लेखक परिचय

अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार

स्वतंत्र लेखक, कहानीकार व् टिप्पणीकार

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-अश्वनी कुमार-

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मध्य प्रदेश का एक छोटा सा गांव… सोहना..! गांव के मुख्य चबूतरे पर बैठे चार लोग आपसे में कुछ बात कर रहे हैं…..मुद्दा है. राजनीति और हमारी जिंदगियों से जुड़ा… चारों में से सबसे बुजुर्ग व्यक्ति…..बहुत अधिक तजुर्बेकार, श्याम सिंह शहर में भी काफी समय बिताकर आया था. गाँव के छोटे बड़े लोग उसे श्यामू काका कहकर बुलाया करते थे. पंचों में बैठा सभी से एक सवाल करता है कि भाई हम सभी अक्सर हम अपने आप से एक सवाल करते हैं कि क्या हमारी जान इतनी सस्ती है…..? जिसे कोई भी आसानी से ले सकता है, मार सकता है हमें। फिर चाहे वह दंगों के रूप में हो या किसी रैली में बम फटने से। सभी इसी विचार में मानो खो से जाते हैं…..तो तभी श्यामू काका की आवाज़ आती है अरे सोचते हो या नहीं, हाँ काका सोचते तो हैं, पर ज्यादा नहीं सोचते, हम सोचकर करेंगे भी क्या…? हम ठहरे गाँव के अलहड़ गंवार, ये काम तो सरकार का है. हम इसे क्यों सोचें…? धानु तेज़ी से खड़ा होकर सबके सामने अपने विचार प्रकट करके बैठा जाता है. अरे! मैं तो तुम लोगों से ऐसे ही पूछ रहा था…..काका कहता है. मैं पूछता हूँ की आखिर मरता कौन है. और तुम हो की गाने लगे अपना अलग ही रोना……..काका फिर से ऊँची आवाज़ में कहता है. ताकि बहरे ताऊ तक भी उसकी आवाज़ पहुँच जाए. चार लोगों के बीच इस गहन चर्चा को देखते हुए, वहां काफी लोग जमा हो गए थे. अच्छा एक बात बताओ काका फिर से एक सवाल वहां बैठे लोगों से पूछता है. आखिर कौन इन दंगाइयों कि चपेट में आता है, कौन हिंसा में अपनी जान से हाथ धो बैठता है, कौन सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, कौन पिसता है इस भारतीय लोकतंत्र नामक इस चक्की में? इतने क्लिष्ट हिंदी सुनकर फिर से धानु ने कहा क्या काका, हम का जाने….? का है ये भारतीय लोकतंत्र…..? अरे पगला है का…जानता नहीं है. हम जहां रहते हैं, भारत एक लोकतांत्रिक देश है. काका ने उसे डांटते हुए जवाब दिया. अच्छा एक बात बताओ अगर दो गुटों में दंगे होते हैं, तो कौन लोग मरते हैं. काका फिर से पूछते हैं… हम मतबल आम आदमी हम ओर आप……धानु ने जवाब दिया….हाँ अब भी तो तेरी खोपड़ी में कुछ घुसा मुरख….काका ने फिर से धानु को डांटते हुए जवाब दिया…. इस बात को हम सब जानते हैं. और इतिहास गवा है इस बात का, न जाने कब से हम पिसते आ रहे हैं, मरते आ रहे हैं। बिना बात, बिना किसी वजह, पर क्यों…? यह हमें नहीं पता। बस पीस रहे हैं। काका बड़े दुःख से इस बात को कहते हैं…!

