अपने व पूर्वजों के कर्मों का फल


डा. राधेश्याम द्विवेदी
संसार के प्रत्येक प्राणी को अपने तथा पूर्वजों के कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। इससे मुक्ति कभी नहीं मिलती है। यह बात और है कि किस कर्म का फल कब मिलता है। जो कर्म ज्यादा होते हैं उसे बाद में तथा जो कम होते है उसे पहले भोगने को मिलता है। वैसे इसका कोई एक ही पैमाना ना होकर परिस्थिति तथा दैवी कृपा से निर्धारण होते देखा या सुना गया है। यदि अच्छे कर्म ज्यादा हैं तो बुरे कर्मों का फल इसी जन्म में तथा अच्छे का फल अगले जन्म में या इसी जन्म के बाद के दिनों में भोगने को मिलता है। यदि बुरे कर्म ज्यादा हैं तो अच्छे कर्मों का फल इसी जन्म में तथा बुरे का फल अगले जन्म में या इसी जन्म के बाद के दिनों में भोगने को मिलता है। अध्यात्म तथा लोकाचार में यह बात कही गई हैं कि “जैसा बीज बोवोगे, वैसा ही फल काटोगे।“ गोस्वामी तुलसी दास ने कहा है “जो जस करहिं तो तस फल चाखा।“ श्रीमद् भगवत गीता में कहा गया है कि मनुष्य अपने कर्मों का फल इसी जन्म में पाता है। इस संसार में रहते हुए फल की चिंता किए बिना कर्म करते जाना ही हर मनुष्य का कर्त्तव्य है। जो अपना कर्म नहीं करता वह पाप का भागीदार होता है।
वास्तविक जीवन में कई बार ऐसा होता है कि मनुष्य के स्वभाव के विपरीत उसे कर्मफल मिलते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि अच्छे लोगों को बार-बार जीवन में बुरी तथा दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का सामना करना पड़ जाता है, जबकि कई दुष्ट मनुष्यों को अनेक बुरे कर्मों के बावजूद भाग्यहीनता का कभी सामना नहीं करना पड़ता। एसे में अगर कर्म के अनुसार फल पाने जैसी बातों का आंकलन करें, तो यह पूरी तरह निराधार मालूम पड़ता है
मनुष्य का वंश उसका पुनर्जन्म :- बच्चे अपने माता-पिता का अंश होते हैं और उन्हीं का दूसरा रूप माने जाते हैं। उनकी सोच और स्थिति के अनुसार बच्चों का जीवन भी प्रभावित होता है, लेकिन इससे भी कहीं बहुत अधिक हर व्यक्ति का भाग्य और दुर्भाग्य भी अपने पारिवारिक कर्मों से जुड़ा होता है। इसलिए संभव है कोई मनुष्य अपने कर्म और स्वभाव में अति नेक दिल हो लेकिन उसकी परिस्थितियां हमेशा उसे चुनौतियों तथा दुखों का सामना कराए। वहीं एसा भी संभव है कि एक अत्यधिक क्रूर व्यक्ति भी अपने भाग्य के बल पर जीवन का हर सुख पाए और हर चीज उसे आसानी से मिल जाए। यह उनसे जुड़े पारिवारिक कर्मों के फल हो सकते हैं। इसलिए अपने साथ दूसरों की परिस्थितियों की तुलना करते हुए दुखी होने की बजाय हमें उसे अपना कर्मफल मानकर चलना चाहिए और ईमानदारी पूर्वक अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए।
पूर्वजों से जुड़ते कर्मफल :– पारिवारिक कर्मों या यूं कहें पूर्वजों के कर्मों से जुड़े लोग कुछ ऐसी घटनाओं या परिस्थितियों से जुड़ सकते हैं जिसका उनके वर्तमान वजूद से शायद ही कोई नाता हो। एसे लोग उन परिस्थितियों के भी जिम्मेदार ठहराए जाते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं। एसा भी संभव है कि हमें उस काम का क्रेडिट भी मिले जिसके लिए हमारा बहुत अधिक योगदान ना हो। अगर कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों के कर्मों से जुड़ा होगा तो जरूरी नहीं कि यह हमेशा उसके लिए नकारात्मक ही होगा, बल्कि कई बार यह उसके लिए अच्छा भी होगा। या तो एसे लोगों को मेहनत से कम आंका जाता है या मेहनत और उम्मीद से अधिक उन्हें मिलता है। ज्यादातर एसे लोगों को परिवार में या तो उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है या उनसे हर किसी की बहुत अधिक उम्मीदें होती हैं। परिणाम यह होता है कि अगर परिवार में कुछ बुरा हुआ और उसके लिए वे जिम्मेदार ना भी हुए, तो भी दोषी ठहराए जाते हैं। यह उनके लिए बेहद दुखी करने वाला या अवसादपूर्ण परिणाम होता है।
