भारतीय सिनेमा में मुस्लिम प्रभाव को बढ़ावा

सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों की सफलता की गारंटी बना दिए गए हैं। अक्षय कुमार, मनोज कुमार और राकेश रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं। तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहाअलीखान और जरीनखान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम हैं और इस्लामी कठमुल्लाओं को उनका काम गैरमजहबी लगता है। फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी – बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है।

muslim-bollywood-actors-married-hindu-womenडा.राधेश्याम द्विवेदी
राष्ट्र के निर्माण में फिल्मों का योगदान:-कल्पना विकास की पहली सीढ़ी है फिल्मों ने आम व्यक्ति को कल्पना के संसार तक पहुँचाया .उच्च गुणवत्ता जीवन शैली के लिए प्रोत्साहित किया. परिणाम स्वरूप आज प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य को फ़िल्मी स्टाइल में करने का प्रयास करता है. यहाँ तक कभी कभी नकारात्मक प्रभाव भी सामने आते हैं,जब चोरी डकैती भी फ़िल्मी शैली में करते हुए दिखाई पड़ती है. फिल्मों ने और अब मीडियाने और टी.वी भौतिवाद को हवा दी है, साथ ही आम जन को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी किया है. अधिक धनार्जन के लिए कठोर परिश्रम, अनुशासन,सहनशीलता,दूरदर्शिता जैसे गुणों का विकास भी किया है. किसी समाज को उठाने के लिए उसमें भूख पैदा करनी पड़ती है जब भूख जागेगी तो स्वतः समाज आगे बढ़ने लगता है यही काम हमारी हिंदी फिल्मो ने किया है.हिंदी फिल्मो ने पूरे देश को हिंदी भाषा का ज्ञान करा कर एकता का परचम लहराया है.आज सामाजिक जागरूकता एवं सामाजिक उत्थान का कार्य इलेक्ट्रोनिक मीडिया कर रहा है.
भारतीय फिल्म उद्योग :- बॉलीवुड और अन्य प्रमुख सिनेमाई केन्द्रों को मिलाकर व्यापक भारतीय फिल्म उद्योग का गठन होता है। सबसे ज्यादा संख्या में फिल्मों के निर्माण और बेचे गए टिकटों की सबसे बड़ी संख्या के आधार पर इसका उत्पादन दुनिया में सबसे ज्यादा माना जाता है।व्यावसायिक फिल्मों के अलावा, भारत में भी समीक्षकों द्वारा बहुप्रशंसित सिनेमा का निर्माण हुआ है। जैसे की सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक , गुरु दत्त, के.एच. विश्वनाथ , अदूर गोपालकृष्णन , गिरीश कासरवल्ली , शेखर कपूर, ऋषिकेश मुखर्जी, शंकर नाग , गिरीश कर्नाड, जी वी अय्यर जैसे निर्माताओं द्वारा बनाई गयी फिल्में.दरअसल, हाल के वर्षों में अर्थव्यवस्था के खुलने और विश्व सिनेमा की झलक मिलने से दर्शकों की पसंद बदल गयी है। इसके अलावा, अधिकांश शहरों में मल्टीप्लेक्स के तेजी से बढे है जिससे, राजस्व का स्वरूप भी बदलने लगा है।
चलचित्र का आगमन :-भारतीय सिनेमा के इतिहास में 7 जुलाई 1887 एक महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन तत्कालीन बंबई के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने छः लघु चलचित्रों का प्रदर्शन किया था। इन छोटी-छोटी फिल्मों ने ध्वनिरहित होने बावजूद भी दर्शकों का मनोरंजन किया था। इन लघु चलचित्रों से प्रभावित होकर श्री एच.