हिंसा का देश विरोधी चेहरा

-अरविंद जयतिलक

यह उचित है कि सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के दौरान हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटना को गंभीरता से लिया है। उसने जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में पुलिस कार्रवाई पर स्वतः संज्ञान लेने की मांग पर सख्त लहजे में कहा कि पहले हिंसा रुकनी चाहिए। अगर हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना जारी रहा तो सुनवाई नहीं की जाएगी। न्यायालय की यह टिप्पणी इस अर्थ में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि एक ओर न्यायालय के समक्ष नागरिक अधिकारों के संरक्षण की दुहाई दी जाती है वहीं दूसरी ओर प्रायोजित हिंसा के जरिए देश को अराजकता की आग में ढंकेल कर न्यायिक भावना और संविधान की धज्जियां उड़ाया जाता है। सवाल लाजिमी है कि फिर दोनों चीजें एक साथ कैसे स्वीकार्य होगी? यह उचित नहीं कि राजनीतिक दल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए विश्वविद्यालयों, कालेजों और तकनीकी संस्थानों के छात्रों को मोहरा बनाएं। जैसा कि इस मामले में देखा भी जा रहा है। निःसंदेह एक संवैधानिक व लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक व समुदाय को अपनी बात सकारात्मक ढंग से रखने और जनतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन करने का अधिकार है। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह हिंसक प्रदर्शनों के जरिए हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और निजी व सार्वजनिक संपत्ति का दहन करें और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए। यह भी स्वीकार्य नहीं कि वह हिंसक प्रदर्शन की आड़ में जनजीवन को बाधित कर दिनचर्या को तहस-नहस कर दे। जिस तरह नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की आड़ में सार्वजनिक संपत्ति का दहन कर देश को अराजकता की आग में ढ़केलने का प्रयास हुआ है, वह किसी भी तरह क्षम्य नहीं है। यह कृत्य देश विरोधी और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला है। समाज को तोड़ने और समरसता में जहर घोलने वाला है। याद होगा अभी गत वर्ष ही इंस्टीट्यूट फाॅर इकोनाॅमिक्स एंड पीस रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था को क्रय शक्ति क्षमता (पीपीपी) के संदर्भ में हिंसा के कारण पिछले साल 1,190 अरब डाॅलर यानी 80 लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा। यह संपत्ति कितनी बड़ी है, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह नुकसान प्रति व्यक्ति के हिसाब से तकरीबन 595.50 डाॅलर यानी 40 हजार रुपए से अधिक ठहरता है। इन आंकड़ों से अच्छी तरह समझा जा सकता है कि पिछले एक दशक में हिंसा के दौरान सार्वजनिक संपत्ति और आमजन का कितना नुकसान हुआ होगा। इंस्टीट्यूट फाॅर इकोनाॅमिक्स एंड पीस के इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो हिंसा से 2017 के दौरान देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नौ प्रतिशत के बराबर नुकसान हुआ। अगर इस धनराशि को शिक्षा और सेहत पर खर्च किया जाए तो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आमुलचूल परिवर्तन देखने को मिलता। गौरतलब है कि इंस्टीट्यूट फाॅर इकोनाॅमिक्स एंड पीस ने यह रिपोर्ट 163 देशों के अध्ययन के आधार पर तैयार की। भारत के संदर्भ में गौर करें तो यहां आए दिन जातीय, धार्मिक और राजनीतिक समूहों के बीच संघर्ष होता रहता है। यह सही है कि ज्यादतर संघर्ष हिंसा का स्वरुप नहीं लेता लेकिन कुछेक मामलों में हिंसा का स्वरुप इस कदर भयावह हो जाता है कि उससे सामाजिक और धार्मिक ताना-बाना बिगड़ जाता है और धन-संपत्ति का भारी नुकसान होता है। जैसा कि नागरिकता संशोधन कानून के मसले पर देखा जा रहा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि राजनीतिक दल हिंसक उपक्रमों को रोकने के बजाए अपना राजनीतिक हित संवर्धन के लिए मजहबी समूहों को उकसाते नजर आए हैं। उकसाऊ भाषणों और ट्वीट के जरिए हालात बिगाड़ने का प्रयास किए हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि नागरिकता संशोधन कानून से भारतीय मुसलमानों का तनिक भी अहित नहीं होने वाला है। यह तथ्य बार-बार प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और अन्य जिम्मेदार लोगों द्वारा दोहराया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद भी देश के विपक्षी दल कुछ इस तरह प्रचारित कर रहे हैं मानों इस कानून से देश के अल्पसंख्यकों का भारी नुकसान होने जा रहा है। यह ठीक नहीं है। सच कहें तो देश की राजधानी दिल्ली से लेकर पूर्वोत्तर तक इस मसले पर हिंसा और तोड़फोड़ का जो दृश्य देखने को मिला है उसके लिए कोई और नहीं बल्कि राजनीतिक दल ही जिम्मेदार हैं। वे ही छात्रों के कंधे पर सियासत का बंदूक रख अपना हित संवर्धन कर रहे हैं। लेकिन वे कुलमिलाकर देश और समाज का ही नुकसान कर रहे हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह कि देश का कोई भी राजनीतिक दल नहीं है जो समय-समय पर पड़ोसी देशों में प्रताड़ित किए गए अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिकों को भारतीय नागरिकता देने की पक्षधरता न की हो।  