More
    Homeटॉप स्टोरीविभाजन और संघ द्वारा हिन्दुओं की रक्षा

    विभाजन और संघ द्वारा हिन्दुओं की रक्षा

    -अनिल गुप्ता-

    hindutva

    स्वतंत्रता के पश्चात पाकिस्तान मिल जाने के बाद भी मुस्लिम लीग को संतुष्टि नहीं हुई और उसने दिल्ली में भारी मात्रा में हथियार एकत्रित करके और हथियारों का अवैध निर्माण करके दिल्ली को दहलाने की तैयारी कर ली थी.संघ द्वारा संचालित साप्ताहिक Organiser weekly ने इस सम्बन्ध में निरंतर समाचार प्रकाशित किये.श्री एएन बाली की पुस्तक Now It Can Be Told के पृष्ठ १३७-१३९ में भारत रत्न डाक्टर भगवान दास के १९ अक्टूबर १९४८ के वक्तय का उल्लेख किया है जिसके अनुसार उन्होंने कहा था “मुझे विश्वस्त सूत्रों से जानकारी मिली है कि RSS के नवयुवकों ने जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल को समय रहते मुस्लिम लीग के उस षड्यंत्र की जानकारी दे दी थी जिसके तहत १० सितम्बर १९४७ को लीग दिल्ली में सशस्त्र विद्रोह करके भारत सरकार के मंत्रियों और बड़े अधिकारीयों कि हत्या कर देती और लाल किले पर पाकिस्तानी झंडा फहरा देती.और हिंदुस्तान को कब्जे में ले लेती.यदि ये देशभक्त और कर्त्तव्यनिष्ठ तरुण नेहरू और पटेल को ठीक समय पर सूचना न देते, तो आज कोई भारत सरकार न होती.सारे देश का नाम बदलकर पाकिस्तान हो जाता.दसियों लाख हिन्दू मारे जाते.और उससे अधिक इस्लाम में धकेल दिया जाते.और भारत फिर गुलाम बन
    जाता.इस सबका क्या निष्कर्ष है?साफ़ तौर पर यह कि हमारी सरकार लाखों संघ कार्यकर्ताओं की राष्ट्रवादी शक्ति का उपयोग करे, उसे कुंठित न करे.”

    तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी ने स्वयं इन व्यापक तैयारियों के बारे में लिखा था,”मुसलमानों ने हथियार एकत्र कर लिए थे.उनके घरों कि तलाशी लेने पर बम, आग्नेयास्त्र,और गोल बारूद के भंडार मिले थे.स्टेनगन,ब्रेनगन.मोर्टार और वायरलेस ट्रांसमीटर बड़ी मात्र में मिले थे.इन वस्तुओं को गुपचुप बनाने वाले कारखाने भी पकडे गए.अनेक स्थानों पर घमासान संघर्ष हुआ, जिसमे इन हथियारों का खुलकर प्रयोग किया गया.पुलिस में मुसलमानों की भरमार थी.इस कारण सरकार को दंगे को दबाने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा.इन पुलिसवालों में से अनेकों तो अपनी वर्दी व हथियार लेकर ही फरार हो गए.और दंगाइयों से मिल गए.शेष जो बचे थे उनकी निष्ठां भी संदिग्ध थी.सरकार को अन्य प्रांतो से पुलिस व सेना बुलानी पड़ी.”(कृपलानी-गांधी, पृष्ठ २९२-२९३)
    कांग्रेसियों की रक्षा स्वयंसेवकों ने की
    सितम्बर १९४६ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मिली जुली सरकार का केंद्रीय असेम्बली में अधिवेशन प्रारम्भ हुआ.उसमे लीगी गुंडों ने विरोध प्रदर्शन और पथराव कर कांग्रेसी नेताओं को अपमानित किया.अपनी योजना को
    सफल होते देख अगले दिन और अधिक संख्या में लीगी एकत्र हुए. तब दिल्ली के कांग्रेसी नेता देशबन्धु गुप्त ने संघ कार्यालय पर जाकर संघ के पदाधिकारियों से सहायता मांगी.संघ ने इस चुनौती को स्वीकार किया.सैंकड़ों
    स्वयंसेवक आनन-फानन में तैयार होकर असेम्ब्ली पहुंचे. उन्हें देखकर लीगी गुंडे भाग गए और उसके बाद फिर ऐसा दुस्साहस नहीं किया. आज़ादी के बाद पं. नेहरू ने नवम्बर १९४७ में पंजाब के प्रधानमंत्री गोपीचंद भार्गव को निर्देश दिया कि अपने राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अकाली दल कि गतिविधियों को किसी भी कीमत पर न चलने दें.तब २५ नवम्बर १९४७ के सम्पादकीय में अंग्रेजी दैनिक ट्रिब्यून ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि पंजाब के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार इस निर्देश का डटकर विरोध करे.उसने लिखा कि देश का विभाजन कराने वाली मुस्लिम लीग जो हथियारों के जखीरे भर रही है उसपर कोई चिंता नहीं है और रा.स्व.संघ जो उसकी नृशंसता का वीरतापूर्वक प्रतिरोध करते हैं वो नेहरूजी की नाराजगी का कारण बन रहे हैं.जब पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) धू-धू कर जल रहा था और लाखों आपदाग्रस्त हिन्दू सहायता की पुकार कर रहे थे तब उनकी इस दर्दभरी गुहार को सत्ताधीश अनसुना कर रहे थे तब इन संगठनों के जांबाज़, बहादुर कार्यकर्त्ता ही जिन्ना के अत्याचारों से पीड़ित लाखों हिन्दुओं को हर प्रकार की सहायता करने में अपने जीवन को दांव पर लगा रहे थे.अपने इन जरूरत मंद भाईयों कि रक्षा करते हुए बलिदान हो रहे थे.”