एस. भटवडेकर और श्री हीरालाल सेन नामक व्यक्तियों ने ल्युमेरे ब्रदर्स की तरह क्रमशः मुंबई (पूर्व नाम बंबई) और कोलकाता(पूर्व नाम कलकत्ता) में लघु चलचित्रों का निर्माण प्रारंभ कर दिया। अब तक केवल मूक फिल्में ही बना करती थीं पर 1930 के आसपास चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित हो जाने से सवाक् (बोलती) फिल्में बनने लगीं। आलम आरा भारत की पहली सवाक् फिल्म थी जो कि सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्मा इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं।मूक फिल्मों के जमाने तक मुंबई (पूर्व नाम बंबई) देश में चलचित्र निर्माण का केन्द्र बना रहा परंतु सवाक् फिल्मों का निर्माण शुरू हो जाने से और हमारे देश में विभिन्न भाषाओं का चलन होने के कारण चेन्नई (पूर्व नाम मद्रास) में दक्षिण भारतीय भाषाओं वाली चलचित्रों का निर्माण होने लगा। इस तरह भारत का चलचित्र उद्योग दो भागों में विभक्त हो गया।
प्रमुख स्टुडिओ :-उन दिनों प्रभात, बांबे टाकीज और न्यू थियेटर्स भारत के प्रमुख स्टुडिओ थे और ये प्रायः गंभीर किंतु मनोरंजक फिल्में बना कर दर्शकों का मनोरंजन किया करती थीं। ये तीनों स्टुडिओ देश के बड़े बैनर्स कहलाते था। उन दिनों सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली, धार्मिक तथा पौराणिक, ऐतिहासिक, देशप्रेम से सम्बंधित चलचित्रों का निर्माण हुआ करता था और उन्हें बहुत अधिक पसंद भी किया जाता था। आरंभ में स्टुडिओ पद्धति का प्रचलन रहा। हरेक स्टुडिओ के अपने वेतनभोगी निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, नायक, नायिका तथा अन्य कलाकार हुआ करते थे। पर बाद चलचित्र निर्माण में रुचि रखने वाले लोग स्वतंत्र निर्माता के रूप में फिल्म बनाने लगे। इन स्वतंत्र निर्माताओं ने स्टुडिओं को किराये पर लेना तथा कलाकारों से ठेके पर काम करवाना शुरू कर दिया। चूँकि ठेके में काम करने में अधिक आमदनी होती थी, कलाकारों ने वेतन लेकर काम करना लगभग बंद कर दिया। इस प्रकार स्टुडिओ पद्धति का चलन समाप्त हो गया और स्टुडिओं को केवल किराये पर दिया जाने लगा।
ध्वनि के समावेश:- 1930 के आसपास चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित हो जाने से सवाक् (बोलती) फिल्में बनने लगीं। आलम आरा भारत की पहली सवाक् फिल्म थी जो कि सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्मा इतनी अधिक लोकप्रिय हुई कि उस फिल्म की नायिका देविका रानी को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं। मूक फिल्मों के जमाने तक मुंबई (पूर्व नाम बंबई) देश में चलचित्र निर्माण का केन्द्र बना रहा परंतु सवाक् फिल्मों का निर्माण शुरू हो जाने से और हमारे देश में विभिन्न भाषाओं का चलन होने के कारण चेन्नई (पूर्व नाम मद्रास) में दक्षिण भारतीय भाषाओं वाली चलचित्रों का निर्माण होने लगा। इस तरह भारत का चलचित्र उद्योग दो भागों में विभक्त हो गया।
