लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन
हिन्दू संगठनों को, अमरिका में, आपात्काल से एक अलक्षित लाभ हुआ. प्रारंभ में तो संघ स्वयंसेवक सम्मिलित हुए, पर पश्चात भारत हितैषी व्यक्तित्व भी छनकर साथ आते गए. इनमें विशेषज्ञ थे, अपने क्षेत्र के दिग्गज थे, और भिन्न विचार रखनेवाले देशप्रेमी भी थे. ऐसे प्रबुद्ध व्यक्तित्वों को संगठन में आत्मीयता से जोडना आवश्यक था. यह काम बिना प्रवास निश्चित सम्भव नहीं था.
व्यक्ति विशुद्ध व्यवहार से जितना प्रभावित होता है, उतना कोरी विचारधारा से नहीं होता. सामान्य व्यक्ति व्यवहार प्रधान होता है, व्यवहार के कारण व्यक्ति निकटता अनुभव करने लगता है. और निकटता के कारण, आगे सैद्धान्तिक विचार भी उसे सहज ग्राह्य होने लगता है. यह व्यवहार प्रधानता संघ की विशेष मुद्रा (स्टॅम्प) है. फिर विष्णु सहस्र नाम से जाना जाता ….’अमानी , मानदो. मान्यो, लोकस्वामी त्रिलोकधृक॥ ’ वाला कार्यकर्ता का विशुद्ध आचरण भी आकर्षित करता है.

जैसे ही, भारत में आपात्काल समाप्त हुआ, अमरिका के प्रवासी भारतियों मॆं भी संघ विचारधारा की स्वीकृति बढी. जब लोहा गरम था, उसका लाभ लेकर, संगठन का विस्तार करने, इससे अधिक उचित अवसर और क्या हो सकता था?

सामने आदर्श था पू. गुरुजी का. संगठन दृढ करने प.पू. गुरुजी का वर्षभर भारत-भ्रमण चला करता था; और आदि शंकराचार्य ने भी भारत भर विचरण कर सनातन धर्म को पुनर्स्थापित और देश संगठित कर अद्‍भुत इतिहास रचा था; वैसे इस विशाल अमरिका में भी प्रवास की आवश्यकता अनुभव कर , आधुनिक वैमानिक प्रवास का लाभ लेकर, जब अन्य प्रवासी भारतीय सप्ताहान्त पर मित्रपरिवारो में आनन्द मनाने में व्यस्त होते थे, एक भारत पुत्र स्वयंसेवक प्रवास के लिए निकल पडता था.

(बारह) बिना नाम का इतिहास?

संघ संस्कार और परम्परा के कारण, नाम देने में हिचक अनुभव कर रहा हूँ; पर बिना नाम , समीचीन और जिस पर विश्वास किया जाए, ऐसा विवरण, कैसे दिया जा सकता है? वैसे ३५-४० वर्ष पूर्व का यह इतिहास है. स्मृति पटल पर भी कालांतरवश धूल जमी है. और बिना नाम दिए, इतिहास भी नकारा जा सकता है.

ऐसा इतिहास नकारे जाने का अनुभव भी नया नहीं है. भारत का प्राचीन इतिहास भी ऐसी ही अपर्याप्त सूक्ष्मताओं के कारण नकारा जाता रहा है.
जिन लोगों ने पीढी प्रति पीढी वेदों का पाठ करवा कर आधुनिक पीढियों तक विशुद्ध वेद पहुँचाने के लिए परम्पराएँ निर्माण की, चलाई, पनपाई और पहुँचाई उन व्यक्तित्वों के नाम कहाँ है?
अरे, जिस व्यक्ति ने अंको का और गिनती का मौलिक शोध किया, जिसका बिना अपवाद, सारा संसार आज लाभ ले रहा है; उस परमश्रेष्ठ विद्वान का नाम पता न होने के कारण, शतकों तक हमारे अंक एरेबिक अंक माने गए.
उसी प्रकार, देववाणी संस्कृत को लातिनी और ग्रीक की समसामयिक बताकर, एक कपोल कल्पित प्रोटो इन्डो युरोपियन भाषा से निःसृत माना गया. ऐसी कई परम्पराएँ गिनाई जा सक्ती हैं, जो एक अलग आलेख का विषय हो सकता है. मैं असमंजस में हूँ. स्वयंसेवक हूँ, और संघ की प्रसिद्धि विन्मुख परम्परा से अवगत हूँ.

