अक्साई चीन: भारत-चीन सीमा विवाद की जड़

वह रेखा जो भारतीय कश्मीर के क्षेत्रों को अक्साई चिन से अलग करती है ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ के रूप में जानी जाती है। अक्साई चीन भारत और चीन के बीच चल रहे दो मुख्य सीमा विवाद में से एक है। चीन के साथ अन्य विवाद अरुणाचल प्रदेश से संबंधित है। अमेरिकी राजदूत के अरुणाचल दौरा पर विवाद:-चीन ने 24 अक्टूबर2016 को अमेरिका को चेतावनी दी कि चीन-भारत सीमा विवाद में उसका कोई भी हस्तक्षेप इस विषय को ‘और भी पेचीदा’ बनाएगा और सीमा पर कड़ी मेहनत से हासिल की गई शांति में खलल डालेगा।

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
चीन, पाकिस्तान और भारत के संयोजन में तिब्बती पठार के उत्तरपश्चिम में स्थित अक्साई चीन एक विवादित क्षेत्र है। यह कुनलुन पर्वतों के ठीक नीचे स्थित है। ऐतिहासिक रूप से अक्साई चीन भारत को रेशम मार्ग से जोड़ने का ज़रिया था और भारत और हज़ारों साल से मध्य एशिया के पूर्वी इलाकों (जिन्हें तुर्किस्तान भी कहा जाता है) और भारत के बीच संस्कृति, भाषा और व्यापार का रास्ता रहा है। भारत से तुर्किस्तान का व्यापार मार्ग लद्दाख़ और अक्साई चीन के रस्ते से होते हुए काश्गर शहर जाया करता था।1950 के दशक से यह क्षेत्र चीन क़ब्ज़े में है पर भारत इस पर अपना दावा जताता है और इसे जम्मू और कश्मीर राज्य का उत्तर पूर्वी हिस्सा मानता है। अक्साई चीन जम्मू और कश्मीर के कुल क्षेत्रफल के पांचवें भाग के बराबर है। चीन ने इसे प्रशासनिक रूप से शिनजियांग प्रांत के काश्गर विभाग के कार्गिलिक ज़िले का हिस्सा बनाया है।
नाम की उत्पत्ति:-‘अक्साई चीन’ (ﺋﺎﻗﺴﺎﻱ ﭼﯩﻦ) का नाम उईग़ुर भाषा से आया है, जो एक तुर्की भाषा है। उईग़ुर में ‘अक़’ (ﺋﺎق‎) का मतलब ‘सफ़ेद’ होता है और ‘साई’ (ﺴﺎﻱ) का अर्थ ‘घाटी’ या ‘नदी की वादी’ होता है।उईग़ुर का एक और शब्द ‘चोअल’ (ﭼﯚل) है, जिसका अर्थ है ‘वीराना’ या ‘रेगिस्तान’, जिसका पुरानी ख़ितानी भाषा में रूप ‘चीन’ (ﭼﯩﻦ) था। ‘अक्साई चीन ‘ के नाम का अर्थ ‘सफ़ेद पथरीली घाटी का रेगिस्तान’ निकलता है।चीन की सरकार इस क्षेत्र पर अधिकार जतलाने के लिए ‘चीन’ का मतलब ‘चीन का सफ़ेद रेगिस्तान’ निकालती है, लेकिन अन्य लोग इसपर विवाद रखते हैं।
भौगोलिक विवरण:- अक्साई चीन लगभग 5,000 मीटर ऊंचाई पर स्थित एक नमक का मरुस्थल है। इसका क्षेत्रफल 42,685 किमी² (16,481 वर्ग मील) के आसपास है। भौगोलिक दृष्टि से अक्साई चीन तिब्बती पठार का भाग है और इसे ‘खारा मैदान’ भी कहा जाता है। यह क्षेत्र लगभग निर्जन है और यहां पर स्थायी बस्तियां नहीं है। इस क्षेत्र मे ‘अक्साई चीन’ (अक्सेचिन) नाम की झील और ‘अक्साई चीन’ नाम की नदी है। यहां वर्षाऔर हिमपात ना के बराबर होता है क्योंकि हिमालय और अन्य पर्वत भारतीय मानसूनी हवाओं को यहां आने से रोक देते हैं।
भारत का आरोप:-भारत का आरोप है कि चीन ने जम्मू-कश्मीर की 41180 वर्ग किलोमीटर जमीन पर गैर कानूनी कब्ज़ा कर रखा है। इसमें 5180 वर्ग किलोमीटर अक्साई चीन का लद्दाखी क्षेत्र है। चीन, सीमा का निर्धारण करने वाली मैकमोहन रेखा को नहीं मानता। चीन अरुणाचल प्रदेश की 90 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर भी अपना दावा करता रहा है। 17 हजार फीट की ऊंचाई पर अक्साई चीन के भौगोलिक हालात ऐसे हैं कि यहां इंसान रह नहीं सकता लेकिन गुस्से और तनातनी के बीज यहां बखूबी पनपते रहे हैं। भारत के जम्मू कश्मीर से सटा है ये अक्साई चीन तो चीन के जिनजियांग प्रांत से सटा हुआ है यही अक्साई चीन। इसी अक्साई चीन से होकर गुजरता है जिनजियांग-तिब्बत हाइवे। वो सड़क जो चीन की है। वो सड़क जो इस इलाके में चीन के आधिपत्य की कहानी लिखती है। अक्साई चीन का ये इलाका दरअसल सदियों पुराना व्यापारिक रास्ता भी है। मौजूदा दौर में यहां चीन का कब्जा है।
