लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः प्रधानमंत्री का ओप्रेसन क्लीनमनी-

प्रमोद भार्गव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए ओप्रेसन क्लीनमनी की समीक्षा करते हुए राजस्व विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे बेनामी संपत्ति रखने वाले लोगों के खिलाफ कार्यवाही में तेजी लाएं। यही बात प्रधानमंत्री ने आकाषवाणी पर ‘मन की बात‘ कार्यक्रम में भी कही थी। मोदी की इस मंशा से यह तो साफ है कि वे कालाधन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐसी कार्यवाही के पक्ष में हैं, जिससे बेनामी संपत्ति रखने वाले लोग कानून के शिकंजे में आ जाएं। दरअसल कर चोरी, भ्रष्टाचार से पैदा किया कालाधन ऐसा धन है, जो बेनामी संपत्तियों में सबसे ज्यादा खपाया गया है। इसीलिए राजग सरकार ने जो  बेनामी लेनदेन कानून 1988 में बना रहकर फाइलों में दफन था, उसे निकाला और संशोधित कर अधिसूचित भी कर दिया अब इसका कड़ाई से पालन होना है।

पूरा देश जानता है कि करोबारी, नौकरशाह और भ्रष्ट नेता गलत आचरण से अर्जित संपत्ति को बड़े नोटों, बेनामी जमीन-जायदाद और सोने-चांदी में खपाते हैं। नोटबंदी के रूप में कालाधन पर चोट करने के बाद अब हथौड़ा बेनामी संपत्ति पर चलना तय है। बेनामी संपत्ति की पड़ताल और फिर जब्ती होती है, तो आम आदमी से जुड़ी कल्याणकारी योजनाएं फलीभूत होंगी। ज्यादातर ऐसी अचल संपत्ति भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं और बड़े व्यापारियों के पास हैं। अब तक जितने भी सरकारी छोटे-बड़े अधिकारी-कर्मचारियों के यहां छापे पड़े हैं, उनके पास से करोड़ों की नकदी के साथ सैंकड़ों एकड़ भूमि और भवन के दस्तावेज भी मिले हैं। भूमण्डलीकरण और आर्थिक उदारवाद के बाद कृषि भूमि लघु और सीमांत किसानों से हस्तांतरित होकर चंद लोगों के पास सिमटती जा रही है। यहां तक की अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की आजीविका चलाने के लिए पट्टे पर मिलीं जो जमीनें विक्रय से प्रतिबंधित थीं, उन्हें भी नौकरशाहों और भूमफियाओं की मिली-भगत से हथिया लिया गया है। दरअसल जिला कलेक्टरों को इन प्रतिबंधित भूमियों को बेचने की अनुमति देने का अधिकार है। नतीजतन भ्रष्ट कलेक्टर के पदस्थ होने के साथ ही ऐसी भूमियों को हथियाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। ये भूमियां हरिजन- आदिवासियों के ही पास बनी रहें, इस मकसद से सरकार चाहे तो ऐसा कानून बना सकती है कि इनका क्रय-विक्रय इन्हीं के बीच हो।

वह लेनदेन बेनामी होता है, जिसमें पैसा कोई और लगाता है और उस पर नाम किसी दूसरे का होता है काले कुबेर बड़े पैमाने पर संपत्तियों की खरीदी व बैंकों की एफडी के लिए यही तरीका अपनाकर कदाचरण से कमाए धन को ठिकाने लगाने के साथ कर चोरी करते है। इसके लिए बेनामी लेनदेन अधिनियम 1988 में ही बन गया था, लेकिन अधिसूचित नहीं हो पाया था। मोदी सरकार ने 13 मई 2016 को इसमें संशोधन कर संपत्ति जब्ती, सजा व जुर्माने का कठोर प्रावधान किया है। एक नवंबर 2016 से यह कानून अमल में भी आ गया। इसके तहत दोशियों को 1 से 7 साल की सजा हो सकती है और बाजार मूल्य से 25 फीसदी तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। बाबजूद अभी तक यह देखने में नहीं आया है कि किसी बेनामी संपत्ति धारक की संपत्ति जब्त की गई हो अथवा उस पर भारी जुर्माना लगा हो ? जेल भेजने की बात तो फिलहाल दूर की कौड़ी है।

भ्रष्ट आचरण से कमाई दौलत ही वह वजह है, जिसके चलते आचार्य बिनोवा भावे द्वारा स्वतंत्रता के बाद चलाए गए सर्वोदय आंदोलन से प्रभावित होकर पूर्व जमींदारों व सामंतों ने जो हजारों एकड़ जीमन दान में दी थी, वह पूंजीपति लोगों के पास आ गईं। बिनोवा का पवित्र उद्देश्य इन जमीनों से उन लोगों को जोड़ना था, जो भूमिहीन थे और आजीविका चलाने के लिए केवल खेती-किसानी से जुड़ी मजदूरी पर निर्भर थे। बिनोवा का मानना था, ‘मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक कोई चीज अगर है तो वह है, उसका जमीन से उखड़ना।  जैसे हर एक पेड़ का मूल जमीन से होता है, वैसे ही हर एक मनुष्य का संबंध जमीन से होना चाहिए।‘ लेकिन आजादी के बाद से हमारी नीतियां और उन्हें अमल के उपाय कुछ ऐसे रहे हैं कि ग्रामीणों को शहर में मजदुरी कर गुजर-बसर के सब्जबाग दिखाए गए। कृषि का मशीनीकरण कर उसकी लागत बढ़ाई गई और फिर गांव-गांव शराब पहुंचाकर व्यक्ति की पसीने की कमाई छीन ली गई। लोगों को सुनियोजित ढंग से शराबी बनाए जाने के उपक्रमों के चलते परिवार घरेलू हिंसा की चपेट में आते चले गए। आज आलम यह है कि शराबजन्य उद्दण्डता के चलते ग्रामीणों पर सबसे ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन झगड़ों के चलते लघु और सीमांत किसानों की जमींने लगातार बिकती जा रही हैं। साफ है, ऐसे उपाय जमींनों को चंद लोगों के नामी-बेनामी रूपों में केंद्रीयकृत करने का सबब बन रहे हैं।

