“प्राचीन भारत सकारण अध्यात्म प्रधान देश था”

मनमोहन कुमार आर्य

आज हम जिस युग में जीवन व्यतीत कर रहे हैं वह आधुनिक युग कहा जाता है। महाभारत काल से पूर्व का प्राचीन भारत अपने समय में तो आधुनिक ही कहा जाता रहा होगा परन्तु उस समय के विद्वानों व मनीषियों ने आध्यात्म और भौतिकवाद में से अध्यात्म का चयन किया था। यह जानना आवश्यक है कि अध्यात्म के क्या लाभ हैं जो भौतिकवाद में नहीं हैं। आध्यात्मवाद में क्या कुछ कमियां भी हैं अथवा भौतिकवाद की कुछ विशेषतायें हैं जो आध्यात्मवाद के प्राचीन युग में नहीं थी। ऐसे सभी प्रश्नों पर विचार किया जा सकता है। आज विश्व के देशों में आन्तरिक व बाह्य जो भी समस्यायें हैं उसका कारण आधुनिकता व भौतिकवाद ही प्रतीत होता है। यदि अपने देश को ही लें, तो यहां धनी-निर्धन, ऊंच-नीच, भेदभाव, बेरोजगारी, अशिक्षा, मत-मतान्तर, अज्ञान-अशिक्षा, अभाव, कुपोषण, अवैदिक मूर्तिपूजा, अवतारवाद की मान्यता, फलित ज्योतिष, अन्याय, शोषण, कर-चोरी, भ्रष्टाचार, जनसंख्या-विस्फोट, रोग आदि अनेक समस्यायें हैं। प्राचीन भारत में यह समस्यायें दृष्टिगोचर नहीं होती। 

 

प्राचीन भारत का आरम्भ मनुष्योत्पत्ति व वेदोत्पत्ति के साथ होता है। परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान देते हैं। यह चार वेद मनुष्य जीवन को सुखपूर्वक व्यतीत करने के लिये अत्युत्तम व श्रेष्ठ ज्ञान है। आज भी यह ज्ञान उपयोगी एवं सार्थक है। वेद हमें ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति व सृष्टि के सत्यस्वरूप का ज्ञान कराते हैं। ईश्वर व जीवात्मा आदि का जो ज्ञान वेद और वेद के विद्वान ऋषियों के रचे ग्रन्थों में उपलब्ध होता है, वैसा ज्ञान संसार के साहित्य में दुर्लभ व असुलभ है। इसके अतिरिक्त संसार के सभी मत-मतान्तरों के ग्रन्थ वा धर्म-ग्रन्थ मिथ्या ज्ञान व अविद्या से युक्त हैं। मत-मतान्तरों के लोगों को तो मनुष्य जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य का भी ज्ञान नहीं है। यह ज्ञान व इनकी प्राप्ति के साधनों का ज्ञान वेद व ऋषियों के साहित्य दर्शन एवं उपनिषद् आदि से प्राप्त होता है। अतः आवश्यक है कि विश्व के विद्वान वेदों की ओर लौटे और वेदों का अध्ययन कर उसमें विद्यमान विद्या व ज्ञान को, जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं है, उसे अपनायें और मानवता के हित में उसका विश्व में प्रचार व प्रसार करें।

 

सृष्टिकाल के आरम्भ से लेकर महाभारतकाल तक भारत में वेदों के विद्वान, ऋषि व मनीषिगण बड़ी संख्या में विद्यमान थे जो सभी मनुष्यों की सभी शंकाओं का समाधान करने में समर्थ थे व करते भी थे। उन्होंने ही अध्यात्म के महत्व के कारण और भौतिकवाद की बुराईयों के कारण भौतिकवाद पर नियंत्रण किया हुआ था। आध्यात्म से यह जाना जाता है कि मैं कौन हूं, मेरा जन्म क्यों हुआ है, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति के साधनों का ज्ञान भी आध्यात्म तर्क व विवेचना के साथ प्रस्तुत करता है। अध्यात्म से दुःख व इसके कारण तथा निवारण का ज्ञान व उपाय भी जाने जाते हैं। वेद व वैदिक साहित्य ईश्वर के सत्यस्वरूप पर प्रकाश डालते हैं जो पूर्णतया तर्क व युक्तिसंगत होने से ग्राह्य है। ऋषि दयानन्द ने इन सभी प्रश्नों व उनके वैदिक समाधानों पर अपना जीवन लगाया और उन्हें वैदिक साहित्य के अध्ययन से जो अनमोल रत्न प्राप्त हुए उसे प्रवचनों, ग्रन्थों व लेखों आदि के माध्यम से देशवासियों को सुलभ कराया। वैदिक साहित्य तथा ऋषि दयानन्द के साहित्य को पढ़कर मनुष्य के जीवन की सभी गुत्थियों को सुलझाना सरल हो जाता है। सभी प्रश्नों व शंकाओं के समाधान भी इनमें प्राप्त होते हैं। अतः सभी मनुष्यों को सम्पूर्ण वैदिक साहित्य सहित ऋषि दयानन्द के सभी ग्रन्थों का अध्ययन कर अपने जीवन को सत्यपथगामी बनाकर अपने वर्तमान जन्म व परजन्मों का सुधार करना चाहिये।

