लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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(१) सुस्वागतम् यवन देशे”

२६ अप्रैल २००७ को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम जी ग्रीस देश गए थे। वहाँ आप के स्वागत समारम्भ में ग्रीस के राष्ट्रपति श्री कार्लोस पम्पाडॅलिस ने

“राष्ट्रपति महाभाग। सुस्वागतम् यवन देशे”

इस संस्कृत वाक्य से अपने भाषण का प्रारंभ कर स्वागत किया था । अपने भाषण में उन्हों ने संस्कृत यह प्राचीन भारतीय भाषा है, और उसका सम्बंध ग्रीक भाषा से भी है, ऐसा कहा था।

(२)ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः

और, उसी वर्ष, जुलाई २००७ में, अमरिकी सेनेट का सत्र प्रारम्भ संस्कृत में वैदिक प्रार्थना, से हुआ था। गत २१८ वर्षों के अमरिका के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार ही घटी थी । ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः के उद्गारों से प्रार्थना का अन्त हुआ , तो सेनेट में शान्ति छायी रही ; पश्चात् तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूँज उठा।

(३)वैदिक गणित

कुछ वर्ष पहले, एक अमरिकी सज्जन संस्कृत में छपी, वैदिक गणित (मॅथेमॅटिक्स) की पुस्तक के कुछ अंशो के अर्थ के विषय में चर्चा करने मुझ से समय माँगने आए थे। परामर्श के लिए उचित पारिश्रमिक शुल्क भी देना चाहते थे।

(४)शुद्ध देवनागरी

मेरी युनिवर्सीटी की फॅकल्टी के डीन, डॉ. फ़ॉन्टेरा जिन्होंने अहमदाबाद की मिलों के प्रबंधन पर ,पी. एच. डी. का शोध निबंध लिखा था, उस शोध के समय भारत भी रहे थे; वे अपने ऑफिस के प्रवेश द्वार पर शुद्ध देवनागरी में भी अपनी नाम पट्टिका लगाते थे। मेरा साक्षात्कार कर नियुक्ति करवाने में भी उनका योगदान था।

(५) जन्म सिद्ध, सर्वाधिकार

उपरि लिखित सच्चाइयां, आप को प्रमाणित करती हैं, कि, सारे संसार में, संस्कृत को उस के जानकार बडे आदर से देखते हैं। उसे जानने में गौरव का अनुभव करते हैं। जहाँ सारे संसार में संस्कृत को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, उस संस्कृत पर जिस देश का जन्म सिद्ध, परम्परा गत सर्वाधिकार है, या यूं कहे, कि एकाधिकार (Monopoly) ही है , उस भारत के लक्षण कुछ निराशा जनक ही प्रतीत होते हैं। कहीं मैं गलती तो नहीं कर रहा? नहीं नहीं। ऐसा अन्य विषयों में भी हुआ है।

(६)योगदान संस्कृत

* भारत को वास्तव में अपनी सर्वोत्कृष्ट भाषा देववाणी संस्कृत पर गर्व होना चाहिए, गौरव होना चाहिए।

संसार में १८ प्रमुख भाषा परिवार है, और सभी भाषा परिवारों में सबसे आगे यह भारोपिय भाषा परिवार अति समृद्ध और अति प्रगत माना जाता है। इस भाषा परिवार को ऐसा उन्नततम स्थान प्राप्त कराने में भी, और सारी भाषाओं को सिंचित कर पल्लवित और पुष्पित करने में भी योगदान संस्कृत का ही मानता हूँ। और भी मानते हैं।

(७)संस्कृत के साथ जुडने की होड

प्राच्यविदों में अपनी अपनी भाषा को संस्कृत के साथ जोडने की एक होड सी लगी थी।

अलग अलग प्राच्यविदों ने कभी इस भाषा परिवार को, जिस में संस्कृत है; कभी ’इन्डो-युरोपियन’, कभी ’इन्डो-जर्मन’, कभी ’इन्डो-आर्यन’, तो कभी ’इन्डो-इरानियन’ भाषा परिवार के नाम से उल्लेखित किया। पर हर नाम में ’इन्डो’ स्थायी रूप से रहा। क्यों? कारण था हर कोई गुट अपनी पहचान संस्कृत के साथ करने में गौरव मानता था।

पर हमें जिन्हे संस्कृत की समूचि धरोहर प्राप्त है, उन्हें, संस्कृत भाषा पर कितना गर्व-गौरव है?

उसका प्रचार प्रसार करने में, और उसका संसार में, डंका बजाने में कितनी रूचि है? और नहीं, तो बताइए क्यों नहीं?

(८) संस्कृतिक दूत

हम चाहते तो सहस्रो संस्कृत पण्डितों को प्रोत्साहित कर सारे संसार में भेजते। वे वहां पर हमारे संस्कृतिक दूत के भांति भी काम करते, और हमारे लिए संसार भर में सद्‌ भावना ही फैलाते। हमें व्याख्यानों के लिए यदि, आमंत्रित किया जाता है, तो वह गीता के किसी विषय पर, हिन्दु दर्शन पर, चार पुरूषार्थों पर, परिवार की भारतीय प्रणाली पर इत्यादि इत्यादि ….ऐसे विषयों पर बुलाया जाता है। कोई हमें सेक्युलरिस्म पर व्याख्यान देने नहीं बुलाता।

(९)विल ड्युरांट

अमरिकन इतिहासकार विल ड्युरांट, संस्कृत और भारत के विषय में क्या कहता है ?

