आदिवासी कुंभ से क्या हासिल होगा आरएसएस को / संजय द्विवेदी

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आदिवासियों के मूल सवालों को आखिर कौन उठाएगा

मध्यप्रदेश के ईसाई समुदाय एक बार फिर आशंकित है। ये आशंकाएं जायज हैं या नाजायज यह तो नहीं कहा जा सकता किंतु ईसाई संगठनों के नेताओं ने पिछले दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा 10,11,12 फरवरी को मंडला में आयोजित किए जा रहे मां नर्मदा सामाजिक कुंभ को लेकर अपनी आशंकाएं जतायी हैं। इस आयोजन में लगभग 20 लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसके चलते ही वहां के ईसाई समुदाय में भय व्याप्त है। मंडला वह इलाका है जहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है, ईसाई संगठनों को आशंका है इस आयोजन के बहाने संघ परिवार के लोग उनके लोगों को आतंकित कर सकते हैं, या उन्हें पुनः स्वधर्म में वापसी के लिए दबाव बना सकते हैं।जाहिर तौर इससे इस क्षेत्र में एक सामाजिक तनाव फैलने का खतरा जरूर है।

यह भी सवाल काबिलेगौर है कि आखिर इस कुंभ के लिए मंडला का चयन क्यों किया गया। इसके उत्तर बहुत साफ हैं एक तो मंडला आदिवासी बहुल जिला है और इस इलाके धर्मांतरित लोगों की संख्या बहुत है। किंतु ईसाई संगठनों की चिंताओं को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। संघ परिवार ने इस आयोजन के ताकत झोंक दी है किंतु इतने बड़े आयोजन में जहां लगभग २० लाख लोगों के आने की संभावना है आदिवासी समाज के वास्तविक सवालों को संबोधित क्यों नहीं किया जा रहा है, यह एक बड़ा सवाल है। आदिवासियों की जिंदगी का मूल प्रश्न है आज उनकी जमीनों,जंगलों और जड़ों से उनका विस्थापन। इसी के साथ नक्सलवाद की आसुरी समस्या समस्या उनके सामने खड़ी है। इस बाजारवादी समय में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे इस समाज के मूल प्रश्नों सें हटकर आखिर धर्मांतरण जैसे सवालों से हम क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या ही बेहतर होता कि संघ परिवार इस महाआयोजन के बहाने माओवादी आतंकवाद के खिलाफ एक संकल्प पारित करता और जल, जंगल,जमीन से आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ कुछ सार्थक फैसले लेते। किंतु लगता है कि धर्मांतरण जैसे सवालों को उठाने में उसे कुछ ज्यादा ही आनंद आता है।

धर्मान्तरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की कुछ उन प्राथमिक चिंताओं में है जो उसके प्रमुख एजेंडे पर है। यह दुख कहीं-कहीं हिंसक रूप भी ले लेता है, तो कहीं गिरिजनों और आदिवासियों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा का आधार भी देता है। आज ईसाई मिशनरियों की तरह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रेरित वनवासी कल्याण आश्रम और सेवाभारती जैसे संगठनों के कार्यकर्ता आपको आदिवासियों, गिरिजनों एवं वंचितों के बीच कार्य करते दिख जाएंगे ।बात सिर्फ सेवा को लेकर लगी होड़ की होती तो शायद इस पूरे चित्र हिंसा को जगह नहीं मिलती । लेकिन ‘धर्म’ बदलने का जुनून और अपने धर्म बंधुओं की तादाद बढ़ाने की होड़ ने ‘सेवा’ के इन सारे उपक्रमों की व्यर्थता साबित कर दी है। हालांकि ईसाई मिशनों से जुड़े लोग इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी सेवाभावना के साथ जबरिया धर्मान्तरण का लोभ भी जुड़ा है। किंतु विहिप और संघ परिवार इनके तर्कों को खारिज करता है। आज धर्मान्तरण की यह बहस ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ तलवारें भांजी जा रही हैं। और तर्क तथा शब्द अपना महत्व खो चुके हैं। जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर धर्मान्तरण हुआ है मसलन मिजोरम, अरुणाचल, मेंघालय, नागालैंड के ताजा हालात तथा कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्या के नाते उत्पन्न परिस्थितियों ने हिंदू संगठनों को इन बातों के लिए आधार मौजूद कराया है कि धर्म के साथ राष्ट्रांतरण की भी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। जाहिर है यह भयग्रंथि ‘हिंदू मानस’ में एक भय का वातारण बनाती है। इन निष्कर्षों की स्वीवकार्यता का फलितार्थ हम उड़ीसा की ‘दारा सिंह परिघटना’ के रूप में देख चुके हैं। दारा सिंह इसी हिंदूवादी प्रतिवादी प्रतिक्रिया का चरम है।