 

मनुष्य अध्यात्म ज्ञान को प्राप्त कर उसके अनुकूल जीवन व्यतीत करता है तो ईश्वर व आत्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होने पर उसे अन्य सभी प्रश्नों व शंकाओं का उत्तर भी मिल जाता है। आध्यात्मिक जीवन से लाभ पर विचार करने पर हमें यह ज्ञात होता है कि यह सृष्टि जड़ प्रकृति का विकार है जिसे ईश्वर ने अपने ज्ञान व सामर्थ्य से रचा वा उत्पन्न किया है। ईश्वर का इस सृष्टि को रचने का उद्देश्य चेतन अल्पज्ञ, एकदेशी व ससीम जीवात्माओं का कल्याण करना है। कल्याण का अर्थ उन्हें उनके कर्मानुसार सुख व दुख देना है। यदि वह ऐसा न करे तो वह निठल्ला सिद्ध होगा और जीवात्मा भी सुख व दुख सहित शुभ व अशुभ कर्मों से वंचित रह जाते। जो जीवात्मायें संसार में मनुष्य की काया वा शरीर में विद्यमान हैं उसका कारण उनके पूर्वजन्म में शुभ कर्म हैं। उनके शुभ कर्मों की संख्या उनके कुल अशुभ कर्मों से अधिक थी। इसी कारण उन्हें मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है। जिन जीवात्माओं को हम पशु, पक्षी व मनुष्येतर योनियों में देखते हैं उन सभी के पूर्वजन्म के कर्म आधे से अधिक अशुभ थे। इस कारण वह मनुष्य जन्म प्राप्त नहीं कर सके। हम मनुष्य जन्म में भी यदि अशुभ व पाप कर्मों को करेंगे तो इसके कारण हमारा भावी जन्म मनुष्येतर योनियों में हो सकता है जहां मनुष्य जीवन की तुलना में अधिक दुःख व कठिनाईयां हैं। अध्यात्म-ज्ञान-विज्ञान यह भी बताता है कि मनुष्य जन्म भी सुख व दुःख से मिश्रित है। अतः हमें दुःखों से पूर्णतया मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिये। दुःख का कारण अशुभ कर्म होता है। यदि हम अशुभ कर्म व पाप करना छोड़ देते हैं, तो हमें इस जन्म में व परजन्म में दुःख प्राप्त नहीं होंगे। यदि हमारे सभी व अधिकांश पाप व अशुभ कर्म भोग लिये जायें और शेष अधिकांश शुभ कर्म ही शेष रहे तो हमें श्रेष्ठ मनुष्य जन्म जिसे देव कोटि का जन्म कह सकते हैं, प्राप्त हो सकता है। वैदिक धर्म में जीवात्मा के जन्म व मरण में होने वाले दुःख पर भी विजय पाने के लिये मोक्ष के साधनों पर विचार किया गया है। सत्याचार, ईश्वरोपासना, यज्ञ आदि श्रेष्ठ कर्म, परोपकार व दूसरों की सेवा आदि साधनों से मनुष्य मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। ईश्वरोपासना व योगाभ्यास से मनुष्य समाधि अवस्था प्राप्त कर सकता है जिसमें उसे ईश्वर का साक्षात्कार होता है। यह ईश्वर साक्षात्कार ही मोक्ष की पात्रता मानी गई है। इससे मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होकर लम्बी अवधि तक जन्म व मरण से अवकाश पा जाता है।

