एक पंक्ति का विराट् सच

एस. शंकर-

pakistanपाकिस्तान के केंद्रीय मंत्री रियाज हुसैन पीरजादा ने इस्लामाबाद में जिन्ना इन्स्टीच्यूट द्वारा आयोजित ‘विचार-सम्मेलन’ में एक बात कही। उन के शब्द थे, “समय आ गया है कि पाकिस्तान में सऊदी धन का आना बंद कर दिया जाए।” इस पंक्ति में कितना विराट सच छिपा है, इसे सब लोग एकबारगी नहीं समझ सकते। लेकिन उसी में उस रोग की पहचान छिपी है, जिस से पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया हैरान-परेशान है।

संयोगवश, एक माह पहले यहाँ गोवा में भी एक ‘विचार-सम्मेलन’ हुआ था। उस में भारतीय मुस्लिम लेखक, सुलतान शाहीन, ने लगभग वही बात दूसरे तरह से कही। उन्होंने बताया कि सऊदी अरब से आने वाले धन ने बहावी इस्लाम की विचारधारा बढ़ाई। उन पैट्रो-डॉलरों ने बहाबी आतंकवाद फैलाने में भारी मदद की और कर रहे हैं। उन पैसों की चमक में यहाँ सूफी मदरसे भी कट्टरवाद, असहिष्णुता, हिंसा का बहावी पाठ पढ़ा रहे हैं। मदरसों से पारंपरिक फारसी भाषा, फारसी किताबें, उदार सूफियों की शिक्षाएं लुप्त हो रही हैं। अब वहाँ केवल अरबी भाषा और बहावी किताबें पढ़ाई जा रही हैं। शाहीन के अनुसार, इस घातक प्रक्रिया को कोई नहीं रोक रहा, जबकि यही आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।

अब समझ सकते हैं कि पीरजादा की एक पंक्ति के पीछे कितनी कड़वी सचाई है। सऊदी धन के साथ एक असहिष्णु, हिंसक विचारधारा फैली, जिसके फलस्वरूप केवल पाकिस्तान में अब तक पचास हजार नागरिक मारे गए। इस के पीछे वह मतवाद है, जो सारी दुनिया पर लागू करने की जिद रखता है। मात्र पिछले सप्ताह पाकिस्तान में जो गिरफ्तारियाँ हुईं, उन में तीन हजार एक सौ मौलवी थे। यानी, इस्लाम के शिक्षक। इस से भी स्पष्ट है कि आतंक के स्त्रोत कहाँ हैं।

कम से कम अब समझ सकना चाहिए कि जिहादी आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई सैनिक विधि से नहीं जीती जा सकती। क्योंकि इस का मूल वैचारिक है। विचारों को हथियारों से कभी पराजित नहीं किया जा सका है। इसे अब पाकिस्तान में भी महसूस किया जा रहा है कि हिन्दू भारत को नीचा दिखाने के लिए जिस इस्लामी विचारधारा को सन् 1972 से स्कूल-कॉलेजों में जमाने की कोशिश की गई, जिसे जिया-उल-हक ने पूरी तरह मुकम्मिल रूप दिया, जिसे लगभग उसी समय सऊदी धन ने दुनिया में फैलाना आरंभ किया, अब उसी ने पाकिस्तान को तहस-नहस कर डाला है।

समय तेजी से बदल रहा है। बारह वर्ष पहले तक भारत में ठसक से कहा जाता था कि ‘मदरसों को झूठे बदनाम किया जा रहा है। उन का आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं।’ अब यह नहीं कहा जाता। लेकिन चुप्पी है। मगर, जैसा पीरजादा और शाहीन के वक्तव्य दिखाते हैं, सच विपरीत है। सारी दुनिया में जिहादी आतंक के तार मदरसों, मकतबों और मस्जिदों से जुड़े मिले हैं। अब इसे नकारना संभव नहीं रहा। पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के अनुसार अब वहाँ शिक्षा को इस्लामी-मूलवाद से मुक्त करने पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन करने का प्रस्ताव है। ताकि उस मानसिकता को उलटा जा सके, जिस से आतंकवाद, संकीर्णता, असहिष्णुता और घोर अज्ञान फैला।

