लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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बुधवार की सुबह १६६ परिवारों सहित देश की जनता के लिए सुखद अहसास लेकर आई। भारत की धर्मनिरपेक्ष अस्मिता व मुंबई में २६/११ हमले के आरोपी आमिर अजमल कसाब को अंततः पुणे की यरवदा जेल में फांसी दे दी गई है। बड़े ही गोपनीय तरीके से इस फांसी को अंजाम दिया गया और ऑपरेशन एक्स का नाम दिया गया। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कसाब की फांसी पर लटकाए जाने की पुष्टि करते हुए कहा कि यह ७ नवंबर को ही तय हो गया था कि २१ नवंबर को कसाब को फांसी की सजा दी जाएगी। दरअसल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उसकी दया याचिका खारिज करते हुए ५ नवंबर को जरूरी कागजातों पर अपने हस्ताक्षर कर दिए थे। वहीं शिंदे ने रोम से लौटने के बाद ७ तारीख को कसाब की फांसी के कागजात पर अपने हस्ताक्षर कर दिए थे। उसी दिन तय भी हो गया था कि २१ नवंबर को सुबह ७.३० बजे कसाब को फांसी पर लटकाया जाएगा। केंद्र सरकार की इस पूर्वयोजना के बारे में ८ नवंबर को महाराष्ट्र सरकार को सूचित किया गया था। कसाब को १९ नवम्बर को यरवदा जेल लाया गया था। २६/११ की चौथी बरसी के ५ दिन पूर्व कसाब को फांसी से इस हमले में मारे गए नागरिकों सहित सुरक्षाकर्मियों की आत्मा को शांति मिली होगी। कसाब की फांसी ने देश को इसी माह एक और दिवाली मनाने का मौका दे दिया है। आनन-फानन में कसाब को फांसी देना गले तो नहीं उतर रहा पर देर आए दुरुस्त आए की तर्ज़ पर आतंकी कसाब को फांसी देश को सच्ची श्रद्धांजलि है। हालांकि विश्व में फांसी की सजा के विरुद्ध उठ रही आवाज और समर्थन को भारत के इस कदम से झटका लगा है किन्तु कसाब की फांसी का मुद्दा जनता के बीच गुस्से और भावुकता में बदल गया था और सरकार इस बात को अच्छी तरह समझ रही थी कि यदि उसने साम्प्रदायिक राजनीति के चलते कसाब की फांसी को अधिक लटकाया तो उसकी प्रतिक्रिया उसकी सत्ता का सूर्यास्त करवा देती। फिर पाकिस्तान को भी कसाब की फांसी की पूर्व सूचना दे दी गई थी किन्तु उसने भी वैश्विक आलोचना व दबाव के चलते कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। यानी कुल मिलाकर कसाब की फांसी को जिस गोपनीयता से अंजाम दिया गया उसके पीछे संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से भी इनकार नहीं किया जा सकता। दरअसल भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें फांसी की सजा पर प्रतिबंध की मांग की गई थी। प्रत्येक राष्ट्र को अपनी कानून व्यवस्था के नीति निर्धारण का हक़ के सिद्धांत पर चलते हुए भारत ने प्रस्ताव के विरुद्ध जाते हुए कसाब को फांसी दी। तब ऐसे में कसाब की फांसी मामले में निश्चित रूप से भारत-पाक के बीच आम सहमति का माहौल बनाने की कोशिश की गई है। हालांकि पाकिस्तान ने कसाब के शव को लेने से इनकार कर दिया है किन्तु ओसामा बिन लादेन की पाकिस्तान में मौत के बाद पाकिस्तानी मूल के कसाब की फांसी वैश्विक समुदाय में पाकिस्तान की किरकिरी अवश्य कराएगी। यह भी संभव है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों की तीव्रता तमाम सीमाओं को लांघ जाए। यहां तक कि पाकिस्तान ने कसाब के शव को लेने से भी इनकार कर दिया है। यहां तक कि महाराष्ट्र के कई शहरों के कब्रिस्तानों ने भी कसाब के शव को दफनाने से इनकार किया जिसके चलते यरवदा जेल प्रशासन को मजबूरन कसाब के शव को जेल के पास ही दफनाना पड़ा। यह थी कसाब के प्रति सार्वजनिक नफरत।