(तेरह) मेरा संदेह:

इस प्रसिद्धि विमुखता का लाभ अवश्य है, पर आज के परिवेश में घाटा भी है. संघ को भी इस प्रसिद्धि विमुखता के कारण प्रतिबंध झेलने पडे थे. असत्य के अंधेरे तले सत्य का प्रकाश ढंका गया था. और इसी कारण भारत की सर्वांगीण उन्नति का संघ का अभियान विलम्बित हो गया.
मौलिक सोच के लिए इन बिन्दुओं को छेडा है. मैं संघ की प्रसिद्धि पराङमुखता को जानता हूँ. पर, उसी के कारण, मुझे आज के बिके हुए संचार माध्यम के युग में सच के पिछड जानेका भय भी है.

अनेक कार्यकर्ताओं को मैं निकटता से जानता हूँ, जिन्होंने अपनी जीवनचर्या में इस परदेश में भी समन्वयकारी भारतीय संस्कृति को केन्द्र में रखा था. काफी अन्य लोग भी काम तो करते ही थे, पर अपने आप को सुरक्षित रखते हुए.अपने सारे निजी उत्तरदायित्व संभालकर, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को वरीयता देकर, बचे खुचे अतिरिक्त समय में सुविधा से सेवा करनेवाले.

(चौदह) असामान्य समर्पण

पर मेरी जानकारी (और भी शायद ही होंगे ) का एक नेतृत्वशाली कार्यकर्ता ऐसा था, जिसके पास सारी उलझी हुई समस्याएँ पहुँचती. और उसको इन समस्याओं का हल ढूँढना ही पडता. और कोई पर्याय नहीं था. ऐसा कुशल योजकता का गुण दुर्लभ होता है, जो असामान्य था.

जब अन्य कार्यकर्ता निराश होते थे, तब उनकी निराशा को आशा में परिवर्तित कर देना इसका काम हुआ करता था. विरोधकों (पर्याप्त थे)की कूटनीति को ताडना, हर प्रसंग के लिए सिद्धता रखना, प्रेरणादायी वक्तृता, कार्यकर्ता को हर परिस्थिति में मार्गदर्शन, ध्येय के लिए पारदर्शी समर्पण, आर्थिक उदारता, हर समस्यापर वैचारिक योगदान, घरका द्वार ,रसोई और भण्डार किसी भी हिन्दू (भारतीय) हित के लिए सदैव खुला. जिसने संघ समझा, संघ जिया, संघ के सिवा और कुछ जीवन के केंद्र में नहीं रखा; ऐसा कार्यकर्ता भी शायद सहस्रों में एक होता होगा.

अपनी सुविधा से जिसकी सोच मर्यादित नहीं थी. कुछ कार्यकर्ता जानता हूँ, जो अपनी सुविधा से काम करते थे. इस कार्यकर्ता को ऐसी सुख-विलासिता उपलब्ध नहीं थी. कभी कभी देर रात्रि तक इसका दूरभाष बजता रहता. कभी भारत से सम्पर्क करने में व्यस्त रहता. कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन और निर्णायक उत्तर दिए बिना इसे बिस्तर पर पीठ टिकाना असंभव था. फिर भोर में पाँच बजे नियम से जाग जाता. न्यूनतम कार्यकर्ता मौलिक चिन्तन की सामर्थ्य रखनेवाले थे, जो हाथ बटा
सकें.

स्वतंत्र चिन्तन से अमरिका के भिन्न परिवेश में किस प्रकार संघ की विचारधारा प्रस्तुत की जाए? इस विवेक का परिचय भी मुझे इस कार्यकर्ता ने अनेक बार दिया.
डॉ. हेडगेवार जी को तो मैंने देखा नहीं. प.पू. गुरुजी से ओ. टी. सी. में दो बार संक्षिप्त परिचय हुआ था. सुदर्शन जी और रज्जू भैया जी का मैं अमरिका में सारथि रहा था. पर इस कार्यकर्ता का तो मैं निकट से जानता हूँ, परिचित हूँ.