पूर्वोत्तर भारत सीमा विवाद की जड़:-भारत और चीन के बीच सरहद के झगड़े का दूसरा मोर्चा है भारत के पूर्वोत्तर में। ये वो इलाका है जहां से काल्पनिक मैकमोहन लाइन गुजरती है और दोनों मुल्कों को अलग करती है। नक्शे पर उकेरी गई यही लकीर दरअसल 1896 में LAC यानि वास्तविक नियंत्रण रेखा के तौर पर देखी गई। जिसे भारत चीन के साथ अपनी सरहद मानता है। पहले इस इलाके को नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी कहा जाता था यानि आज का अरुणाचल प्रदेश। लेकिन चीन अरुणाचल प्रदेश को भी अपना इलाका करार देता है और सिक्किम में भी दखलंदाजी करता रहता है। 1962 में इसी इलाके में भारत-चीन की जंग भी हुई थी।
सीमा विवाद का इतिहास:-भारत-चीन सीमा विवाद की जड़ सालों पहले पड़ी थी। ये दौर था 1834 का। पंजाब में सिखों का राज था। 1834 में वो लद्दाख तक जा पहुंचे और लद्दाख को जम्मू में मिलाने का ऐलान कर दिया। सिखों की फौज ने बाकायदा तिब्बत पर हमला कर दिया, लेकिन चीन की सेनाओं ने उन्हें हरा दिया और खदेड़ते हुए लद्दाख और लेह पर कब्जा कर लिया। सिख और चीनियों के बीच 1842 में एक समझौता हुआ जिसमें तय हुआ कि एक-दूसरे की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया जाएगा। अंग्रेजों ने 1846 में सिखों को हरा दिया और लद्दाख पर ब्रिटिश राज कायम हो गया। उन्होंने चीन के अधिकारियों से मिलकर सरहद का मुद्दा सुलझाने की कोशिश की। तय हुआ कि प्राकृतिक चिन्हों के जरिए ही सरहद तय की जाएगी और सीमा पर बाड़ की जरूरत नहीं है। यहीं से असली सरहद गायब हो गई और कई लकीरों में दोनों देश उलझ कर रह गए। नक्शे पर बनी सरहद की पहली लकीर जॉनसन लाइन है। 1865 में सर्वे ऑफ इंडिया के अफसर डब्लू एच जॉनसन ने एक दिमागी रेखा खींची जिसके मुताबिक अक्साई चीन का इलाका जम्मू कश्मीर में आता है। जॉनसन ने नक्शे पर उकेरी ये रेखा जम्मू कश्मीर के महाराजा को दिखाई। लेकिन जॉनसन के काम की आलोचना हुई। उसे ब्रिटिश राज ने नौकरी से निकाल दिया, चीन ने कभी इसे नहीं माना और भारत ने हमेशा अपनाया। नक्शे पर बनी सरहद की दूसरी लकीर जॉ़नसन-आरदाग लाइन है। 1897 में ब्रिटिश फौज के अफसर सर जॉन आरदाग ने कुनलुन पहाड़ों से गुजरती हुई एक और सरहद खींची। ये वो दौर था जब ब्रिटिश राज को रूस के बढ़ते प्रभुत्व से खतरा लगने लगा था। चीन कमजोर था। आरदाग ने ब्रिटिश राज को समझाया कि ये सरहद फायदेमंद होगी। लेकिन ये लकीर सिर्फ किताबों तक रह गई। नक्शे पर बनी सरहद की तीसरी लकीर मैक्कार्टनी-मैक्डॉनल्ड लाइन है। 1890 में ब्रिटेन और चीन दोस्त बन गए, ब्रिटेन को चिंता सता रही थी कि कहीं अक्साई चिन का इलाका रूस न कब्जा ले। 1899 में चीन ने अक्साई चिन के इलाके में दिलचस्पी दिखाई सो ब्रिटेन ने सरहद में बदलाव का इरादा बनाया। ये बदलाव सुझाया जॉर्ज मैककार्टनी ने और अक्साई चिन का ज्यादातर इलाका चीन में डाल दिया। चीन ने इसपर खामोशी लगा ली, ब्रिटिश राज ने इसे चीन की सहमति समझ ली। ये लाइन ही मौजूदा वास्तविक नियंत्रण रेखा है। नक्शे पर बनी सरहरद की चौथी लकीर मैकमोहन लाइन है। 1913-14 में ब्रिटेन, चीन और तिब्बत के प्रतिनिधि शिमला में मिले और सरहद पर बातें हुईं। ब्रिटिश अफसर हेनरी मैकमोहन ने समझौते के साथ एक नक्शा पेश किया। जो तिब्बत और भारत की पूर्वी सरहद तय कर रहा था। चीन को ये मंजूर नहीं हुआ, वो समझौते के लिए तैयार न हुआ। मैकमोहन लाइन का आधार हिमालय था, हिमालय के दक्षिणी हिस्से भारत से जोड़े गए।1947 में भारत की आजादी के बाद से ही सरकार ने जॉनसन लाइन को ही आधिकारिक सरहद माना जिसमें अक्साई चीन भारत का हिस्सा था। उधर, चीन ने जिनजियांग और पश्चिमी तिब्बत को जोड़ने वाला 1200 किलोमीटर लंबा हाइवे बना डाला, इसका 179 किलोमीटर का हिस्सा जॉनसन लाइन के दक्षिणी हिस्से को काटते हुए अक्साई चिन से होकर गुजरता था।
