लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

पांच राज्यों में टिकट बंटवारे को लेकर वैसे तो हर दल में इस समय मारामारी का माहौल है पर यह माहौल भाजपा में कुछ अधिक ही है। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि इस पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए टिकटों के सर्वाधिक दावेदार इसी पार्टी के मंच पर आये हैं। दूसरे, भाजपा ने अपने लोगों की उपेक्षा करके ‘सीट जिताऊ’ बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी है।

तीसरे, भाजपा का आम कार्यकर्ता अक्सर यह आरोप लगाता मिल जाता है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उनकी उपेक्षा करते हैं।

इसमें दो राय नहीं कि मोदी के उदय के बाद से भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता बढ़ी है, अब जिस पार्टी की लोकप्रियता बढ़े उसके पास टिकटार्थियों की संख्या का बढऩा कोई बड़ी बात नहीं है, अर्थात ऐसी पार्टी में टिकट चाहने वालों की लंबी लाइन की प्रत्याशा की जा सकती है। ऐसे समय में पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का यह गंभीर दायित्व होता है कि वह टिकटार्थियों की लंबी लाइन में से अपने संगठन के प्रति समर्पित रहे कार्यकर्ताओं और नेताओं को प्राथमिकता दे। इसका कारण यह है कि कोई भी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के समर्पण और बलिदानों से ही खड़ी होती है। उनके त्याग और समर्पण का महत्व वैसे ही होता है जैसे किसी भवन के लिए ईंट और मसाले का महत्व होता है। यदि ईंट और मसाला एक साथ मिलकर दीवार बनने से मना कर दें या अपने आपको एक स्तंभ बनाने से मना कर दें तो नेताओं की बनी बनायी छत धड़ाम से नीचे आ गिरेगी। किसी भी ‘छत’ को यह अहम और बहम नहीं पालना चाहिए कि वह अपने बलबूते पर खड़ी है। वैसे व्यावहारिक सत्य यही है कि हर ‘छत’ इसी बहम और अहम में जीने की अभ्यस्त हो जाती है कि उसके कारण ही ईंट और मसाले का महत्व है। यही कारण है कि हर पार्टी के बड़े नेताओं  को यह भ्रम हो जाता है कि उसके कारण ही पार्टी है, पार्टी के कार्यकर्ता  हैं और पार्टी के नेता हैं।

भाजपा कार्यकर्ताओं की मानें तो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इस समय कुछ भ्रम है। अच्छा होगा कि पार्टी अध्यक्ष अपने व्यवहार में कुछ लचीलापन लायें और अपने कार्यकर्ताओं को देखकर मुस्कराना सीखें। उनकी मुकस्कराहट अपने कार्यकर्ताओं को नई ऊर्जा देगी और उनका सदा गंभीर रहना और कार्यकर्ताओं की ओर को देखने से भी परहेज करना कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ेगा। किसी संगठन में कड़ा अनुशासन होना उचित माना जा सकता है, पर अनुशासन के नाम पर पार्टी की रीढ़ अर्थात कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करना या उनकी राय को न मानकर अपनी मर्जी उन पर थोपना तो अनुशासन के नाम पर स्वेच्छाचारिता को बढ़ावा देने के समान है। जिसे उचित नहीं माना जा सकता।

भाजपा को अभी पैदा हुए अधिक दिन नहीं हुए हैं। इसमें आज भी उन लोगों की बहुतायत है, जिन्होंने पार्टी के जन्म वाले दिन से लेकर आज तक पार्टी की पूर्ण मनोयोग से सेवा की है। उन्होंने अपने खून पसीने से पार्टी को खड़ा किया है। भाजपा ने अपने जन्मकाल से ही ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नारा दिया था। जिससे लोगों को आशा बंधी थी कि भ्रष्टाचार की दलदल में सड़ रहे अन्य दलों के मुकाबले भाजपा सबसे अलग सिद्घ भी होगी। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वह देश के जनमानस की भावनाओं को समझे। पार्टी के लिए बोझ बन गये बुढ़ापे को उठा उठाकर बाहर फेंकने की प्रवृत्ति तो ‘नालायक बेटों’ की निशानी होती है। अच्छी बात तो यह होगी कि बुढ़ापे के अनुभवों से लाभ उठाया जाए और उनके बताये रास्ते पर चलने का अमल भी किया जाए।

पार्टी के समर्पित लोगों ने संघर्ष किया है और उनके संघर्ष की मौन आहुति को पार्टी यह कहकर उपेक्षित करे कि आप सीट नही निकाल सकते तो क्या इससे यह पता नहीं चलता कि भाजपा भी ‘धनबली’ और ‘गन’ बली लोगों के सामने आत्म समर्पण कर चुकी है। इन धनबली और ‘गन’ बली लोगों की राजनीति में कोई जमीर नहीं होती। ये ऊपर से आते हैं और अपने धनबल और ‘गन’ बल से किसी भी पार्टी के उन लोगों की गर्दन को पकड़ लेते हैं जो पार्टी में टिकट के दावेदार होते हैं। इनके आगमन से ही पार्टी के कुछ समर्पित कार्यकर्ता टिकट की दौड़ से इसलिए बाहर हो जाते हैं कि वे इनसे ‘पंगा’ लेने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं। कुछ लोग थोड़ी देर संघर्ष करते हैं तो उन्हें ये अपने धनबल और ‘गन’ बल से ढीला कर लेते हैं। इससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चाहे ये लगने लगे कि बाहरी व्यक्ति की स्वीकार्यता बढ़ गयी है और यदि वह उसे टिकट देता है तो अच्छे परिणाम आएंगे? पर ऐसा होता नहीं है, ऐसे बाहरी व्यक्ति के आने से बहुत से लोगों का मन टूटता है, उनकी भावनाएं आहत होती हैं और वो मन ही मन पार्टी के लोगों को कोसते हैं या उसके विरूद्घ विद्रोह की भूमिका तैयार करते हैं। कड़े अनुशासन के कठोर आवरण के नीचे चाहे कार्यकर्ताओं के ऐसे आवेश या विद्रोही तेवरों को उपेक्षित कर दिया जाए, पर सच यही है कि ऐसे आवेश और विद्रोही तेवरों से निकलने वाली बददुआएं बड़े बड़ों को भी धराशायी कर देती हैं। स्वयं भाजपा ने दिल्ली में किरण बेदी को अपने कार्यकर्ताओं पर थोपकर देख लिया जो कार्यकर्ताओं को पसंद नहीं आयीं तो कार्यकर्ताओं ने चुनाव प्रचार में कोई रूचि नहीं दिखाई और परिणाम यह आया कि केजरीवाल को दिल्ली मिल गयी। सचमुच केजरीवाल को दिल्ली का मुखिया बनाने में भाजपा नेतृत्व की हठधर्मिता ही एक कारण रही। भाजपा को कांग्रेस से सीख लेनी चाहिए। इस पार्टी ने आम कार्यकर्ताओं की राय की उपेक्षा करके दिल्ली से एक परिवार से आदेश दिलाने आरंभ किये तो आज इसके पास नेता का भी अभाव है। अमित शाह जी! आप भाजपा को कांग्रेस के रास्ते पर मत ले जाओ। कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझो और उन पर प्रत्याशी थोपो नहीं, अपितु उनकी राय से उनके गमले में प्रत्याशी रह्वोपो।

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