वायु एवं जल मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है

मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य का जीवन अन्न सहित वायु व जल पर आश्रित है। यदि मनुष्य को कुछ सकेण्ड्स या मिनट तक वायु न मिले तो वह जीवित नहीं रह सकता। वायु का अन्न से भी अधिक महत्व है वह इसी बात से सिद्ध होता है। इसी प्रकार जल भी मनुष्य जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है। हमारे शरीर का लगभग 60 प्रतिशत भाग जल होता है। हम स्वस्थ तभी रह सकते हैं जब हमें पर्याप्त मात्रा में शुद्ध जल प्राप्त हो। वर्तमान समय में देश के सभी स्थानों में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। भारत की जनसंख्या 125 करोड़ से अधिक है और छोटे छोटे शहरों में भी लाखों की संख्या में लोग रहते हैं। यह लोग मल मूत्र सहित नाना प्रकार से वायु और जल को प्रदूषित करते हैं। जल का आवश्यकता से अधिक मात्रा में उपयोग करते हैं, जिससे बहुत से लोगों को शुद्ध जल जिससे मनुष्य का स्वास्थ्य निरोग रहे, कठिनता से प्राप्त होता है। शुद्ध जल का मिलना आज कठिन ही है। इसी लिए कहा जाता है कि जल को उबाल कर उसके किटाणुओं को दूर कर उसका उपयोग करना चाहिये। इसी कारण आजकल सामर्थ्यवान घरों में जल स्वच्छ करने की वाटर प्योरिफायर या आरओ मशीने लगी हुई हैं। आज तो हमें किसी प्रकार से जल उपलब्ध हो भी रहा है परन्तु यह नहीं कह सकते की इसी प्रकार से इस शुद्धता का जल भविष्य में भी उपलब्ध होता रहेगा। हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों व सन्ततियों के विषय में सोचना है। उन्हें भी शुद्ध जल व अन्य पदार्थ उपलब्ध होते रहें इस पर ध्यान देना है। अतः जल की एक एक बूंद का उपयोग हमें विवेक पूर्वक करना चाहिये।

 

हमारे देश के नागरिकों का जल आदि पदार्थों का मितव्ययता के साथ उपयोग करने का कोई अच्छा उदाहरण या वर्तमान में परम्परा नहीं है। हमने अनेक लोगों को जल का दुरुपयोग करते हुए देखा है। ऐसे परिवार भी देखे हैं जहां जल का मीटर न लगा होने के कारण जल बहता रहता है, परन्तु घर के लोग जल की टोंटी को बन्द ही नहीं करते हैं। पीने के जल से लोगों को खेती करते हुए देखा है। आज कल वायु प्रदुषण के कारण जो वर्षा होती है वह जल भी स्वास्थ्य के हितकर न होकर हानिकारक ही होता है। कहते हैं कि वर्षा जल अम्लीय होता है। इसी प्रकार से गंगाजल भी इतना प्रदुषित है कि उसका आचमन करना स्वास्थ्य के हानिकारक हो सकता है, ऐसा विशेषज्ञ बता रहे हैं। इसी प्रकार किसान खेतों में जो कीटनाशक व कृत्रिम खाद डालते हैं उससे जल प्रदुषित होकर भूमिगत स्वच्छ जल भी दूषित वा प्रदूषित हो जाता है। उसका सेवन व पान करना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। हमारी नदियां भी स्वच्छ नहीं है। जागरूकता के अभाव व अपनी आदतों के कारण लोग नदियों में कूड़ा कचरा व दूषित पदार्थ डालते रहते हैं, जिससे प्रायः सभी नदियों व नालों का जल प्रदुषित हो गया है। आजकल टीवी पर ऐसे गांव भी दिखायें जाते हैं जो निकटवर्ती नदियों का जल पीने के लिए मजबूर हैं और उस प्रदूषित जल से गांव के सभी लोग बीमार होकर कैंसर जैसे डरावने रोग का शिकार होकर असमय अल्पायु में मृत्यु का ग्रास बन रहे हैं। ऐसे अनेक उदाहरण और भी हैं। ऐसी स्थिति में अनुमान लगाया जा सकता है कि जल व वायु प्रदुषण आदि के कारण भविष्य में मनुष्य का जीवन संकटों से भरा हुआ होगा। जल हमें शुद्धता के साथ सुलभ होता रहे इसके लिए हमें वायु शुद्धि, वृक्षारोपण व वनस्पतियों में वृद्धि व विस्तार की योजनायें क्रियान्वित करनी होंगी। अपने खेतों में कीटनाशकों व कृत्रिम खाद के विकल्प तलाशने होंगे। तभी यह सम्भव होगा की हम जल को स्वास्थ्य के अनुकूल रख पायेंगे।