धर्मान्तरण की यह प्रक्रिया और इसके पूर्वापर पर नजर डालें तो इतिहास के तमाम महापुरुषों ने अपना धर्म बदला था। उस समय लोग अपनी कुछ मान्यताओं, आस्थाओं और मानदंडों के चलते धर्म परिवर्तन किया करते थे। वे किसी धर्म की शरण में जाते थे या किसी नए पंथ या धर्म की स्थापना करते थे। लंबे विमर्शों, बहसों और चिंतन के बाद यथास्थिति को तोड़ने की अनुगूंज इन कदमों में दिखती थी। गौतम बुद्ध, महावीर द्वारा नए मार्गों की तलाश इसी कोशिश का हिस्सा था वहा भी एक विद्रोह था। बाद में यह हस्तक्षेप हमें आर्य समाज, ब्रह्मा समाज, रामकृष्ण मिशन जैसे आंदोलनों में दिखता है। धर्म के परंपरागत ढांचे को तोड़कर कुछ नया जोड़ने और रचने की प्रक्रिया इससे जन्म लेती थी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म स्वीकारना, एक लालच या राजनीति से उपजा फैसला नहीं था। यह एक व्यक्ति के हृदय और धर्म परिवर्तन की घटना है, उसके द्वारा की गई हिंसा के ग्लानि से उपजा फैसला है। बाद के दिनों में बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकारना एक लंबी विचार-प्रक्रिया से उपजा फैसला था। इसी प्रकार केशवचंद्र सेन भी ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे। उदाहरण इस बात के भी मिलते हैं कि शुरुआती दौर के कई ईसाई धर्म प्रचारक ब्रह्माण पुजारी बन गए। कुछ पादरी ब्राह्मण पुजारियों की तरह कहने लगे । इस तरह भारतीय समाज में धर्मातरण का यह लंबा दौर विचारों के बदलाव के कारण होता रहा । सो यह टकराव का कारण नहीं बना । लेकिन सन 1981 में मीनाक्षीपुरम में 300 दलितों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण करने की घटना ने एक बड़ा रूप ले लिए । सामंतों और बड़ी जातियों के अत्याचार से संतप्त जनों की इस प्रतिक्रिया ने कथित हिंदूवादियों के कान खड़े कर दिए। सही अर्थों में मीनाक्षीपुरम की घटना आजाद भारत में धर्मान्तरण की बहस को एक नया रूप देने में सफल रही । इसने न सिर्फ हमारी सड़ांध मारती जाति-व्यवस्था के खिलाफ रोष को अभिव्यक्त दी वरन हिंदू संगठनों के सामने यह चुनौती दी कि यदि धार्मिक-जातीय कट्टरता के माहौल को कम न किया गया तो ऐसे विद्रोह स्थान-स्थान पर खड़े हो सकते हैं। इसी समय के आसपास महाराष्ट्र में करीब 3 लाख दलितों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया । 26 जनवरी 1999 को तेजीपुर (उ.प्र.) में कई दलित काश्तकारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया । लेकिन इन घटनाओं को इसलिए संघ परिवार ने इतना तूल नहीं दिया, क्योंकि वे बौद्धों को अलग नहीं मानते । लेकिन मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मान्तरण की कुछेक घटनाओं ने उन्हें चौकस कर दिया । संघ परिवार ने धर्म बदल चुके आदिवासियों को वापस स्वधर्म में लाने की मुहिम शुरू की, जिसमें दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता आगे आए।

इस सबके साथ ईसाई मिशनों की तरह संघ परिवार ने भी सेवा के काम शुरू किए। इससे बिहार के झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में जमीनी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी । जिसकी परिणति कई प्रदेशों में हिंसक संघर्ष रूप में सामने आई । कुछ समय पहले इसका इस्तेमाल कर पाक प्रेरित आतंकियों ने भी हिंदू-ईसाई वैमनस्य फैलाने के लिए चर्चों में विस्फोट कराए थे। इन तत्वों की पहचान दीनदार अंजमुन के कार्यकर्ताओं के रूप में हो चुकी है। पूर्वाचल के राज्यों में आईएसआई प्रेरित आतंकियों से चर्च के रिश्ते भी प्रकाश में आए हैं। ऐसे एकाध उदाहरण भी देश के सद्भाव व सह अस्तित्व की विरासत को चोट पहुंचाने के लिए काफी होते हैं। जाहिर है ऐसे संवेदनशील प्रश्नों पर नारेबाजियों के बजाए ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में जहां साक्षरता के हालात बदतर हैं, लोग भावनात्मक नारों के प्रभाव में आसानी से आ जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंदू समाज धर्मान्तरण के कारकों एवं कारणों का हल स्वयं में ही खोजे। धर्म परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का बुनियादी हक है। कोई भी व्यक्ति का यह हक उससे ले नहीं सकता, लेकिन इस प्रश्न से पीड़ित जनों को चाहिए कि वे लड़ाई हिंदू समाज में पसरी अमानवीय जाति प्रथा और पाखंडपूर्ण बहुरूपिएपन के खिलाफ शुरू करें। समाज को जोड़ने, उसमें समरसता घोलने का दायित्व बहुसंख्यक समाज और उसके नेतृत्व का दावा करने वालों पर है। सामाजिक विषमता के दानव के खिलाफ यह जंग जितनी तेज होती जाएगी। धर्मान्तरण जैसे प्रश्न जिनके मूल में अपमान ,तिरस्कार, उपेक्षा और शोषण है, स्वतः समाप्त करने के बजाए वंचितों के दुख-दर्द से भी वास्ता जोड़ना जाहिए। इस सवाल पर बहुसंख्यक समाज को सकारात्मक रुख अपनाकर बतौर चुनौती इसे स्वीकारना भी चाहिए। जाहिर है इस लड़ाई को दारा सिंह के तरीके से नहीं जीता जा सकता । इसके दो ही मंत्र हैं सेवा और सद्भाव। २० लाख लोगों को मंडला में जुटाकर आरएसएस अगर आदिवासियों के मूल सवालों पर बात नहीं करता तो अकेले धर्मांतरण का सवाल इस कुंभ को सार्थक तो नहीं बनाएगा।