बेनामी संपत्ति पर प्रहार होता है तो यह कालेधन को समाप्त करने का बड़ा उपाय होगा। इस दृष्टि से उन लोक कल्याणकारी कथित ट्रस्टों पर भी चोट करनी होगी, जो हजारों एकड़ जमीन के मालिक हैं। देश के जितने भी पुर्व सामंत है, उनके ट्रस्टों के पास शहरों में कई एकड़ भूमि  हैं। इनकी वर्तमान कीमत अरबों रुपए है। इनमें से ज्यादातर अचल संपत्तियां ऐसी हैं, जो रियासतों के विलय के समय राज्य सरकारों की संपत्ति घोशित हो गई थीं। किंतु बाद में जब ये सामंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया के चलते सांसद व विधायक बनकर सत्ता के अधिकारी हो गए तो इन्होंने दस्तावेजों में हेराफेरी कराकर इन जमींनों पर फिर से अपना मालिकाना हक हासिल कर लिया। चूंकि इनमें से ज्यदातर जमींने शहरी विस्तार के चलते बीच में आ गई हैं, इसलिए इनका मूल्य तो बढ़ा ही, ये आवासीय काॅलोनियों में भी तब्दील की जाने लगी हैं। यह कच्चा-चिट्ठा खंगाला जाता है तो इसे खंगालने की शुरूआत रियासतों के विलय-वर्ष 1954 से 1956 से हो ? क्योंकि विलय के पहले दस्तावेज इन्हीं वर्षों में तैयार हुए थे। कुछ इसी तरह के संकत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ज्योतिरादित्य सिंधिया पर शिवपुरी में 700 एकड़ जमीन हड़पने के लगाए हैं।

हमें ज्ञात है कि गांधी की स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई सिर्फ सत्ता हस्तांतरण के लिए नहीं थी, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन ही उनका मुख्य लक्ष्य था। दरअसल अंग्रेजों ने जो प्रशासनिक व राजनैतिक व्यवस्था बनाई थी, वह भारतीयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाए रखकर उन पर राज करने की थी। इसी क्रम में अंग्रेजों ने 1935 में भारत शासन अधिनियम के तौर पर ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जो ‘बांटों और राज करो‘ के कुटिल सिद्धांत पर आधारित थी। इन व्यवस्थाओं का शासक व्यक्ति समानता व समरसता को तोड़ने की कमजोरियों के चलते बेहद शक्तिशाली और निरकुंश हो जाता है। यही वजह है कि प्रजातांत्रिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद जो भी व्यक्ति सत्ता का हिस्सा बनता है, वह अंग्रेजी हुकूमत का व्यवहार अपनी ही प्रजा से करने लगता है। नौकरशाह भी अंग्रेजों के लूट-प्रबंध को औजार बना लेते हैं। यही कारण है, देश में आजादी के इन सत्तर सालों में हर क्षेत्र में असामानता की खाई निरंतर चौड़ी होती चली जा रही है। ट्रांसपेरिसी इंटरनेशनल का मानना है कि भारत यदि भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाए तो देश से गरीबी का उन्मूलन आप से आप हो जाएगा। क्योंकि भ्रष्टाचार ही ऐसा कारक है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायायपालिका के तंत्र को अपारदर्षी बनाए रखने का काम करता है।  दरअसल लाइलाज हो चुके भ्रष्टाचार से छुटकारा मिल जाता है तो देश के सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्वि होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, संचार और बिजली-पानी जैसी सुिवधाओं को धन की कमी नहीं रहेगी। बेनामी संपत्ति पर लगाम लगती है तो मोदी सभी गरीबों को अपने घर का जो सपना दिखा रहे हैं, वह हकीकत में बदल जाएगा। नोटबंदी का फैसला लागू होने से पहले, कालाधन पर शिकंजा कसने के जो उपाय किए थे, उनसे 1.25 लाख करोड़ कालाधन बाहर आ चुका है। इसके सार्थक नतीजों का पता इस तथ्य से भी चला है कि स्विट्रलैंड के बैंकों में 2015 के अंत तक जिन देशों के नागरिकों का कालाधन जमा था, भारत उनमें से तेजी से नीचे खिसक कर 75वें स्थान पर आ गया है। जबकि 2014 में यह स्थान 61वां था। यहां जमा भारतीयों का धन 33 फीसदी कम होकर 8,392 करोड़ रुपए रह गया है। भारतीयों का शेष धन स्विस बैंकों से निकलकर किसी ओर देश में जमा हुआ या फिर अघोशित रास्ते से निवेष के रूप में भारत आकर सफेद धन बना इसकी पड़ताल भारत सरकार की वित्तीय एजेंसियों को करने की जरूरत है ? बहरहाल केंद्र सरकार ने कालाधन और बेनामी संपत्ति पर लगाम लगाने का जो सिलसिला शुरू किया है, दरअसल यही वे उपाय हैं, जो संविधान में दर्ज समानता के अधिकार का पर्याय बनेंगे।

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