अखिलता की विकल उड़ानों में !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

अखिलता की विकल उड़ानों में,

तटस्थित होने की तरन्नुम में;

उपस्थित सृष्टा सामने होता,

दृष्टि आ जाता कभी ना आता !

किसी आयाम वह रहा होता,

झिलमिला द्रश्य को कभी देता;

ख़ुमारी में कभी वो मन रखता,

चेतना चित्त दे कभी चलता !

कभी चितवन में प्रकट लख जाता,

घुले सुर में कभी हृदय रसता;

कभी वाणी में बजाता वीणा,

भीना भीना सा उर कभी करता !

चीन्हा चीन्हा सा हर कोई लगता,

साधना में है हर मिला रहता;

सहस्र पंखुड़ी खिला रखता,

बैठ गोदी गुरु के अंग लगता !

विलीन होती सकल द्विविधाएँ,

समाधित होतीं सकल शंकाएँ;

छटा ‘मधु’ देखते जटा शिव में,

छवीली सृष्टि लखे कण गण में !

 

 

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