30 COMMENTS

  1. लेखक महोदय,

    वैसे तो आपने कई तथ्यपूर्ण जानकारिया दी लेकिन इतना तो बता दीजिय, क्या आरक्षण का कोई अंत नहीं है. पिछड़ी जाती कब तक पिछड़ी रहेगी. जिन्होंने आरक्षण के लाभ मिला उन्होंने अपनी जाति के लिए कया किया? ऐसा कोई धरम बताये जिसमे जाति, क्षेत्र के हिसाब से विभाजित नहीं है? आदिवासियों के धरम बदल लेने से क्या उनकी समस्या ख़त्म हो जाति है तो फिर क्यों धरम बदले जाते है जाहिर है पैसे का लालच बीच में आ ही रहे hai

  2. संघ को उपदेश देने वाले बहुत हो गए है की ये करना है ये नहीं करना पर साथ चल कर kaam करने का कहने पर ………………????उअपदेश देने से नहीं कन्धा से कंध मिला कर काम करने से परिवर्तन hoga ,जिसको संघ की नीतिया पसंद नहीं वे खुद अपना अलग से काम खड़ा करने को स्व्तन्त्र्त है कर लो कौन मन करता है???जहा बिना svarth के १०० लोग नहीं जुटते है राजनीतिक पार्टियों के लोग पैसा फेक फेक कर logo को bulate है vaha प्रेम purvak दिए गए निमंत्रण से 10-१५ लाख आदिवासी बंधू आये है ये बात अनेक तथाकथित “दलित” व् “adivasi” कहे जाने वाले बुधिजिवियो को हजम नहीं होती है उनकी दुकान दरी जो खतरे में है पिचले अनेको वर्षो से वो लोग संघ व् हिंदुत्व को “ब्रहाम्न्शाही बता कर kosate रहे bhole भले adivasiyo को व् वंचितों को कभी आरक्षण hataye जाने का कभी brahaman hakumat का कभी शोषण का दर दिखा कर संघ व् हिंदुत्व के खिलाफ योजना बढ़ रूप से उअनके मन में नफ़रत का बिज भरते रहे है लेकिन mera अनुभव है की मात्र एक गिलास पानी पिने से ही साडी की साडी गलतफहमी निकल जाती है फिर इन बुधिजिवियो के हजार भड़काने से भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है प्रेम का मूल्य प्रेम ही चूका सकता है व्यर्थ के तर्क-कुतर्क नहीं ,संघ ने इस प्रेम के बल पर ही सबका ह्रदय जीता है वरना उसके पास देने को सिवास सम्मन्न व् प्रेम के कुछ नहीं है ,जो भी रुखी सुखी मिलेगी वो हम मिल बात कर खा लेंगे किसी लालच की हमको आवश्यकता नहीं है…………..

  3. सर
    इस महांकुभ से आर एस एस को क्या हासिल होगा ये तो पता नहीं…..लेकिन सच तो ये हैं कि सीधे- सादे आदिवासी धर्म परिवर्तन के लिए बड़ी ही आसानी से तैयार भी हो जाते हैं…..

  4. माननीय संपादक महोदय,
    माननीय टिप्पणीकार महोदय मेरे उठाये सवालों को जवाब देंगे, इसकी आशा मुझे नहीं थी । इसलिए जब उन्होंने लिखा कि -श्री रमेश कुमार जी आपने मेरी कुछ बैटन पर आपत्ति की थी और मुझसे प्रमाण मांगे थे हालाँकि मैं इसी कुतर्कपूर्ण बातो के जवाब देना जरूरी नहीं समझता – तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । क्योंकि अगर टिप्पणीकार महोदय के पास उत्तर हो, तभी तो वह जवाब दे सकते हैं । अन्यथा जवाब देना उनकी बस की बात नहीं । जब कोई किसी आधारहीन बातें लिखता है तो वह लिख तो देता है लेकिन उसको प्रमाणित करने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं होता है । अतः वह उन्हें कुतर्कपूर्ण बातें बता कर वहां से बच निकलना चाहता है । इसमें यही हुआ है । हम उनसे जबाव की मांग भी नहीं कर रहे थे ।
    लेकिन जैसा मैने पहले भी कहा है माननीय टिप्पणीकार चर्च व विदेशी शक्तियों के एजेंट है, यह मैं नहीं लिख सकता क्योंकि मेरे पास इसे सिद्ध करने के लिए वर्तमान प्रमाण नहीं है । अगर मैं लिखूं तो मैं बौद्धिक रुप से इमानदार नहीं हूं यह स्पष्ट होगा । साथ ही मेरी विश्वसनीयता भी खत्म होगी । इसलिए मेरा संपादक जी पुनः एक बार आग्रह है कि किसी के भी किसी प्रकार अनर्गल आरोप जिनता आधार न हो, प्रमाण न हो, उसको प्रकाशित करने से पहले एक बार देख लें तो वेबसाईट की विश्वसनीयता बढेगी । अन्यथा यह आधारहीन बातों व किसी के खिलाफ अनर्गल आरोपों को मंच बन जाएगा जो किसी के लिए भी हितकारी नहीं होगा । संपादक जी से यही प्रार्थना है ।
    सधन्यवाद
    रमेश कुमार

  5. श्रीमान धर्म आधारित आरक्षण भी तो असंवैधानिक है लेकिन आप देखते रहिये इसे कैसे संवैधानिक रूप दिया जाता है पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र इसके उदाहरण है
    “यही तो आरएसएस का सबसे बड़ा और खतरनाक खेल है कि पिछड़ों और आरक्षितों को तो कुछ अलग कहा जाता है, जबकि उच्चजातीय लोगों को आर्थिक आरक्षण जैसी असंवैधानिक बातों में उलझाया रखा जाता है, जो असम्भव है।”
    श्रीमान आप तो ऐसे बता रहे है जैसे आरक्षण लागू करने का कार्य संघ के हाथ में हो, पिछली टिप्पणी में मैंने जो कहा है वो संघ के विचार (हालाँकि मैं संघ का कोई प्रवक्ता नहीं हूँ) है अंत में होना तो वही है जो देश की सरकार चाहती है और वही हो रहा है और दुष्प्रभाव हम देख रहे है