    पं.नेहरू कि सभा कि रक्षा की:
    १९४६ में नेहरूजी हैदराबाद (सिंध) गए. वहां उनकी एक आम सभा आयोजित की गे थी.सम्भावना थी की लीगी गुंडे सभा को भंग कर सकते हैं. तब तक कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार नहीं क्या था.संघ उस समय तक सिंध में एक बड़ी शक्ति बन चूका था. कांग्रेस प्रमुख डॉ. चिमन दास तथा बाबा किशन चंद ने संघ के लोगों से सहायता मांगी.अतः बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों की उपस्थिति के कारण लीगी गुंडे उपद्रव नहीं कर पाये.

    गांधीजी की रक्षा की:
    गांधीजी दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती के मंदिर में रह रहे थे. निकट ही मुस्लिम लीग का बड़ा केंद्र था. उस ओर से गांधीजी पर आक्रमण के संकेत मिल रहे थे. गांधीजी की रक्षा में कठिनाई थी, क्योंकि वे पुलिस के घेरे में रहने को तैयार नहीं थे. गांधीजी के सहयोगी श्री कृष्णा नायर (जो बाद में सांसद भी रहे) दिल्ली के तत्कालीन प्रान्त प्रचारक श्री वसंत राव ओक के पास पहुंचे और उनसे गांधी जी की रक्षा का दायित्व संघ संभाले यह आग्रह किया. संघ अधिकारियों द्वारा अपने स्वयंसेवकों को यह कार्य सौंपा गया. उन्होंने दिन रात गांधीजी की कुटिया की पहरेदारी की.हथियारबंद लीगी गुंडों, आतंकियों से बिना डरे संघ के स्वयंसेवकों ने अपना कर्तव्य पालन किया. और उन सतर्क स्वयंसेवकों की उपस्थिति से लीगी गुंडे अपनी योजना पूरी नहीं कर सके।

    जब संघ ने दरबार साहब की रक्षा की:

    ५ मार्च १९४७ को लीग के गुंडों ने अमृतसर में सुनियोजित ढंग से हिन्दुओं और सिखों पर हमले कर दिए. सबसे पहले भगत सिंह नामक एक सिख को मार डाला गया. उसके बाद हाल बाजार की सभी दुकानों के ताले तोड़कर उन्हें लूट कर आग लगा दी गयी.उसके बाद कारखानों पर हमले किये गए.६ मार्च को शरीफपुरा के मुसलमानों ने पठानकोट से अमृतसर आ रही ट्रेन को शरीफपुरा पर रोकर हिन्दू यात्रियों को ट्रेन में घुसकर मार डाला. अमृतसर पहुँचने पर पूरी ट्रेन हिन्दुओं की लाशों से पटी पड़ी थी. ६ मार्च की रात को लीग के गुंडों का एक बड़ा समूह अमृतसर के शेराँवाला गेट से फव्वारा चौक की तरफ से कृष्णा कपड़ा मार्किट और दरबार श्री हरमंदर साहिब की और बढ़ रहा था.उन गुंडों को ये बताया गया था की जिस प्रकार अहमदशाह अब्दाली ने इस गुरूद्वारे की ईंट से ईंट बजा दी थी उसी प्रकार हम भी कर देंगे. लेकिन ये क्या! फव्वारे चौक पहुंचते ही उन पर चारों और से लाठियों ,तलवारों भालों और छुरों व बमों से प्रहार शुरू हो गए.हमलावरों ने देखा की उनपर निकरधारी स्वयंसेवक प्रहार कर रहे हैं.वो लीगी गुंडे संघ से भय खाते थे. अतः वो भागने लगे. इस प्रकार संघ के बहादुर स्वयंसेवकों ने न केवल कृष्णा मार्किट बल्कि दरबार साहब की भी सुरक्षा की.

    असल में संघ के अधिकारीयों को लीग के हमले के षड्यंत्र का पहले से पता चल गया था। अतः बचाव व प्रतिकार की पुख्ता योजना बना ली गयीथी.डॉ.इंद्रपाल,डॉ.बलदेव प्रकाश,और श्री गोवर्धन चोपड़ा- इसका मार्ग दर्शन कर रहे थे.और स्वयंसेवकों ने निश्चय किया था कि जब तक एक भी स्वयंसेवक जीवित रहेगा, पवित्र स्वर्ण मंदिर की पवित्रता को नष्ट नहीं होने दिया जायेगा.

    इस असफलता से बौखलाकर लीगियों ने डीएम.से मिलकर कर्फ्यू लगवा दिया हिन्दुओं को घरों से नहीं निकलने दिया गया जबकि मुस्लमान खुलेआम घूम रहे थे. और ९ मार्च को पुनः दरबार साहब पर तीन तरफ से हमले की योजना बनायीं. लेकिन डॉ. बलदेव प्रकाश जी की सूझ बूझ और साहस के कारण कुछ स्वयंसेवकों ने सेना की पुरानी वर्दी खरीदकर पहन लीं और सैनिकों की भांति कर्फ्यू के बावजूद असुरक्षित क्षेत्रों में स्वयंसेवकों को लेकर पहुँच गए और तीनों तरफ से मुकाबला करके हमलावरों को भागने पर मजबूर कर दिया और इस प्रकार पुनः दरबार साहब की रक्षा की.

    अनिल गुप्ता
    अनिल गुप्ताhttps://www.pravakta.com/author/anilguptarsdgmail-com
    मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,739 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read