“भारत हमारे वंशगत, प्रजाति की मातृ भूमि थी, और संस्कृत युरपकी भाषाओं की जननी: वह हमारे दर्शन शास्त्र की जन्मदात्री थी; अरबों द्वारा हमें प्राप्त हुए गणित (के ज्ञान) की माता, बुद्ध द्वारा प्रसारित, इसाइ संप्रदाय के आदर्शों की भी जननी वही है। ग्राम पंचायत की परंपरा से प्राप्त, स्वशासन और जनतंत्र की जननी भी, भारत ही है। भारत माँ अनेकविध परंपराओं से हम सभी की माँ ही है।”

(१०)विल्यम जोन्स

सर विल्यम जोन्स (ब्रिटीश प्राच्यवेत्ता ) क्या कहता है ?

“संस्कृत भाषा जो कुछ भी उसकी प्राचीनता हो, अद्भुत गठन (संरचना ) वाली,

युनानी(ग्रीक) से अधिक परिपूर्ण, लातिनी(लॅटीन) से अधिक शब्द-समृद्ध, और (लातिनी और युनानी) दोनों से अधिक सूक्ष्मता से, परिष्कृत (साफ ) की गई भाषा है।”

सारे संस्कृतज्ञ यदि उद्धरित किए जाएं, तो पन्ने के पन्ने नहीं एक छोटीसी पुस्तक भर जाएं।

(११)संस्कृत को मृत भाषा नहीं “अमृत भाषा”

प्रत्येक निर्णय का प्रभाव-क्षेत्र और प्रभाव की काल-परिधि अलग अलग होती है। कुछ निर्णय देश को कुछ समय के लिए ही, प्रभावित करते हैं। कुछ निर्णय सारे राष्ट्र को, लम्बे काल तक प्रभावित करते ही रहते हैं।

इस लिए हरेक निर्णय समान महत्वका नहीं होता।

पर संस्कृत को मृत भाषा घोषित करना किसी भी दृष्टिसे बहुत गम्भीर और दीर्घ काल तक विपरित प्रभाव पैदा करने वाला निर्णय है। इसे, बन्दर के हाथ में आरी दे कर या दिया सलाइ थमा कर उत्तेजित करने जैसा निर्णय मानता हूं।

ऐसे निर्णय का फल हमारी बाद की पीढियों को अननुमानित काल तक भुगतना पडेगा।

कौन सी शक्तियां ऐसी संस्कृति द्रोही, संस्कृत द्रोही, ज्ञानद्रोही, राष्ट्र द्रोही, निर्णय के पीछे हो सकती है ?

सोचिए।

सोचिए।

जी हां आपका अनुमान सही है।

23 Responses to “॥अमृत भाषा संस्कृत॥- डॉ. मधुसूदन उवाच”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    मुदगल जी इस विषय पर इतनी चर्चा हो चुकी है की अब इसे आगे बढाने का दिल तो नहीं चाहता ,पर मेरे जिस कथन का स्पष्टीकरण आपने चाहा है,उसमे मेरे कहने का अर्थ सिर्फ यह था की मेरी जानकारी के अनुसार संस्कृत कभीआम जनता में बोली जाने वाली भाषा नहीं बन सकी और न इसे आम जनता में आने दिया गया. मेरे विचार से बहुत सोची समझी साजिशके अंतर्गत इसे अभिजात वर्ग तक सीमित कर दिया गया था,जिससे इसका एक विशेष स्थान बना रहे और इसके जानने वाले हमेशा समाज में विशिष्ट स्थान रख सकें यह कार्य मुस्लिमों के भारत आने से पहले का है. मेरे विचारानुसार भाषा जब तक सार्वजानिक तौर पर बोली के रूप में स्वीकार्य नहीं होती उसका विकास स्वयं अवरुद्ध हो जाता है.

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  2. Jeet Bhargava

    सिंह साहब द्वारा जापानियों की अंगरेजी वाया संस्कृत सीखने की बात वाकई में कमाल की है.
    कुछ सप्ताह पूर्व मैंने इंटरनेट पर लेख पढ़ा था कि विदेश में किसी शोध अध्ययन से पता चला है कि संस्कृत के अध्ययन से मानसिक विकास में तीव्रता आती है. ..!!
    मजे की बात है कि ये सब भारत या भारतीय नहीं बल्कि जापानी और अन्य विदेशी कर रहे हैं.
    हमारे यहाँ तो संस्कृत घर की मुर्गी दाल बराबर है. और इसकी पैरवी करना साम्प्रदायिकता भी…!!

    Reply
  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    देखा हमारा लाभ?
    आर सिंह साहब ने जो लिखा है।
    “ऐसे समाचार आया है कि जापनी लोग संस्कृत का अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें अंग्रेजी सीखने में आसानी होती है.पता नहीं संस्कृत के लिए यह शगुन है या अशगुन.”
    सिंह साहब,
    आप हम भी तो डिक्षनरी में कोष्ठक मे लिखे देवनागरी से अंग्रेज़ी के उच्चारण सीखते थे। चीनी जपानी वगैराह कैसे सीखेंगे?
    उनके पास तो उच्चारानुसारी लिखने की सुविधा नहीं है।कोइ बोलकर बताए तभी? इस लिए शायद हमारे अंग्रेज़ी उच्चारण, चीनी ,जपानियों से मैं ने अधिक शुद्ध पाए हैं।
    देखा हमारा लाभ?