(पंद्रह) समरसता:
संघ की सफलता का एक विशेष रहस्य और हार्द समरसता है. समता से बढकर समरसता होती है. समरसता होने पर समता आ ही जाती है. डॉ. हेडगेवार की जीवनी जिन्होंने पढी हैं, वे जानते हैं.
इसी के कारण, परस्पर अनजान स्वयंसेवक चाहे वह तमिलनाडु से हो या कश्मीर से एक दूजे के अंतरंग सहकारी और मित्र बन जाते हैं. इसी समरसता को प्रोत्साहित करने, इस कार्यकर्ता ने दिनरात दौड-भाग की थी.
और यह कार्यकर्ता प्रचारक नहीं है, इसे भी नौकरी है, परिवार है, सगे-सम्बंधी हैं. पर, जो इसके संबंधी थे वे इस हिन्दु -हितैषी महायज्ञ में जुड गए, और जो कार्यकर्ता थे वे उसके विस्तृत परिवार के अंग बन गए. संगठक ऐसा कि, बडे बडे व्यक्तित्वों को प्रभावित कर कार्य में जोडता. ऐसा संगठक हमें इस मौलिक संगठन खडा करते समय मिला, यह एक मणि-कांचन योग था.

(सोलह)समता की अपेक्षा समरसता श्रॆष्ठतर:

भारत में शाखा के दैनंदिन मिलन और परस्पर निःस्वार्थ सहायता के कारण धीरे धीरे समरसता निष्पन्न होती है. यह दीर्घ प्रक्रिया है, तात्कालिक फल देनेवाली प्रक्रिया नहीं . पर अमरिका में दैनंदिन सम्पर्क के अभाव में समरसता विकसाना और भी कठिन और धीमा था. फिर भी दैनंदिन शाखा जैसी समरसता प्रोत्साहित कर फैलाना आवश्यक था. यह काम प्रवास से ही सम्भव था.
ऐसी परिस्थिति के लिए निम्न उक्ति सार्थ प्रतीत होती है.
“if the mountain won’t come to Muhammad, then Muhammad must go to the mountain,”
पर हमारे पास संघ संस्कार की पूँजी थी. वास्तव में समरसता परिणाम है, दीर्घ प्रक्रिया और विशुद्ध व्यवहार का. कोई सामने पडी हुयी वस्तु नहीं जो आप छूकर हाथ में उठा लें. समरसता घरेलू सम्पर्क से आती है; साथ रहने से आती है। बार बार भेंट करने से आती है। हर सदस्य की समस्याओं में हाथ बटाने से आती है.
इसीका दूसरा नाम, पारिवारिक भाव है, और बिन्दू दृढ करना चाहूँगा कि, यह पारिवारिक भाव या समरसता ही संघ की मुद्रा (स्टॅम्प) है.

संघ की भी सफलता का सशक्त कारण मुझे यह समरसता लगती है. यह कृत्रिम घोषणाओं की समता नहीं है. जब ना. ग. गोरे अपने समाजवादी कार्यकर्ताओं को भी संघकी समता का उदाहरण देते थे. कहते थे. कि जो संघ समता की बात भी नहीं करता उसकी समता स्तुत्य है.

मुझे भी ना. ग. गोरे जी का आतिथ्य करने का अवसर इसी आपात्काल में मिला था. आप ने हमारे कार्यकर्ताओं की प्रशंसा ही की थी. मैंने भी उनकी सुविधा के लिए मराठी में, पिताजी के सर्वोदय आंदोलन में योगदान का परिचय कराया था. जिससे वें मुझसे भी निकटता अनुभव कर पाए थे.
पर उन्हें भी संघ की समरसता या पारिवारिक भाव का कारण शायद ही पता होगा. मेरी जानकारी में, बाकी लोगों की समता बाहर से लादी जाती है; वें किसी विशिष्ट वाद में मानकर सदैव संघर्षरत रहते हैं. बाहर भी संघर्ष और विजयी होनेपर घर में भी संघर्ष. ऐसा संघर्ष सौम्य शत्रुता अवश्य जगाता होगा. संघर्षवादी पक्षों की यही समस्या है.
शत्रुता से समता? ऐसी परस्पर विरोधाभासी वृत्तियाँ इन संघर्षवादियों की समझ के बाहर है.
इससे विपरित संघकी समता अंतरबाह्य होती है. परस्पर आत्मीयता पर टिकी होती है.