  6. श्री रमेश कुमार जी आपने मेरी कुछ बैटन पर आपत्ति की थी और मुझसे प्रमाण मांगे थे हालाँकि मैं इसी कुतर्कपूर्ण बातो के जवाब देना जरूरी नहीं समझता लेकिन आपकी टिप्पणी से अगली टिपण्णी में ही आर एस एस के कार्य करता श्री शैलेन्द्र कुमार जी ने स्वीकार कर लिया है की-

    “जहाँ तक आरक्षण का सवाल है संघ ने हमेशा कहा है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए लेकिन अगर देना भी पड़े तो उसका आधार आर्थिक होना चाहिए न कि जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई या लैंगिक क्योंकि आरक्षण के जितने प्रकार होंगे समाज उतना ही बटेगा……”

    ये अलग बात है की श्री शैलेन्द्र कुमार जी जैसों को इस बात का ज्ञान ही नहीं है की हमारे संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने को स्वीकृति ही नहीं है और इन्हें (श्री शैलेन्द्र कुमार जी) यह भी ज्ञान नहीं है कि आरक्षण क्‍यों एवं किसे दिया जाता है। यही तो आरएसएस का सबसे बड़ा और खतरनाक खेल है कि पिछड़ों और आरक्षितों को तो कुछ अलग कहा जाता है, जबकि उच्चजातीय लोगों को आर्थिक आरक्षण जैसी असंवैधानिक बातों में उलझाया रखा जाता है, जो असम्भव है।

  7. कोई भी कौम, जाति या धर्म राष्ट्र से बड़ा नहीं होता और संघ हो या कोई और जब तक आम लोगों के मुद्दे पर संघर्ष कि बात नहीं करता इस तरह के आयोजन बेमानी हो जाते हैं. स्वतंत्र लोकतंत्र में लोगों को अपना विचार और अपनी पार्टी ही नहीं अपना धर्म चुनने का भी अधिकार है. आज के दिनों में जब आम लोगों के आगे जीने मारने के मुद्दे की भरमार है तो धर्म का मुद्दा उठा कर

    एक बार फिर बेहतरीन आलेख के लिए संजय जी को साधुवाद.

  8. कोई भी कौम, जाति या धर्म राष्ट्र से बड़ा नहीं होता और संघ हो या कोई और जब तक आम लोगों के मुद्दे पर संघर्ष कि बात नहीं करता इस तरह के आयोजन बेमानी हो जाते हैं. स्वतंत्र लोकतंत्र में लोगों को अपना विचार और अपनी पार्टी ही नहीं अपना धर्म चुनने का भी अधिकार है. आज के दिनों में जब आम लोगों के आगे जीने मारने के मुद्दे की भरमार है तो धर्म का मुद्दा उठा कर एक बार फिर संघ अपनी असलियत साबित करेगा.

    एक बार फिर बेहतरीन आलेख के लिए संजय जी को साधुवाद.

  9. संजय जी आपने इस लेख के जरिय एक बेहद संवेदनपूर्ण मुद्दे पर कलम चलाई हें लेकिन जब सत्ता पाना और वह भी किसी भी कीमत पर तो ऐसा ही करना जरुरी होता आया हें हर मोर्चा पर भ्रटाचार से घिरी कांग्रेस को हटाना बीजेपी जैसी पार्टी के लिए ज्यादा कठिन काम नहीं हें लेकिन कुम्भ जैसे आयोजन ज्यादा सरल रस्ते बन जाते हें अडवाणी जी की पुरानी रथ यात्रा इसका बेहतरीन उदाहरण कहा जा सकता हें लेख में आपने जो कुछ बताने का सफल उपक्रम किया हें उसे देश के लोगो को अच्छी तरह समझाना होगा तभी लोकतंत्र मजबूत होगा

  10. धर्मपरिवर्तन का सवाल किसी के मन में क्यों उठता है इस बात को समझना तथा उन्हें दूर करना जरुरी है। एक साधारण सा आदमी अपना धर्म बदल लेता है। कुछ मामलों में इसे जबरदस्ती परिवर्तन माना जा सकता है कुछ में लालच को लेकिन सभी मामलों में ऐसा ही होता है यह सही नहीं है।
    हमारे देष के नेताओं को किसी के दुःख दर्द की कोई परवाह नहीं है परवाह है तो केवल इस बात की कि हमारी राजनीति कैसे चलती रहे, हम समाचार में कैसे बने रहें। यह सही है कि देष में अब केवल धर्म परिवर्तन ही नहीं राष्ट्र परिवर्तन की बात भी चल रही है। केवल झण्डा फहरा देने से कोई भारत का अंग बन जाएगा तो इसे माना नहीं जा सकता है। कष्मीर के लोगों की क्या समस्या है उसे समझना तथा उस अनुसार उनकी परेषानियों को दूर करने की कोषिष होनी चाहिए। ‘‘राष्ट्रीय एकता यात्रा’’ में जितने लोगों ने भाग लिया में उस पर कोई सवाल न उठाते हुए केवल इतना कहना चाहता हूं कि वही लोग इस बात को वहां जाकर बिना किसी हो हल्ला किए वहां के लोगों के परेषानियों को समझें और इस पर विचार करें इसे कैसे दूर किया जा सकता है।
    भाजपा या आरएसएस को धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए अगर कुछ करना है तो उसके लिए महाकुंभ का आयोजन करने की कोई आवष्यकता नहीं है। धर्म परिवर्तन करने वालों के मनोभावों को समझे तथा उनकी समस्याओं को दूर करने की कोषिष करें। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कोई भी साधारण मनुष्य सामान्य परिस्थितियों में अपना धर्म बदलना पसंद नहीं करता है। जहां तक मुझे लगता है धर्म परिवर्तन से पहले लोग को अपने भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में बहुत सोचना-विचारना पड़ता है।
    आपका लेख बहुत अच्छा है। सवाल उठाना जरुरी है समाधान नहीं। सवाल अपना समाधान खुद तलाष लेगा।
    उमेष कुमार
    एम.फिल मीडिया अध्ययन
    एमसीआरपीवीवी भोपाल।