लेकिन अब उनका सुर बदल गया है। इस मसले पर खालिस सियासत कर रहे हैं। गौर करें तो पिछले एक दशक के हिंसक आंदोलनों के पीछे राजनीतिक दलों का ही हाथ रहा है। कभी वे जातीय व धार्मिक मसले को आगे कर जनता को भड़काते देखे गए हैं तो कभी भाषा और आरक्षण के सवाल पर अपनी रोटियां सेकते नजर आए हैं। याद होगा गत वर्ष पहले पश्चिम बंगाल राज्य के दार्जिलिंग में उस वक्त हिंसा भड़क उठी थी जब राज्य सरकार ने पहाड़ी इलाकों के स्कूलों में बांग्ला भाषा पढ़ाने की अनिवार्यता सुनिश्चित की। पहाड़ी लोगों ने इसका विरोध किया और आरोप लगाया कि उनके बुनियादी अधिकारों एवं रीति-परंपराओं के साथ राज्य सरकार खिलवाड़ कर रही है। इस जज्बात ने लोगों को विरोध के लिए इस कदर उकसा दिया कि शीध्र ही यह आंदोलन गोरखालैंड राज्य की मांग में तब्दली हो गया। इस हिंसक आंदोलन को चरम पर पहुंचाने में सियासी दलाों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नतीजा इस हिंसक आंदोलन में हजारों करोड़ रुपए स्वाहा हो गए। इसी तरह गत वर्ष पहले हरियाणा में आंदोलन का जो रक्तरंजित चेहरा सामने आया उससे न केवल हरियाणवी समाज की एकता व भाईचारा नष्ट हुआ बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचा। आंदोलनकारियों ने हिंसा का रास्ता अख्तियार कर अपने विरोधियों की दुकानों, मकानों व वाहनों को आग के हवाले कर दिया। इस आंदोलन में ढ़ाई दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग बुरी तरह घायल हुए। एसोचैम की मानें तो उस हिंसक आंदोलन में तकरीबन 30 हजार करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ था। अगर यह धनराशि राज्य के विकास में लगा होता तो राज्य का भला हुआ होता। देखा गया कि आंदोलनकारियों ने रास्ता जाम करने के लिए हजारों मूल्यवान पेड़ों को काटकर पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाया। इसी तरह गत वर्ष पहले पाटीदारों ने आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन किया जिससे निजी व सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा। इस हिंसक आंदोलन में 3500 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। सबसे ज्यादा नुकसान गोल्ड, माॅल, रेस्त्रां और पेट्रोलियम इंडस्ट्री को हुआ। गत वर्ष पहले आंध्रपदेश के कापू समुदाय के लोगों ने भी आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन किया जिससे अर्थव्यवस्थ को भारी नुकसान पहुंचा। याद होगा अभी पिछले वर्ष ही मध्यप्रदेश राज्य में किसानों ने अपने उत्पादन में मूल्य वृद्धि को लेकर आंदोलन किया और धीरे-धीरे यह आंदोलन हिंसा में बदल गया जिससे कई किसानों की जान गयी। तोड़-फोड़ के दौरान हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति का भी नुकसान हुआ। ध्यान दें तो देश के अन्य हिस्सो में आए दिन इस तरह के आंदोलन होते रहते हैं जिससे न केवल जनजीवन बाधित होता है बल्कि हिंसा से करोड़ों रुपए का नुकसान होता है। याद होगा गत वर्ष पहले सर्वोच्च अदालत ने आंदोलन के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान और हिंसा करने वालों के विरुद्ध कड़ा कदम उठाने का निर्देश दिया और कहा कि आंदोलन से जुड़े राजनीतिक दलों और संगठनों को इस नुकसान की भरपायी करनी होगी। उसने यह टिप्पणी गुजरात में हुए पाटीदार आंदोलन के नेतृत्वकर्ता हार्दिक पटेल की याचिका की सुनवाई के दौरान की थी। न्यायालय ने यह भी कहा था कि वह सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की जवाबदेही तय करने के मानक सुनिश्चित करने के साथ-साथ ऐसी गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दिशा-निर्देश भी जारी करेगा। लेकिन बिडंबना है कि सर्वोच्च अदालत की कड़ी फटकार के बाद भी हिंसक आंदोलनों का क्रम जारी हैं। सियासी दल हिंसक आंदोलनों को भड़काने-उकसाने से बाज नहीं आ रहे हैं। आंदोलन की उग्रता और हिंसक गतिविधयों को देखते हुए समझना कठिन नहीं कि सियासी दलों का मकसद येनकेनप्रकारेण सत्ता हासिल करना है। लेकिन उन्हें समझना होगा कि उनके ऐसे कृत्यों से देश का भला होने वाला नहीं है।

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