More
    Homeसमाजएक नज़र शहीदों के जन्मदाताओं पर भी

    एक नज़र शहीदों के जन्मदाताओं पर भी

    निर्मल रानी  पूरे देश में कारगिल दिवस के अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि देकर उनके गौरवमयी बलिदान को याद करते हुए देश के अमर सपूतों के प्रति कृतज्ञता पेश की गयी। प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को कारगिल दिवस मनाए जाने के अतिरिक्त भी विभिन्न अवसरों पर देश के शहीदों को याद किया जाता है तथा कृतज्ञ राष्ट्र उनकी अमूल्य क़ुर्बानियों के प्रति आभार व्यक्त करता है। जिस समय देश का कोई सपूत शहीद होता है तथा सेना विभागीय स्तर पर उसके पार्थिव शरीर को शहीद के घर भेजती है उस समय अंतिम संस्कार के वक़्त आम तौर पर कुछ अधिकारी या नेता आदि वहां मौजूद रहकर उसका मान सम्मान करते व तिरंगे में लिपटे शहीद के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि भेंट करते हैं। इस अवसर पर मीडिया द्वारा शहीद के बारे में,उसके शौर्य,उसकी रुचियाँ उसके परिवार आदि के विषय में समाज को अवगत करता रहता है। बाद में केंद्र सरकार,राज्य सरकारें तथा सेना अपने अपने स्तर पर शहीदों के माता-पिता तथा उसके बीवी बच्चों को उनके जीवन बसर के लिए सांत्वना स्वरूप नक़दी,मकान के लिए प्लाट, पेट्रोल पंप,परिवार के किसी सदस्य को सरकारी सेवा,गैस एजेंसी,पेंशन आदि से नवाज़ते हैं। इस तरह का सहयोग निश्चित रूप से किसी की जान का बदल तो नहीं हो सकता परन्तु इससे शहीदों के परिजनों को अपनी ज़िन्दिगी गुज़ारने में कुछ राहत ज़रूर मिल जाती है।
        यदि शहीद शादी शुदा होता है तो सभी की हमदर्दी उसकी पत्नी के साथ सबसे अधिक इसलिए होती है क्योंकि वह विधवा हो गयी, उसका जीवन का सहारा चला गया और यदि बच्चे हैं तो उन बच्चों के पालन पोषण का बोझ उसके कन्धों पर आ गया। इसलिए सरकार यदि सरकारी सेवा देने पर विचार करती है तो पहली प्राथमिकता के आधार पर पत्नी को ही सरकारी सेवा देने के लिए चुना जाता है। नक़दी की राशि ज़रूर पत्नी व माता पिता के बीच बाँट दी जाती है परन्तु पेट्रोल पंप व प्लाट आदि भी प्रायः पत्नी के नाम ही आवंटित होते हैं। जबकि पेंशन की राशि में से भी केवल 30 प्रतिशत वृद्ध माता-पिता को मिलती है शेष 70 प्रतिशत पत्नी को। परन्तु आम तौर पर ऐसा देखा गया है की जब तक सरकार द्वारा प्रदत्त सभी सरकारी सांत्वनाएं अथवा सुविधाएँ शहीद फ़ौजी की पत्नी व माता पिता सबको मिल नहीं जातीं तब तक तो शहीद के परिवार में सब कुछ ठीक ठाक नज़र आता है और उसका पूरा परिवार एक सुर में बातें करता है और एक सी भाषा बोलता है परन्तु जैसे ही सब कुछ हासिल हो जाता है उसी समय परिवार में तनाव बढ़ना शुरू हो जाता है और फ़ौजी की पत्नी अपने सॉस ससुर से मुंह मोड़ने लगती है।   