 

आज विश्व जल दिवस है। जल के भावी संकट से बचने के लिए ही विश्व स्तर पर इस दिवस को मनाने का आयोजन किया गया है। लोगों में जल के प्रति जागरूकता व अपने कर्तव्यों का ज्ञान हो, यही इसका मुख्य प्रयोजन है। लोगों को कहा जा रहा है कि जल मूल्यवान है, इसकी एक बूंद भी व्यर्थ न करें। जल प्रदुषण के कार्यों से बचे। यह आवश्यक भी है। हम जब अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति पर विचार करते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे पूर्वज शुद्ध वायु, जल व अन्न के महत्व को समझते थे और आजकल की तरह अनापशनाप प्रदुषण उत्पन्न करने वाले कार्यों को नहीं करते थे। आज का मनुष्य प्राचीन पूर्वजों की तुलना में कहीं अधिक प्रदुषण कर रहा है। उस पर भी वह अपने को अधिक शिक्षित मानता है। शिक्षा यदि मनुष्य के आचरण में नहीं आती तो वह शिक्षा किस काम की? जो शिक्षा आचरण में न आये, वह शिक्षा, शिक्षा नहीं कही जा सकती। शिक्षा वह है जो मनुष्य के अपने लिए व समाज के अन्य सभी लोगों के लिए हितकर कार्य करने की प्रेरणा दें। मनुष्य का जीवन एकांगी व्यतीत नहीं हो सकता। वह अपने जीवन में असंख्य मनुष्यों के पुरुषार्थ से लाभान्वित होता है, तभी वह जीवनयापन कर पाता है। हम अन्न व वनस्पतियां खाते हैं, दुग्धपान करते हैं, फलाहार करते हैं, जिसे देश भर के असंख्य किसानों ने उत्पन्न किया होता है। इसी प्रकार हम जो वस्त्र धारण करते हैं वह भी देश के बड़ी संख्या में श्रमिकों व इंजीनियरों आदि ने बनाया होता है, दर्जी उसे सिलते हैं, धोबी उन्हें धोते व प्रेस आदि से अपनी सेवा देते हैं। इसी प्रकार श्रमिक हमारा घर बनाते हैं, शिक्षक हमें पढ़ाते हैं, देश के लोगों के कर के रूप में दिए धन से हमें वेतन व आजीविका प्राप्त होती है, इसलिए विवेकशील मनुष्यों को केवल अपने हित साधने का विचार न कर देश व समाज के हितों की चिन्ता करनी चाहिये। आर्यसमाज का नवां व दसवां नियम भी हमें दूसरों की उन्नति में सहायक होने व सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहने को कहता है। आर्यसमाज का नवां नियम है ‘प्रत्येक मनुष्य को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।’ दसवां नियम है ‘सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें।’ हमें मनुष्य जीवन व समाज के हितकारी इन नियमों का इनकी भावना कि अनुरूप पालन व व्यवहार करना चाहिये। तभी हमारा समाज व देश उन्नति को प्राप्त हो सकेंगे। निजी स्वार्थ सिद्धि से हमारा नैतिक पतन होता है और देश कमजोर होता है।

 

जब तक पृथिवी पर शुद्ध वायु, जल व अन्न उपलब्ध हो रहा है तभी तक मनुष्य सुखी व स्वस्थ रहकर जीवन यापन कर सकता है। जब यह सन्तुलन नहीं रहेगा तो मनुष्य व प्राणी भी इस पृथिवी को अलविदा कर देंगे। ऐसी स्थिति न उत्पन्न हो, उसके लिए हमें भरसक प्रयत्न करना चाहिये। इसी में हमारा हित है। हमें जल के साथ अन्य सभी पदार्थों को प्रदुषण से मुक्त रखते हुए अपनी आवश्यकता को कम करके मिताहार को अपना आदर्श बनाना चाहिये। आज अन्तर्राष्ट्रीय जल दिवस पर हम निवेदन करना  चाहते हैं कि सभी बन्धु जल सहित वायु, अन्न आदि में प्रदुषण न करके दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। जल का कम से कम उपयोग करें जिससे अन्यों को भी आवश्यकतानुसार जल उपलब्ध हो सके। हमारी आने वाली पीढ़ियां भी हमारी ही तरह सुख से अपना जीवन व्यतीत कर सकें, इस पर हमें विचार करना चाहिये। ओ३म् शम्।

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