आरक्षण नीति का संवैधानिक प्रावधान

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डा राधेश्याम द्विवेदी

सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने अब भारतीय कानून के जरिये सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाषाई अल्पसंख्यक शैक्शिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्शिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आकर्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की है। भारत के संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है। समाज के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों को अवसर प्रदान करने हेतु आरक्षण का प्रावधान किया गया है। पिछले कई वर्षों से समाज के पिछड़े लोग इसका लाभ ले रहे हैं। जातिवाद एक बुराई है इसी बुराई को राजनीतिज्ञों ने समय-समय पर बढ़ावा दिया है।
भारत की केंद्र सरकार ने उच्च शिक्शा में 27% आरक्षण दे रखा है और विभिन्न राज्य आरक्षणों में वृद्धि के लिए क़ानून बना सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता, लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने 68% आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अगड़ी जातियों के लिए 14% आरक्षण भी शामिल है।

आम आबादी में उनकी संख्या के अनुपात के आधार पर उनके बहुत ही कम प्रतिनिधित्व को देखते हुए शैक्षणिक परिसरों और कार्यस्थलों में सामाजिक विविधता को बढ़ाने के लिए कुछ अभिज्ञेय समूहों के लिए प्रवेश मानदंड को नीचे किया गया है। कम-प्रतिनिधित्व समूहों की पहचान के लिए सबसे पुराना मानदंड जाति है। भारत सरकार द्वारा प्रायोजित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, हालांकि कम-प्रतिनिधित्व के अन्य अभिज्ञेय मानदंड भी हैं; जैसे कि लिंग (महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है), अधिवास के राज्य (उत्तर पूर्व राज्य, जैसे कि बिहार और उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कम है), ग्रामीण जनता आदि।

पांच वर्षों का आरक्षण बार बार बढ़ाया जाना

मूलभूत सिद्धांत यह है कि अभिज्ञेय समूहों का कम-प्रतिनिधित्व भारतीय जाति व्यवस्था की विरासत है। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान ने पहले के कुछ समूहों को अनुसूचित जाति (अजा) और अनुसूचित जनजाति (अजजा) के रूप में सूचीबद्ध किया। संविधान निर्माताओं का मानना था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया और इसीलिए राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी कम रही. संविधान ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की खाली सीटों तथा सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अजा और अजजा के लिए 15% और 7.5% का आरक्षण रखा था, जो पांच वर्षों के लिए था, उसके बाद हालात की समीक्शा किया जाना तय था। यह अवधि नियमित रूप से अनुवर्ती सरकारों द्वारा बढ़ा दी जाती रही. बाद में, अन्य वर्गों के लिए भी आरक्षण शुरू किया गया।

50% से अधिक का आरक्षण नहीं हो सकता, सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से (जिसका मानना है कि इससे समान अभिगम की संविधान की गारंटी का उल्लंघन होगा) आरक्षण की अधिकतम सीमा तय हो गयी। हालांकि, राज्य कानूनों ने इस 50% की सीमा को पार कर लिया है और सर्वोच्च न्यायलय में इन पर मुकदमे चल रहे हैं। उदाहरण के लिए जाति-आधारित आरक्षण भाग 69% है और तमिलनाडु की करीब 87% जनसंख्या पर यह लागू होता है

प्रमोशन में आरक्षण अनुचित

2014 में होने वाले लोकसभा का चुनाव सभी के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में मुस्लिम और हिंदुओं के दलितों को लुभाने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। रूढ़ियों और जातियों को खत्म करने के बजाय उसे बढ़ाकर समाज में खाई पैदा करने के लिए राजनीतिज्ञों ने एक और आरक्षण का शंख बजाया है। इसकी शुरुआत मायावती ने सबसे पहले की। प्रमोशन में रिजर्वेशन बिल के मुताबिक दलितों और आदिवासियों को सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में 5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है।
इस बिल को 1995 से ही लागू किए जाने का प्रावधान है। अगर यह बिल पास हो जाता है तो दलितों व आदिवासियों को प्रमोशन और वरीयता नए कानून के मुताबिक दी जाएगी। आगे से ऐसे आरक्षण से पहले किसी आधार पर कोई सफाई देने की जरूरत नहीं होगी. एक और महत्वपूर्ण बात ये कि यह कानून सभी राज्यों को मानना होगा।