इस तरह के अनेक मामले देखने को मिलेंगे कि शहीद की पत्नी ने अपने दिवंगत पति की शहादत पर मिलने वाली सभी सरकारी सहायताओं को भी ले लिया। यहाँ तक कि सरकारी नौकरी भी ले ली और बाद में अपनी दूसरी शादी भी कर ली। अपने सॉस ससुर यानी शहीद के बुज़ुर्ग माता पिता से भी रिश्ता ख़त्म कर अपनी नई दुनिया बसा ली और उसी में अपने जीवन की ख़ुशी ढूंढ ली। जबकि माता पिता अपनी संतान को खोने के ग़म को सारी उम्र सहने के लिए उसी की यादों करे सहारे जीने को मजबूर रहते हैं। पिछले दिनों कारगिल दिवस के शहीदों को श्रद्धांजलि देते समय एक बार फिर ऐसे ही एक शहीद के बुज़ुर्ग माता पिताका दर्द उनकी आँखों से आंसुओं की शक्ल में छलका। उन्होंने भी यही बताया कि उनके बेटे की शहादत के बाद उनकी विधवा बहू 70 प्रतिशत सरकारी पेंशन की भी मालिक बनी,अनेक सरकारी सहायता भी ले ली,सरकारी नौकरी भी लेली और सब कुछ मिल जाने के बाद बुज़र्गों को उनके हाल पर छोड़ कर दूसरी शादी कर अपनी नई नवेली दुनिया में जा बसी।
       निश्चित रूप से अब वह युग नहीं रहा जब स्त्रियों अपने पति की मृत्यु के बाद उसके नाम पर या उसके बच्चों की परवरिश को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान कर अपना जीवन बसर कर लिया करती थीं। इस सुविधा भोगी युग में कोई युवा विधवा महिला भी यदि दूसरा विवाह करना चाहे तो यह उसका अधिकार भी है और उसके घर के लोग भी अपनी विधवा बेटी को सारी उम्र अकेले जीवन बसर करने के लिए नहीं छोड़ना चाहते। परन्तु किसी शहीद के मां बाप के पास अपने बेटे की यादों के सहारे अपना शेष जीवन जीने बसर करने के सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं रहता। ले देकर बेटे की शहादत के बाद मिलने वाली राशि या सुविधाएँ ही उनके जीवन बसर करने का साधन होती हैं। परन्तु चूंकि पत्नी ही अपने पति की वास्तविक उत्तराधिकारी मानी जाती है इसलिए सरकारी सुविधाओं पर ज़्यादा अधिकार भी उसी का होता है जो सरकार उसे देती भी है। हालांकि कुछ परिवार ऐसे भी मिल जाएंगे जहाँ शहीद की विधवा को बेटी जैसा प्यार व सम्मान देकर सारी उम्र शहीद की विधवा को अपने घर की इज़्ज़त समझ कर रखा जाता है और उसे पूरे अधिकार प्राप्त होते हैं।
       ऐसे में सरकार को कोई ऐसा मापदंड ज़रूर निर्धारित करना चाहिए जिससे शहीद की विधवा के दूसरी शादी करने की स्थिति में शहीद के मां-बाप के अधिकारों का भी हनन न हो और वे भी आर्थिक रूप से अपना जीवन यापन ठीक ढंग से कर सकें। सरकार को चाहिए की पेट्रोल पंप या प्लॉट जैसी कोई सुविधा यदि दी जाती है तो वह अकेले शहीद की पत्नी के नाम होने के बजाए शहीद के मां बाप के नाम भी हो तथा उससे मिलने वाले लाभ के दोनों ही हक़दार हों। और यदि बहू दूसरा विवाह करे तो  पेट्रोल पंप या प्लॉट जैसी सुविधाओं और पेंशन आदि से उसे वंचित कर दिया जाए। क्योंकि विधवा ने तो अपना दूसरा विवाह कर अपने जीवन का सहारा ढूंढ लिया परन्तु शहीद के जन्मदाताओं के पास जीवन गुज़ारने के लिए शहीद की यादों के अलावा केवल वही सुविधाएं व सांत्वनाएं होती हैं जो सरकार द्वारा शहादत के बाद दी जाती हैं।

    निर्मल रानी
    निर्मल रानी
    अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,682 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read