    Reply
  4. आर. सिंह

    R.Singh

    मैं जो कहना चाहता हूँ ,वह यह है कि मेरे विचार से संस्कृत के पतन या अवनति के वास्तविक दोषी वे ही हैं,जिनकी जिम्मेवारी थी कि वे संस्कृत का विकास करें .उसे जन मानस की भाषा बनाएं.जैसे गुरुकुलों में उस समय सबको स्थान पाना संभव नहीं था उसी तरह सब लोग संस्कृत भी नहीं पढ़ सकते थे.यह अभिजात वर्ग की भाषा थी.साधारण जनता की पहुँच से या तो यह बहुत पहले बाहर हो चुकी थी या यह कभी भी जन साधारण की भाषा बनी ही नहीं..जातक कथाओं के संस्कृत में नहीं होने का भी यही कारण है यह भी हो सकता है कि राज्य शासन पर सनातन धर्म के कर्णधारों का इतना प्रभाव हो कि उन्होंने जातक कथाओं के लिए संस्कृत की अनुमति ही न दी हो.संस्कृत विज्ञान की भाषा है,गणित की भाषा है ,क़ानून की भाषा है,कला,साहित्य और दर्शन की भाषा है,पर कालान्तर में वह मन्त्र और पूजा की भाषा बन कर रह गयी,कोई बता सकता है कि इसके लिए कौन जिम्मेवार है?
    इतिहास के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुस्तकालय मुस्लिम काल में जला दिए गए थे जिसमे हजारों दुर्लभ ग्रंथ नष्ट हो गए थे, पर यह संस्कृत भाषा की अवनति का कारण बना ऐसा मैं नहीं मानता.
    मैं आप लोगों का संस्कृत प्रेम समझ रहा हू और मुझे भी संस्कृत से कम प्रेम नहीं है.हो सके तो आज भी संस्कृत को बचाने का प्रयत्न कीजिये गड़े मुर्दे उखाड़ने से कुछ मिलने वाला नहीं .

    ऐसे समाचार आया है कि जापानी लोग संस्कृत का अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें अंग्रेजी सीखने में आसानी होती है.पता नहीं संस्कृत के लिए यह शगुन है या अशगुन.

    Reply
  5. Rekha Singh

    डाक्टर मधु भाई का यह संस्कृत ज्ञान एवं अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान उन्हे संस्कारी , बुद्धजीवी राष्ट्रावादी माता पिता से मिला है |वह प्रोफेसर संस्कृत के नहीं किसी और विषय के है |उनकी ९६ बर्षीय माता जी भी तीन भाषाऔ गुजराती मराठी हिंदी की बहुत ही जानकार है , कुल मिलाकर कहने का मतलब है की हमारी संस्कृति का धारा प्रवाह इसी तरह से चलता है |जो व्यक्ति अंग्रेजी के साथ संस्कृत भी पढ़ा लिखा होगा वह सरदार पटेल की तरह भारत के बारे मे सोचेगा, मात्रभूमी के बारे में सोचेगा और निर्णय लेगा और जो सिर्फ अंग्रेजी पढ़ा होगा वह नेहरु की तरह एडविना माउंट वेटन की सिगरेट जलाने मे अपनी शान समझेगा |

    Reply
  6. sc mudgal

    असल जड़ है इस देश की नौकरियों में संस्कृत को प्रोत्साहन देने के लिए इसके विषय में शिक्षा लेने वाले को १०% अंक बोनस के दिए जाएँ अर्थात सशक्तिकरण के बिना सिर्फ पढ़ने मात्र से इसका कुछ नहीं होगा, हाँ धीरे धीरे इस भाषा का विकास किया जा सकता है क्योंकि संस्कृत को कंप्यूटर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा माना गया है इसलिए इसका विकास अंतररास्ट्रीय भाषा बनायीं जा सकती है और तब भारत के कुछ लोगों का विरोध भी उसी तरह धराशायी हो जाएगा जैसे वो लोग संस्कृत या हिंदी का तो विरोध करते हैं मगर इंग्लिश का नहीं क्योंकि इंग्लिश उनको विश्वस्तर पर बढ़ने में सहायक प्रतीत होती है, इसलिए केंद्र सरकार इसके विकास की नीतियां बनाये उसके अनुसन्धान के मार्ग खोले और कंप्यूटर स्सिएंस के लोगों से मिलकर उस भाषा का आविश्व्कर किया जाए जो कंप्यूटर को सर्वाधिक युप्योगी बना सकती है संस्कृत के माध्यम से, इस भाषा की विशेषता है इसका गणितीय आधार जिसपर अन्य भाषाएँ खरी नहीं उतरती इसलिए उनसे अनुवाद कभी भी सटीक नहीं हो पाता और ये पंगुता कंप्यूटर में भाषा के उपयोग पर अनावश्यक रुकावट सिद्ध हो रही है जो संस्कृत के विकास के साथ ख़तम हो सकती है,

    Reply
  7. shiv shambhu sharma.