सामाजिक सरोकारों से हटता सिनेमा:-आज दुनिया भर में मनोरंजन का जनसुलभ और सबसे सस्ता माध्यम सिनेमा है । सिनेमा जब भारत में पहली बार आया, तो कई निर्देशक सक्रिय हो गए। फिल्में बहुतेरी बनीं, लेकिन भारत की पहली फीचर फिल्म कहलाई ‘राजा हरिश्चंद्र’, जिसे बनाया था भारत में सिनेमा के जनक कहलाने वाले दादा साहब फाल्के ने। यह एक मूक फिल्म थी जो कि एक हिंदू पौराणिक कहानी पर आधारित थी। हर दशक के साथ न सिर्फ सिनेमा का रूप स्वरूप बदलता रहा है बल्कि तेवर और सरोकार भी बदलते रहे हैं। आज की फिल्मों में हमें उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड या छत्तीसगढ़ के गाँवों के भारत की तसवीर कम दिखती है जबकि मेट्रो शहरों मुंबई या गोवा की चमक-दमक, शापिंग मॅाल और मल्टीप्लेक्स अधिक दिखता है। कुछ फिल्मकारों ने प्रतिरोध के सिनेमा या सामाजिक सवालों की धारा को अपनी फिल्मों के माध्यम से बरकरार रखा है जिसमें प्रकाश झा का नाम अग्रणी है। औद्योगिक घरानों का दखल :- वैश्वीकरण के बाद सिनेमा पर इन दिनों धीरे-धीरे औद्योगिक घरानों का दखल बढ़ रहा है जो कि उसे और अधिक लाभ कमाऊ फैक्ट्री में तब्दील कर रहा है। आज फिल्मों पर बाजारवाद का वर्चस्व इस कदर बढ़ा है कि वह दर्शकों को क्या परोसा जाएगा यह तय करता है। आज का सिनेमा कई बड़े औद्योगिक घरानों की अकूत पूँजी पर खड़ा है। भारतीय सिनेमा पर पूँजी का यह दखल इस कदर बढ़ रहा है कि यह सिने निर्देशकों के सरोकारों पर खासा असर डाल रहा है। उनकी मानसिकता को बाजारवादी ताकतों के साथ मिलकर कदमताल करने पर मजबूर कर रहा है। सच तो यह है कि सिनेमा जैसा बेहद प्रभावशाली माध्यम, जिससे एक बड़े जनसमुदाय को संबोधित करने या उसे जागरूक करने की अपेक्षा की जाती थी, वह संभावना अस्ताचल की ओर अग्रसर है।
दाऊद का फिल्म फाइनेंसिंग और सट्टेबाजी:- हम सभी लोग सिनेमा के मंहगा टिकटों से लेकर केबल टीवी के बिल और फिल्मी कलाकारों पर हर साल भारी धन खर्च करते हैं। । हमारे बच्चे भी अपने जेबखर्च में से पैसे बचाकर इनके पोस्टर खरीदते हैं और इनके प्रायोजित टीवी कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए हजारों रुपए के फोन करते हैं। सिनेमा पर आठवें और नौंवें दशक के दौरान अडरवर्ल्ड से संबंध और उसकी पूँजी के इस्तेमाल के आरोप भी लगते रहे हैं। सच सिनेमा की शुरुआत में फिल्मों के निर्माण पर कम पूँजी और अधिक समय लगता था। आगे चलकर जब तकनीकी स्तर पर हिंदी सिनेमा मजबूत हुआ तो फिल्में साल दो साल के बजाय फटाफट वाली रफ्तार से बनने लगीं। यहीं से फिल्म उद्योग पर पूँजी का वर्चस्व इतना अधिक बढ़ा कि उसने कंटेंट और सामाजिक सरोकारों को बहुत पीछे ढकेल दिया। 80 के दशक में चोरी और तस्करी करने वाला दाऊद जरायम की दुनिया का बड़ा नाम बन गया. वह फिल्म फाइनेंसिंग और सट्टेबाजी का भी काम करने लगा. इसी दौरान उसकी मुलाकात छोटा राजन से हुई. दोनों मिलकर भारत के बाहर भी काम करने लगे. मुंबई और दुबई के बीच इनके गुनाहों की तूती बोलने लगी. फिल्म उद्योग का सबसे बड़ा फाइनेंसर दाऊद इब्राहिम चाहता है कि बहुसंख्यक बॉलीवुड फिल्मों में हीरो मुस्लिम लड़का और हीरोइन हिन्दू लड़की हो। टी-सीरीज का मालिक गुलशन कुमार ने उसकी बात नहीं मानी और नतीजा सबने देखा ही है। आज भी एक फिल्मकार को मुस्लिम हीरो साइन करते ही दुबई से आसान शर्तों पर कर्ज मिल जाता है। इकबाल मिर्ची और अनीस इब्राहिम जैसे आतंकी एजेंट सातसितारा होटलों में खुलेआम मीटिंग करते देखे जा सकते हैं। सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ अली खान, नसीरुद्दीन शाह, फरहान अख्तर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, फवाद खान जैसे अनेक नाम हिंदी फिल्मों की सफलता की गारंटी बना दिए गए हैं। अक्षय कुमार, मनोज कुमार और राकेश रोशन