशनामियों की हैं, 16 मठिकाओं में पुरी नामधारी संन्यासी के अधीन हैं। 4 मढ़ियों में भारती नामधारी दशनामियों का वर्चस्व है और एक मढ़ी लामाओं की है। साधुओं में दंडी और गोसाईं दो प्रमुख श्रेणियाँ हैं। तीर्थ, आश्रम, भारती और सरस्वती दशनामी, दंडधर साधुओं की श्रेणी में आते हैं जिन्हें दंडा स्वामी भी कहा जाता है । जबकि शेष गोसाईं कहलाते हैं ।

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  5. डॉ. मधुसूदन

    द्वारा: शकुन्तला बहादुर -कैलिफ़ोर्निया

    आदरणीय मधुसूदन जी,
    आपके शोधपूर्ण आलेख को पढ़ कर मैं स्तब्ध रह गई । आचार्य शंकर के व्यक्तित्व और कृतित्व की आपने विस्तृत
    व्याख्या करके जिन रहस्यों का उद्घाटन किया है , वे सामान्य पाठक के लिये तो विशेषरूप से ज्ञानवर्धक और
    जिज्ञासा का शमन करने वाले हैं । भारतीय-संस्कृति की गहराइयों में प्रवेश करके, अमृतमंथन सदृश ही उपलब्ध किये गए ज्ञान के प्रसार हेतु,आपके द्वारा किये जा रहे ये प्रयास सराहनीय , सशक्त और प्रभावी भी हैं । आपके अन्य आलेखों की भाँति ये उच्चकोटि का आलेख भी पठनीय और संग्रहणीय है ।
    सादर एवं साभार,
    शकुन्तला बहादुर
    कैलिफ़ोर्निया

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  6. Arun Kumar Upadhyay

    तिष्ये प्रयातायनलशेवधिबाणनेत्रेऽब्दे नन्दने दिनमणावुदगध्वभाजि।
    राधेऽदितेरुडुविनिर्गत मङ्गलग्ने स्याहूतवान् शिवगुरुः स च शङ्करेति।।
    इसके अनुसार गणना करने षर शंकराचार्य का समय 4-4-509 ईपू रात्रि 1052 बजे स्थानीय समय आता है। तीन मुख्य बुद्ध थे। इनके अलावा 4 का नाम सारनाथ लेख में, अन्य 4 का काल और स्थान फाहियान ने लिखा है। सिद्धार्थ बुद्ध कपिलवस्तु में 1887-1807 ईपू, गौतम बुद्ध 563 ईपू में प्रयाग में हुए। विष्णु अवतार बुद्ध 800 ईपू में मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र रूप में हुए। 756 ईपू में असीरिया रानी सेमिरामी द्वारा अफ्रीका एशिया के देशों के सहयोग से 35 लाख सेना द्वारा आक्रमण होने पर आबू पर्वत पर उज्जैन राजा शूद्रक के अधीन 4 अग्नि वंशी राजाओं का संघ बनाया था। यह प्रख्यात मालव गण था जिसका 300 वर्ष तक प्रभुत्व था। सभी ग्रीक लेखकों ने 300 वर्ष के इस गणतंत्र की चर्चा की है। अन्य बुद्धों ने असुरों को नहीं केवल भारतीयों को मोहित किया जिसका परिणाम आजतक बिहार भोग रहा है। बौद्ध धर्म के सर्वप्रिय नहीं होने का मुख्य कारण था कि वे सदा अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए हिन्दू धर्म और भारत का विरोध करते रहे और सदा विदेशी आक्रमणकारियों की मदद की। चीन जापान आदि में वे सदा समाज से मिलकर रहे। अन्य कारण था कि 84000 मठों में भारत की 10 प्रतिशत आबादी मुफ्त मांसाहार कर रही थी जिसका बोझ देश नहीं उठा सकता था।

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आ. उपाध्याय जी–जानकारी के लिए धन्यवाद। मुझे दो अलग जन्म तिथियाँ मिली थी। ५०९ ई. पू. और ७८८ ई. वाली ये दोनों में फिर वेदान्त सोसायटी वाली और अन्य भी ७८८ ई. के पक्षमें थी।
      मुझे विशषतः उनके भारत के मानचित्र पर दृष्टिपात, विश्लेषण, और प्रबंधन, एवं विविधता में एकता की दृष्टि को उजागर करने के, सीमित उद्देश्य से लिखने का विचार आया। इसके स्पष्ट प्रमाण मुझे (१) दशनामी (२)चार दिशाओं में आश्रम (३)और उनकी महंतों की नियुक्तियाँ। ऐसे सशक्त आकलनीय प्रमाण, सर्वग्राह्य होने में कम कठिनाई होगी; इस अपेक्षा से, और,इसी लिए ऐसे सीमित उद्देश्य से मैंने लिखने का प्रयास किया।
      मैं पाठक और विरोधक को भी स्वीकार करने में न्यूनतम (?) कठिनाई हो,ऐसे कोण से लिखने का प्रयास करता हूँ। (जिस से पाठक धीरे धीरे साथ आता जाता है।)
      प्रमाण प्रमाण में भी प्रत्येक पाठक की स्वीकृति का मापदण्ड ही अलग होता है।

      मैं मेरी वैयक्तिक मान्यताएँ अलग रखता हूँ। पर आलेखों में सर्वग्राही प्रमाणों के आधारपर तर्क देने का प्रयास करता हूँ।
      नमन सहित धन्यवाद।
      टिप्पणी के लिए भी धन्यवाद।

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