    डाँ. मधुसुदन जी,जैसा कि लेख ,और टिपण्णी को पढ्ने के बाद , आर. सिन्घ जी की बातो की सत्यता के अलावा और कुछ नही दिखता है । मै यह कहना चाहुन्गा कि अब काफ़ी देर हो चुकी है ,सर्वसमर्थ गुणो के बाद भी आज हम संसकॄत को पतन से बचा नही सकते है आज हम हिन्दी को राष्टभाषा बनाने मे असक्क्षम है ,और आप संस्कॄत की बात करते है ।
    देखिये, उस इसके पतन का मूल कारण भाषा पर पंडितो का एकाधिपत्य होना रहा है ,, तुलसी के राम चरित मानस का लोकप्रिय होना इसका सबूत है
    जब भी कोइ भाषा आम जन जीवन के लोगो की पहुच के बाहर होगी ,कालांतर मे वह नष्ट हो जायेगी ,चाहे वह कितनी भी सर्वसंपन्न क्यो ना हो ।

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      ऐसा ना मानिए।
      बाहर(परदेश) की गतिविधि की कुछ थाह लेने से पता चलेगा। कि शायद भारत और एक अवसर गँवा जाए। यह सब संभावनाओं का खेल है।
      योग, मेडिटेशन, आयुर्वेद, पंचकर्म पद्धति, आयुर्वेदिक औषधियां, पतंजलि मानस शास्त्र का अध्ययन अध्यापन,और मानसिक रोगों में उसका उपयोग इत्यादि
      आज भी परदेशों में परदेशियों को करते देखता हूं; तो भारत ने खोए हुए अवसर मुझे दुःख देता है।
      निश्चित तो कौन जानता है? नहीं जानता।
      “संस्कृत भारती” का कोर्स आपको १० दिनमें सम्भाषण का प्राथमिक अभ्यास करवा देता है।
      हमारी युनिवर्सीटी में आयोजित हुआ था।
      लिखके रखिए===>
      भारत शायद यह संस्कृत के विश्वस्तर पर आने वाले अवसर को गंवाने जा रहा है।
      एक दिन सबेरे समाचार होगा, कि “संस्कृत व्याकरण पर आधारित संगणक क्रांति?”
      और भारत की बैल गाडी के बैल दिल्ली में जुगाली करते पाए जाएंगे।
      चीन से भी कुछ पाठ सीखिए।
      मैं भविष्य वेत्ता नहीं हूं। पर इस सम्भावना को कोई नकार नहीं सकता।

      Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      ऐसा ना मानिए।
      बाहर(परदेश) की गतिविधि की कुछ थाह लेने से पता चलेगा। कि शायद भारत और एक अवसर गँवा जाए। यह सब संभावनाओं का खेल है।
      योग, मेडिटेशन, आयुर्वेद, पंचकर्म पद्धति, आयुर्वेदिक औषधियां, पतंजलि मानस शास्त्र का अध्ययन अध्यापन,और मानसिक रोगों में उसका उपयोग इत्यादि
      आज भी परदेशों में परदेशियों को करते देखता हूं; तो भारत ने खोए हुए अवसर मुझे दुःख देता है।
      निश्चित तो कौन जानता है? नहीं जानता।
      “संस्कृत भारती” का कोर्स आपको १० दिनमें सम्भाषण का प्राथमिक अभ्यास करवा देता है।
      हमारी युनिवर्सीटी में आयोजित हुआ था।
      लिखके रखिए===>
      भारत शायद यह संस्कृत के विश्वस्तर पर आने वाले अवसर को गंवाने जा रहा है।
      एक दिन सबेरे समाचार होगा, कि “संस्कृत व्याकरण पर आधारित संगणक क्रांति?”
      और भारत की बैल गाडी के बैल दिल्ली में जुगाली करते पाए जाएंगे।
      चीन से भी कुछ पाठ सीखिए।
      मैं भविष्य वेत्ता नहीं हूं। पर इस सम्भावना को कोई नकार नहीं सकता।

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  8. Rekha Singh

    स्कृत भारत की संस्कृति है |किसी भी भाषा को जीवित रखने के लिए उसे बोलचाल की भाषा के माध्यम से भी जीवित रखा जा सकता है |संस्कृत मे वह पूरी क्षमता है हां साहित्यिक पराकाष्टा के लिए उनका शैक्षनिक संस्थाओ के स्तर पर विकास जरूरी है |जातक कथाओं की तो बात छोड़िये चारो वेद, पुराण , उपनिषद , गीता, वाल्मीकी रामायण आदि आदि आदि आदि का आधार संस्कृत है |यह तो बहुत बड़ा विषय है यहाँ कितना लिखेगे|
    हिन्दू विचारधारा कर्मकाण्डो मे बहुत फष गयी थी तो बुद्ध ने आकर सुधार किया | हिन्दू विचारधारा की सनातन भागीरथी मे कोई एक बाइबिल , जीसस , क़ुरान , अल्ला तो है नहीं यह तो अनन्त और अखंड है |
    मैने यह तो नहीं लिखा की यह शासन की मेहरबानी थी की संस्कृत आई ए स परीक्षा का एक विषय थी |आई ए स के स्तर पर होना , संस्कृत भाषा की क्षमता का धोतक है| किसी विचारधारा के बारे में अपने विचारों को प्रकट करना गाली देना नहीं होता है |
    मै अपने विचारों मे कही नहीं रो रही हूँ |हमारे जिस इतिहास को न हमे पढ़ाया गया , हमारे इतिहास को हमे झूठा बताया गया एवं छुपाया गया वह आज सब कुछ इस इन्टरनेट के माध्यम से उजागर है |हम सब को सही जानने और सुनने का अधिकार है चाहे सरकारी तंत्र कुछ भी चाहे विचारों की स्वतन्त्रता रुकना मुश्किल है |मै बहुत भाग्यशाली अपने को समझती हूँ की एक नेक और महान पिता एवं संस्कारी माता के संतान होने से बहुत कुछ विरासत मे मिला है और कुछ बहुत ही नेक और विद्वान् लोगो के मित्रता का सनिध्ये भी प्राप्त है |
    जो भारतीय रोना रोते होगे शायद उन्हे नहीं मालूम की अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है , हताश होने की जरूरत नहीं है |
    सबसे पहले हमे स्वयं को जागृत करना पडेगा फिर हमारे आस पास जागृत ही जागृत लोग मिलेगे |

