ए डिफ़रंट टेक : पुस्तक की समीक्षात्मक टिप्पणी ​

विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।
एक, पुस्तक की समीक्षात्मक टिप्पणी ​
Dr. Madhusudan ​(१)​विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।​”स्वगृहे पूज्यते मूर्खः, स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः।​ स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥”​​**मूर्ख व्यक्ति का सर्वाधिक ध्यान घर परिवार में रखा जाता है, ग्राम देवता की पूजा सारे गाँव द्वारा (में) सम्पन्न होती है; राजा का सम्मान स्वदेश में किया जाता है; पर विद्वान व्यक्ति सर्वत्र (परदेश में भी) पूजा जाता है, सम्माना जाता है।​**
इस सुभाषित का  अंतिम अंश  जिस विद्वान व्यक्तिपर कसा और परखा जा सकता है, जिस व्यक्ति को, मैं कुछ गहराई में जानता हूँ , वह व्यक्ति है डॉ. बलराम सिंह। जिनकी  अंग्रेज़ी पुस्तक ’ए डिफ़रंट टेक’ (A Different Take ) की, एक अलग (और विशेष) दृष्टि पर यह समीक्षात्मक टिप्पणी है। डॉ. बलराम सिंह जी द्वारा गत बीस वर्षों में लिखे  गए आलेखों का यह संकलन हैं; और प्रतिष्ठित मोतीलाल बनारसी दास द्वारा प्रकाशित।​आपके व्यक्तित्व पर दो आलेख पहले ही लिख चुका हूँ। उचित होगा, कि, इस लेखन को  मैं टिप्पणी ही कहूँ।​​(२)​ अनुभव रहा है, कि, नरेन्द्र  मोदी जी के साम्प्रत शासन पूर्व   बहुतेरे प्रवासी भारतीय भी भारत वा भारतीय संस्कृति के प्रति हेय दृष्टि से देखते थे। इस सच्चाई का अनुभव इस टिपाणी लेखक ने किया है। तब, दारुण निराशा में ही बहुतेरा प्रवासी भारतीय डूबा था।​ऐसी निराशाजनक स्थिति में भी युनीवर्सीटी में  बिना बजट, आयोजित भारतीय कार्यक्रमों में, डा. बलराम सिंह जी की अग्रगण्य और सक्रिय सहायता हुआ करती थी।​​मोदी जी के शासन में, आज स्थिति बदली हुयी है। आप की पुस्तक डिफरंट टेक इस का ऐतिहासिक विवरण सूक्ष्मता और प्रदत्त सामग्री सहित प्रस्तुत करती है। प्रवासी भारतीय अपनी साख और विशेषज्ञता के बल पर इस ऐतिहासिक आयाम के अंतर्गत जो योगदान करते हैं, और कर सकते हैं, उस के कई पहलु सिंह साहेब ने निर्देशित किए हैं।
 इसी उद्देश्य से प्रेरित सक्रिय प्रवासी भारतीयों को पुस्तक अर्पण की गई है। जो पुस्तक के अनोखे उद्देश्य  का  भी संकेत देती है।​ऐसा योगदान करनेवाले साहसी और सक्रिय प्रवासी भारतीय अल्प होते हुए भी अपनी सक्रियता के कारण नगण्य नहीं है। ​​(३)​अर्पण:​’भारत से बाहर गए, जाते जाते, साथ भारत को भी साथ ले गए, ऐसे  साहसी वीरों को यह पुस्तक समर्पित है। मानो, वे कह रहे हैं, हम भारत के बाहर अवश्य हैं, पर भारत हममें समाया है।” ​ऐसे साहसी वीरों को यह पुस्तक समर्पित हैं। ​(४)​पश्चिमी विद्वानों की दृष्टि में भी, ​प्रवासी भारतीय अन्य देशीय प्रवासियों से अलग होते हैं। शायद कारण है, उनका कर्तव्य प्रेरित योगदान। भौतिक स्वार्थ प्रेरित पश्चिम की परम्परा के  सामने भारत की काल की कसौटी पर सफल प्रमाणित हुयी, कर्तव्य प्रेरित, कुटुम्ब पद्धति जो इन प्रवासी भारतीयों की साथ साथ  जाने अनजाने ही चली आई। ​(५)​प्रवासी भारतीय अनजान ​बहुत से प्रवासी भारतीय भी इस तथ्य से अनजान है। क्योंकि, जो वस्तु आपके पास होती है; उसपर व्यक्ति की दृष्टि सहसा ( ब्लाइण्ड स्पॉट) उपेक्षित रहती है।
