लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

किसी खूँटे से बंध कर,
मुक्त हुआ नहीं जाता।
संदूक में बंद हो कर ,
बाहर  देखा नहीं जाता।
॥१॥
अण्डा फोडकर निकलता है,
गरूड का बच्चा बाहर;
अंडे में कैद हो, अंबर में,
कभी उडा नहीं करता।
॥२॥
किताबी  ज़ंज़ीर से,
जकड-बंध बंदों को,
दुनिया का खालिस नज़ारा,
दिखलाया नहीं जाता।
॥३॥
अंडे में बंद, जो सदियों से,
उन्हें, किस भाँति समझाएँ ?
अंडे के अंधेरे में बैठ,
सच दिखलाई नहीं देता।
॥४॥
चिराग ले, ढूंढ कर लाओ ,
सारी दुनिया में, प्यारा  देस,
जहाँ सम्मान से जी पाओ,
भारत-सा देस नहीं मिलता।
॥५॥
अण्डा फोड, बाहर आओ,
फिर तर्क दे समझाओ,
अण्डे के अंदर रहने का,
फायदा क्या,  कुछ होता?
॥६॥
बदलते मौसम के साथ,
जो बदला, वही जीता,
डायनासौर का संदेस.
क्या समझ, नहीं आता।
॥७॥
पनडुब्बी में, जीनेवालों,
कभी सूंघो, मधुबन के फूल?
पनडुब्बी डूब जाने पर,
फिर, चेताया नहीं जाता।
॥८॥

No Responses to “कभी अण्डा भी उडता है?”

  1. मानव गर्ग

    उपमाओं से भरी, प्रभावशाली कविता । माननीय मधु जी को बहुत बहुत बधाई !

    भारतवासियों से आह्वान् है – प्रतिदिन अपने जीवन के एक घण्टे की आहुति दें, अपने राष्ट्र् के प्रति । इस एक घण्टे में आप अपनी इच्छा से राष्ट्र के लिए कुछ भी कीजिए । निर्धनों को आवश्यकतानुसार दान दीजिए, राष्ट्र हित सोचने वाले सम्बन्धियों के साथ चर्चा कीजिए, कोई ज्ञानवर्धक पुस्तक य लेख पढिये, अपने विचारों को डायरी में लिखिए, या केवल चुपचाप बैठ कर ध्यान लगाइये, या प्रार्थना कीजिए । शर्त केवल इतनी है, कि इस एक घण्टे आप अपने हित के बारे में न सोच कर केवल राष्ट्रहित के प्रति ही सोचें । (ये विचार मेरे मन में यह कविता पढ कर ही आए हैं ।)

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