 

कसाब की फांसी पर राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ के बीच नेताओं ने संसद पर आत्मघाती हमले के आरोपी आतंकी अफजल गुरु को फांसी की मांग तेज़ कर दी है। अफजल की फांसी की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है और अब उनपर ख़ासा दबाव होगा कि कसाब के बाद वे अफजल की दया याचिका का भी त्वरित निर्णय करें। जहां तक कसाब की फांसी से राजनीतिक लाभ की बात है तो इससे कांग्रेस को जबरदस्त फायदा होना तय है। हालांकि राष्ट्र हित से जुड़े मुद्दों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए मगर स्वार्थ की राजनीति के चलते कसाब को फांसी के फंदे पर लटकाए जाने के बाद ही बयानवीरों ने राजनीतिक रोटियां सेंकना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के नेता जहां पार्टी को देशहित के लिए समर्पित बताने में जुटे हैं वहीं भारतीय जनता पार्टी ने कसाब की फांसी को देरी से उठाया हुआ कदम बताते हुए सरकार की आलोचना की है। वैसे सरकार को इस प्रश्न का उत्तर तो देना ही होगा कि उसने कसाब की मिजाजपुर्सी में करोड़ों रुपए क्यों फूंके? प्राप्त जानकारी के अनुसार अजमल कसाब पर रोज लगभग ३.५ लाख रुपए खर्च किए जा रहे थे। इस खर्च में कसाब का खाना, सुरक्षा, वकील, दवा खर्च शामिल है। कसाब ४६ महीनों से जेल में था। अब तक उसपर करीब ५० करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे। ऑर्थर रोड जेल में कसाब को जिस बैरक में रखा गया था, उसको बुलेटप्रुफ बनाने पर ५.२५ करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। १.५ करोड़ रुपए तो कसाब के लिए गाडि़यों पर खर्च किए गए थे। लगभग ११ करोड़ रुपए उसकी सुरक्षा पर खर्च हुए थे। इसके अलावा भी उसके ऊपर कई तरह के खर्च किए जा रहे थे। पिछले साल महाराष्‍ट्र विधानसभा में गृह मंत्री आर.आर. पाटिल ने कसाब पर लगभग २० करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही थी। जनता के धन की ऐसी बर्बादी भारत के अलावा कहीं देखने को नहीं मिलेगी। अब जबकि कसाब को फांसी दी जा चुकी है; राष्ट्रपति के समक्ष अन्य लंबित दया याचिकाओं को निपटाने का दबाव होगा। और शायद इसी दबाव के पूर्वानुमान के तहत प्रणब मुखर्जी ने अफजल सहित ११ अन्य अभियुक्तों की दया याचिका पर गृह मंत्रालय की राय मांगी है। कसाब को फांसी देकर सरकार ने देश की जनता की भावनाओं की कद्र की है; साथ ही पाकिस्तान का चेहरा भी बेनकाब किया है कि पाकिस्तान चाहे कितने भी झूठ बोले मगर भारत में प्रायोजित आतंकवाद का केंद्र वही है।

 