  11. संजय जिया,
    आपने एक गंभीर लेख लिखा है.आपके लेख में भारत की शिक्षा प्रणाली की दुर्दशा वर्णित हो रही है..हमारे देश के लोगो का शिक्षित और आत्मनिर्भर होना बहुत जरुरी है..

  12. @पुरुषोत्तम लाल मीणा जी
    संघ सुझावों को हमेशा स्वीकार करता है लेकिन उस पर अमल परिस्थितिनुसार ही कर सकता है इसलिए ये न सोचे की मैं सुझाव देने का विरोध कर रहा हूँ बल्कि विरोध इस बात का है कि आपके सुझावों को संघ अगर कहीं नहीं ला पा रहा है तो उसपर आपकी नाराजगी नाजायज है क्योंकि उसकी अपनी कुछ प्राथमिकताएँ है
    और आपने लिखा है कि
    “जहाँ तक संघ के संख्याबल का सवाल है साढ़े पांच हजार साल से देश कि ९० फीसदी आवादी को जिस विचारधारा के लोगों ने गुलाम बना कर रखा था, उन्हीं लोगों के हाथ में संघ कि कमान है. जो वर्तमान में देश के ९८ फीसदी लोगों के दुश्मन हैं. आज नहीं तो कल लोगों के ये बात समझ में आ जायेगी तब देखना संघ का क्या होगा.”
    आप किस दुनिया में जी रहे है मीणा जी जैसे जैसे विकास हो रहा है संघ भी बढ़ रहा है लोगो को बात समझ आ रही है, मैं स्वयं एक अति पिछड़ा वर्ग से आता हूँ और संघ और संघकार्यों का प्रबल समर्थक हूँ आपके अनुसार १९२५ में जब संघ का जन्म हुआ तभी देश के सभी उच्चजाति के लोगो को उसका सदस्य बन जाना चाहिए था आप को मैं ये बता दूं संघ कभी सच्चाइयों से भागता नहीं उसने वस्तुस्थिति को स्वीकार किया है उसके लिए आपको एक लिंक देता हूँ
    https://www.youtube.com/user/RSSOwner#p/u/3/KXJ359StT-०
    इसे जरूर देखिएगा आपने और भी कई आरोप लगाये है आप एक बात नहीं समझते कि संघ ने जहाँ भी मुस्लिम, ईसाईयों के विरुद्ध कुछ कहा है वो अनावश्यक नहीं है आज ही जब चीजे इतनी विपरीत नहीं है और जबकि इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है तब भी स्वयंसेवकों को भारी विरोध और हिंसा झेलना पड़ता है तो सोचिये जब ये समस्याए विकराल रूप ले लेंगी तो क्या होगा उदाहरण के लए कश्मीर, केरल और पूर्वोत्तर
    संघ देश कि आजादी के बाद से आज तक आम मुसलमानों या ईसाईयों का कभी विरोधी नहीं रहा लेकिन उसने जो विषय उठाये उसमे से कुछ को सांप्रदायिक रूप दे दिया गया जबकि ये सभी राष्ट्रीय मुद्दे थे तात्कालिक छोटे से लाभ के लिए बड़ी हानि राष्ट्र नहीं उठा सकता
    और जहाँ तक आरक्षण का सवाल है संघ ने हमेशा कहा है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए लेकिन अगर देना भी पड़े तो उसका आधार आर्थिक होना चाहिए न कि जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई या लैंगिक क्योंकि आरक्षण के जितने प्रकार होंगे समाज उतना ही बटेगा अब दिक्कत ये है कि हमें आपका विज्ञानं सहीं नहीं लगता और आपको हमारा, तो फिलहाल आपने आपने अनुसार आरक्षण लगा कर देख लिया गुर्जर और जाट आन्दोलन हमारे सामने है जिस भारतीय समाज को आप जोड़ने कि बात कर रहे है कुछ समय इन्तेजार करियें देखिएगा कैसे मौजूदा आरक्षण प्रणाली देश को तहस नहस कर देगी

  13. टिप्पणीकार महोदय के लिखे हुए शब्दों का यहां पर मैं विरोध जताना चाहता हूं ।

    कब संघ ने दलित आदिवासियों का संरॐण समाप्त करना चाहा । टिप्पणीकार महोदय क्या इसकी पुष्टि के लिए कोई प्रस्ताव या फिर किसी के बयान को उद्धृत करने की कृपा करेंगे ।

    संघ स्त्रियों को आरक्षण नहीं देना चाहता । यह भी उन्हें कहां से मिला । क्या उन्हें कहीं से सपना आया जिसमें संघ के किसी अधिकारी ने उन्हें यह बताया ।