इसलिए अब केवल समय की बात है कि उस मानसिकता के स्त्रोतों की पहचान भी खुल कर बताई जा सकेगी। लोग अभी हिचक रहे हैं। किन्तु यह भी समझ रहे हैं कि इस से काम चलने वाला नहीं। ‘उदारवादी इस्लाम’ और ‘कट्टरवादी इस्लाम’, अथवा ‘बहावी इस्लाम’ और ‘सच्चा इस्लाम’ जैसी दुविधाओं का हल निकालना ही होगा। इन में क्या अंतर और क्या समानता है, इस का उत्तर सचाई के आधार पर ढूँढे बिना आतंकवाद से पार नहीं पाया जा सकता।

क्योंकि समस्या केवल आतंक और सामूहिक संहारों से निपटना नहीं है। बोको हराम और इस्लामी स्टेट दिखा रहे हैं कि वे क्या-क्या लागू कर रहे हैं। दुनिया यह भी देख रही है कि इस्लाम के आधिकारिक टीकाकार और नेता उन के प्रति क्या रुख रखते हैं। आखिर जिस क्रोध से वे रुशदी, तसलीमा या ‘शार्ली अब्दो’ के खिलाफ मस्जिदों से लेकर सड़कों तक फौरन अभियान छेड़ते हैं – वह बोको हराम के विरुद्ध क्यों नहीं दिखता? इस का निष्कर्ष निकालने के लिए किसी प्रतिभा की जरूरत नहीं है।

सीरियाई लेखिका डॉ. वफा सुलतान ने अरब समाज के अपने अनुभवों को लिपिबद्ध किया है। अपने चिकित्सकीय, मनोवैज्ञानिक और अरब विश्व के लंबे अध्ययन से वफा कहती हैं कि किसी समाज में प्रचलित छपी पुस्तकों और हिंसा के संबंध पर जो शोध होना चाहिए, वह नहीं हुआ है। विशेषकर जब पुस्तकों की प्रकृति मजहबी हो, और जब वही उस समाज में ज्ञान का एक मात्र या मूल स्त्रोत हो। तब जो मानसिकता बनती है, उसे दूसरे लोग नहीं समझ सकते। आतंकवाद-विरोधी लड़ाई की विफलता का एक कारण यह भी है। वफा की पुस्तक ए गॉड हू हेट्स (2009) बड़ी गंभीर और रोचक है। इसे उन सब को पढ़ना चाहिए जो जिहादी आतंकवाद और मुस्लिम मानसिकता, पिछड़ेपन और परेशानी को समझना चाहते हैं।

अतएव समाधान का मार्ग पूर्णतः अहिंसक है। गोवा के विचार-सम्मेलन में बेल्जियन विद्वान डॉ. कोएनराड एलस्ट ने जोर देकर कहा कि अमेरिका-यूरोप को मुस्लिम देशों में सैनिक युद्ध बिलकुल बंद कर देना चाहिए। इस से उलटे मुस्लिम समाजों में जिहादियों को सहयोग, समर्थन ही मिला है। जरूरत है कि मुस्लिम विश्व को शान्ति से रहने, अपने हाल पर छोड़ दिया जाए। जब उन्हें स्थिरता मिलेगी, तब वे कुछ सहजता से देख सकेंगे कि उनके और गैर-मुस्लिम समाजों के जीवन में क्या अंतर है। संभवतः तब वे स्वयं समझने लगेंगे कि अपने किताबी अंधविश्वासों के कारण ही वे पिछड़े और संकीर्ण बने रहे हैं।