    Reply
  9. आर. सिंह

    R.Singh

    डाक्टर मधुसुदन जी आप लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि मैं क्या कहना चाहता हूँ.इसमे तो कोई मतभेद ही नहीं है कि संस्कृत विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है..मुझे नहीं ज्ञात है कि विश्व की अन्य कोई भाषा इस मामले में संस्कृत से टक्कर ले सकती है.ऐसे मैं बहुत भाषाएँ नहीं जानता,पर अंग्रेजी के अतिरिक्त मुझे फ्रांसीसी भाषा का भी थोडा ज्ञान है.मैंने रूसी भाषा भी सीखने काप्रयत्न किया था. इन तीनों विदेशी भाषाओं में रूसी भाषा का व्याकरण थोडा ठीक लगा पर संस्कृत के व्याकरण का नक़ल प्रतीत हुआ. अतः आपलोग जो बार बार इस बार पर जोर दे रहें है कि संस्कृत भाषा ऐसी वैसी है तो यह बात आज के उन युवकों के लिए ठीक लगती है,जिन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं. हो सकता है कि इससे मेरे जैसों के ज्ञान में भी कुछ वृद्धि हो पर मूल प्रश्न है कि संस्कृत के इस अवस्था में पहुँचने का कारण क्या है,जब उसका अस्तित्व ही खतरे में है.ऐसे लोग जो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं,वे यह भी कह सकते हैं या कह रहें है कि आजादी के बाद इसका पतन आरम्भ हुआ,पर यह कथन सत्य से बहुत दूर है और इसका कोई आधार नहीं दिखता. आप सब लोगों से यही अनुरोध है कि मेरी टिप्पणी को आरम्भ से पढ़िए और मुझे संस्कृत की सशक्तता और उसकी वैज्ञानिकता समझाने के बदले उन प्रश्नों का उत्तर खोजिये जो मैंने अपनी टिप्पणियों में उठाये हैं. नीचे मैं एक लिंक दे रहा हूँ,जिसमे संस्कृत भाषा के वैज्ञानिक भाषा होने का विधिवत वर्णन है.ऐसे इस लेख में अन्य बहुत सी बातें भी हैं जिसमें अधिकतर विचारों से मैं असहमत हूँ,,पर संस्कृत के बारे में लेखक का कथन ठीक जंचता है.
    https://www.facebook.com/jagadishwar9/posts/355992924429421

    Reply
  10. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    मा. सिंह साह्ब,
    बिन्दू क्रम देकर चर्चा करने की बिनती करता हूं।
    (१)
    देखिए संस्कृत शब्द “नेता”।
    नेता, नेतृत्व, इत्यादि नेत्रसे जुडा हुए शब्द है।
    (२)
    नेत्रों से आगे, भविष्य में दूर तक और निकट भी जो देखकर अपने अनुयायियों का, सही दिशा दर्शन करता है, एवं उस दिशामें आगे बढने की सुविधा निर्माण करता है, उसीका अर्थ नेता करता हूं।
    (३)
    दूरदर्शिता नेता में होनी चाहिए।नहीं तो, उसमें और सामान्य जन में क्या अंतर?
    (४)
    अर्थात, नेहरू जी से ऐसे नेतृत्व की अपेक्षा थी।
    (५)
    नहरूजी ने, कुछ नकारत्मक नहीं भी किया होगा, जो आप कह रहे हैं।–स्वीकार भी कर लें,
    (६)
    पर उन्होंने भाषा क्षेत्र में, सकारात्मक भी कुछ नहीं किया।
    (७)
    सार, असार; हितकर, अहितकर; दूरदर्शिता, विवेक –इत्यादि गुणों की अपेक्षा थी नेहरूजी से।
    (८)
    वे भारत के नेता थे वे।सामान्य जन नहीं।

    Reply
  11. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    सिंह साहन,

    जितनी सघनता से निम्न गुण संस्कृत में है, मैं ने किसी भी अन्य भाषा में देखा नहीं है|.
    (१)
    संस्कृत सक्षम है, अर्थवाही है, नए शब्द गढ़ने में|.
    उपसर्ग, प्रत्यय, समास, और संधि इत्यादि के कारण|.
    (२)
    वह शब्द बनाती है अर्थ को शब्द के ढाँचे में भरकर|.
    (३)
    २०-२२ उपसर्ग, ८० प्रत्यय, २००० धातु ही ३२ से ३५ लाख शब्द बना सकते हैं| समास, संधि तो इसको अनगिनत कर देंगे| इतने सारे तो “अर्थ” भी नहीं है मानव के पास|.
    (४)
    मैंने आज तक जो ढूँढा, इसके आधारपर कह सकता हूँ, की ऐसी शब्द रचना की क्षमता मैं ने और किसी भाषा में नहीं देखी|.
    (५)
    संस्कृत आपको बहुत सारी संज्न्याए देती है, अन्य भाषाएँ अभिधान| अभिधान एक लेबल होता है| संज्न्या का अर्थ उस शब्द के प्रत्येक अंश में व्यक्त होता है| उदाहरणार्थ.
    (6)
    सरिता –अर्थ जो “सर सर सरती” हुयी आगे बढती है|संस्कृत —>( या सरती सा सरिता|).
    (7)
    नदी–जो “नाद” (कल कल ) करते हुए बहती है|संस्कृत —>( या नादते सा नदी|).
    (8)
    मानव —-वह जिसको विचार के लिए “मन” मिला हुआ है| संस्कृत ->( मन: अस्ति स मानव:)

