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    Homeमहत्वपूर्ण लेखआखिर कब तक मनाते रहेंगे निष्कासन दिवस

    आखिर कब तक मनाते रहेंगे निष्कासन दिवस

    -वीरेन्द्र सिंह चौहान-  refugees in kashmir

    चौबीस बरस बाद भी कश्मीरी हिंदुओं की घर-वापसी की कहीं कोई ठोस योजना नहीं-
    उन्नीस जनवरी उन्नीस सौ नब्बे भारतीय इतिहास का वह काला और दुर्भाग्यपूर्ण दिन है जब महर्षि कश्यप की भूमि कश्मीर घाटी से लाखों भारतीय नागरिकों को महज इसलिए अपने घर-आंगन-दूकान-कारोबार छोड़कर निकलना पड़ा था चूंकि वे हिंदू धर्मावलंबी थे। कश्मीर घाटी के यह विस्थापित हिंदू इस दिन को देशभर में निष्कासन दिवस के रूप में मनाते हैं। वह दिन जिस दिन के घरों से निकले कश्मीरी हिंदू आज तक वापस अपने पुश्तैनी घरों को नहीं लौट पाए हैं। इनमें से अनेक की तीसरी पीढ़ी यहां-वहां शरणार्थी शिविरों में नारकीय परिस्थितियो में जीवनयापन कर रही है।
    निष्कासन दिवस के संदर्भ में उस कष्टकारी दौर के चौबीस बरस बाद पीछे की तरफ मुडक़र कनिगाह दौड़ाई जाए तो समझ आएगा कि स्वतंत्र भारत में हिंदू की उपेक्षा और मानवाधिकारों के हनन से सरकारों का हृदय नहीं पसीजता। और सरकारों का ही क्यूं, दिल तो मानवाधिकारों के उन वामपंथी झंडाबरदारों का भी नहीं पिघलता जो गुजरात दंगों के नाम पर मिथ्या प्रलाप और विलाप करते नहीं थकते। नक्सलवादियों और कश्मीरी अलगाववादियों की वकालत करने वाले आम आदमी पार्टी के प्रशांत भूषण इस बीच में यहीं थे मगर उन्हें भी किसी ने आज तक कश्मीरी हिंदुओं के लिए रूदन-क्रंदन करते नहीं सुना।
    भूषण तो महज एक प्रतीक हैं और इस तुलना का उद्देश्य केवल यह स्पष्ट करना है कि भारत में वामपंथी विचारधारा का लबादा ओढ़कर घूमने वाले प्रशांत भूषण की जमात वालों से बढ़कर सांप्रदायिक कोई नहीं जो हिंसा और मानवाधिकारों के हनन को भी संप्रदायों के चश्मे से देखते हैं। उन्हें घाटी के बहुसंख्यकों का वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ अमानवीय बर्ताव आज तक नजर नहीं आया जबकि गुजरात के अल्पसं2यक मुसलमानों का दर्द बेचकर वे अपनी बौद्धिक व सियासी दुकानदारी बरसों से चमका रहे हैं।
    अपने पूर्वजों की विरासत को सूना छोड़कर कश्मीरी हिंदुओं का रातों-रात घाटी से निकल पड़ऩा अकारण या अनायास हुई घटना नहीं थी। घाटी को हिंदू-शून्य करना पाक-परस्तों का एजेंडा था। जेहादियों ने लगभग एक वर्ष इसके लिए जमकर काम किया था। चुन-चुनकर हिंदुओं के कत्लोगारत का सिलसिला लंबा चला था और इस सिलसिले का चरम उस समय आया था जब बात बहू-बेटियों के अपहरण और जबरन निकाह की घटनाओं तक पहुंच गई थी। राज्य सरकार और उसकी पुलिस इस सारे दृश्य को मूकदर्शक बन कर देख रही थी। पंडितों के जो बड़े नेता आतंकी गोलियों से बचे उन्होंने दिल्ली से भी मदद मांगी मगर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो घाटी से पलायन के सिवा उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