लेकिन पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण को खारिज कर दिया था लेकिन मायावती ने उत्तरप्रदेश में अपनी सरकार के कार्यकाल के दौरान प्रमोशन में एससी-एसटी को आरक्षण का फैसला लागू करवाया, तभी से विवाद की शुरुआत हुई। अप्रैल 2012 में ही सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण से पहले यह तय करना होगा कि पिछड़ेपन, योग्यता और उचित प्रतिनिधित्व के आधार पर वाकई किसी को दिया जा रहा आरक्षण जरूरी और संवैधानिक तौर पर सही है। इसी के बाद से मायावती लगातार सरकार पर इस प्रावधान को पूरी तरह से हटाते हुए संशोधन के साथ बिल को फिर से पास कराने का दबाव बना रही है। मायावती के साथ-साथ सरकार भी इस बिल के पक्ष में है। एनडीए में इस बिल पर एक राय नहीं है। भाजपा इस बिल के पक्ष में हैं लेकिन उसने कुछ संशोधन का प्रस्ताव रखा है, वहीं जेडीयू इस बिल के पक्ष में दिख रही है। नीतीश कुमार ने समर्थन की बात कह ही दी है।

समाजवादी पार्टी इस बिल के सख्त खिलाफ है। समाजवादी पार्टी को डर है कि अगर ये बिल लागू हो जाता है तो सबसे ज्यादा नुकसान उनके आधार वोट को ही होगा। हालांकि मुलायम सिंह मुसलमानों को आरक्षण देने के पक्ष में है। दूसरी ओर सरकारी नौकरियों के आरक्षण में मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने के सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की मांग का समर्थन करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग एवं अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए।
अपने आधार वोट बैंक को मजबूत रखने के लिए ही सपा और बीएसपी जैसी पार्टियां खुलकर इस बिल के विरोध और समर्थन में हैं। इस बिल को पास कराकर जहां बीएसपी दलित वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है, वहीं समाजवादी पार्टी पिछड़ी जाति के साथ-साथ अगड़ी जातियों के वोट पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने में जुटी है।
सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले के अनुसार प्रमोशन में आरक्षण अनुचित       सवाल उठता है कि प्रमोशन में आरक्षण कितना उचित या अनुचित है। क्या आरक्षण का मतलब किसी वर्ग विशेष, समुदाय विशेष या व्यक्ति विशेष को जबरदस्ती आगे बढ़ाना है, चाहे योग्यता हो या न हो? क्या ऊंची जातियों में पिछड़ें और दलित नहीं होते? क्या दलित, मुस्लिम या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति में एक समृद्ध व्यापारी, बड़े नेता, आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति नहीं होते? यदि ऐसा है तो संविधान में उल्लेखित सामाजिक न्याय का मतलब क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण देना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य नहीं है। इसके लिए राज्य सरकार बाध्य नहीं है। शीर्षस्थ अदालत ने यह बात उत्तर प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण मामले में डिमोशन की कार्रवाई के खिलाफ दाखिल याचिका पर कही। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में दिए गए आदेश में बदलाव से भी मना कर दिया। याचिका में कहा गया था कि जिन कर्मचारियों को कोटे से प्रमोशन दिया जा चुका है, उन्हें डिमोट न किया जाए और इस कार्रवाई से पहले सर्वे किया जाए। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने वर्ष 2006 में एम. नागराज मामले में भी कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण का लाभ देना सरकारों का अपना फैसला है। आरक्षण देते समय राज्य सरकारों को तीन बातों का ध्यान रखना होगा। अधिकारी की दक्षता, उस वर्ग का प्रतिनिधित्व और पिछड़ापन।

