मनुष्य का धर्म सद्ज्ञान व विवेक की प्राप्ति और उसके अनुसार आचरण कर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति है’

मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्यों को अपने कर्तव्यों का ज्ञान कहां से प्राप्त हो सकता है? क्या मत-मतान्तरों की शिक्षा से कर्तव्यों का यथार्थ ज्ञान मिलता है कि जिससे मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूरा होता हो? ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो फिर सभी मनुष्य आपस में प्रेम से रहते और उनकी धार्मिक, आत्मिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक व भौतिक सभी प्रकार की उन्नति होती। समाज में कहीं हिंसा, अन्याय व शोषण न होता और देश व विश्व में सर्वत्र सुख शान्ति होती। ऐसा न होना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्यों को अपने कर्तव्यों का यथार्थ ज्ञान नहीं है जिससे उनके जीवन का उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष पूरा होता है। अब यदि मत-मतान्तरों से पूरा नहीं हो रहा है तो उसके कारण जानने के लिए प्रयत्न करना चाहिये और उसे जानकर फिर कर्तव्यों के यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति के स्रोत को प्राप्त करने का प्रयास करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। मत-मतान्तर होते क्या हैं? इसका उत्तर है कि समय समय पर सामान्य मनुष्यों से कुछ अधिक ज्ञान रखने वाले पुरुष समाज में जन्म लेते रहते हैं जो अल्पज्ञ होने पर भी अपनी किंचित उन्नत बुद्धि से तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार कुछ उपयोगी बातें प्रचारित करते हैं जिनसे मनुष्यों को तात्कालिक लाभ होता है। ऐसे विद्वान मनुष्य ही प्रायः मत प्रवर्तक कहलाते हैं। इन लोगों का ज्ञान भी निभ्र्रान्त, सत्य व यथार्थ नहीं होता। इसके विपरीत सभी मनुष्य व मत-प्रवर्तक अल्पज्ञ होने के साथ कुछ कम व अधिक लोकेषणा, वित्तेष्णा और पुत्रैषणा से भी प्रभावित होते हैं। इन एषणाओं के अतिरिक्त जीवात्मा वा मनुष्यों में काम, क्रोध, लोभ, मोह, इच्छा, राग व द्वेष आदि भी पाये जाते हैं जो किसी में कुछ कम व कुछ में अधिक होते हैं। इन अवगुणों से भी हमारे मत-प्रवर्तक न्यूनाधिक प्रभावित रहते हैं। इन अवगुणों पर शत प्रतिशत विजय प्राप्त करना असम्भव नहीं तो महाकठिन अवश्य है। इस कारण से मत-मतान्तरों से मनुष्यों को अपने कर्तव्यों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता। सत्य, यथार्थ व निभ्र्रान्त ज्ञान के लिए तो मनुष्यों को इस संसार के रचयिता ईश्वर की ही शरण में जाना होता है। ईश्वर सभी जीवों का माता-पिता-आचार्य-गुरु-राजा- न्यायाधीश-स्वामी आदि है। अतः जीवों को कर्तव्य व अकर्तव्यों का ज्ञान कराना ईश्वर का भी कर्तव्य है। हमारे ऋषियों ने इस पर विचार किया है। इसका उत्तर मिलता है कि ईश्वर प्रत्येक कल्प वा सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों के कल्याणार्थ वेदों का ज्ञान देता है। वह ज्ञान अपने आप में पूर्ण और सर्वांश में सत्य होता है। उससे जीवात्मा वा मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। जीवात्मा व मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह ईश्वर प्रदत्त उस ज्ञान की रक्षा करें और उसे भावी पीढ़ियों को बिना किसी प्रकार किंचित विकार किये यथावत् प्रदान करें वा सौंपे। सृष्टि में यह देखने को भी मिलता है कि ईश्वरप्रदत्त यह वेदज्ञान महाभारतकाल तक हमारे ऋषियों, विद्वानों, आचार्यों आदि ने सुरक्षित रखा व बाद वालें अनेक विद्वानों व ऋषियों ने भी इसे सुरक्षित रखने का हर सम्भव प्रयत्न किया। इसकी कारण यह ज्ञान ऋषि दयानन्द को प्राप्त हो सका और उन्होंने भी ऋषियों के मार्ग व परम्पराओं का अनुगमन करते हुए उसे अपनी समकालीन पीढ़ीयों व भावी लोगों तक पहुंचाने की दृष्टि से उस पर सरल टीकायें आदि लिखकर प्रस्तुत किया। वस्तु स्थिति यह कि महर्षि दयानन्द को वेदों की प्राप्ति व उनके आशय व अर्थ जानने व उसे प्रचारित करने के लिए घोर तप वा पुरुषार्थ करना पड़ा। ऐसा लगता है कि इसमें भी कहीं ईश्वर की ही प्रेरणा व इच्छा रही अन्यथा मानव जाति सदा सदा के लिए वैदिक ज्ञान व साहित्य से वंचित हो सकती थी।

 