सिद्धार्थ शंकर गौतम

6 Responses to “दास्ताँ-ए-कसाब का हुआ अंत”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    डा.राजेश कपूर

    व्यवस्था और देश हित को ध्यान में रखते हुए कसाव को फांसी देने के इलावा और कोई विकल्प नहीं था. पर यह समाधान भी नहीं है. मुस्लिम युवाओं, दीन दशा में पहुंचे तथाकथित नेक्स्लाईटर आदि का इस्तेमाल अमेरीकी ( व उनकी साथी ) व्यापारी कंपनियों द्वारा बडी चतुराई और क्रूरता के साथ किया जा रहा है. चीन भी इस बहती गंगा में हाथ धोने में पीछे क्युं रहेगा. ये सब युवा लोग वास्तव में बेचारे हैं. खुद मर रहे हैं और दूसरों को मार रहे हैं ; यानी इस्तेमाल हो रहे हैं. यदि ये दुष्ट और चतुर होते तो केवल दूसरों को मारते, खुद न मरते.
    * असल में भावुक मुस्लिमों को भडका कर उन्हें अधिक से अधिक आतंक फैलाने के लिये प्रेरित करने के पीछे इन्ही विदेशी कम्पनियों, कार्पोरेशनों की कुटिल चालें काम कर रही हैं. दुर्भाग्य से कुरानशरीफ में आतंकवाद फैलाने के लिये पर्याप्त प्रेरणा उपलब्ध है. उसका पूर दुरुपयोग सीआईए और अमेरीकी कम्पनियां कर रही हैं. इस हथियार का इस्तेमाल करके वे ….
    १. एक तो मुस्लिमों को मारने के लिये विश्व जन मत का समर्थन प्राप्त कर लेते हैं और उन्हे अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिये क्रूरता से मारते जा रहे हैं ( इराक, अफ्गानिस्तान आदि ).
    २. भारत और हिंदुओं के विरुद्ध मुसलमानों को इस्तेमाल कर रहे हैं. जिससे हिन्दू शक्ती मुस्लिम विरोध में लगी रहे और भारत की संपदा व सत्ता पर कब्जे के उनके प्रयासों बाधक न बने. हिन्दु, मुस्लिम के टकराव व दुर्बल होने में उन का हित ही हित है.
    * कसाव जैसे हजारों उनकी योजनाओं के लिये बली के बकरे बन रहे हैं और वे असली अपराधी पर्दे के पीछे से अपने हित सरलता से साध रहे हैं. बिल्कुल वैसे ही जैसे अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम टकराव के बीज बोकर अपने हित साधे थे.
    * ये अमेरेकी तो उन अंग्रेजों से कहीं अधिक चतुर और दुष्ट हैं. अतः कसावों को जन्म देने वाले वास्तविक अपराधी पर तो कोई आंच आयेगी नहीं और वे हर रोज नये अजमल कसावों को जन्म देते रहेंगे. अजमल खुद मरेंगे और हमें मारते रहेंगे, समस्या की जड कभी समाप्त नहीं होगी. और अन्त में इस खेल के असली खिलाडियों की विजय हओगी …. यानी देश की संपदा पर उनका पूर्ण अधिकर होगा और हम अपने ही देश में भिखारियों जैसी दशा में एक याचक बन कर रह जायेंगे. जैसे कि अफ्रीका के अनेक देश बन चुके हैं.
    * इस लिये जरूरी है कि बेकार में बली का बकरा बन रहा मुस्लिम समाज और हिन्दु संगठन इस वास्तविकता को पहचानें और अपनी शक्ती वास्तविक शत्रु के विरुद्ध लगायें. खास कर मुस्लिमों को जान लेना चाहिये कि अफ्रीका के मुसलमानों को समाप्त करने के लिये उन में कैंसर, एडस आदि रोग इन्ही लोगों ने फैलाये थे. अब भारत की बारी है. अतःजरा दूर्दर्शिता व धैर्य से हालात को जान कर चलना होगा.