भारत-चीन विवाद:-चीन ने जब 1950 के दशक में तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया तो वहाँ कुछ क्षेत्रों में विद्रोह भड़के जिनसे चीन और तिब्बत के बीच के मार्ग के कट जाने का ख़तरा बना हुआ था। चीन ने उस समय शिंजियांग-तिब्बत राजमार्ग का निर्माण किया जो अक्साई चीन से निकलता है और चीन को पश्चिमी तिब्बत से संपर्क रखने का एक और ज़रिया देता है। भारत को जब यह ज्ञात हुए तो उसने अपने इलाक़े को वापस लेने का यत्न किया।1957 तक तो भारत को ये तक पता नहीं चल सका कि चीन ने अक्साई चीन के इसी विवादित हिस्से में सड़क तक बना ली है। 1958 में चीन के नक्शे में पहली बार ये सड़क प्रकट हुई। यह 1962 के भारत-चीन युद्ध का एक बड़ा कारण बना। वह रेखा जो भारतीय कश्मीर के क्षेत्रों को अक्साई चिन से अलग करती है ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ के रूप में जानी जाती है। अक्साई चीन भारत और चीन के बीच चल रहे दो मुख्य सीमा विवाद में से एक है। चीन के साथ अन्य विवाद अरुणाचल प्रदेश से संबंधित है। अमेरिकी राजदूत के अरुणाचल दौरा पर विवाद:-चीन ने 24 अक्टूबर2016 को अमेरिका को चेतावनी दी कि चीन-भारत सीमा विवाद में उसका कोई भी हस्तक्षेप इस विषय को ‘और भी पेचीदा’ बनाएगा और सीमा पर कड़ी मेहनत से हासिल की गई शांति में खलल डालेगा। अमेरिकी राजदूत के अरुणाचल प्रदेश दौरा के कुछ दिनों बाद चीन ने यह चेतावनी दी है। चीन अरुणाचल के दक्षिण तिब्बत होने का दावा करता है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लु कांग ने यहां एक मीडिया ब्रीफिंग में अमेरिका से भारत-चीन सीमा विवाद में हस्तक्षेप करने से बचने को कहा। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के निमंत्रण पर अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा 22 अक्तूबर 2016 को वहां गए थे। रिचर्ड की उस यात्रा का उल्लेख करते हुए लू ने कहा कि अमेरिकी राजदूत ने एक विवादित क्षेत्र का दौरा किया है। उन्होंने कहा, ‘हमने इस बात का संज्ञान लिया है कि अमेरिका के वरिष्ठ राजनयिक अधिकारी ने जिस जगह का दौरा किया है वह चीन और भारत के बीच विवादित क्षेत्र है। हम इस यात्रा के पूरी तरह खिलाफ हैं।’ चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताता है और इस इलाके में भारतीय नेताओं, विदेशी अधिकारियों तथा दलाई लामा की यात्रा का नियमित विरोध करता है। लु ने समाधान निकालने के लिए दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की अगुवाई वाली विशेष प्रतिनिधियों की प्रणाली का जिक्र करते हुए कहा, ‘चीन-भारत सीमा के पूर्वी क्षेत्र को लेकर चीन की स्थिति बहुत स्पष्ट है और एक जैसी है। दोनों देश बातचीत और परामर्श के माध्यम से क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं।’ दोनों पक्षों ने 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए विशेष प्रतिनिधियों की 19वें दौर की वार्ता की थी। चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत कहता है वहीं भारत का मानना है कि अकसाई चीन को लेकर विवाद है जिस पर चीन ने 1962 की जंग में कब्जा कर लिया था। लु ने कहा, ‘किसी भी तीसरे पक्ष को जिम्मेदारी की भावना के साथ शांति, सुलह और अमन के लिए चीन और भारत के प्रयासों का सम्मान करना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि अमेरिका का व्यवहार चीन और भारत के प्रयासों के प्रतिकूल है।

1 thought on “अक्साई चीन: भारत-चीन सीमा विवाद की जड़

  1. चीन और भारत को सीमा विवाद सहित सारे विवादों पर सुलह का प्रयास करना चाहिए. चीन की बढ़ती ताकत से शेष विश्व आशंकित है, चीन को महत्वपूर्ण पड़ोसी के साथ विवाद सुलझाने में उदारता का परिचय देना चाहिए.

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