    दुःख है कि अब तो आतंकवादी घटनाओं में भी लिप्त है. । यह जानकारी उन्हें कहां से मिली । किस न्यायालय ने यह बात कही है । उसका ब्योरा अगर टिप्पणीकार महोदय प्रदान करेंगे तो कृपा होगी । अगर कोई व्यक्ति बिना किसी प्रमाण के टिप्पणीकार को चर्च व विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों का एजेंट बताये तो क्या यह उचित होगा . यह सरासर गलत होगा । इसलिए टिप्पणीकार को कोई भी बात सार्वजनिक मंच पर कहने से पूर्व प्रमाण प्रदान करने चाहिए ताकि उनकी विश्वसनीयता बची रहेगी ।.
    ये क्या लिखा हुआ है । इसका आधार क्या है ।

    सबको अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है लेकिन आधारहीन आरोप लगाने की इजाजत किसी को नहीं दी जानी चाहिए । ।
    मेरा माननीय संपादक जी से विनम्र अनुरोध है कि वह इस तरह के निराधार आरोपों को प्रकाशित करने से पहले सच्चाई को जांच कर प्रकाशित करें । अन्यथा इससे प्रवक्ता की विश्वसनीयता ही गिरेगी ।
    लेखक महोदय से मुझे कोई शिकायत नहीं है । क्योंकि उनका काम ही यही है । वैसे कहने को वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा है लेकिन किसी भी विषय को खींच कर संघ को लपेट लेते हैं । ये मैने कई बार देखा है । तो इसलिए लेखक महोदय से कोई शिकायत नहीं है । मेरा आग्रह सिर्फ संपादक महोदय से है कि कुछ भी पब्लिश करने से पूर्व उसे एक बार देख लें । अन्यथा वेबसाईट की विश्वसनीयता प्रभावित होगी ।

    सधन्यवाद

    रमेश कुमार

  14. श्री शैलेन्द्र कुमार जी लिखते हैं कि-

    “मुझे एक बात कभी नहीं समझ नहीं आती की सभी विद्वान लोग संघ को ये समझाने में लगे रहते है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए आज जबकि यही लोग कहते है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रूचि के अनुसार काम करना चाहिए तो संघ क्यों दूसरों कि रूचि के अनुसार काम करे

    दूसरी बात आज संघ दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है तो क्या इसमें सदस्यों कि भर्ती ताकत के बल पर होती है इस बात से इसके विरोधी भी सहमत होंगे कि ऐसा नहीं है तो क्या सभी उच्च जातियों के संख्या बल पर ही ये एक विश्वव्यापी और विशाल संगठन है अगर नहीं तो क्या वजह है कि देश के सभी क्षेत्र-धर्म-जाति-वर्ग के लोग इससे जुड़ते है”

    आपकी बात आपके तर्क की कसौटी पर खरी प्रतीत होने कि परीतीति करती है, लेकिन सबसे बड़ा हिन्दू संगठन होने के कारण संघ की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है.

    संघ यदि सर्वाधिक संख्याबल को इंसाफ की लडाई में सकारात्मक रूप से उपयोग करे तो भारत के लोगों की तस्वीर बदल सकती है, तकलीफ ये है कि संघ कहता कुछ है और करता कुछ है.

    कहने को संघ संस्कृतिक संगठन है, लेकिन भाजपा को चलाता है.

    दलित, आदिवासियों, पिछड़ों का आरक्षण समाप्त करवाना चाहता है.

    स्त्रियों को आरक्षण नहीं देना चाहता.

    मुस्लिमों, ईसाईयों, बोध्दों के विरुध्द वातावरण बनाकर देश के माहोल को ख़राब करता है.

    दुःख है कि अब तो आतंकवादी घटनाओं में भी लिप्त है.

    हिन्दुओं को आपस में लड़ा रहा है.

    संघ भारतीयों की नहीं बल्कि इंडियन के हितों का चिन्तक है.

    ऐसे में हर भारतीय को इस बारे सोचना होगा कि संघ सही दिशा में काम करे और देश के माहोल को ख़राब नहीं करे.

    अंत में ये भी लिखना जरूरी है के संघ या भाजपा के साथ देश का बहुमत नहीं है. अन्यथा इनका देश पर शासन होता.

    जहाँ तक संघ के संख्याबल का सवाल है साढ़े पांच हजार साल से देश कि ९० फीसदी आवादी को जिस विचारधारा के लोगों ने गुलाम बना कर रखा था, उन्हीं लोगों के हाथ में संघ कि कमान है. जो वर्तमान में देश के ९८ फीसदी लोगों के दुश्मन हैं. आज नहीं तो कल लोगों के ये बात समझ में आ जायेगी तब देखना संघ का क्या होगा.

    इसलिए बेहतर होगा कि संघ लोगों को लड़ाना बंद करे और लोगों को जीने दे.