आरक्षण देश के लिए गले की फांस आरक्षण हमारे देश के लिए गले की फांस बन चुका है, जिसे देखों आरक्षण की मांग कोलेकर सड़कों पर उतर आता है। लोग किस जाति धर्म और मजहब के नाम आरक्षण कीमांग करते है ? जबकि इस देश में सभी को जीने का सामान्य अधिकार है फिर क्यों हमखुद ही अपने आपको और अपनी समाज को नीचा दिखाकर औरों की अपेक्शा कम आंकेजाने की मांग करते है। सही मायने में सरकारआरक्षण की जंग की जिम्मेदार है। औरआरक्षण देश की बर्बादी और मौत का जिम्मेदार है। क्योंकि आरक्षण मांगने वाले या आकर्षित  लोग कहीं ना कही सामान्य वर्ग से कमजोर होते है और ऐसे ही कमजोर  लोगोंके हाथों में हम अपने देशकी कमान थमा देते है। जो उसको थामने लायक थे ही नहीं।बस उन्हें तो यह मौका आरक्षण के आधार  पर मिल गया।

आरक्षण से  नुकसान

आज हमारे देश में कई इंजीनियर और डॉक्टर्स आकर्षित जातिसे है। जिनकी नियुक्ति को आरक्षण का आधार बनाया गया। एक सामान्य वर्ग,सामान्य जाति के छात्र और एक आकर्षित जाति के छात्र के बीच हमेशा ही सामान्यजाति के छात्र का शोषण हुआ, चाहे स्कूल में होने वाला दाखिला हो , फीस की बात होया अन्य प्रमाण पत्रों की। इन सभी आकर्षित जति वाले छात्र को सामान्यजाति वालेछात्र से आगे रखा जाता है। क्या सामान्य जाति वाले छात्र के पालक की आमदनी आकर्षित जाति वाले छात्र से अधिक होती है। शायद नहीं फिर भी उसे स्कूल फीस मेंकटौती मिलती है और साथही साथ छात्रवृति भी दी जाती है। इतना ही नहींपरीक्शा मेंकम अंक आने पर भी सामान्य जाति वाले छात्र के अपेक्शा उसे प्राथमिकता पर लियाजाता है। जबसामान्य जाति वाला छात्र स्कूल की पूरी फीस भी अदा करता है औरमन लगाकर पढ़ने के बाद परीक्शामें अच्छे अंकों से पास भी होता है।फिर भी  उसके साथ यह नाइंसाफी सिर्फ इसलिए होती है क्योंकि वह सवर्ण जातिसे वास्ता रखता है। अगर हम इसी कहानी के दूसरे पड़ाव की बात करें यानी नौकरी की तो अच्छे अब्बलनंबरों से पास हाने के बाबजूद

