बिना बाल शिक्षा के देश के उज्जवल भविष्य की कल्पना करना निरर्थक

वर्तमान में भारत देश में कई जगहों पर आर्थिक तंगी के कारण माँ-बाप ही थोड़े पैसों के लिए अपने बच्चों को ऐसे ठेकेदारों के हाथ बेच देते हैं, जो अपनी सुविधानुसारउनको होटलों, कोठियों तथा अन्य कारखानों आदि में काम पर लगा देते हैं। और उन्हीं होटलों, कोठियों और कारखानों के मालिक बच्चों को थोड़ा बहुत खाना देकरमनमाना काम कराते हैं। और घंटों बच्चों की क्षमता के विपरीत या उससे भी अधिक काम कराना, भर पेट भोजन न देना और मन के अनुसार कार्य न होने पर पिटाईयही बाल मजदूरों का जीवन बन जाता है।

childhood-2बाल दिवस 14 नवंबर 2016 पर विशेष

भारत में प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू की जन्म जयंती को बाल दिवस के रूप में 14 नवंबर को  मनाया जाता है। क्योंकि स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरूजी को बच्चों से बहुत प्यार था और बच्चे उन्हें चाचा नेहरू पुकारते थे। स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू जी का जन्मदिवस बाल दिवस के रूप में बच्चों को समर्पित भारतका एक राष्ट्रीय त्योहार है। दरअसल बाल दिवस बच्चों के लिए महत्वपूर्ण दिन होता है। बच्चों को स्कूल में हर साल बाल दिवस का आने का इंतजार रहता है। क्योंकिइस दिन स्कूलों में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन होता है। जिसमें बच्चे बढ़-चढ़कर भागीदारी करते हैं। और अपनी प्रतिभा दिखाते हैं। इस दिन स्कूली बच्चों के चेहरेपर खुशी देखने लायक होती है। इस दिन बच्चे स्कूलों में सज-धज कर जाते हैं। और  अपने चाचा जवाहर लाल नेहरू को प्यार से याद करते हैं। लेकिन दुनियाभर मेंबहुत सारे ऐसे भी बच्चे हैं। जिन्हें बाल दिवस का मतलब ही नहीं पता। उनके लिए हर दिन मुश्किलों से भरा होता है। क्योंकि उनकी या उनके परिवार की ऐसी स्थितिनहीं होती है। जिससे कि वे स्कूल जा सकें या बाल दिवस पर होनें वाले कार्यक्रमों का हिस्सा बन सकें।

बच्चे देश का का आने वाला भविष्य हैं। इसलिए हमें बच्चों की शिक्षा में अमीर-गरीब या लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। बच्चों को बाल श्रमिक बनने सेरोकना चाहिए। जो उम्र बच्चों के खेलने और पढ़ने की होती है उसमें आज भी पूरे विश्व में  बच्चे मजदूरी करते हैं। भारत देश के बारे में कहा जाए तो यहाँ बाल मजदूरीबहुत बड़ी समस्या है। भारत में बाल मजदूरी की समस्या सदियों से चली आ रही है। कहने को भारत देश में बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है। फिर भी बच्चोंसे बाल मजदूरी कराई जाती है। जो दिन बच्चों के पढ़ने, खेलने और कूदने के होते हैं, उन्हें बाल मजदूर बनना पड़ता है। इससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता जारहा है। कहने को सरकारें बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए बडे-बडे वादे और घोषणाएं करती हैं, फिर भी होता सिर्फ ढाक के वही तीन पात है। इतनी जागरूकताके बाद भी भारत देश में बाल मजदूरी का खात्मा दूर-दूर तक नहीं दिखता है। इसके उल्ट बाल मजदूरी दिन व दिन बढती जा रही है मौजूदा समय में गरीब बच्चे सबसेअधिक शोषण का शिकार हो रहे हैं। जो गरीब बच्चियां होती हैं उनको पढने भेजने की जगह घर में ही बाल श्रम कराया जाता है। छोटे-छोटे गरीब बच्चे स्कूल छोड़करबाल-श्रम हेतु मजबूर हैं। बाल मजदूरी बच्चों के मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक एवं सामाजिक हितों को प्रभावित करती है। जो बच्चे बाल मजदूरी करते हैं, वोमानसिक रूप से अस्वस्थ्य रहते हैं और बाल मजदूरी उनके शारीरिक और बौद्धिक विकास में बाधक होती है। बालश्रम की समस्या बच्चों को उनके मौलिक अधिकारोंसे वंचित करती है। जो की सविधान के विरुध्द है और मानवाधिकार का सबसे बड़ा उल्लंघन है।

बाल-श्रम की समस्या भारत में ही नहीं दुनिया कई देशों में एक विकट समस्या के रूप में विराजमान है। जिसका समाधान खोजना जरूरी है। भारत में 1986 मेंबालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित हुआ। इस अधिनियम के अनुसार बालश्रम तकनीकी सलाहकार समिति नियुक्त की गई। इस समिति की सिफारिश केअनुसार, खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में शोषण और अन्याय के विरुध्द अनुच्छेद 23 और 24 को रखागया है। अनुच्छेद 23 के अनुसार खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। और संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 साल के कम उम्र काकोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा। औरफैक्टरी कानून 1948 के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जासकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन साढ़े चार घंटे कीकार्यावधि तय की गयी है और रात में उनके काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। फिर भी इतने कडै कानून होने के बाद भी बच्चों से  होटलों, कारखानों, दुकानोंइत्यादि में दिन-रात कार्य कराया जाता हैं। और विभिन्न कानूनों का उल्लंघन किया जाता है। जिससे मासूम बच्चों का बचपन पूर्ण रूप से प्रभावित होता है।