  15. मुझे लगता है कि कोई भी संगठन राष्ट्र से बड़ा नहीं होता।जब देश बचेगा तभी देश से जुड़े सवाल बचेंगें। इस समय हमारे गणतंत्र के सामने सबसे बड़ा खतरा माओवादी आतंकवाद है।जिसकी जड़ें गहरी होती जा रही हैं। देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी इस खतरे को महसूस कर रहे हैं। किंतु इसे खत्म करने के ईमानदार प्रयास नहीं हो रहे हैं। एक विचारधारा पर पोषित यह आतंकवाद मुझे लगता है कि धर्मांतरण जैसी बीमारी से बड़ी समस्या है। मैने सिर्फ सुझाव दिया है कि नर्मदा कुंभ का उपयोग अगर माओवाद से संधर्ष और आदिवासियों के मूल प्रश्नों से मुठभेड़ के लिए होता तो ज्यादा उपयोगी रहता। आज देश के आठ प्रतिशत आदिवासी किस तरह सत्ता, कारपोरेट और माओवादियों के त्रिकोणीय संर्धष से जूझ रहे हैं यह कहने की बात नहीं हैं। उनका अस्तित्व दांव पर है। भारत के सबसे अच्छे मनुष्य और निर्दोष मनुष्यों को मिटाने में माओवाद लगा है, मैं इस खतरे के खिलाफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। इस पीड़ा को थोड़ा बहुत छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ही महसूस करते हैं। बाकी राजनीतिक दलों और नेताओं को भी इस संकट पर ध्यान देना होगा। माओवादी आतंकवाद के नाते हमारा गणतंत्र और हमारे सबसे लोग निर्दोष, निष्पाप, निर्मल ह्दय आदिवासियों को खत्म करने की किसी भी साजिश के खिलाफ मैं खड़ा हूं ,खड़ा रहूंगा।

  16. मुझे एक बात कभी नहीं समझ नहीं आती की सभी विद्वान लोग संघ को ये समझाने में लगे रहते है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए आज जबकि यही लोग कहते है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रूचि के अनुसार काम करना चाहिए तो संघ क्यों दूसरों कि रूचि के अनुसार काम करे
    दूसरी बात आज संघ दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है तो क्या इसमें सदस्यों कि भर्ती ताकत के बल पर होती है इस बात से इसके विरोधी भी सहमत होंगे कि ऐसा नहीं है तो क्या सभी उच्च जातियों के संख्या बल पर ही ये एक विश्वव्यापी और विशाल संगठन है अगर नहीं तो क्या वजह है कि देश के सभी क्षेत्र-धर्म-जाति-वर्ग के लोग इससे जुड़ते है
    @पुरुषोत्तम लाल मीणा जी
    “मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में हिन्दू धर्म से ईसाई धर्म अपनाने वालों की संख्या काफी है, जिनमें से किसी ने भी एकान्त के क्षणों में भी नहीं स्वीकारा कि धर्म बदलने के लिये उनसे किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती की गयी या उन्हें बहला-फुसलाकर धर्म परिवर्तन करने के लिये बाध्य किया गया हो।”
    मैं आपसे कहता हूँ कि जरा संघ के किसी कार्यकर्ता को पकड़ लीजिये और उससे पूछिए कि क्या उसे संघ में जोर जबरदस्ती से या बहला फुसला कर शामिल किया गया वो स्वयं संघ तक पंहुचा या संघ उस तक आपको ये जानकारी होगी ही कि संघ के ९९% कार्यकर्ता स्वयं संघ तक पहुचे लेकिन चर्च के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता
    जहाँ तक आदिवासी कुम्भ का सवाल है संघ की अपनी प्राथमिकताएं है अगर आप अपने हिसाब से काम करना चाहते है तो आप को किसी ने रोका नहीं है मैं आपसे पूछता हूँ क्यों आप संघ विचारों के अनुसार कार्य नहीं करते और अगर आप को संघ के कार्य सहीं नहीं लगते तो क्यों संघ को आपके कार्य सही लगने चाहिए
    मैं भी करीब २० वर्ष पहले संघ का स्वयंसेवक रहा हूँ और आज भी उसके सेवा कार्यों, त्याग और समर्पण की भावना का कायल हूँ मैं संघ समर्थक हूँ तो आपकी नज़रों में एक आतंकवादी हूँ एक बात याद रखिये मुझे और संघ को भी राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र आपसे नहीं लेना है
    हाँ एक और बात अगर आप संघ के नजरियें से परिस्थितियों को देखना चाहते है तो आदिवासी कुम्भ में आप सादर आमंत्रित है

  17. क्या संघ सुन रहा है?
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीनदिवसीय आयोजन नर्मदा सामाजिक कुंभ में शामिल होने के लिए मंडला में 20 लाख लोगों के आने की संभावना है। प्रशासन के सामने पहली चुनौती यही है कि इस बड़े जनसमूह के लिए सभी आवश्यक उपाय करे वरना इस आयोजन से जिस तरह का सामाजिक तनाव फैलने के खतरे की आशंका व्यक्त की गई है उसे नजरअंदाज करना सरकार के लिए मंहगा साबित हो सकता है। दूसरा और महत्वपूर्ण सवाल जो उठाया गया है कि संघ परिवार को धर्मांतरण जैसे सवालों से हटकर माओवादी आतंकवाद और आदिवासियों के सवालों पर कुछ सार्थक पहल करनी चाहिए, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। साथ ही धर्मांतरण के लिए प्रेरित करने वाले स्थितियों पर विचार करना होगा कि आखिर वे कौन सी वजहें हैं जिनकी वजह से धर्मांतरण पर लोग मजबूर होते हैं या इसके लिए प्रेरित होते हैं। यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। क्या संघ इसे सुन रहा है?