 देखता हूँ, कि, जो उनके पास नहीं था, उसे पाने के चक्कर में, और वही अपनी सन्तानों को  भी भरसक  देने में, बहुसंख्य  प्रवासी भारतीय भूल जाते हैं, जो उन्हें धरोहर में सहज बिना प्रयास मिला था। ​बहुसंख्य भारतीय और प्रवासी भारतीय भी जिस संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने के आदि है; उसी के पास वैश्विक समस्याओं का समाधान है।​(६)​इतिहासवेत्ता अर्नाल्ड टोयनबी का उद्धरण ​विद्वान इतिहासवेत्ता और वैश्विक मान्यता प्राप्त अर्नाल्ड टोयनबी नें  करीब ३८ संस्कृतियों का अध्ययन करने के पश्चात भारतीय संस्कृति का  अकेली का मार्ग ही विश्व को वैश्विक समस्याओं से छुटकारा पाने में सहायक होने की क्षमता रखता है, इस अर्थ का विधान किया था।​ऐसे जानकार प्रवासी लोगों की संख्या जो अल्प भी हो, पर यही जानकारी हमारी विशेष है। औरअल्प संख्या भी इस घोर समस्याओं के समाधान में, अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान करने की क्षमता रखती है।  वास्तव में यह सहिष्णु हिन्दुत्व  की विशेषता है। ​(७) ​भारतीय संस्कृति है, दूध में शक्कर  ​​अपने संबंधियों को सहायता दे कर के यहाँ बुलानेवाले काफी प्रवासी भारतीय जानता हूँ।और समन्वयी सहकार से यहाँ और भारत में भी सामाजिक योगदान करनेवाले भी जानता हूँ। और उनका  सहिष्णु व्यवहार जो उनकी सांस्कृतिक पहचान है, उससे भी  परिचित हूँ। 
वास्तव में,​भारतीय संस्कृति जहाँ  भी गयी दूध में शक्कर की भाँति घुल मिल गयी। ​अडंगा वा समस्या नहीं बनी। संघर्ष से नहीं समन्वय से स्थानिक समस्याएँ सुलझाने में सहायक रही। ​
और दूसरी ओर, अपने पीछे छोडे  भारतीय रिश्तेदारों को भी सहायता करने में पीछे नहीं रही। प्रवासी चीनियों से अनुपात में सात गुना अमरिकन  मुद्रा (स्वदेश भारत को)  भेजनेवाला प्रवासी भारतीय ही है। ओबामा शासन में ५० तक और ट्रम्प शासन में भी दो दर्जन तक प्रवासी भारतीयों की नियुक्तियाँ करने के पीछे यही कारण मानता हूँ।​अर्थात: प्रवासी भारतीय  भारत को भी भूला नहीं है। यह जानकर किस भारतीय को हर्ष नहीं होगा?​साथ साथ, यहाँ हर क्षेत्र में भारतीय,  प्रोफ़ेसर, डाकटर, शिक्षक, मोटेल मालिक, डेन्टिस्ट, इत्यादि  व्यवसायो में , अपने  नाम का, और  साथ भारत का डंका बजा  चुका है।​​(८)​भारत और अमरिका दोनो को लाभ:​इस सांस्कृतिक संबंध ने,भारत और अमरिका दोनो को लाभान्वित किया है।​एक कालेज शिक्षित अण्डर ग्रॅज्युएट  व्यावसायिक पैदा करने अमरिका को ४ से ५ लाख डालर लगते हैं, वहाँ भारत से ऐसा व्यावसायिक सस्ते में मिल जाता है। साथ समन्वयी सांस्कृतिक योगदान भी अनायास साथ होता है।  ​​पर निम्न उद्धरण जिसका लेखक बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का सीईओ ​मार्क सुजमैन   है। 
​शीर्षक है, “भारत दिखाए महामारी से मुक्ति की राह”June 2, 2020, NBT एडिट पेज in नज़रिया | देश-दुनिया, सोसाइटी लेखक: मार्क सुजमैन।।(कुछ अंश ही प्रस्तुत है) ​”अच्छी बात यह है कि भारत इस वैश्विक चुनौती को भी संबोधित कर रहा है। यहां के खोजियों, विद्वान वैज्ञानिकों और दवा निर्माताओं की क्षमता, दवाओं के निर्माण में उच्च स्तरीय सुरक्षा मानकों के पालन की भावना और सहयोग की परंपरा इस देश को वहां ला खड़ा करती है जहां से यह दुनिया को इस महामारी से बाहर निकलने का रास्ता दिखा सकता है।—–​​—–यही वह समय है जब भारत दुनिया की अगुआई कर सकता है। जब बात हो नई खोज की तो वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में भारत पहले ही महत्वपूर्ण दर्जा प्राप्त कर चुका है।​​——मैंने पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से भारत के जबर्दस्त उभार को करीब से देखा है। इसीलिए मैं इसकी मजबूती और संभावनाओं में अन्य लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा यकीन रखता हूं। एक साझेदार के तौर पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन इस वैश्विक संकट का समाधान तलाशने में भारत के साथ खड़ा है।​(लेखक बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सीईओ हैं)​​अंत में, इस ” डिफ़रन्ट टेक” पुस्तक को प्रत्येक भारत हितैषी चिन्तक और विद्वान ने पढना और आत्मसात करना चाहिए। शासन भी इस दृष्टि का अध्ययन करे। ​इस विचार प्रवर्तक डिफ़रन्ट टेक” पुस्तक के लिए मैं मेरे मित्र डॉ. बलराम सिंह जी को  हृदयतल से शुभेच्छाएं देता हूँ।​