सवर्ण जाति की बजाय उस व्यक्ति को वह नौकरी सिर्फइसलिए मिल जाती है क्योंकि वह आकर्षित जाति से है। जबकि वह उस नौकरी की पात्रता नहीं रखता था, क्योंकि उसने तो यह पढ़ाई सरकार के पैसों की है, जबकि सवर्णजाति के छात्र ने यह तक पहुंचने में अपने मांबाप के खून पसीने की कमाई को दांव परलगा दिया। पर मिला क्या, निराशा मांबाप की आंखों के आंसू और सरकार की खोखली मजबूरियों का हवाला। जिनसे सिर्फ दिल भर जाता है पेट की आग और जहन में एक सवाल हमेशा शोलों की तरह दहकता रहता है कि क्या सामान्य जाति वाले हार में पैदाहोना ही मेरे लिए अभिशाप बना गया? वही अगर गौर देश के विकास पर किया जाए तो शायद विकास की परिभाषा ही बदलजाएगी। विकास तो हुआ पर देश का नहीं बल्कि देशद्रोहियों का जिनको हमारे वतन मेंरहने की जगह मिली, खाने को रोटी मिली, तन ढ़कने को कपड़े मिले। उन्होंने ही इससरजमी को गिरवी रख दिया, हमारे अपनों को एकएक निवालों को तरसा दिया, हमारेघरों की इज्जत को वेपर्दा कर उन्हें बदनाम और देश को बर्बाद कर दिया, बिल्कुल यहीसब तब हुआ था जब हम अंग्रेजों के गुलाम थे और वह सब अब भी हो रहा है। जब हम अपनों के गुलाम है। ना हम तब आजाद थे और ना ही हम अब आजाद है। फर्क बस इतना है कि तब हमें गैरों ने लूटा था आज हमें कोई हमारा अपना ही लूट रहाहै। देश में विकास की कड़ी को जोड़ने के लिए कुछ ऐतिहासिक पहल तो की गई और इतिहास भी बना मगर विकास का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की भेंट  चढ़ रहे देश के विनाशका। मामला 2 जी स्पेक्ट्रम का हो कॉमनवेल्थ गेम्स का हो या फिर चारा घोटाला,आदर्श घोटाला का हो। सपने और स्कीम विकास के धरातल से ही शुरू की गई थी मगरविकास जस की तस धरातल पर ही रहा। इसको बनाने वाले आसमान की बुलंदियों को छू गये। शायद सबके बाद एक बार आपको अपने देश पर गर्व हो और दूसरी बार शर्म से आंखे झुक जाए यह सोचकर किहमारा देश आर्थिक गरीब आज भी नहीं है। मगर शारीरिक और मानसिक अपंग जरूरहो चुका है। फिलहाल देश की इस दर्द भरी कहानी पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा।मगर इस सवाल का जबाब ना आपके पास है ना हमारे पास और ना ही देश के किसी राजनेता के पास। आइये हम सब मिलकर इस सवाल के जबाव को ढूंढने का प्रयासकरें। हमारी कोशिश निरंतर जारी रहेगी। बस यहां से शुरू होती है देश की बर्बादी की

दस्तान, जिसके बाद शायद आप किसी भीजाति या धर्म से हो। अगर इस देश से वास्ता रखते है तो आरक्षण की मांग नहीं करेंगे।बल्कि इसे हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर देने की गुजारिश करेंगे।जिस आकर्षित व्यक्ति को सरकार ने डॉक्टर बनाया सही मायने में वह इस काबिल नहीं था। इन आकर्षित डॉक्टर साहब केहाथों में  मौत और जिन्दगी कैद हो। लेकिन इन्हें अंदाजा नही है कि इलाजपढ़ाई से होता है आरक्षण से नहीं। अस्पताल में इलाज के दौरान होने वाली कई मौतोंका जिम्मेदार आरक्षण को ही ठहराया जा सकता है। क्योंकि उन्होंने सरकार और आरक्षण पर अपना विश्वास जताया था जबकि सरकार की उपेक्षा के शिकार हुए काबिलडॉक्टर निजी अस्पतालों में अपनी सेवाएं देकर लोगों की जान बचा लेते है कारण साफहै उन डॉक्टरों ने मन लगाकर पढ़ाई की थी और मरीज की बीमारी पर काबू कर पानीकी जानकारी हासिल की थी। उन्हें यह डिग्री किसी आरक्षण के आधार के आधार परनहीं बल्कि पात्रता के आधार पर दी गयी थी। लेकिन यह देश का दुर्भाग्य ही है किउसके पास पारस की नजर ही नहीं है। जो ऐसे हीरों को चुन सके। खैर यह तो हुई आम जिंदगियों की बात, अब अगर बात की जाए आम और खास सेजुड़कर बने इस विशाल भारत के भविष्य की। तो वह भी पूरी तरह से अंधकार में है।क्योंकि डॉक्टरों की ही तरह इंजीनियर्स को भी आरक्षण के आधार पर आसानी से मौका मिल जाता है। जबकि उन्हें तो यह से पास कर देते है उनमें कितनी जिंदगियां अपनाबसेरा बनाकर सपना देख रही होगी अपने सुनहरे भविष्य का वही कई ऐसी सड़कों काजाल को वह एक इशारे मेंपास कर देते है जिन पर दौड़ते कई लोग मंजिल की आस मेंदौड़े जा रहे है। जिन्हें शायद ही मंजिल मिल सके क्योंकि जिन रास्तों के सहारे वहमंजिल पाना चाहते है वह आकर्षित सोच से बनाई गई है।

 

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