इसके ठीक विपरीत एसा भी हो सकता है कि किसी भी प्रकार से परिवार की उन्नति हो या मान-सम्मान मिले और उसे दिलाने में भले ही उस व्यक्ति ने कोई अधिक प्रयास ना किया हो लेकिन परिस्थितियां कुछ एसी होती हैं कि उसका पूरा क्रेडिट उसे ही दे दिया जाता है। एसे लोग त्यागी होते हैं और जीवन में अपने पूर्वजों के आशीर्वाद से आगे बढ़ते हैं। परिवार और उसके हर सदस्य के लिए उनके दिल में एक विशेष मोह होता है। अन्य लोगों की अपेक्षा उनमें परिवार के सदस्यों और परिस्थितियों के लिए अतिरिक्त समझ भी होती है। जिन घटनाओं या समस्याओं का कारण और निदान परिवार के बड़े भी नहीं समझ पाते, उन्हें ये आसानी से समझ लेते हैं।
समभाव में रहने का प्रयास करें :- इसलिए अगर हमारे साथ भी उपर्युक्त परिस्थितियां हैं तो समझें हम भी अपने परिवार के कर्मों से जुड़े हैं। एसे में अगर हमें बेवजह प्रशंसा मिले तो उसपर बहुत अधिक उत्साहित और खुश होने की बजाय अपनी वास्तविकता को याद रखना चाहिए। इसी प्रकार अगर अकारण कुछ बुरा होता है तो दुखी होने की बजाय सत्य को स्वीकर करना चाहिए। जो हो रहा है उसका आंकलन करना चाहिए और अपने दिल की पुकार को ही सुनना चाहिए। चाहें हालात अच्छे हों या बुरे, अपने दिल की आवाज को कभी अनसुना ना करें, यही हम सबको हमेशा सही रास्ता दिखाएगा।
पूर्वजों के गुणों का अनुसरण : – हमें अपने पूर्वजों के गुणों का अनुसरण करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना होता है। परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को न मानकर उसकी कथित पूजा करना अथवा अपात्र को दान देना, एसे कर्म क्रमशः कोई कर्म-फल प्राप्त नहीं कराते, बल्कि पाप का भागी बनाते हैं। परमात्मा जिसे जीवन में कोई विशेष अभ्युदय-अनुग्रह करना चाहता है, उसकी बहुत-सी सुविधाओं को समाप्त कर दिया करता है। पिता सिखाते हैं पैरों पर संतुलन बनाकर व उंगली थाम कर चलना, पर मां सिखाती है सभी के साथ संतुलन बनाकर दुनिया के साथ चलना, तभी वह अलग है, महान है। हमें पढना एक गुना, चिंतन दोगुना, आचरण चैगुना करना चाहिए। परोपकारी, निष्कामी और सत्यवादी यानी निर्भय होकर मन, वचन व कर्म से सत्य का आचरण करने वाले को देव कहा जा सकता है। प्रेम करने का मतलब सम-व्यवहार जरूरी नहीं, बल्कि सम-भाव होना चाहिए जिसके लिए घोड़े की लगाम की भांति व्यवहार में कभी ढील देना पड़ती है और कभी खींचना भी जरूरी हो जाता है।
बाढ़ै पूत पिता के धर्मे :- घाघ तथा लोकाचार में कहा जाता है कि पुत्र पिता के धर्म से फलता-फूलता है और खेती अपने कर्म से अच्छी होती है।
बाढ़ै पूत पिता के धर्मे। खेती उपजै अपने कर्मे।।
पूर्वजों के कर्म भी उनकी संतानों के भाग्य को प्रभावित करते हैं। दशरथ ने श्रवण कुमार को बाण मारा जिसके फलस्वरूप माता-पिता के शाप के कारण पुत्र वियोग से मृत्यु का कर्मफल भोगना पड़ा। किंतु इसका परिणाम तो उनके पुत्रों, पुत्रवधू समेत पूरे राजपरिवार यहां तक कि अयोध्या की प्रजा को भी भोगना पड़ा। भगवान राम भगवान होते हुए भी उस कर्म फल से ना तो स्वयं मुक्त हो सके ना ही अन्य किसी को कर सके। इसी प्रकार बहेलिया के बाण से श्रीकृष्ण का अन्त भी कर्म फल के कारण ही हुआ था।
संगति गुण अनेक फल :- कहा जाता है कि ‘संगति गुण अनेक फल।’ घुन गेहूं की संगति करता है। गेहूं की नियति चक्की में पिसना है। गेहूं से संगति करने के कारण ही घुन को भी चक्की में पिसना पड़ता है। देखा जाता है कि किसी जातक के पीड़ित होने पर उसके संबंधी तथा मित्र भी पीड़ित होते हैं। इस दृष्टि से सज्जनों का संग साथ शुभ फल और अपराधियों दुष्टों का संग साथ अशुभ फल की पूर्व सूचना मिल जाती है। किसी भी अपराधी से संपर्क उसका आतिथ्य या उपहार स्वीकार करना भयंकर दुर्भाग्य विपत्ति को आमंत्रण देना है। अतः यश-अपयश, उचित-अनुचित का हर समय विचार करके ही कोई काम करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं से सुखद-दुखद परिस्थितियां बनती हैं। इन्हीं के अनुसार भविष्य का निर्धारण होता है।

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