    उन्हें अपनी प्राणरक्षा और बहु-बेटियों की आबरू बचाने के लिए अपने पूर्वजों की धरती को अनिश्चितकाल के लिए अलविदा कहना पड़ा चूंकि पाक-परस्त अलगाववादी और आतंकी तत्वों को उनका वहां बसे रहना बिल्कुल मंजूर नहीं था। बात यहां तक भी सीमित रहती तो भी शायद नजारा कुछ भिन्न होता। मगर सारे घटनाक्रम की सबसे दर्दनाक बात तो यह थी कि घाटी का बहुसंख्यक समाज भी मौन रहकर आतंकियों के इरादों को स्वीकृति दे रहा था।
    शिविरों में बसे कश्मीरी हिंदु आज भी उस नजारे को याद कर सहम उठते हैं। निष्कासन दिवस हर बरस उस दौर के हरे जख्मों को और गहरा कर जाता है चूंकि इस बीच दिल्ली और श्रीनगर में बनी अधिकांश सरकारों ने इन ज2मों को भरने के लिए कोई प्रभावी मरहम लगाने की कोशिश नहीं की।
    कश्मीरी हिंदू चाहे वे शरणार्थी शिविरों में बसते हों या शेष भारत में अपने परिश्रम और बुद्धिबल के दम पर नए सिरे से कोई नई दुनिया बसा चुके हों, आकंठ इस उपेक्षाजनित पीड़ा से भरे हुए हैं। जरा सा छूते ही वे फूट पड़ते हैं और देशवासियों और सरकार से पूछने लगते हैं कि आखिर और कितने साल उन्हें यूं ही अपने घरों से दूर निष्कासन दिवस मनाना होगा? विस्थापितों का कहना है कि लोकदिखावे के लिए कश्मीरी हिंदुओं की घर वापसी के लिए सरकारों ने कई प्रकार के पैकेज और प्रस्ताव समय समय पर घोषित किए हैं। मगर ऐसी तमाम योजनाओं में कोई व्यावहारिक नहीं होती। शायद उन्हें तैयार करने वाले इसी एजेंडे के साथ वापसी संबंधी योजनाएं और कार्यक्रम रचते कि ये कभी कश्मीरी हिंदुओं के गले न उतरें। उन्हें लागू करने के लिए जिम्मेदार राज्य की अब तक की सरकारों की मंशा भी उन्नीस सौ नब्बे से लेकर आज तक जस की तस संदिग्ध रही हैं।
    सांप्रदायिक जेहादियों के एजेंडे के तहत घाटी से निकाल बाहर किए गए लाखों कश्मीरी हिंदू आज भी अपने घरों से दूर हैं। मगर भारत के कथित बुद्धिजीवियों और कई राजनीतिक दलों के दिवालिया-दिमाग नेताओं के रहन में आज भी कश्मीर में जनमत संग्रह का सवाल ही गूंज रहा है। वह जनमत संग्रह का सवाल जिसका कोई कानूनी आधार नहीं। वह मिथ्या सवाल जिसे लेकर हमारा नापाक पड़ौसी गाहे-ब-गाहे दुनिया में भारत को बदनाम करने का प्रयास करता रहता है। इस साल निष्कासन दिवस पर क्या कोई प्रशांत भूषण कश्मीरी हिंदुओं की व्यथा पर आंसू बहाएगा? या फिर खबरिया चैनलों के बुद्धिविलासी विशेषज्ञ किसी बड़ी बहस या तीखी-सीधी बात कार्यक्रम में इस सवाल पर चर्चा करेंगे कि आखिर कश्मीरी हिंदुओं को उनके घरों से कौन से जनमत संग्रह के आधार पर निकाला गया था ? शायद नहीं, चूंकि हम मानवाधिकारों को भी सांप्रदायिक चश्मे से देखते हैं। एक संप्रदाय के मानवाधिकारों का हनन हनन कहलाता है जबकि दूसरे के मामले में वैसा हो तो किसी को नजर नहीं आता है।

    वीरेन्द्र सिंह चौहानhttps://[email protected]
    स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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