अब काका जब समझाने लगते हैं तो सभी शांत होकर उनकी बात को सुनने लगते हैं…! क्या जानते हो कई बार सैलाब उठा है इस सवाल का जवाब जानने के लिए, पर हर बार इसे दबा दिया जाता है, कुछ न कुछ बहाना करके। कामयाब हो जाती है सरकार हर बार हमें बेवकूफ बनाने में। और हम बन जाते हैं बिना कुछ जाने, बिना कुछ समझे। फिर तो शायद हमारी ही गलती है, और हम ही हैं हमारी मौतों का कारण। काका की बात ख़त्म भी नहीं होती की इस बार रोली एक छोटी बच्ची जो अभी पांचवी कक्षा में ही पढ़ती है, काका से कहती है पर काका सरकार तो हमारी मदद करती है, हमें यही पढ़ाया गया है. फिर वो कैसे हमें धोखा दे सकती है…..? धानु भी उठकर इस बात का समर्थन करता है और काका से कहता है ऐसा कैसे हो सकता है काका….? सरकार तो हमें खाने को दे रही है….! हमारा अनाज खरीद रही है…! काका जवाब देते हैं, तभी तो हम हर बार बेवकूफ बन जाते हैं. क्योंकि सरकार ने हमें टाफी जो दे रखी है. उनके साथ आवाज़ से आवाज़ मिलाने की…..! सब काका की यह बात सुनकर शांत हो जाते हैं….! कुछ देर के मौन के बाद…..! हां, अब कुछ कुछ समझ आ रहा है….काका आप सही कह रहे हैं……दूर खड़े गाँव के एक मात्र 12 पढ़े फली सिंह ने काका का समर्थन करते हुए कहा….! काका फिर से अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, और कहते हैं यहाँ सवाल ये नहीं कि हम दोषी हैं या नहीं। सवाल ये है कि आखिर हम ही क्यों मारे जाते हैं हर बार? क्यों हम ही होते हैं दागदार राजनीति का शिकार? घटनाओं में हम ही क्यों आगे खड़े दिखाई देते हैं। अरे साफ़ हैं भाई हमें मारने के लिए सेना के सिपाहियों कि तरह इस्तेमाल किया जाता है। जैसा हमेशा होता है अफसर पीछे रहते है और सिपाही आगे ही शहीद होते रहते हैं। कुछ समझ रहे हो या नहीं…! एक स्वर में सब का हुंकारा सुनाई देता है….हूँ……..हूँ…..हूँ……….हूँ…….काका सही का.

काका फिर कहते हैं, एक ओर से देखें तो ठीक भी है, हमें शहीद कि संज्ञा मिल रही है। पर ये संज्ञा तो हम खुद ही ले रहे हैं सरकार कि ओर से थोड़ी इसे माना जा रहा है। और अगर देश के लिए अपनी जान दें तो ठीक भी है, हम तो नेताओं कि जान बचाने के लिए अपनी जानों से हाथ धो रहे हैं। और कहीं उनकी फैलायी हिंसा के कारण…! क्या हम कठपुतली हैं जिसे वो हुक्मरान चला रहे अपनी मर्ज़ी से? जब कहते हैं आ जाओ भाषण है पहुँच जाते है, बिना सोचे समझे। जानते भी हैं हमें भीड़ के अलावा और कुछ नहीं समझा जाता। इनके लिए हम बस भीड़ हैं, जो इनकी रैलियों में नारे लगाने मात्र के लिए हैं। हमारी जान से इन्हें कोई लेना देना नहीं…! काका अचानक रोष में आ जाते हैं, अपना दुःख व्यक्त करते करते वह अपनी आँखे भीगने से रोक नहीं पाते……और अपनी बात को अपनी बढती साँसों के साथ ख़त्म कर लेते हैं…! काका को सभी का समर्थन मिल रहा था तो काका आगे कहते हैं…! काका फिर से अपनी बात की शुरुआत करते हैं, और कहते हैं. याद हैं, मुजफ्फरनगर में हुए हिन्दू और मुसलामानों के बीच दंगे. क्या भूल सकते हो, याद है न हम यहीं बैठकर कर पढ़ रहे थे कि कैसा फैला वो दंगा…! बता सकते हो…..धानु उठा और कहने लगा सही कहते हो काका…..! एक नेता के कुछ अनमोल वचनों के कारण ही इतना बढ़ा था, वह दंगा…! जिसमें न जाने कितने ही लोगों की जाने चली गई थी…! और उनकी जिनका कोई कसूर भी नहीं था…! बस एक नेता के भाषण ने कमाल दिखा दिया था…! काका चिल्लाकर फिर से लोगों से पूछते हैं…..क्या उस नेता का कुछ हुआ…..सजा हुई उसे…? फली सिंह ने कहा सुनने में तो कुछ नहीं आया काका…..! एक दूं सब शांत हो गया था…! इतना कहकर फली सिंह चुप होकर बैठ गया…! काका फिर बोले हां…..मैं यही तो कहना चाहता हूँ..! देखों हमारे जीने और मरने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता…….! हम जिन्हें चुनकर, जिनपर विश्वास करके हमारी सुरक्षा और नीतियां के निर्माण और उनके कार्यान्वयन के लिए भेजते हैं, वही हमारी जिंदगियों का सौदा कर देते हैं। क्या सही है ये?…काका के सवाल पर गाँव वाले कहते हैं, बिलकुल नहीं……सरासर गलत है ये. काका फिर से कहते हैं…!  इनके लिए तो सही ही है, हमारे लिए हो न हो, क्या फर्क पड़ता है।