इसलिए उन पर सैनिक नहीं, वैचारिक दबाव डाला डाना चाहिए। ताकि वे किसी मजहबी विचारधारा के ‘एक मात्र सत्य’ होने के दावे को सचाई की कसौटी पर स्वयं परख सकें कि वह कथित सत्य कितने पानी में है। पीरजादा की बात के संदर्भ में वफा का सुझाव भी उल्लेखनीय है। वह कहती हैं कि गैर-मुस्लम विश्व, विशेषकर अमेरिका को सबसे जरूरी काम यह करना चाहिए कि पूरे अरब-इस्लामी साहित्य को मूल अरबी स्त्रोतों से अंग्रेजी में विश्वसनीय तरीके से सामने लाएं। तभी पता चलेगा कि उन का साबका किस समस्या से है। यह न केवल उन के हित में है, बल्कि स्वयं मुसलमानों का हित करने के लिए भी पहले उन की स्थिति को बिना मिलावट के समझना जरूरी है। उन की संकीर्ण दृष्टि खोलने के लिए पहले उसे जानना जरूरी है। अब तक दुनिया के नेता ओर बुद्धिजीवी अपनी ही काल्पनिक बातों को इस्लाम और मुसलमानों की समझ बता-बता कर स्वयं भ्रमित और दूसरों को भी भ्रमित करते रहे हैं भारत के संदर्भ में कोएनराड की एक और बात उल्लेखनीय है। गोवा सम्मेलन में उन्होंने यह भी कहा कि यदि भारत के सेक्यूलरवादी आज तक केवल हिन्दू-निंदा में न लगे होते, तो अब तक मुस्लिम वैचारिक मोर्चे पर काफी प्रगति हो चुकी होती। मगर वे तो हिन्दू धर्म का नाश करने, उसे नष्टनीय बताने में ही सारी बुद्धि खर्च करते रहे हैं। यहाँ की कोई समस्या हो, सारे सेक्यूलरवादी लेखक, प्रोफेसर किसी न किसी प्रकार हिन्दू धर्म को उसका एक कारण जरूर बताते हैं। इस के लिए ईसाई मिशनरियों द्वारा कराए जा रहे अवैध धर्मांतरणों को भी खुला समर्थन देते हैं। कि हिन्दू धर्म और ब्राह्मणों के अत्याचार के कारण पीड़ित हिन्दुओं को ईसाई बनने का पूरा अधिकार है, आदि। ऐसे हिन्दू-विरोधी उत्साह का शतांश भी उन लोगों ने इस्लामी सिद्धांत, व्यवहार, इतिहास, परंपरा का मूल्यांकन करने में लगाया होता – तो आज मुस्लिमों के बीच एक स्वस्थ, स्वतंत्र-बुद्धि तबका तैयार हो चुका होता।

इस प्रकार, पीरजादा, शाहीन, वफा और कोएनराड – चार देशों के प्रतिनिधियों के स्वर इस का संकेत हैं कि जिहादी आतंक से लड़ाई अब सही मोर्चे पर आने वाली है। आनी चाहिए। क्योंकि अब उस से बचने का कोई उपाय नहीं रहा।

1 thought on “एक पंक्ति का विराट् सच

  1. जब ज्ञान का प्रवाह केवल एक दिशा से हो औरवह भी एक और केवल एक धार्मिक विचारधारा से तो अन्य स्रोत सुख जाते हैं. चाहे कोई विचारधारा हो यदि केवल एक ही अंतिम धर्मोपदेशक हो तो और भी कठिनाई हो जाती है. हरियाणा के संत रामपाल ने तो यहाँ तक कह दिया की कोई ”श्रद्ध” पूजा उपवास नहीं करना ,घर की किसी परम्परा ,”भेरू” पितृ। कुलदेवता किसी को नहीं मानना ,कोई शंकर।ब्रह्म.vishanu नहीं केवलकेवल रामपाल. इस उपदेश का हश्र क्या हुआ ,आश्रम खाली कराने में कितने दिन कितनी धनराशि खर्च करनी पडी?और आश्रम में क्या क्या आपत्तिजनक चीजे मिली वे मीडिया ने बतायी हैं. सभीइन् धर्मोमे जहां कहाँ अधिनायक वृत्ति है वहां यही हाल हैं. एक और संत जो जेल में हैं और उनके सु (?)पुत्र जो जमानत में है उनके भक्तों के भी यही हाल हैं. वे भक्त ,न्यायालय गवाह ,पुलिस किसी को मानते ही नहीं। पॉप लीला से तो सब परिचित हैं. आखिर पॉप का सा,म्राज्य ,केवल वटकन तक क्यों सिमट गया?भारत में अ. झूंठे धर्म निरपेक्ष ,और वामपंथियों ने हिन्दू विरोध को ही अपना मूल मन्त्र मान लिया. यदि हम आज भी स्वामी दयानंद। विवेकानद की बातों को मान लें तो एक स्वतंत्र. और सुखी समाज बन सकते हैं

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