हमने यह समझा है कि मत-मतान्तर पूरी तरह से मनुष्य जीवन के उद्देश्य को जानने व उसकी प्राप्ति के यथार्थ साधन बताने में पूरी तरह से सफल नही हुए हैं। मनुष्य धर्म वा मनुष्य के समस्त कर्तव्य व अकर्तव्यों का यथार्थ ज्ञान तो ईश्वर व इसके ज्ञान वेद से ही प्राप्त हो सकता है। संसार में ईश्वर का ज्ञान किस रूप में उपलब्ध है, इस पर भी विचार करना समीचीन है। हमें यह भी ज्ञात है कि संसार की सबसे पुरानी पुस्तक वेद है। वेद देववाणी संस्कृत में हैं। वेद के समस्त पद व शब्द रूढ़ न होकर यौगिक वा योगरूढ़ हैं। वेद के शब्दों के अर्थ निरुक्त व निघण्टु आदि ग्रन्थों की सहायता से ही किये जा सकते हैं। यह भी तथ्य है कि वेद सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न होने से वेदों में इतिहास का वर्णन नहीं है। इतिहास उन ग्रन्थों में ही हो सकता है जो ग्रन्थ सृष्टि व मनुष्यों की उत्पत्ति के बाद बनें हों। वेदों में इतिहास का होना तभी सम्भव होता जब कि यह ज्ञान सृष्टि के आदि काल में प्राप्त न होकर बाद के वर्षों में प्राप्त होता। ईश्वर व जीव का स्वरूप क्या है, इसका निर्धारण मुख्यतः व यथार्थ रूप में वेदाध्ययन कर ही जाना जा सकता है। जन्म व मरण की पहेली क्या है। मृत्यु से बचने के उपाय व साधन क्या हैं? दुःखों की निवृति सहित आनन्द वा सुख की प्राप्ति किन किन साधनों से हो सकती हैं?

 

विचार करने पर इसका उत्तर मिलता है कि सभी प्रकार का सत्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए वेदों की ही शरण व ईश्वर की भक्ति वा उपासना ही साधन हैं। जीवात्मा को विवेक अर्थात् कर्तव्य व अकर्तव्य का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य सिद्ध होता है। इसके साधन भी वेदाध्ययन से उत्पन्न सत्यासत्य के ज्ञान से जाने जाते हैं। वेदाध्ययन वेदाध्यायी को ईश्वरोपासना में प्रवृत्त करते हैं जिससे ईश्वर व जीवात्मा का साक्षात्कार होता है। इस अवस्था में पहुंचकर मनुष्य जीवनमुक्त अवस्था को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर वह ईश्वरोपासना जारी रखते हुए परोपकार, सेवा, देश-समाज-संसार के हित व कल्याण के कार्य ही करता है। उसका मुख्य कार्य दूसरों के कल्याणार्थ सदज्ञान का प्रचार व प्रसार करना होता है जैसा कि ऋषि दयानन्द सरस्वती व उनके अनुयायियों स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, महात्मा आनन्द स्वामी आदि ने किया है। ऐसा करने से सत्य व यथार्थ धर्म की उन्नति होती है। इसका उद्देश्य अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाना व किन्हीं स्वार्थों की पूर्ति करना नहीं होता अपितु जन-जन का हित व कल्याण करना होता है। इससे मनुष्य की इहलौकिक व पारलौकिक उन्नति होती है जो कि धर्म का मुख्य उद्देश्य है। इस स्थिति में पहुंचे हुए मनुष्य के दुःखों की निवृत्ति हो जाती है। उसे जो ज्ञान प्राप्त होता है, उससे सन्तोष प्राप्त होता है। शंकायें व भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं। जीवन सुख व प्रसन्नता से पूर्ण होता है। ऐसे व्यक्ति को न तो सुख के साधनों, कार, बंगला, बैंक बैलेंस, मान, प्रतिष्ठा आदि, के प्रति कोई मोह होता है और न अपने जीवन के प्रति किसी प्रकार का राग व लगाव। ऐसा मनुष्य ही, ईश्वर से इतर, एक सीमा तक पूर्ण पुरुष वा पूर्ण मनुष्य कहा जा सकता है। महर्षि दयानन्द ने कहा है कि सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। मनुष्य को अपना प्रत्येक कार्य सत्य और असत्य को विचार करके करना चाहिये। मत-मतान्तरों के अनुयायियों को सत्य व असत्य का विचार करने की छूट नहीं है। उन्हें वही करना पड़ता है जो उनके मतों की पुस्तकों में कहा गया होता है या उनके धर्म गुरु जैसा उन्हें कहते हैं। इस कारण मत-मतान्तरों के अनुयायियों द्वारा सत्याचार वा सत्याचरण से युक्त मनुष्य धर्म का पालन नहीं हो पाता। इस कारण वेदाचरण से जो परिणाम मिलता है वह मताचरण से प्राप्त नहीं होता। अतः मनुष्यों की सभी प्रकार से उन्नति के लिए सभी मत-मतान्तरों के अनुयायियों को अपना मत वेदमत के अनुकूल बनाना होगा। वेदाचरण वा वेदानुकूल आचरण से ही मनुष्य सच्चा मनुष्य बनेगा। ऐसा मनुष्य ही वस्तुतः अपने जीवन के उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने वाला हो सकता है। इस अवस्था को प्राप्त करने वाले संसार में गिने चुने मनुष्य ही होते हैं।

 

जो मनुष्य अपना कल्याण करना चाहते हैं उन्हें मत-मतान्तरों से स्वयं को पृथक रख कर सद्ज्ञान की प्राप्ति व उसके अनुकूल आचरण करने का दृण निश्चय करना ही होगा। यही जीवन उन्नति का एकमात्र ऋजु वा सरल मार्ग है। इसकी पुष्टि आर्यसमाज के इस नियम से भी होती है जिसमें कहा गया है कि ‘अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।’ यदि धर्म व जीवन के क्षेत्र में इस नियम का पालन किया जाये तो संसार में अविद्यायुक्त मत छूट कर विद्या व ज्ञान का मत स्थापित होकर संसार दुःखों से रहित व सुख-शान्ति से समृद्ध हो सकता है। यही धर्म का उद्देश्य व लक्ष्य भी होता है। इसी का प्रचार महर्षि दयानन्द जी ने किया और इसके लिए ही अपने प्राणों की आहुति दी। उनके जीवन का मुख्य सन्देश उनके प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में विद्यमान है। उसका अध्ययन कर सत्य को ग्रहण करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

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