एक गजल -सिगरेट की बदनसीबी

खुद को जलाकर,दूसरो की जिन्दगी जलाती हूँ मैं
बुझ जाती है माचिस,जलकर राख हो जाती हूँ मैं

पीकर फेक देते है रास्ते में,इस कदर सब मुझको
चलते फिरते हर मुसाफिर की ठोकरे  खाती हूँ मैं

करते है वातावरण को दूषित पीकर जो मुझे
लेते है लुत्फ़ जिन्दगी का बदनाम होती हूँ मैं 

लिखी है वैधानिक चेतावनी,फिर भी पीते है मुझे
उनको कोई कुछ नहीं कहता,गालिया खाती हूँ मैं

किसने बनाया है मुझे,किसने जहर भरा है मुझमे
मैं एक बदनसीब सिगरेट हूँ,बदनसीबी पाती हूँ मैं

तम्बाकू है मेरा बड़ा भाई,कागज है मेरा छोटा भाई
मैं उनकी सगी बहन हूँ,एक अजीब रिश्ता पाती हूँ मैं

समझाता है रस्तोगी,ये सेहत के लिये नहीं है मुफीद
पीते पिलाते है मुझको,कैंसर की बीमारी लाती हूँ मैं

आर के रस्तोगी 

7 thoughts on “एक गजल -सिगरेट की बदनसीबी

  1. डॉ. मधुसूदन जी ,नमस्कार
    प्रंशसा के लिये बहुत बहुत धन्यवाद| अगर इस तरह की हौशला अफजाई मिलती रहेगी तो मेरी कलम भी चलती रहेगी |

  2. डॉ. मधुसूदन जी, नमस्कार,
    प्रंशसा के लिये धन्यवाद| अगर इस प्रकार की हैअगर हौशला अफजाई मिलती रहेगी तो मेरी कलम भी चलती रहेगी |

  3. प्रवाही लय के साथ अर्थ भी उत्तम !
    वाह रस्तोगी जी वाह!.
    यह मंच पर सफल प्रस्तुति, और वाह वाही दिलाने वाली गज़ल है.
    लिखते रहिए.
    शुभेच्छाएँ

    1. डॉ. मधुसूदन जी ,नमस्कार
      प्रंशसा के लिये बहुत बहुत धन्यवाद| अगर इस तरह की हौशला अफजाई मिलती रहेगी तो मेरी कलम भी चलती रहेगी |

  4. नमस्ते जी,
    आपके​ विचार बहुत ही उत्तम लगे,
    समाज के ​सुधार के लिए आप लिखते हैं, यह यथार्थ में बहुत ही सराहनीय कदम है। ईशकृपा से आप आपका जीवन मंगलमय हो तथा इसी प्रकार से प्रेरणाप्रद तथ्यों को समाज के सम्मुख प्रस्तुत करते रहें, बहुत—बहुत आभार एवं धन्यवाद

    1. डॉ. मधुसूदन जी ,नमस्कार
      प्रंशसा के लिये बहुत बहुत धन्यवाद| अगर इस तरह की हौशला अफजाई मिलती रहेगी तो मेरी कलम भी चलती रहेगी |

    2. श्री शिवदेव आर्य जी
      नमस्कार
      प्रंशसा के लिये बहुत धन्यवाद | 10 अगस्त को आपसे बात करने का प्रयास किया था पर आपसे बातचीत नहीं हो सकी आपने भी लिखा था की मै कुछ समय के बाद बात करूँगा |

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