जैसे फिल्मकार इन दरिंदों की आंख के कांटे हैं। तब्बू, हुमा कुरैशी, सोहाअलीखान और जरीनखान जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों का कैरियर जबरन खत्म कर दिया गया क्योंकि वे मुस्लिम हैं और इस्लामी कठमुल्लाओं को उनका काम गैरमजहबी लगता है। फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे मुस्लिम लेखकों के इर्द-गिर्द ही रहा जिनकी कहानियों में एक भला-ईमानदार मुसलमान, एक पाखंडी ब्राह्मण, एक अत्याचारी – बलात्कारी क्षत्रिय, एक कालाबाजारी वैश्य, एक राष्ट्रद्रोही नेता, एक भ्रष्ट पुलिस अफसर और एक गरीब दलित महिला होना अनिवार्य शर्त है। इन फिल्मों के गीतकार और संगीतकार भी मुस्लिम हों तभी तो एक गाना मौला के नाम का बनेगा और जिसे गाने वाला पाकिस्तान से आना जरूरी है।
शादियों का गजब तरीका:-एक विचारणीय बिन्दू यह भी है कि बालीवुड में शादियों का तरीका ऐसा क्यों है कि शाहरुख खान की पत्नी गौरी छिब्बर एक हिंदू है। आमिर खान की पत्नियां रीमा दत्ता ,किरण राव और सैफ अली खान की पत्नियाँ अमृता सिंह और करीना कपूर दोनों हिंदू हैं। इसके पिता नवाब पटौदी ने भी हिंदू लड़की शर्मीला टैगोर से शादी की थी। फरहान अख्तर की पत्नी अधुना भवानी और फरहान आजमी की पत्नी आयशा टाकिया भी हिंदू हैं। अमृता अरोड़ा की शादी एक मुस्लिम से हुई है जिसका नाम शकील लदाक है। सलमान खान के भाई अरबाज खान की पत्नी मलाइका अरोड़ा हिंदू हैं और उसके छोटे भाई सुहैल खान की पत्नी सीमा सचदेव भी हिंदू हैं।
शादी के लिए धर्म परिवर्तन :- अनेक उदाहरण ऐसे हैं कि हिंदू अभिनेत्रियों को अपनी शादी बचाने के लिए धर्म परिवर्तन भी करना पड़ा है। आमिर खान के भतीजे इमरान की हिंदू पत्नी का नाम अवंतिका मलिक है। संजय खान के बेटे जायद खान की पत्नी मलिका पारेख है। फिरोज खान के बेटे फरदीन की पत्नी नताशा है। इरफान खान की बीवी का नाम सुतपा सिकदर है।
मुसलमान एक्टर का हिंदू नाम:- एक समय था जब मुसलमान एक्टर हिंदू नाम रख लेते थे क्योंकि उन्हें डर था कि अगर दर्शकों को उनके मुसलमान होने का पता लग गया तो उनकी फिल्म देखने कोई नहीं आएगा। ऐसे लोगों में सबसे मशहूर नाम युसूफ खान का है जिन्हें दशकों तक हम दिलीप कुमार समझते रहे। महजबीन अलीबख्श मीना कुमारी बन गई और मुमताज बेगम जहाँ देहलवी मधुबाला बनकर हिंदू ह्रदयों पर राज करतीं रहीं। बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी को हम जानी वाकर समझते रहे और हामिद अली खान विलेन अजित बनकर काम करते रहे। हममें से कितने लोग जान पाए कि अपने समय की मशहूर अभिनेत्री रीना राय का असली नाम सायरा खान था। आज के समय का एक सफल कलाकार जान अब्राहम भी दरअसल एक मुस्लिम है जिसका असली नाम फरहान इब्राहिम है।
अब हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं:- पिछले 50 साल में ऐसा क्या हुआ है कि अब ये मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखने की जरूरत नहीं समझते बल्कि उनका मुस्लिम नाम उनका ब्रांड बन गया है। यह उनकी मेहनत का परिणाम है या हम लोगों के अंदर से कुछ खत्म हो गया है? हिंदू अभिनेता संजय दत्त ने अपनी पत्नी मान्यता का नाम दिलनवाज शेख क्यों रखा है। सभी जानते हैं कि संजय दत्त के पिता सुनील दत्त एक हिंदू थे और उनकी पत्नी फातिमा राशिद यानी नर्गिस एक मुस्लिम थीं। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि संजय दत्त ने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम कबूल कर लिया लेकिन वह इतना चतुर भी है कि अपना फिल्मी नाम नहीं बदला।
