पचास के उस पार

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-बीनू भटनागर-

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माना कि यौवन के वो पल,

खो गये कुछ उलझनों में,

मैं वही हूं तुम वही हो,

फिर न क्यों जी लें कभी,

उन्माद के वो क्षण।

तुम मेंरे हो शांत सागर लक्ष्य मेंरा ,

मैं नदी बहती हुई तुमसे मिली थी,

बांहे फैला दो मै तो अब भी वही हूं।

तुम हो एक चट्टान संबल मेरा,

फिर नहीं क्यों बढ़के थामा हाथ मेरा।

भूल जाओ बालों में चांदी के जो तार हैं,

भूल जाओ  कि अब हम पचास के उस पार है,

फिर से जी लो वो पल,

जो रेत में पानी की बूंदों से खो गये हैं।

आज भी वो मेंरे पल, तुम पर उधार हैं।

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बीनू भटनागर
मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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