    अगले लेख में इसी विषय को प्रस्तुत करूँगा|.
    कुछ समय मिलने पर लिखूंगा|.
    एक बिनती |

    Reply
  12. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    सिंह साहन,

    जितनी सघनता से निम्न गुण संस्कृत में है, मैं ने किसी भी अन्य भाषा में देखा नहीं है|
    (१)
    संस्कृत सक्षम है, अर्थवाही है, नए शब्द गढ़ने में|
    उपसर्ग, प्रत्यय, समास, और संधि इत्यादि के कारण|
    (२)
    वह शब्द बनाती है अर्थ को शब्द के ढाँचे में भरकर|
    (३)
    २०-२२ उपसर्ग, ८० प्रत्यय, २००० धातु ही ३२ से ३५ लाख शब्द बना सकते हैं| समास, संधि तो इसको अनगिनत कर देंगे| इतने सारे तो “अर्थ” भी नहीं है मानव के पास|
    (४)
    मैंने आज तक जो ढूँढा, इसके आधारपर कह सकता हूँ, की ऐसी शब्द रचना की क्षमता मैं ने और किसी भाषा में नहीं देखी|
    (५)
    संस्कृत आपको बहुत सारी संज्न्याए देती है, अन्य भाषाएँ अभिधान| अभिधान एक लेबल होता है| संज्न्या का अर्थ उस शब्द के प्रत्येक अंश में व्यक्त होता है| उदाहरणार्थ
    (6)
    सरिता –अर्थ जो “सर सर सरती” हुयी आगे बढती है|संस्कृत —>( या सरती सा सरिता|)
    (7)
    नदी–जो “नाद” (कल कल ) करते हुए बहती है|संस्कृत —>( या नादते सा नदी|)
    (8)
    मानव —-वह जिसको विचार के लिए “मन” मिला हुआ है| संस्कृत ->( मन: अस्ति स मानव:)

    अगले लेख में इसी विषय को प्रस्तुत करूँगा|
    कुछ समय मिलने पर लिखूंगा|

    Reply
  13. आर. सिंह

    R.Singh

    रेखा सिंह जी आपने खाका तो अच्छा खींचा है,पर यह वास्तविकता से कोसों दूर है.स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संकृत को बढावा मिला था,पर वह बढ़ावा बहुत दूर तक नहीं चल सका.जैसे उर्दू उत्तर भारत के आम शहरियों की भाषा होते हुए भी एक ख़ास मजहब के पहचान के रूप में जानी जाने लगी,उसी तरह संस्कृत आजादी के बहुत पहले से एक जाति की भाषा बन गयी थी.आप लोग टिप्पणी तो लिख देते हैं,पर कभी कभी उन टिप्पणियों को भी देखिये जो संस्कृत के आम आदमी की भाषा होने में संदेह प्रकट करती है.मैंने लिखा था कि जातक कथाएं भी संस्कृत में नहीं हैं.इसके कारणों पर प्रकाश डालने की कौन कहे हम स्वतत्रता के बाद के नेतृत्व को गाली देने में उस टिप्पणी को भी नजर अंदाज कर गए.मैं समझता हूँ कि संस्कृत बुद्ध के जमाने से ही राज दरबारों और सनातन धर्म के ग्रंथों में सिमट गयी थी.संस्कृत को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद प्रोत्साहन मिलने का कारण था उसकासंपन्न साहित्य और प्राच्य दर्शन ,जो विषद रूप में संस्कृत में ही उपलब्ध है.शासन में उच्च वर्गों की उपस्थिति ने भी संस्कृत को आरम्भिक दिनों में बढाने में सहायता दी.रेखा जी आपने स्वयं लिखा है कि तब तक संस्कृत IAS परीक्षा के लिए स्कोरिंग विषय हुआ करती थी .ये सब बातें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की हीं हैं,क्योंकि आजादी के पहले आई.ए.एस था हीं नही .मुझे नहीं पता कि आज संस्कृत आई.ए.एस की परीक्षा में शामिल है कि नहीं .अगर नहीं तो वह कब वहां से हटा?आप इस पर भी प्रकाश डालें तो अच्छा हो.ऐसे भी हम भारतीय इस पर रोना तो जानते हैं कि यह होता ऐसा होता,पर यह नहीं विचार करते कि अगर भूतकाल में भूले हुईं हैं तो वर्तमान या भविष्य में उसे सुधारा कैसे जाये?

