एक लोक कथा : आश्रय—पथ; पाथेय—दुःख

गंगानन्द झा 

बहुत दिन हुए, दूर के एक देश से होकर कुछ वीर सैनिक अपने अपने घोडों पर सवार होकर चले जा रहे थे । उनकी राह एक घने जंगल से होकर थी, जहाँ उलझी लताएँ काफी घनी और मजबूत हुआ करती थी ; ये इस राह पर भटक गए लोगों की मांसपेशियों को चीर-चीर देती थीं। यहाँ तक कि वहाँ ठहरी हुई उदासी और शोक को हलका करनेवाली कोई रोशनी की किरण उन लताओं की शाखाओं से होकर नहीं गुजरती थी ।

और जब वे उस घने,अंधेरे जंगल से होकर गुज़र रहे थे, घुड़सवारों में से एक सैनिक, अपने साथियों से अलग होकर दूर-दूर तक भटक गया और उन लोगों के पास कभी नहीं लौटा ; बाकी सैनिक दुख में डूबे हुए उसके बग़ैर ही आगे बढ़ते रहे, उसके मृतक होने का शोक करते हुए ।

अब, जब वे उस सुन्दर किले में पँहुचे, जिसकी ओर वे यात्रा कर रहे थे, तो वहाँ कई-कई दिनों तक ठहरे; आनन्द-उल्लास मनाया और तब एक रात — जब वे बड़े हॉल में जल रहे कुन्दों के ग़िर्द उत्फुल्ल आराम से बैठे थे और प्रेमपूर्ण मदिरा पान कर रहे थे — तभी आया उनका वह साथी जिसे उन्हौंने खो दिया था,और उन्हौंने उसका अभिवादन किया ।

उसकी पोशाक चिथड़े हो गई थी, जैसे भिखारियों की हों, और उसकी मधुर मांस-पेशियों पर बहुत से उदासियों से भरे घाव थे, पर उसके चेहरे पर चमक रही थी एक महान आभा — गहरे आनन्द की ।

और उन्होंने उससे जिज्ञासा की ; उससे पूछा कि उसके साथ क्या कुछ बीता था। तब उसने उन्हें बताया कि कैसे अन्धेरे घने जंगल में वह अपनी राह खो बैठा था, और कई कई दिन और कई कई रात भटकता रहा था, और यह कि भटकते भटकते अन्त में अपने को क्षत विक्षत, लहूलुहान हालत में अपने उसने को लिटा दिया था मरने के लिये ।

तब, जब कि वह मृत्यु के पास आ ही गया था तो – आश्चर्य ! बर्वर शोकाच्छन्नता को चीरती हुई आई उसके पास एक नैसर्गिक कन्या, तथा अपने हाथ से उसे पकड़ा , और ले चली उसे ऐसी अनजान टेढ़ी-मेढ़ी राहों से, जिसे कोई आदमी नहीं जानता होता है ; वह चलती रही, चलती रही तब तक जब तक कि जंगल की स्याही पर ऐसा उजाला उदित हुआ जैसे दिन का प्रकाश, जैसे दीए की रोशनी के समक्ष सूरज ; और उस आश्चर्यजनक चामत्कारिक प्रकाश में देखा हमारे सैनिक ने —- जैसे स्वप्न में हो — एक ज्योति — इतनी उज्ज्वल और स्पष्ट वह ज्योति प्रतीत हुई कि अब अपने लहू रिसते घावों के बारे में कोई बात उसके दिमाग में रह ही नहीं गई । ऐसे मंत्र-मुग्ध की तरह खड़ा रह गया जिसका आनन्द सागर की गहराइयाँ लिये हुए है ; उस गहराई की माप कोई भी आदमी नहीं बता सकता ।

और वह ज्योति मुरझा गई । सैनिक ने घुटनों के बल जमीन पर उस महान सन्त का आभार प्रगट किया, जिन्हौंने उसके कदम उस जंगल में ला दिए थे, और उस ज्योति के, जो वहाँ छिपी हुई थी ।

और उस अन्धेरे जंगल का नाम था —– दु:ख ; किन्तु जिस ज्योति को सैनिक ने वहाँ देखा, उसके बारे में हम न बोल सकते हैं, न ही बता सकते हैं ।

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