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    Homeसाहित्‍यकविताआरम्भ में ब्रह्म एक था

    आरम्भ में ब्रह्म एक था

    —विनय कुमार विनायक
    आरंभ में ब्रह्म एक था,
    ‘एको ब्रह्म दूजा नास्ति’
    ब्रह्म द्विजाकर हो बना
    पुरुष-प्रकृति और सृष्टि!

    आरंभ में वेद तीन था
    ऋक्,साम, और यजुर्वेद
    बाद में चौथा अथर्ववेद;
    सभी वेदों का समाहार!

    मानवीय आचार-विचार,
    जन्म, विवाह, अंत्येष्टि
    औषधि, चिकित्सा,जादू,
    मातृभूमि प्रेम,ब्रह्मज्ञान
    अथर्ववेद से मिला हमें!

    आरंभ में ब्रह्म एक था,
    बाद में त्रिदेव बन गया
    ब्रह्मा विष्णु और शिव,
    फिर तैंतीस कोटिक देव
    जन जातियों से आया!

    ब्रह्मा से ब्राह्मण बना
    ब्राह्मण से त्रिवर्ण चला है
    ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यजन
    बाद में बन गया चतुष्वर्ण,
    तीन वर्णों का सम्मिलन!

    आरंभ में एकमात्र लक्ष्य था
    जीव सृजन-जनन-संवर्धन का
    फिर तीन लक्ष्य था सामने
    सिर्फ धर्म,अर्थ औ’ काम का,
    चौथा लक्ष्य मोक्ष बाद बना!

    वेद मंत्रवेत्ता मोक्ष कामी नहीं
    वे जीते जी थे स्वर्ग आकांक्षी
    मोक्ष लक्ष्य वैदिकों का नहीं है
    ब्राह्मण नहीं श्रमणों से मिला
    आज समग्र हिन्दू का दर्शन!

    वैदिक जन का त्रिआश्रम है
    ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ,
    सन्यास श्रमण की निवृत्ति,
    ब्राह्मण का प्रवृति दर्शन है
    सन्यास नहीं था आरंभ में!

    आज हम जैसे भी दिखते
    वह सम्मिलित अवदान है
    ब्राह्मण, श्रमण, आदिजन
    चिंतन, मनन, मिलन का
    जल और शक्कर के जैसा!
    —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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