हाँ एक घटना और मुझे याद आ रही है. वो घटी थी बिहार में, जब वहां उस मैदान में बहुत से लोगों की जन चली गई थी……काका एक घटना का और जिक्र करते हुए फिर से बात को आगे बढ़ाते हैं. जानते हो न कितने मासूम लोगों ने अपनी जान से हाथ धो दिया था। सैंकड़ों में हैं काका…..!!! अगर गिनती करने लगे तो, टीवी और अखबार वाले सही आंकड़े थोड़ी देते हैं…..!!! हमेशा कम ही आंकड़े दिखाई और पढ़ाये जाते हैं हमें…….फली सिंह ने गुस्से में आकर काका को जवाब दिया. काका अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए फिर से कहते हैं……!!! न जाने कितने ही लोगों को बिना किसी वजह के अपने घरों से बेघर होना पड़ा, खौफ के साये में जीना पड़ा….!!!  कुछ नेताओं के बड़बोले पन के कारण। क्या सही कहा न मैंने……काका ने सबसे पूछा………सभी ने अपनी मुंडी हिलाते हुए जवाब दिया हाँ काका आप बिलकुल सही कह रहे हैं…..!!!

उस समय गाँव में उस चबूतरे के हालात देखकर लग रहा था कि मानो वहां कोई बड़ी राजनीतिक सभा हो रही है….!!! ऐसा नज़ारा यहाँ पहले कभी नहीं देखा गया था…..परन्तु एक सवाल ने यहाँ इतनी बड़ी सभा लगा दी थी…..!!! काका ने फिर से कहा कि और इन हुक्मरानों को देखें तो साफ़ दिखाई देता है कि इन्हें हमारे जीने मरने से कोई मतलब नहीं बस अपनी जान कि परवाह है। उदाहरण हमारे सामने है….. मोदी साहब अरे! हमारे प्रधानमंत्री………!!! ये क्या है काका…..??? एक बच्चे ने खड़े होकर अपना मासूम सा सवाल सबके सामने रखा…….काका ने जवाब दिया कि जो देश को चलाता है…..देश का मालिक……जैसे तुम्हारे बापू घर में मालिक हैं…..ठीक वैसे ही…….बच्चा शायद पूरी तरह न समझ पाया था पर मुंडी हिलाकर अपनी जगह पर बैठ गया…..!!!! काका ने अपनी बात को फिर कहना प्रराम्भा किया……जानते हो जब मोदी जी दोबारा पटना कि ओर चलें तो इन सबको भी अपनी सुरक्षा के लिए ले चलें…….जिनमें एक एडीजी, 2 डीआईजी, 12 डीएसपी और 1 हजार एसटीएफ के जवान थे। अब बताइये हमारी जान कीमती है कि उनकी जिन्हें हम ही अपनी सुरक्षा के लिए चुनते हैं…?