आध्यात्मिक जीवन में मनुष्य ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप व इनके गुण, कर्म व स्वभाव को जानकर ईश्वरोपासना व यज्ञादि कर्मों को करके ईश्वर के सान्निध्य से श्रेष्ठ सुख व आनन्द की उपलब्धि करता है जो भौतिक जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होती। आध्यात्मिक पुरुष की आवश्यकतायें बहुत कम होती है। यम व नियमों का पालन आस्तिक व आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्यों का आवश्यक कर्तव्य होता है। यम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह को कहते हैं। नियम शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान को कहते हैं। जो व्यक्ति आध्यात्मिक अर्थात योगी का जीवन व्यतीत करेगा वह अहिंसक होगा, इससे समाज में हिंसा व अनाचार नहीं होगा। यदि समाज में हिंसा होती है तो राज्य व्यवस्था से कठोर दण्ड देकर उसे निर्मूल किया जा सकता है। सत्य व अस्तेय से भी समाज व देश उन्नति को प्राप्त होते हैं। ब्रह्मचर्ययुक्त जीवन के अनेक लाभ होते हैं। मनुष्य में बल की वृद्धि होती है, रोग नहीं होते, मनुष्य दीर्घायु होता है एवं मनुष्य सहनशील व धैर्य आदि गुणों से युक्त होता है। अपरिग्रह से भी समाज में असमानता, धनी-निर्धन आदि की दीवारें निर्मित नहीं होती। इस प्रकार यदि यम व नियमों पर विचार किया जाये तो इससे देश व समाज को अनेक लाभ होते हैं। इसके विपरीत भौतिकवाद में मनुष्य सुख सुविधाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। इन्हें प्राप्त करने के लिये वह रात दिन धनोपार्जन करता है। महत्वाकांक्षाओं के कारण वह उचित व अनुचित का ध्यान नहीं रखता। भारत में राजनीतिक व प्रशासन में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार की घटनायें सुनने को मिलती रहती है। लोग सुख सुविधाओं के लिये बड़े-बड़े भवन व निवास बनवाते हैं। इससे खनन को बढ़ावा मिलता है जो प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाड़ता है। सभी डीजल व पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का प्रयोग करते हैं जिससे वायु व जल प्रदुषण होने से मनुष्य का श्वांस लेना भी दूभर हो जाता है। अनेक भंयकर रोगों की उत्पत्ति होती है जिससे जनसामान्य दुःखी होते हैं। जल प्रदुषण से भी अनेक रोग होते हैं। भौतिकवाद से उद्योगों की वृद्धि होती है। इनसे भी वायु, जल व ध्वनि आदि अनेक प्रकार के प्रदुषण होते हैं। मनुष्य धनोपार्जन में ही लगा रहता है। ईश्वर व जीवात्मा को जानने व उपासना आदि कार्यों के करने में भौतिकवादी मनुष्य की प्रवृत्ति नहीं होती जिससे वह उपासना के लाभों से वंचित हो जाता है। भौतिकवाद सामाजिक असमानता में वृद्धि करता है। इससे अन्याय, शोषण व अभाव की स्थिति भी उत्पन्न होती है जिससे मनुष्यों को कष्ट होता है। मनुष्य का यहां तक पतन होता है कि बल व बुद्धिवर्धक तथा आरोग्यकारक आदर्श शाकाहारी भोजन को भूलकर जिह्वा के स्वाद के लिये पशुओं को मरवाता है व उन्हें अपना भोजन बना डालता है। यह साधू प्रकृति न होकर इसकी विरोधी राक्षसी प्रवृत्ति होती है। मांस तामसिक व राजसिक भोजन है जिससे उसमें हिंसा, क्रोध, ब्रह्मचर्यनाश आदि की प्रवृत्तियों में वृद्धि होती है। ऐसी अनेक हानियां भौतिकवादी जीवन से होती है।

 

हमारे प्राचीन ऋषि मुनि आध्यात्मिक जीवन के लाभों को भली-भांति जानते थे और भौतिकवादी जीवन से होने वाली अनेकानेक हानियों को भी जानते थे। इसलिये उन्होंने सृष्टि के आरम्भ से ही आध्यात्मवाद को स्वीकार किया और भौतिकवाद को न्यूनतम आवश्यकता के अनुरूप ही स्वीकार किया। आज भी जो मनुष्य आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करते हैं वह प्रशंसा के पात्र हैं। वही वस्तुत आदर्श व वास्तविक मनुष्य जीवन है। उसी जीवन से मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। सभी को अध्यात्म के मार्ग पर चलना चाहिये। इसी में सबका भला व कल्याण है।

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