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  2. santanu arya

    कसाब की मौत से खड़े होने वाले सवाल और उनके जवाब , जो की सबूत का भी काम कर रहे है की कसाब की मौत फांसी से नहीं हुई है ! ?? ***

    1. मुझे कसाब का डेथ वारंट नही दिख
    ाया गया और न ही दिया गया था : कसाब के वकील का बयान
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    2. कसाब को तुरंत ही यरवदा जेल में ही दफना दिया गया — मुख्यमंत्री महाराष्ट्र
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    3. नियमानुसार यदि किसी मुस्लिम को फ़ासी दी जाए और यदि उसके शव को लेने वाला कोई न हो तो उसके शव को उस शहर के मुस्लिम धर्म के किसी संस्था को सौप दिया जाता है ताकि उसका अंतिम संस्कार उसके धर्म के अनुसार हो सके — ये जेल में मैन्युल में भी है
    फिर कसाब का शव जेल में ही बिना किसी धर्मगुरु के कैसे दफना दिया गया ?
    एक झूठ को छिपाने के लिए सरकार कितने झूठ बोलेगी ?
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    4. फाँसी की वीडियोग्राफी तो हुई होगी, फाँसी पर लटकने और उससे पहले तक के वीडियो जारी होने चाहिए…..
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    5. महाराष्ट्र पुलिस के एसीपी प्रद्युम्न ने भी कसाब की फांसी पर सवाल उठा दिया है .. उनके अनुसार कसाब की मौत डेंगू से हुई है
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    6. जेल मैन्यूल के अनुसार किसी भी अपराधी को जब तक फासी नही दी जा सकती तब तक वो पूरी तरह स्वस्थ न हो लेकिन कसाब को डेँगु होने के बाद तो ये संभव ही नही है
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    7.अफजल गुरु की फांसी के मामले में जब भी गृहमंत्री और दिल्ली सरकार और कांग्रेस के प्रवक्ताओ से पूछा जाता रहा है उनका एक ही दलील होता था की राष्ट्रपति के पास गृहमंत्रालय क्रम से फ़ाइल भेजता है ..और अफजल गुरु के पहले १२ आरोपिओ की फ़ाइल लम्बित पड़ी है |

    मित्रो, आज के समय में राष्ट्रपति के पास फांसी की कुल १७ फ़ाइल थी जिसमे कसाब की १७ वा नम्बर था फिर अगर कांग्रेस की दलील को सच माना जाये की भारत सरकार आरोपियों को क्रम से फांसी देती है तो फिर कसाब को बिना बारी के फांसी कैसे हो गयी ?
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    8. गृहमंत्री ने कसाब को फांसी देने वाले जल्लाद का नाम बताने से इंकार किया .. लेकिन क्यों ?
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    9. जेल कानूनों के बाद सूर्यास्त के बाद किसी भी जेल से किसी भी कैदी को किसी दुसरे जेल में शिफ्ट नही किया जा सकता ..
    फिर कसाब को रात को आठ बजे आर्थर रोड जेल से कैसे बाहर निकाला गया होगा ?

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  3. santanu arya

    कसाब के मुम्बई हमले के समय के वीडियो और फोटो सुरक्षित है |

    कसाब के पकडे जाने के समय के फोटो और वीडियो सुरक्षित है |

    कसाब के घायल अवस्था में होने के कारण इलाज़ के समय के फोटो सुरक्षित है |

    कसाब के पुलिस को ब्यान देने के समय के फोटो और वीडियो सुरक्षित है |

    कसाब के विशेष न्यायाधीश के समक्ष पेश होने और ब्यान देने के फोटो और वीडियो सुरक्षित है |

    कसाब के वीडियो कोंफ्रेंसिंग के जरिये जेल में ही मुकदमा चलाये जाने के वीडयो और फोटो सुरक्षित है |

    कसाब को फांसी की सजा बोले जाने के समय उसके चहरे पर आई प्रतिक्रिया के फोटो और वीडियो सुरक्षित है |

    बस कम्बखत के डेंगू के काटे जाने के बाद हुयी मौत या फांसी के बाद हुयी मौत के फोटो और वीडियो नहीं है ||