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  14. sanjay

    शायद ही आज की सरकार संस्कृत शिक्षा को प्रोत्शाहन दे पायेगी , क्योंकि आजकल लोग नौकरी करने के लिए पढ़ते हैं न की केवल ज्ञान के लिए . उनको इस में रूचि ही नहीं क्योकि इससे पंडित बन सकते हैं पर धन नहीं कमा सकते ….
    क्षेत्रीय भाषाएँ लोग नहीं जानते पर संस्कृत हर राज्य का पंडित जानता है लोग भी थोडा बहुत जानते ही हैं अतः आंग्ल के विकल्प में मुझे संस्कृत ही जचती है …यही मेरी पर पर पर दादी माँ की भाषा है…

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  15. आर. सिंह

    R.Singh

    मोहन गुप्त जी, आपके द्वारा दिए गए लिंक पर मैंने जा कर देखा किजिन विदिओज का आपने अपनी टिप्पणी में जिक्र किया है,वे इतने लम्बे भाषणों से भरे हुए हैं कि उनको देखने में धैर्य जबाब दे जाता है,पर पच्चीस और पैंतीस मिनट के इन लम्बे भाषणों का आधे से अधिक भाग देखने के बाद भी कहीं कुछ ऐसा नहीं मिला ,जिससे पता चले कि नेहरू ने ऐसा कुछ किया था.ऐसे भी ये विदिओज इस सन्दर्भ में प्रमाणिक नहीं माने जा सकते.आप ने जो आगे अपनी टिप्पणी में लिखा है कि नेहरु ने अंग्रेजी को जारी रखा था,इसमें मैं यही कहना चाहता हूँ कि उस समय का सम्पूर्ण नेतृत्व कुछ अपवादों को छोड़ कर अंग्रेजी को रखने के पक्ष में था.पंद्रह वर्ष के बाद तो हिंदी के विरुद्ध दक्षिण में ऐसी आंधी चली कि किसी राज नेता का सहस ही नहीं था कि इस बात को उठाता और आज भी परिस्थितियाँ ऐसी हीं है.पर मैं यहाँ आपको एक बात याद दिलाना चाहता हूँकि हम यहाँ हिंदी नहीं संस्कृत के बारे में चर्चा कर रहे हैं.अगर आप कोई पुष्ट प्रमाण दे सकें और उन कालेजों में से कुछ कालेजों का नाम दे सके जिसमे स्वतत्रता के बाद संस्कृत की पढाई रोकी गयी थी,तो मैं आपका आभारी रहूँगा मेरी स्कूली शिक्षा स्वतंत्रता प्राप्ति के करीब आठ महीने पहले आरम्भ हुई थी.आजादी के पहले हिंदी स्कूलों में चौथी कक्षा से अंग्रेजी द्वितीय भाषा के रूप में पढाई जाती थी,अब उसका स्थान संस्कृत और उर्दू ने ले लिया था और अंग्रेजी तृतीय भाषा के रूप में आठवी से पढाई जाने लगी थी.यह था बिहार का माहौल. उस समय अन्य राज्यों में क्या हो रहा था,मुझे इसकी विशेष जानकारी नहीं है.इन्तर्मेदिएत में मैं संत जेविअर कालेज में था.वहां का पूरा माहौल हालाकि अंग्रेजी मय था,फिर विज्ञान के विषय को भी हिंदी में लिखने को प्रश्रय दिया जाता था,पर हम लोगों ने स्वयं अपने भविष्य को देखते हुए इस को अधिक महत्त्व नहीं दिया था.
    आपलोगों को यही सलाह है की आप लोगपूर्वाग्रह छोड़कर इस पर विचार करेंगे तो आपको इस सत्य का पता चलेगा किआजादी के बाद भी हिन्दी को वह महत्त्व नहीं मिला जो मिलना चाहिए था,पर संस्कृत के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.हिंदी के विरोध में पूरा दक्षिण भारत अवश्य खड़ा हो गया था,पर संस्कृत के सम्बन्ध में ऐसी कोई बात नहीं थी.
    मैंने अपनी पहली टिप्पणी में या इसी सन्दर्भ में लिखे हुए एक अन्य टिप्पणी में जो लिखा है,उसपर ध्यान देने की किसी ने आवश्यकता ही नहीं समझी,क्योंकि वे टिप्पणियाँ लोगों की प्रतिक्रिया वादी विचार को उकसाने में मदद नहीं करतीं

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  16. Mohan Gupta

    It is fact that many people do not know that just after independence Jawahar Lal Nehru ordered to stop teaching Sanskrit in various colleges and universities. Due to his order Sanskrit was stopped teaching in more than 400 colleges
    This fact is mentioned in one of the following videos.
    A Dharma Video Presentation With Sri Dharma Pravartaka Acharya – dharmacentral@yahoo.com;
    What does it actually mean to find the Highest Reality? Finding the Highest Reality is not an intellectual exercise designed merely to satisfy our curiosity or feed our ego even further. Rather, it is a profoundly transformative spiritual experience that leaves one unalterably and deeply changed forever. In what is without doubt Sri Dharma Pravartaka Acharyaji’s most powerful and inspiring Dharma talk to date, this authentic spiritual master reveals the exact nature of the Divine as revealed in the ancient Vedic literature, and what is required of us in order to know that Divine intimately. This talk will radically transform both your understanding of God, as well as your very approach to reality itself!
    WATCH THE FULL VIDEO HERE:


    “In Defense of Reality” – Powerful New Video

    Watch the full video here:

    Nehru was pro- Muslim; he did not like anything associated with Hindus and wanted to promote Urdu and English. Many people wanted to switch over to Hindi after independence, but he extended to continue English for 15 years, then after Hindi will become national language if all states of Bhaarat pass a resolution that they want Hindi as national language. This condition can never be fulfilled. Instead the rule should have been if the population of the states who want Hindi as national language is 75% then Hindi would be declared as national language. Then both Hindi and Sanskrit would have been prevalent in Bhaarat.

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  17. Pankaj

    माता के नालायक पुत्रों की वजह से सब हो रहा है, शत्रु को क्या दोष दें.

