अमेरिका दुनिया का सब से क्रूर देश ?

सियना कालेज वाशिंगटन द्वारा 1982 सें हर वर्ष कराये जा रहे जनमत में इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दुनिया के 44 श्रेष्ट राष्ट्रपतियो की सूची में 15वे स्थान पर रहे। दुनिया की सुपर पावर कहे जाने वाले इसी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश दुनिया के पॉच सब से बुरे राष्ट्रपतियो में सब से निचले स्तर पर चुने गये। इस जनमत में हर बार की तरह इस बार भी फ्रेंकलिन रूजवेल्ट को ही बेस्ट प्रेसीडेंट चुना गया है।

आखिर अमेरिका की छवि दुनिया के लोगो की निगाह में दिन प्रतिदिन इतनी क्यो खराब होती जा रही है। इस की कई वजह है। छोटे देशो पर अमेरिकी आतंक, रोज रोज अपनी दादागिरी से अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर मानवधिकारो का हनन, अमेरिकी नागरिको का खुद को असुरक्षित महसूस करना, आतंकवाद के नाम पर बेकसूर देशो पर बमबारी करना। अमेरिकी जेलो में बन्द कैदियो के साथ जानवरो से बदतर व्यवहार अमेरिकी ग्राफ को नीचे लाने में काफी हद तक जिम्मेदार है। अमेरिका की जेलो की तरफ निगाह डाले तो आज अमेरिका की जेलो में इस वक्त करीब दो लाख महिला कैदी विभिन्न अपराधो में बन्द है। एक अनुमान के अनुसार इन में करीब तीन से चार प्रतिशत महिलाये गर्भवती अवस्था में लाई जाती है। अमेरिका के पेंसिलवेनिया राज्य में आज भी एक बहुत ही घिनौना, क्रूर तथा तमाम मानवीय हदो को पार करने वाला कानून लागू है जिस के तहत वहा कि जेलो में बन्द गर्भवती महिला कैदियो को प्रसव के दौरान भी बेडियो में रहना पडता है। दरअसल वहा महिला कैदियो को भागने से रोकने के लिये ये बेडिया डाल दी जाती है। इस से भी बढ़कर अमेरिकी सरकार का एक और घिनौना चेहरा यह है जिस में तमाम इन्सानियत की हदो को पार कर दिया गया है। मानवधिकारो की पेरवी करने वाली हिलेरी क्लिटन आखिर क्यो और किस खौफ से खामोश बैठ जाती है जब अमेरिका की फिलाडेल्फिया की एक जेल में एक महिला कैदी को अस्पताल में हथियारबन्द सुरक्षा कर्मियो की मौजूदगी में बच्चे को जन्म देना पडता है।

सवाल ये उठता है कि क्या किसी बच्चे को संसार में इस तरह आना चाहिये। सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी महिला की इज्जत उस के अपने ही देश में यू तार तार होनी चाहिये। सवाल यह भी उठता है कि किसी भी कानून में बडे से बडे अपराध की सजा ये नही हो सकती कि एक महिला सार्वजनिक रूप से लोगो के सामने अपने बच्चे को जन्म दे। मगर ये सब आज अमेरिका में खुलओम हो रहा है। और मानवधिकारो की दुहाई देने वाले तमाम संघ अमेरिकी दादागिरी के सामने गॉधी जी के बंदरो के समान खामोश बैठे है।

बाल अधिकारो के मामले में भी अमेरिका का रवैय्या कुछ इसी प्रकार का है अमेरिका की सर्वोच्च न्यायालय में पिछले दिनो बच्चो और किशोरो के एक हिस्से के भविष्य से जुडी अहम याचिकाओ पर सुनवाई हुई है। दरअसल अमेरिका में बाल्यावस्था या किशोर(जुनेनाइल)में किये गये अपराध के लिये ताउम्र बिना किसी पैरोल के सजा काट रहे इन अभिशापित बंदियो के माता पिताओ और मानवधिकार कार्यकर्ताओ के प्रयास से ये याचिकाए अदालत के सामने आई है। अब अमेरिकी अदालते इस मसले पर विचार करेगी कि जेल प्रशासन द्वारा बच्चो और किशोरो पर उठाये जा रहे मौजूदा कदम कही असांविधानिक और सख्त तो नही है। इस वक्त अमेरिकी जेलो में 1700 से ज्यादा ऐसे बाल और किशोर बंदी है जो अपनी शेष उम्र उस अपराध के लिये जेल में बिता देगे, जो इन्होने बाल्यावस्था में किया था। इस दौरान उन्हे पैरोल पर रिहा होने की इजाजत नही मिलेगी। यहा में ये बताता चलू की दुनिया के सामने खुद को जनतंत्र का प्रहरी बताने वाले इस अमेरिका के अलावा किसी भी देश में ऐसा कानून नही है जिस में बच्चो और किशोरो को इस कदर दंडित करने का कोई कानून हो और जिस कानून के द्वारा मानवधिकारो का खुलकर हनन होता हो।

