अटल आस्था का अनूठा पर्व छट पूजा

नागमणि पाण्डेय

छठ पूजा का प्रारंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या तालाब के किनारे पूजा करने के लिए लोगो का हुजूम एकत्रित होता है प्राचीन काल में इसे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था। लेकिन आज इस प्रान्त के लोग विश्व में जहाँ भी रहते हैं वहाँ इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाते हैं। छठ मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है।इस लोकपर्व का संबंध बिहार के उस क्षेत्र से है, जो इतिहास के किसी दौर में महान सूर्योपासक रहा है। यह संबंध पूर्वी बिहार अथवा प्राचीन ‘अंग’ प्रदेश से जोड़ा जा सकता है, जिसमें भागलपुर, मुंगेर, पटना, गया, राजगृह, चंपा नगरी और मिथिला आदि क्षेत्र आते हैं। बिहार में तो इसे राजकीय पर्व जैसा दर्जा मिला हुआ है। अब मुंबई,दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों और इनके उपनगरों में भी प्रवासी बिहारी और उत्तर प्रदेश के लोग यह पर्व बड़े पैमाने पर मनाने लगे हैं।

छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है।-पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ(खजूर), नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल,पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।

छठ पर्व पर दूसरे दिन पूरे दिन व्रत ( उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्ने के रस की बखीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा ( मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बाँटा जाता है।

तीसरे दिन यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जली व्रत रखा जाता है सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी कहते हैं दौरी में पूजा का सभी सामान डाल कर देवकरी में रख दिया जाता है। देवकरी में गन्ने के पेड़ से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक, तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है। वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल, पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरूष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर की तरफ रखते हैं। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर में देवकरी ( पूजा-स्थल) व प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के लिए महिलाएँ कई दिनों से तैयारी करती हैं इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहाँ पूजा स्थल होता है वहाँ नहा धो कर ही जाते हैं यही नही तीन दिन तक घर के सभी सदस्य देवकरी के सामने जमीन पर ही सोते हैं।

वैसे तो प्रत्येक पर्व में ही स्वच्छता एवं शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, पर इस पर्व के संबंध में ऐसी धारणा है कि किसी ने यदि भूल से या अनजाने में भी कोई त्रुटि की तो उसका कठिन दंड भुगतना होगा। इसलिए पूरी सतर्कता बरती जाती है कि पूजा के निमित्त लाए गए फल- फूल किसी भी कारण अशुद्ध न होने पाएं। इस पर्व के नियम बड़े कठोर हैं। सबसे कठोर अनुशासन बिहार के दरभंगा में देखने को मिलता है। संभवत: इसीलिए इसे छठ व्रतियों का सिद्धपीठ भी कहा जाता है। ऐसा समझा जाता है कि इस पूजा के दौरान अर्घ्यदान के लिए साधक जल पूरित अंजलि ले कर सूर्याभिमुख होकर जब जल को भूमि पर गिराता है, तब सूर्य की किरणें उस जल धारा को पार करते समय प्रिज्म प्रभाव से अनेक प्रकार की किरणों में विखंडित हो जाती हैं। साधक के शरीर पर ये किरणें परा बैंगनी किरणों जैसा प्रभाव डालती हैं, जिसका उपचारी प्रभाव होता है।

छठ पर्व हिंदी महीने के कार्तिक मास के छठे दिन मनाया जाता है। यह कुल चार दिन का पर्व है। प्रथम दिन व्रती गंगा स्नान करके गंगाजल घर लाते हैं। दूसरे दिन, दिन भर उपवास रहकर रात में उपवास तोड़ देते हैं। फिर तीसरे दिन व्रत रहकर पूरे दिन पूजा के लिए सामग्री तैयार करते हैं। इस सामग्री में कम से कम पांच किस्म के फलों का होना जरूरी होता है।

तीसरे दिन ही शाम को जलाशयों या गंगा में खड़े रहकर व्रती सूर्यदेव की उपासना करते हैं और उन्हें अर्घ्य देते हैं। अगले दिन तड़के पुन: तट पर पहुंचकर पानी में खड़े रहकर सूर्योदय का इंतजार करते हैं। सूर्योदय होते ही सूर्य दर्शन के साथ उनका अनुष्ठान पूरा हो जाता है। पूरे चौबीस घंटे व्रतधारियों का निर्जला बीतता है।

इस व्रत में पहले दिन खरना होता है। पूरे दिन उपवास रखकर व्रती शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। साथ ही लौकी की सब्जी खाने की भी परंपरा है। कहा जाता है कि गुड़ की खीर खाने से जीवन और काया में सुख-समृद्धि के अंश जुड़ जाते हैं। इस प्रसाद को लोग मांगकर भी प्राप्त करते हैं अथवा व्रती अपने आसपास के घरों में स्वयं बांटने के लिए जाते हैं, ताकि जीवन के सुख की मिठास समाज में भी फैले।

इस पर्व के संबंध में कई कहानियां प्रचलित हैं। एक कथा यह है कि लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो दीपावली मनाई गई। जब राम का राज्याभिषेक हुआ, तो राम और सीता ने सूर्य षष्ठी के दिन तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए सूर्य की उपासना की। इसके अलावा एक कथा यह भी है कि सूर्य षष्ठी को ही गायत्री माता का जन्म हुआ था। इसी दिन ऋषि विश्वामित्र के मुख से गायत्री मंत्र फूटा था। पुत्र की प्राप्ति के लिए गायत्री माता की भी उपासना की जाती है।

एक प्रसंग यह भी है कि अपना राजपाट खो चुके जंगलों में भटकते पांडवों की दुर्दशा से व्यथित दौपद्री ने सूर्यदेव की आराधना की थी।

 कोशी भरने की मान्यता

इस अवसर पर पुत्र प्राप्ति या सुखा -शांति और वैभव प्राप्ति किसी भी इच्छा पूर्ति हेतु जो कोई छठ मां से मन्नत मांगता है वह मन्नत पूरी होने पर कोशी भरी जाती है इसके लिए छठ पूजन के साथ -साथ गन्ने के बारह पेड़ से एक समूह बना कर उसके नीचे एक मिट्टी का बड़ा घड़ा जिस पर छ: दिए होते हैं देवकरी में रखे जाते हैं और बाद में इसी प्रक्रिया से नदी किनारे पूजा की जाती है नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है।

छठ माता का एक लोकप्रिय गीत है–

केरवा जे फरेला गवद से ओह पर सुगा मंडराय

उ जे खबरी जनइबो अदिक से सुगा देले जुठियाए

उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय

उ जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ ना सहाय

 

 

 

 

 

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