सिनेमा का नियंत्रण कारपोरेट ताकतों के पास:- सिनेमा का अंदाज और कंटेंट पिछले दो दशकों के दौरान बहुत सतही हुआ है और फिल्मों में हिंसा और मारधाड़ हावी हो चली है। इसकी एक वजह यह भी है कि इंटरनेट, सीडी, मनोरंजन चौनलों और अखबारों ने गंभीरता की विदाई कर दी है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सिनेमा का नियंत्रण जब कारपोरेट ताकतों के पास होगा तो वे उसे किसी फैक्ट्री की भाँति चलाएँगी ही। ये ताकतें जब पूँजी निवेश करेंगी तो उसकी वापसी मुनाफे के साथ कराने के लिए वे उसे बदलेंगी ही क्योंकि उनके लिए सरोकार और शिक्षण के बजाय कमाई ज्यादा मायने रखती है। आज यही हो रहा है। यही कारण है कि सिनेमा अब कस्बाई नहीं बल्कि मेट्रो और माल वाला हो गया है। आज छोटे कस्बों और छोटे शहरों से सिनेमा की विदाई हो गई है वे या तो आलू के गोदाम बन गए हैं या फिर गेस्ट हाउस या बारातघर। फिल्म निर्माता पर बाजारवादी ताकतों का इतना दबाव है कि वह चाहे हीरोइन के कपड़े उतरवाएँ या डांस कराएँ लेकिन फिल्म निर्माण पर लगा बजट जरूर वापस कराएँ। वैसे सच तो यह है कि आज का सिनेमा सिर्फ इंटरटेनमेंट है और इससे अलग कुछ भी नहीं। यही वजह है कि सिनेमा आज अपने सामाजिक सरोकारों से पीछे हटता जा रहा है। आज की फिल्मों को और हिंदी सिनेमा को इसी रूप में देखा जाना चाहिए।

2 thoughts on “भारतीय सिनेमा में मुस्लिम प्रभाव को बढ़ावा

  1. दाऊद इब्राहिम से पहले हाजी मस्तान भी फिल्म उद्योग में बहुत पैसा लगाता था….पृथ्वी स्टूडियो..पृथ्वी राजकपूर ने बनाया था जिसमे अधिकांश हिन्दू कलाकार ही कार्य करते थे..मुख्य रुप से शंकर-जयकिशन (संगीतकार) व शेलेन्द्र जी (गीतकार) एवं अन्य कई हिन्दू कलाकार पृथ्वी स्टूडियो की देंन माना जाता है… दुसरी और महबूब स्टूडियो था जो मुस्लिमों को प्रोत्साहन देता था ।.इसमें कोई संदेह नहीं कि फिल्म देखकर जो गहराई तक सोच व मानसिकता बनती है वह पढ़ने व लिखने से नहीं बनती ….और इसका प्रभाव बहुत शीघ्रता से बाल व युवा मन को आकर्षित करके प्रभावित करता है।भारत-चीन युद्ध 1962 पर बनी “हकीकत” व स्वतंत्रता संग्राम पर मनोज कुमार की “शहीद” जैसी फिल्मों ने उस समय मेरे जैसे लाखों बालकों के मन में राष्ट्रभक्ति का संचार किया व “दोस्ती” आदि जैसी मानवीय फिल्मो ने ह्रदय को उदार व दयावान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई ।इसी प्रकार अन्य शिक्षाप्रद व धार्मिक चित्रपटो से अच्छाई ग्रहण करके जीवन को सार्थक बनाने में सहयोग मिलता रहा और सकारात्मक मानसिकता विकसित हुई।बहुत कुछ पहले ही आपने उपरोक्त लेख में लिखा है जो मै भी पिछले 30 वर्षों से कहता व लिखता रहा हूँ।
    बहुत धन्यवाद
    विनोद कुमार सर्वोदय, ग़ाज़ियाबाद

  2. आपने सब ठीक लिख, किंतु,हिंदू जाति ग्यांवान होने के बाव्जूद मुसल्मानों के शिकार है। लड्कियँ मुसल्मान एक्टरों को ही चाहती है। , माता पिता उनको अपने काबू में रखने में भी नाकाव है, मतलब हम हिंदू जाति इतने बेवकूफ क्यों है ।

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