दो साल पहले ब्रिटेन के एक अखबार ”गार्डियन’’ ने अपने सर्वेक्षण में बताया था कि 2270 बाल और किशोर कैदी अमेरिका की विभिन्न जेलो में पैरोल के बिना उम्रकैद की सजा काट रहे है और ये सभी लोग अपराध करते वक्त 18 साल से कम उम्र के थे। हम सभी लोग जानते है कि यह एक ऐसी उम्र है जब बच्चे अक्सर गलत रास्तो पर भटक जाते है। यू इन्हे जेलो मे किसी खूंखार कैदियो की तरह डालकर क्रूर तरीको से यातनाये देना क्या अमेरिकी भविष्य से खिडवाड नही क्या ये मानवधिकारो का खुलकर हनन नही है। समुची दुनिया को मानवधिकार और जनतंत्र का पाठ पाने वाले और इसी जनतंत्र की दुहाई देकर इराक और आफगानिस्तान पर बमबारी कर निर्दोश लोगो को मौत की नींद सुलाने वाले सारी दुनिया में सुपर पावर के नाम से मशहूर दुनिया को मानवधिकार और जनतंत्र का सबक सिखाने का दावा करने वाला अमेरिका उन गिने चुने देशो में भी गिना जाता है जिन्होने बाल अधिकार संबंधि संयुक्त राष्ट्र समझौते पर दस्तखत करने से इन्कार किया है। अमेरिका से पूर्व सोमालिया भी बाल अधिकार संबंधि संयुक्त राष्ट्र समझौते पर दस्तखत करने से इन्कार कर चुका है जाहिर है यह समझौता स्पष्ट रूप से बाल या किशोर अपराधियो को इस तरह से दंडित करने पर पाबंदी लगाता है।

बच्चो को जेलो में ठूंसने वाले और महिला कैदियो के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले अमेरिका के बारे में यह तथ्य भी जानने योग्य है कि अमेरिकी जेलो की आबादी में 1970 के बाद लगभग आठ गुना बढ़ोतरी हुई है समूची दुनिया में अन्य कोई ऐसा मुल्क नही है जहॉ इतने छोटे से वक्त में इतने कैदी बे हो पूरी दुनिया में यह एक रिकार्ड बढ़ोतरी है। ऐसे में क्या इस वर्ष का नोबल शांति पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को देना उचित था। ओबामा अपनी और अमेरिका की असलियत जानते है तभी तो उन्होने खुद इस का अहसास किया और मंच पर स्वीकार किया कि इस पुरस्कार के असली हकदार और काबिल कई और दावेदार है। उन्हे शांति का नोबल पुरस्कार देने में एक कालदोष ये भी था कि वो एक युद्वरत राष्ट्रपति थे। नोबल शांति पुरस्कार ग्रहण करने से कुछ दिन पहले ही उन्होने युद्व के लिये तीस हजार अतिरिक्त सैनिक भेजने का आदेश दिया था। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की वास्तविक उपलब्धियो का इन्तेजार न करते हुए जल्दबाजी में दिये गये नोबल शांति पुरस्कार बराक ओबामा को देने की अमेरिका सहित सारी दुनिया में आलोचना हुई थी। आखिर पूरी दुनिया के सामने अमेरिका को अपनी छवि अच्छे काम कर के, बाल अधिकार संबंधि संयुक्त राष्ट्र समझौते पर दस्तखत कर के सुधारनी चाहिये दादागिरी से नही। संयुक्त राष्ट्र संघ और तमाम ऐसे देशो को जो मानवधिकारो की पैरवी करते है मानते है अमेरिका पर दबाब बनाना चाहिये की वो बाल अधिकार संबंधि संयुक्त राष्ट्र समझौते पर दस्तखत करे।

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