(सत्रह) गुलाब जामुन की समरसता

मुझे गुलाब जामुन की समरसता का दृष्टान्त समीचीन लगता है. संघ में जो भी हिन्दू आता है, इस समरसता के मीठे रस में ऐसे घुल जाता है, कि, वह न बनिया, न ब्राह्मण, न शुद्र, न क्षत्रिय या अस्पृश्य रहता है; वह मात्र हिन्दू बन जाता है. संघ के पारिवारिक मीठे रस में डूबा हुआ गुलाब जामुन बन जाता है.

और कोई संस्था कर नहीं पाई वो चमत्कार संघने कर दिखाया है. इसे संघ के साहित्य पढनेपर अनुभव नहीं किया जाता. अनेक बुद्धिजीवी पढ पढकर और लेखनी घिसड घिसडकर भी इस समरसता को पहचान नहीं पाए हैं. ’मैं मनु और संघ ’ (रमेश पतंगे जी की पुस्तक) पढकर कुछ जानकारी मिलेगी दत्तोपंत जी का साहित्य पढने पर भी कुछ जानकारी अवश्य मिलेगी. पर शाखा का प्रत्यक्ष और पर्याप्त अनुभव लिए बिना यह बात आपके गले नहीं उतरेगी. यह संघ की विशुद्ध तपस्या का फल है.

ऐसा पारिवारिक बंधुभाव यह संघकी मुद्रा है. और स्वयंसेवक को पहचानने का साधन भी है.

स्वयंसेवक को उसकी जाति पूछनेवाले अन्य पार्टियों वाले ही होते हैं.
रमेश पतंगे जी ने ’मैं मनु और संघ ’नामक उनकी पुस्तक में इस विषय की आवश्यक चर्चा की है. पर मेरी यह दृढ धारणा है, कि, संघ उस पुस्तक को पढने पर भी समझा नहीं जाएगा कुछ जानकारी अवश्य मिलेगी. ऐसी समरसता कागज़ी घोडे दौडाकर नहीं फैलायी जा सकती.

(अठारह ) संगठन शीघ्र पथ (शॉर्ट कट) नहीं है.

तो, संगठन के लिए (शॉर्ट कट) शीघ्र संक्षिप्त पथ नहीं चलता। समाचार में प्रसिद्धि के लिए शॉर्ट कट हो सकता है।
समरसता सह-जीवन से अंकुरित होती है, और धीरे धीरे फलती है, तो स्वयं प्रेरणा बन प्रसृत हो जाती है। यह दूसरों को फाँस कर अपना उल्लु सीधा करने की प्रणाली नहीं है. ऐसे सैद्धान्तिक सत्य का अनुभव करने करानेवाली संस्थाएँ कम ही हैं। मुझे तो केवल संघ प्रेरित संस्थाओं में इस गुण का अनुभव हुआ है. मैं भी गांधी और विनोबा प्रेरित कुटुम्ब में जन्मा हूँ. पर डंके की चोट पर कहूँगा, कि….
अन्य सभी संस्थाएँ झटपट फल चाहती हैं। इसी कारण दीर्घकालिक असफलता पाती है।
पर, फिर जब उनको नाम ही कमाना है, तो काम पर कौन ध्यान दें?
प्रचार कर के, पद पाने के लिए इर्ष्या प्रेरित काम होता है।जिस के फलस्वरूप, पदाधिकार के ढपोसले खंभोपर सारा कुनबा खडा होता है, और अल्पकाल में ही, कभी कभी खडा होने के पूर्व ही, गिर भी जाता है। देखा है, उन संस्थाओं में पदाधिकारी भी काम भी तब तक करता है, जब तक पद पर है.

(उन्निस ) नाम प्रसिद्धि का चक्र व्यूह

ऐसा प्रसिद्धि का चक्र व्यूह ७० वर्षों से विफल ही हो रहा है। दूरगामी लक्ष्य रखकर सुदृढ काम करनेवाली संस्थाएँ इनी गिनी ही हैं।राजनीति में ऐसी सैद्धान्तिक संस्था भी धीरे धीरे दूषित हो सकती है. भा. ज. पा. को भी आँखों में तेल डालकर, इसका ध्यान रखना चाहिए.