    बेवकूफ समझा है क्या हमें ? इस खान्ग्रेस ने ,,,,

    जब तक फांसी के सबूत , पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और इतनी जल्दबाजी में नियमो को टाक पर रख कर फांसी दिए जाने के कारण सामने नहीं आते | हम कसाब को फांसी दी गयी है नहीं मानेगे ||

    एक ही विकल्प …भारत / जीत शर्मा ” मानव “

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  4. santanu arya

    इस फोटो में महेश भट्ट, दिग्विजय सिंह के साथ कांग्रेस का राज्य सभा सदस्य मदनी(पगड़ी में) और उसके बगल में महाराष्ट्र सरकार का गृहराज्य मंत्री तथा मुंबई कांग्रेस का अध्यक्ष रहा कृपाशंकर सिंह मौजूद है।
    ये मौका है इसी फोटो में मौजूद काले कपड़ों और झबरैले बालों वाले अज़ीज़ बर्नी की उस पुस्तक के 29 दिसंबर 2010 को हुए विमोचन का है जिसका नाम ही उसने रखा था का ”आरएसएस का षड्यंत्र, 26/11”
    इसकी इस पुस्तक को ‘ग…ीता’ की तरह सच मानकर दिग्विजय सिंह इसके आरोपों को आवाज़ और हवा देता रहा है। महेश भट्ट भी ऎसी ही करतूतों को अंजाम देता रहा है।
    ये बर्नी 26/11 हमले के लिये पाकिस्तान को क्लीन चिट देने के लिए इस हद तक नीचता पर उतर चुका है कि, इसने नरेंद्र मोदी तक पर 26/11 के हमले की साज़िश का आरोप लगाया था और हेमंत करकरे का हत्यारा भारतीय सेना को सिद्ध करने की कोशिश की थी।
    अतः आज जब कसाब फांसी पर लटकाया जा चुका है तब इन दुष्टों को भी देश क्या सज़ा दे ?
    तथ्यों की पुष्टि के लिए देखिये ये लिंक
    http://www.haindavakeralam.com/hkpage.aspx?PageID=13215&SKIN=क
    https://www.facebook.com/photo.php?fbid=354144078016060&set=a.296664787097323.63804.296661657097636&type=1&theater

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  5. santanu arya

    अजमल आमिर कसाब को फांसी दी गयी है या वो डेंगू के कारण मारा गया या फिर इसके पीछे भारत सरकार का कोई षड्यंत्र छुपा है |
    आईये देंखे क्या कहते है फांसी दिए जाने वाले कैदी के लिए अन्तराष्ट्रीय और भारतीय मानक :-

    १-कोई भी प्रशासन फांसी दिए जाने से पहले राज्य सरकार को सूचित करती है |

    २-कोई भी प्रशासन फांसी दिए जाने से पहले मुलजिम के घर पर फांसी की तिथि और समय सूचित करता है अगर मुलजिम विदेशी है तो सम्बंधि
    त देश के दूतावास को खबर दी जाती है |

    ३-फांसी देने से पहले मुलजिम के वकील और विपक्ष के वकील दोनों को जानकारी देना आवश्यक है और उक्त सभी बिन्दुओं में सुचना सरकारी डाक के माध्यम से दी जानी आवश्यक है जो की भविष्य में साक्ष्य के रूप में काम आती है |

    ४-मुलजिम यदि बीमार है तो उसको फांसी नहीं दी जा सकती , अगर फांसी की तिथि तय भी है तो उसको आगे बढाया जाएगा और कसाब को डेंगू था जगजाहिर है और डेंगू के मरीज़ को पूर्ण स्वस्थ होते होते ३ महीने का समय कम से कम लग जाता है |