इतने पुख्ता सुरक्षा इंतज़ाम के साथ मोदी पटना पहुंचे, हमारे जख्मों पर मरहम लगाने। लगता है डर लगता हैं मरने से, जिस जनता को ये अपने जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा बताते है, उनके बीच जाने के लिए ही इन्हें सुरक्षा कि जरुरत पड़ती है। क्या समझें इसे? क्या दर्शाता है ये सब? काका ने गाँव वालों से भी पुछा क्या समझ में आ रहा है कुछ..? हाँ काका बात कुछ कुछ समझ में तो आ रही है….! गाँव वालों ने जवाब देकर कहा…..!

काका ने अपनी बात जारी रखते हुए एक और वाक्या गाँव वालों के सामने रखा. और कहा ऐसा ही कुछ मुजफ्फरनगर में भी हुआ, जहाँ ये लोग पहुंचे तो सही पर घटना के तीन चार दिन बाद, जब सब कुछ तबाह हो चुका था। कोई पूछे इनसे भाई अब भी क्यों आये हो, जख्म देकर मरहम कि टाफी देने? उस समय ही क्यों नहीं रोका गया दंगों को क्या पुलिस कम थी? क्या सेना मौजूद नहीं थी। शायद थी ही नहीं। क्योंकि आधी से ज्यादा पुलिस और सेना के जवान तो इनकी सुरक्षा में ही रहते हैं, तो हमारे बारे में क्या सोचेंगे? सही है न काका ने फिर एक सवाल पूछा…! हां काका बिलकुल सही है. धानु ने जवाब दिया, बड़ी देर से कुछ कहने का इंतज़ार कर रहा था…..पर पहले सब कुछ समझने की कोशिश कर रहा था. पूछना चाहता था, पर फिर कुछ कहते कहते बैठ गया……और काका ने फिर से कहना शुरू किया. और कहा कि जब मैं शहर में था तब मेरे एक जानकार ने मुझे यह बताया था कि किसी भी राज्य कि आधी से ज्यादा पुलिस वीआईपी सुरक्षा में लगी है। पिछले दिनों एक व्यक्ति ने सूचना के अधिकार के माध्यम से जानकारी में यह सच उजागर किया था। पर क्या हुआ फिर भी कुछ नहीं बदला। सब जैसा था वैसे का वैसा ही है……..धानु उठा और अपना सवाल जिसे काफी समय से वह अपने दिमाग में सोच रहा था……पूछ ही लिया……पर डर भी रहा था…..तो पहले कहता है कि माफ़ी चाहता हूँ हम काफी समय से बहुत कुछ सुन रहे हैं..पर मैं काका से एक सवाल करना चाहता हूँ अगर आपकी इजाज़त हो तो..! गाँव वालों ने कहाँ हां हां पूछो धानु क्या सवाल है तुम्हारा…! काका मैं जानना चांटा हूँ कि आखिर हमें इस सब चीज़ को रोकने के लिए करना क्या चाहिए..? सब शांत हो गए…! सन्नाटा छा गया चारों ओर……सब चुप हो गए थे..! धानु सोच में पड़ जाता है……और मन ही मन सोचने लगता है……आखिर क्या पूछ लिया मैंने जो सब चुप हो गए….!

काफी समय सोचने के बाद काका कहते हैं कि अब तो लगता है कि हमें भी सुरक्षा के लिए राजनीति में कदम रखना पड़ेगा…! और जोर से हंस पड़े… काका के साथ सारे लोग भी जोर जोर से हंसने लगे..फिर काका सबको चुप कराते हुए, बोले अरे! मज़ाक कर रहा था. सब चुप जो हो गए थे…..! करना ये चाहिए धानु…….अपने भाईचारे को समाप्त नहीं होने देना चाहिए..! आपसी लड़ाई को छोड़कर सौहार्द पर ध्यान देना चाहिए..! और किसी भी ऐसे व्यक्ति की बात को तवज्जो नहीं देनी चाहिए, जो रंग बदलने में माहिर हो…..अगर आज समझ गए तो कभी मार नहीं खाओगे…! इतना कहते हुए काका वहां से उठकर…..अपने घर की ओर चले गए और गाँव के लोगों में भाईचारे की एक नई मिसाल कायम कर गए…!

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