बाकी बहुतेरी संस्थाएँ, नाम पर दृष्टि गाडकर काम करती हैं। इस लिए प्रसिद्धी तो पा लेती है। पर काम कुछ होता नहीं. फिर भी कोई उस से सीख लेता नहीं। सुई खोयी है घास की गंजी में, पर वहाँ तो विलम्ब और अंधेरा है। इस लिए ढूंढते हैं; बत्ती तले। वहाँ सुई मिलेगी कहाँ से? सारे रचनात्मक काम कठोर परिश्रम चाहते हैं. एक अकेला डॉ. हेडगेवार यह रहस्य समझा था. धन्य है भारत डॉ. हेडगेवार भारत में जन्मा था.

(बीस) तेरी भी जय जय-मेरी भी जय जय

कुछ संस्थाएं “तेरी भी जय जय-मेरी भी जय जय” के समीकरण पर काम करती है। काम क्या करती है, केवल नाम करती है। मात्र, नाममात्र काम होता है। चाय चिवडा खाकर हाथ पोंछकर घर चले जाते हैं। और सोते जागते सोचते हैं कि स्वयं बडे नेता हैं। इस लिए कुछ भी होता नहीं। मात्र नाम हो जाता है। फिर नाम कमाने के झटपट तरीके खोजने में ही बुद्धि व्यस्त रहती है।
समाचार पत्रों में अपना नाम और फोटु देखकर हर्षित होते हैं. जानते नहीं कि वो फोटु उनके सिवा और शायद उनकी पत्‍नी के सिवा किसी ने नहीं देखा, न पहचाना.
वैसे इन लोगों को दर्पण ही देखना चाहिए. कम से पूरा प्रतिबिम्ब तो दिखाई देगा.

(इक्किस ) एक ही संस्था यह जानती है।

साक्षात अनुभव से ही प्रेरणा मिलती है। मेरे बच्चो ने भी जब भारत के, छोटे देहात को जाना , तो उनका हृदय भी मोम हो गया था।अपनत्व का भाव जाग्रत हुआ था। जो कठिनाइयों को कुटिया में रहनेवाले झेलते हैं, उन्हें उनके साथ रहे बिना अनुभव नहीं की जा सकती। मैंने उन्हें कहा था; कि भारत में संबंधियों का और लोगों का प्रेम देखना बाकी समस्याएं तो होंगी ही उन्हें देखोगे तो कुछ सीख नहीं पाओगे.
समाचारों के लिए कुटियों में जाकर, छवियाँ खिंचवाई जा सकती है, पर प्रेरणा के लिए नहीं।

(बाइस) संगठक का मापदण्ड:

संगठक की उपलब्धियों का माप-दण्ड क्या हो?
उसका नाप समसामयिक घटनाओं पर प्रभाव की मात्रा से किया जाएगा.
आज हिंदुओं की अनेक संस्थाएँ (यु.एस.ए.) अमरिका में चल रही हैं, अनेक कार्यकर्ता उनमें सक्रिय हैं। ऐसे संगठनों में अनेक कार्यकर्ताओं का योगदान अवश्य है, पर मैं अपना वैयक्तिक मत भी रख सकता हूँ।
मैं मानता हूँ, कि, इस काम में सिंह-की राशी का योगदान, सर्वोच्च योगदान, जिस व्यक्ति के काम से और नाम से उभर आएगा, वह व्यक्ति यही है। कौन है, यह व्यक्ति ? इस व्यक्ति के नाम की राशी भी सिंह है। वास्तव में इसका सिंह जैसा व्यक्तिमत्व भी है।
नाम की उन्हें चिन्ता नहीं है, मुझे नाम देने की चिन्ता क्यों हो?
यह उनकी इच्छा नहीं, पर मेरा एक लेखक का स्वतंत्र अधिकार मानता हूँ. साथ साथ युवा पीढी के सामने एक विश्वासार्ह आदर्श भी रखना चाहता हूँ.

एक ग्रहस्थी भी चाहे तो क्या कर सकता है, इसका अनुमान भी हो.
वास्तव में मेरे लिए वें हिंदु-रत्‍न है, भारत रत्‍न हैं. इस भारत रत्‍न का नाम है डॉ. महेश मेहता और आपके इस सांस्कृतिक योगदान में आप की पत्‍नी श्रीमती रागिनी जी का शत प्रति शत उदार सहकार है. साथ साथ आपकी सहायता में बहन श्रीमती अंजलि पण्ड्या को भी कोई भूल नहीं सकता. बहन अंजलि पण्ड्या ने महेश जी के व्याख्यानो की जो टिप्पणियाँ सँजोकर रखी थीं, उनके सहारे ही डॉ. महेश जी ने ’हिन्दू फिलॉसॉफी इन ऍक्शन ’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें १९७० से २००० तक का परिषद के ऐतिहासिक वृत्तान्त का विवरण किया गया है.