डॉ. मधुसूदन ​

2 thoughts on “ए डिफ़रंट टेक : पुस्तक की समीक्षात्मक टिप्पणी ​

  1. गाँव में रहते जब उपलों के लिए एक ओर धरे गोबर के ढेर पर मैंने पहले पहल कोंपल देखी तो बहुत अचम्भा हुआ था| प्रकृति के सौन्दर्य को परिभाषित करती कोंपल पर दो एक छोटी पत्तियों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया था| अचम्भा इस लिए कि मैंने एक दिन पहले कोंपल खेत में देखी थी, इसे तो वहां खेत में होना चाहिए था!

  2. एक समय था जब सारे विश्ब में केवल हिन्दू थे और हिन्दू सभ्यता का प्रचलन विश्ब में था किन्तु जब कई अन्य पन्थो की उत्पत्ती हुई तो संसार के कई देशो में गैर हिन्दुओ की बहुतयात हो गई। भारत पिछले लगभग १००० वर्षो से पराधीन था। पराधीनता के समय शासक लोगो ने केवल भारत में ही नहीं बल्कि शासक लोगो ने विश्व के लोगो को अपने अपने पन्थो में परिवर्तन करना आरम्भ कर दिया जिसके कारन हिन्दुओ की संख्या कम हो गई। कई देश ऐसे थे जहा हिन्दू लोग नहीं थे। कई ऐसे भी देश थे जहा विकास के लिए शासक लोग हिन्दुओ को श्रमिक बना कर ले गए. जहा पर भी हिन्दू लोग गए बह लोग अपने साथ हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति साथ ले गए। हिन्दू लोग प्राय शिक्षित और परिश्रमी होते हैं. इस कारण कई बिकसित देशो ने अपने देशो में हिन्दुओ को नौकरिया दी। हिन्दू लोग जहा कही भी रहे , अपने व्यबहार हिन्दू संस्कृति के अनुसार करते हैं. जिस देश में रहते हैं बहा के नियमो का पालन करते हैं और उस देशो के विकास और उन्नति में सहयोग देते हैं । एक सर्वेक्षेण में पाया गया के प्रवासी हिन्दुओ में अपराध मनोवृति बहुत काम होती हैं और हिन्दू लोग अन्य समुदायों की तुलना में आर्थिक अनुदान का बहुत कम दुरपयोग करते हैं। प्रवासी लोग प्राय सहिष्णु और स्थानीय लोगो से मिलनसार होते हैं। इन सब गुणों के उपरान्त भी पिशले १००० वर्षो से पराधीन के कारन विदेशो में हिन्दुओ को हैय दृस्टि से देखा जाता था। डॉ. बलराम जी ने अपनी पुस्तक डिफरेंट टेक में प्रवासी भारतीय लोगो की प्रवृति , विचार और ब्यबहार के बारे में बताया हैं। बलराम जी यह भी बताते हैं के प्रवासी लोग बिदेशी लोगो को हिन्दू संस्कृति और धर्म के बारे में कुछ कुछ बताते रहते हैं. डॉ. मधुसूदन जी ने बलराम जी की पुस्तक डिफरेंट टेक पर टिप्पणी के हैं। यह पुस्तक बताती हैं के प्रवासी हिन्दुओ का विदेशो में आजकल सम्मान बढ़ रहा हैं और हिंदू लोग विदेशी लोगो पर अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं।

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