    ५-फांसी के बाद मुलजिम के शारीर को उसके देश भेजने का प्रवधान होता है , पकिस्तान कसाब को अपना नहीं मानता इस सूरत में उसकी कब्र भारत में ही खुदेगी किन्तु सरकार कसाब की कब्र के बारे में जनता को नहीं बता रही है ,, और कहा जहा रहा है की यरवदा जेल में ही कसब को दफनाया जाएगा | जिस कब्रिस्तान में कसाब को गाड़ा जाएगा वहां के लोग कब्र के विषय में जान जायेगे और हो सकता है उसको भी गाजी पाजी जैसे आतंकियों की तरह मज़ार बना कर सजदा करवाया जाए जो की एक प्रकार से कानून का ही उलंघन है |

    अब बात करते है कसाब को इस तरह से फांसी दिए जाने के पीछे छुपे षड्यंत्र पर |

    १-अफज़ल गुरु जैसा आतंकी अभी तक जिन्दा है जबकि उसको फांसी की सजा हुए काफी समय निकल गया है | फिर कसाब को सिर्फ ४ साल में ही फांसी क्यों ?

    २-कसाब को फांसी की तैयारी इतनी गुपचुप क्यों की गयी ?

    ३-अगर सरकार को कसाब की फांसी की खबर उजागर होने पर माहोल बिगड़ने का खतरा था तो वह कौन लोग थे जो इस आतंकी का साथ देते ? उन लोगो का चेहरा भी सामने आना चाहिए था ?

    ४-कसाब को फांसी देनी ही थी तो जनता को बता कर क्यों नहीं दी गयी ? आखिर वो कोई नेता अभिनेता तो नहीं था जो सरकार एक आतंकी को फांसी देने में इतना डर रही थी और फांसी को गुपचुप तरीके से अंजाम तक पहुचाया गया |

    ५- चलो मान लिया की सुरक्षा कारणों से कसाब की फांसी को गुप्त रखना आवश्यक था तब अभी तक उसके फांसी से पहले के और फांसी के समय के , फांसी के बाद के , पोस्टमार्टम से पहले और बाद के फुटेज क्यों जारी नहीं किये गए ?

    ६-सबसे अहम् बात यह की भारत की जनता की निगाहे अफज़ल गुरु और कसाब को फांसी होते देखना चाहती थी , जनता में इन दोनों के प्रति एक रोष था | सरकार के अनुसार उसने २६ / ११ / २००८ को मुम्बई में बलिदान गए १६६ लोगो को श्रधांजलि दी है | क्या श्रधांजलि देने का सही समय २६/११/२०१२ नहीं था जो मुम्बई में बलिदान हुए लोगो की वरसी के दिन फांसी देकर दिया जाता | फिर केवल ५ दिन पहले अत्यधिक गोपनीय और शीघ्रता दिखाते हुए फांसी दिए जाने का क्या ओचित्य ?

    खैर कसाब को एक मच्छर ने मारा या फांसी देकर मारा गया लेकिन बाला साहेब ठाकरे के जाने के बाद उनकी एक इच्छा तो पूरी हो ही गयी है ||

    जय जय सियाराम ,, जय जय माँ भारती ,, जय जय महाकाल ||
    ____________________ जीत शर्मा ” मानव “

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  6. santanu arya

    कहाँ तो जल्लाद नहीं मिल रहा था…
    कहाँ तो फ़ाँसी की लिस्ट आड़े आ रही थी…

    ================
    और अचानक 5 तारीख को दया याचिका खारिज, 6 तारीख को गृहमंत्री के हस्ताक्षर और 21 तारीख को फ़ाँसी… न कोई वीडियो, न कोई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, न कोई चित्र… तत्काल दफ़ना भी दिया…। अब यदि कोई RTI लगाकर जानना भी चाहे तो “देश की सुरक्षा” का हवाला देकर दफ़ा कर दो…

    कांग्रेस की सरकार कब से इतनी तेजी से काम करने लगी???

    यह गुजरात के चुनावों के लिए चली गई कोई “चालबाजी” है, या अचानक इज़राइल को देखकर “बासी कढ़ी में उबाल आ गया…”?

    ***साभार सुरेश चिपलूनकर जी ****

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