आजकल महेश जी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं चल रहा. अनेक कार्यकर्ताओं ने उनके स्वास्थ्य के लिए शुभेच्छाएँ भेजी हैं.
कार्यकर्ताओं के सामने एक आदर्श ग्रहस्थी चाहे तो कैसा योगदान कर सकता है, यह प्रत्यक्ष कर दिखानेवाले इस भारत भक्त के सामने मैं नत मस्तक हूँ. अनेक कायकर्ताओं की ओरसे, एवं धर्मपत्‍नी पल्लवी की ओरसे भी आपके स्वास्थ्य के लिए शुभेच्छाएँ इस आलेख द्वारा भेजी जा रही हैं.
मुझे कार्यकर्ता को मार्गदर्शक हो ऐसा आलेख लिखनेका आदेश था, जो आपके सामने हैं.

3 Responses to “आपातकाल पश्चात, अमेरिका में हिन्दू संगठन का दृढीकरण (२)”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    बहन शकुन जी नमस्कार.
    मुझे काफी मित्रों ने महेश जी के स्वास्थ्य प्राप्त करने की शुभेच्छा दर्शाते संदेश भेजे हैं.
    मैं स्वयं सप्ताह भर बाहर था.
    सारे संदेश महेश भाई को पहुँचाए जाएंगे.
    बहुत बहुत धन्यवाद.

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  2. Rekha Singh

    आदरणीय मधु भाई , पढ़कर अपने अश्रुओं को रोक नहीं पाई | आप और पल्लवी बहन के साथ जब महेश भाई के यहाँ गए पिछली बार गए तो लगा जल्दी ही जाकर फिर रागिनी बहन और महेश भाई के साथ एक हप्ते रहूँगी | शायद कुछ काम आ सकू उन लोगो के , इस अश्वस्तथा की स्थिति में लेकिन भारत भागना पड़ा माता जी के लिए और फिर यहाँ न्यूयार्क रश्मि की मदद के लिए | महेश भाई को मैने अपने श्रेष्ठ भ्राता श्री की तरह चाहा है और उनका स्नेह , आशीर्बाद और नैतिक सहयोग पाकर मेरा अति संघर्षमय जीवन निकलता गया और उस जीवन के संघर्ष का अहम् हिस्सा रहा बच्चों की परवरिश और …… ऊंचे जीवन मूल्यों को लेकर जीना अत्यंत कठिन है यह तो वह स्वयं जाने जो जीते है | मेरे महेश भाई एवं सभी संघीय परिवारों से जुड़ने के सुअवसर के प्रणेता मधु भाई स्वयं आप और पल्लवी बहन रहे है | लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन यहाँ बस एक ही इच्छा है महेश भाई के स्वस्थ होने की कामना। ………

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  3. डॉ. मधुसूदन

    शकुन्तला बहादुर द्वारा

    आदरणीय मधु भाई,
    सादर नमस्कार। आप के आलेख से मुझे श्रद्धेय महेश भाई
    जी के अस्वस्थ होने का समाचार मिला । आपके.पिछले आलेखों से
    मुझे उनके द्वारा संघ के संगठन कार्यों के लिये निष्काम भाव.से की गयी सेवाओं और हिन्दू-समाज की जागृति हेतु किये गये अथक परिश्रम की जानकारी मिली। उनके वर्चस्वी एवं यशस्वी व्यक्तित्व
    को ज्ञात कर मुझे हर्ष भी है और गर्व भी है ।
    परमप्रभु से प्रार्थना है कि वे आ. महेश भाई को यथाशीघ्र नीरोग करके
    पूर्ण स्वस्थ करे ंं और पर्याप्त शक्ति प्रदान करें , जिस से वे अधिक समय तक भारतीय प्रवासियों का मार्गदर्शन कर सकें। उनकी सेवाएँ
    और प्रेरणा हमारे लिये अनमोल हैं ।।

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