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  18. आर. सिंह

    R.Singh

    डाक्टर मधुसुदन जी ,जैसा की मैंने आपके इस विषय पर प्रवक्ता में प्रकाशित इसके पहले वाले लेख पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि संस्कृत आम जनता की जिन्दगी से तो शायद बुद्ध के समय से ही बाहर निकल चुकी थी और इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता कि हर्ष के बाद संस्कृत साहित्य की भाषा भी रही या नहीं. .अगर मेरा वह अनुमान सही है तो अंग्रेजों को कौन कहे ,मुसलमानों के भारत में पदार्पण के पहले ही संस्कृत कुछ गिने चुने लोगों की भाषा रह गयी थी.यह उस समय के संस्कृत विद्वानों की एक सोची समझी चाल के अंतर्गत भी हो सकता है.अतः अंग्रेज ,अंगरेजी सभ्यता का प्रभाव आदि को इसके लिए जिम्मेवार ठहराने के पहले हमें उसके पहले वाले काल के विषय में शोध करना आवश्यक है. मैं नहीं समझता कि
    “कौन सी शक्तियां ऐसी संस्कृति द्रोही, संस्कृत द्रोही, ज्ञानद्रोही, राष्ट्र द्रोही, निर्णय के पीछे हो सकती है ?” का उत्तर आसान है.

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    • sc mudgal

      ,र.सिंह जी, कृपया हमें बताएं की आप इन शब्दों के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं>>>>>>>>. आर सिंह >>. मुस्लिमों के भारत में पदार्पण के पहले ही संस्कृत कुछ गिने चुने लोगों की भाषा रह गयी थी.यह उस समय के संस्कृत विद्वानों की एक सोची समझी चाल के अंतर्गत भी हो सकता है. “

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  19. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    ज्ञानी जी, शशि, और पण्डित चौबे जी–आभार।
    संक्षेपमें प्रयास करता हूं,फिर भी लम्बा ही होगा।
    धार्मिक या सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की लडाई है यह।
    धनके बलपर भारत का इसाईकरण करने में उन्हें कठिनाइ हो रही है। कारण भारत की सर्व स्पर्शी, विकेन्द्रित, बहु योगी(कर्म भक्ति इ इ ), बहु दैवी (बहुत देवी देवता वाली), बहु आयामी, बहु मार्गी, सांस्कृतिक, बहु नैष्ठिक (अनेक निष्ठाएं नदी, वृक्ष, गिरि, अरण्य, इ इ ) बहु आश्रमी, बहु पुरूषार्थी, इत्यादि बहुत सारा।
    पर सारा संस्कृत के आधार पर खडा हुआ है। यदि संस्कृत मृत हो जाए, तो समाज में जानकारी कैसे, और कहांसे पहुंचेगी? इस लिए वॅटिकन चाहेगी कि सभी शास्त्रों की जड संस्कृत का ही अंत हो जाए, तो फिर मतांतरण का मार्ग प्रशस्त होगा।
    और यह दबाव आज कल के बिना रीढ के शासन पर आ रहा है। ३०० मिलियन डॉलर(२००५ का आंकडा) जब मतांतरण के लिए आया है। तो उसके आधार पर कितने समाचार, स्तम्भ लेखक,मिडिया, विधायक, इ और “——” खरिदे जा सकते हैं? आंतर राष्ट्रीय कूट नीति ३ मार्गों से अधिकार जमाने का विश्लेषण करती हैं।
    (१) सेना बल,
    (२) धन बल
    (३) सांस्कृतिक घुसपैंठ, इत्यादि
    १ वाला रास्ता अब यु एन ओ के कारण पिछड गया है। २ और ३ वाला रास्ता प्रायोजित हो रहा है।
    जिस संस्कृति से सबसे अधिक भय लगता है, उन्हें वह है, सनातन संस्कृति।
    जो आज तक नाथी नहीं गयी है। अब आप सोच सकते हैं। क्यों?
    मेरा अनुमान, कहता है, कि, हमारी सर्व समन्वयी, विशाल वटवृक्ष जैसी, परम्परा का भय। कि उन्हें पता है, कि वटवृक्ष का एक मूल काटा तो दूसरे अनेक मूल तो कटे बिना, जीवित ही हैं।
    राम की निष्ठा का अंत हुआ, तो बाकी देवी देवता है।
    फिर नदियां, परबत, पर्व, त्यौहार,व्रत, उत्सव।
    गीता पर, रामायण पर, महाभारत पर, ६ दर्शनों पर, १८ पुराणों पर, १०८ उपनिषदों पर, चार वेदों पर, चार योगों पर, ३३ कोटि देवताओं
    ——सूचि बडी लम्बी है।
    यह सब एक संस्कृत मर (क्षमा मांगता हूं, लिखने के लिए) जाने से समाप्त होगा।
    यही है कारण। संस्कृत के विषय को समाप्त करने के पीछे।
    यह मेरी धारणा है। एक, दो खंभो पर टिकी हुयी संस्कृतियां मतांतरित होने में कठिनाइ नहीं होती।
    पर बहु आयामी बहु मार्गी सनातन समन्वयी संस्कृति को निगला नहीं जा सकता। यह उसके सुधार भी कर लेती है।
    धन के बल पर बेचारे कुछ तो कर पाएंगे।
    बडा लम्बा हो गया, और भी पहलु है। कभी लेख ही ईश्वर कृपा से, प्रयास करुंगा।
    तन मन धन सब तेरा।
    तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

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