आज विश्व में जितने बाल श्रमिक हैं, उनमें सबसे ज्यादा भारत देश में हैं। एक अनुमान के अनुसार विश्व के बाल श्रमिकों का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा भारत में है।और एक अनुमान के अनुसार भारत के 50 प्रतिशत बच्छे अपने बचपन के अधिकारों से वंचित हैं। न उनके पास शिक्षा की ज्योति पहुँच पा रही है और न ही उचितपोषण। हालांकि फैक्ट्री अधिनियम, बाल अधिनियम, बाल श्रम निरोधक अधिनियम आदि भी बच्चों के अधिकार को सुरक्षा देते हैं। किन्तु इसके विपरीत आज की स्थितिबिलकुल अलग है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 2 करोड़ बाल मजदूर हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार तो भारतीय सरकारी आंकडों से लगभग ढाईगुना ज्यादा 5 करोड़ बच्चे बाल मजदूर हैं। असल में कहा जाए तो बच्चे अपनी उम्र के अनुरूप कठिन काम गरीबी के कारण करते हैं। गरीबी ही बच्चे को बाल श्रमिकबनने को मजबूर करती है। इसके अलावा भी बढती जनसँख्या, सस्ती मजदूरी, शिक्षा का अभाव और मौजूदा कानूनों का सही तरीके से क्रियान्वित न हो पाना जैसेकारण बाल श्रम के लिए जिम्मेदार हैं।

वर्तमान में भारत देश में कई जगहों पर आर्थिक तंगी के कारण माँ-बाप ही थोड़े पैसों के लिए अपने बच्चों को ऐसे ठेकेदारों के हाथ बेच देते हैं, जो अपनी सुविधानुसारउनको होटलों, कोठियों तथा अन्य कारखानों आदि में काम पर लगा देते हैं। और उन्हीं होटलों, कोठियों और कारखानों के मालिक बच्चों को थोड़ा बहुत खाना देकरमनमाना काम कराते हैं। और घंटों बच्चों की क्षमता के विपरीत या उससे भी अधिक काम कराना, भर पेट भोजन न देना और मन के अनुसार कार्य न होने पर पिटाईयही बाल मजदूरों का जीवन बन जाता है। इसके अलावा भी काम देने वाला नियोक्ता बच्चों को पटाखे बनाना, कालीन बुनना, वेल्डिंग करना, ताले बनाना, पीतलउद्योग में काम करना, कांच उद्योग, हीरा उद्योग, माचिस, बीड़ी बनाना, कोयले की खानों में, पत्थर खदानों में, सीमेंट उद्योग, दवा उद्योग आदि सभी खतरनाक कामअपनी मर्जी के अनुसार कराते हैं। कई बार श्रम करते-करते बच्चों को यौन शोषण का शिकार भी होना पड़ता है। और खतरनाक उद्योगों में काम करने से कैंसर औरटीबी आदि जैसी गंभीर बीमारियां का सामना करना पडता है। एक तरह से बाल श्रमिक का जीवन जीते जी नरक बन जाता है।

आज बाल मजदूरी समाज पर कलंक है। इसके खात्मे के लिए सरकारों और समाज को मिलकर काम करना होगा। साथ ही साथ बाल मजदूरी पर पूर्णतया रोक लगनीचाहिए। बच्चों के उत्थान और उनके अधिकारों के लिए अनेक योजनाओं का प्रारंभ किया जाना चाहिए। जिससे बच्चों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव दिखे। और शिक्षाका अधिकार भी सभी बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। गरीबी दूर करने वाले सभी व्यवहारिक उपाय उपयोग में लाए जाने चाहिए। बालश्रम की समस्याका समाधान तभी होगा जब हर बच्चे के पास उसका अधिकार पहुँच जाएगा। इसके लिए जो बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं, उनके अधिकार उनको दिलाने के लियेसमाज और देश को सामूहिक प्रयास करने होंगे। आज देश के प्रत्येक नागरिक को बाल मजदूरी का उन्मूलन करने की जरुरत है। और देष के किसी भी हिस्से में कोईभी बच्चा बाल श्रमिक दिखे, तो देष के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह बाल मजदूरी का विरोध करे। और इस दिशा में उचित कार्यवाही करें साथ ही साथ उनकेअधिकार दिलाने के प्रयास करें। क्योंकि बच्चे ही भारत के भविष्य हैं। क्योंकि जब तक बच्चों को उनके अधिकारों और शिक्षा से वंचित रखा जायेगा। तब तक देश केउज्जवल भविष्य की कल्पना करना निरर्थक है। चाचा नेहरू के सपनों का भारत तभी बन सकता है जब भारत के प्रत्येक बच्चे तक शिक्षा की ज्योति पहुंचे। जब तकभारत देश और पूरे विश्व से बाल मजदूरी खत्म नहीं होती तब तक बाल दिवस मनाना सार्थक नहीं होगा।

ब्रह्मानंद राजपूत

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