  18. द्विवेदी जी धर्म ,संस्कृती हमारी शक्ति है ! जिसे धर्म संस्कृती को सोफ्ट पॉवर आज दुनिया में कहा जाता है . अमेरिका आज राज कर रहा है . पहले अपनी संस्कृति
    थोपी फिर उताप्द(प्रोडक्ट).आप इंग्लिश म्यूजिक सुनीऐ गा तो कोंके कोला जरूर पीजिएगा .चर्च जयेइगा तो उनके जैसे होने की कोसिस कीजिएगा.और उनेक कंपनियो का प्रोडक्ट का उपभोग कीजिएगा. इसतरह अमेरिकल को आर्थिक रूप से मजबूत बनैग . अज गया में जापान और अन्य जगहों से bhaudhist आते है जिससे गया(बिहार) को आर्थिक लाभ होता है. मिलिटरी से भी बढ़ कर संस्कृति मजबूत हथियार है.

  19. ईसाई मीसनेरी और इस्लाम भारत को हिन्दू रहित करना चाह रही है. यह एक विदेशी साजिस है जरा देखें पाकिस्तान में जहाँ मुस्लिम ज्यादा है वहां हिन्दुवों की क्या दुर्दशा है. और संजय द्विवेदी जी जैसा विद्वान यदि इस बात को न समझें तो इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा.
    संघ हमेसा दलितों के साथ समान ब्यवहार करता है संघ में जाती सूचक शब्द नहीं है संघ में छुवाछुत नहीं है.

  20. संजय जी, आर एस एस द्वारा मध्य प्रदेश में आयोजित होने वाले ‘आदिवासी कुम्भ’ पर लिखे गए इस आलेख के लिए धन्यवाद.

    संजय जी, सच तो यही है कि – धर्म के नाम पर दलितों, दमितों, आदिवासिओं को कमजोर बनाये रखकर अपना गुलाम बनाये रखना और उनको विकास की राह से दूर बनाये रखना ही इस “आर एस एस” का मुख्य मकसद बना हुआ है और शायद यही इसका असली ‘हिन्दुत्ववाद’ भी है. तभी तो जब कभी भी इन कट्टरपंथी व भगवाधारी हिन्दुत्व-वादिओं के समर्थकों द्वारा दलितों और दमितों पर अत्याचार किये जाते है, तो तब इन सभी हिन्दुत्व-वादिओं की आत्माएं ‘मृत’ समान बनी नज़र आती है. वही, यदि एक दलित हिन्दू और एक मुस्लिम व्यक्ति के बीच में कोई आपसी विवाद भी हो जाता है, तो इनका समूचा ही ‘हिन्दुत्ववाद’ खतरे में आ जाता है ! दलितों के सरकारी सेवाओं में बने हुए ‘पदोनत्ति आरक्षण’ को खत्म कराये जाने के लिए राजस्थान में इन्ही हिन्दुत्व-वादियों के संरक्षण और सहयोग से “मिशन ७२” चलाया हुआ है, जिसमे न्याय पालिका भी अघोषित रूप में इनकी सहयोगी ही बनी हुई है.

    ऐसे हालातों में, अब यह स्पष्ट ही होता जा रहा है कि – अब इस भारत देश में न केवल मुस्लिम और इसाई ही, बल्कि दलित और दमित भी इन्ही भगवाधारी आतंकियों और हिन्दुत्व-वादिओं के निशाने पर बन चुके है – जिन पर आर एस एस का हाथ बना हुआ है. लेकिन यह ‘हाथ’ इस सफाई के साथ बना हुआ है कि जिसे सिर्फ ‘हवा’ की माफिक ही ‘महसूस’ किया जा सकता है, ‘देखा’ नहीं जा सकता. इसीलिए, आज तक भी हमारे इस भारत देश में जितने भी साम्प्रदायिकतावादी फसाद हुए है, उनमे आर एस एस के इस सफाई भरे ‘हाथ’ को साबित नहीं किया जा सका है, लेकिन यह ‘हाथ’ महसूस जरुर हुआ है. आज भी यही हो रहा है, जिसका ताजा प्रमाण राजस्थान में चल रहा “मिशन ७२” और मध्य प्रदेश में आयोजित होने वाला “आदिवासी कुम्भ” है.

    वैसे, केंद्र या प्रदेशों में सरकारें कांग्रेस की हो या भाजपा की हो या किसी भी अन्य दल की हो, सबके लिए दलित, आदिवासी, दमित, मुस्लिम और इसाई केवल मात्र ‘वोट-बैंक’ है – जो ‘डिस्पोसल आएटम’ की माफिक है, जिन्हें चुनाव के समय उपयोग करो और भूल जाओं. फिर इन दलों की सोच भी ‘कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी’ ही है, यह भी अब साफ होता जा रहा है. इसलिए- अब देश के दमितों और दलितों को तथा मुस्लिमों और इसाइयों को एक साथ मिलकर ही इन देशद्रोही ताकतों से निपटना होगा, यह लगभग तय हो चूका है – बस, अब समय का ही इंतजार है जो कभी भी आ सकता है. जब, धर्म के नाम पर अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये तो हिफाजत तो करनी ही होगी.

    संजय जी, आपको इस आलेख के लिए फिर से धन्यवाद. जिसको पढ़कर हमें भी उस सच को उजागर करने का अवसर मिला, जिसे कहने में भी हिम्मत करनी होती है.

    – जीनगर दुर्गा शंकर गहलोत, मकबरा बाज़ार, कोटा – ३२४ ००६ (राज.) ; मो. ०९८८७२-३२७८६

  21. श्री संजय द्विवेदी जी का आलेख निश्चय ही सराहनीय है, लेकिन श्री सुनील अमर की टिप्पणी अधिक गहराई लिये हुए और आदिवासियों के हालातों के करीब से होकर गुजरती प्रतीत होती हैं, वहीं श्री विजय सोनी जी की टिप्पणी संघ के असली चरित्र को प्रकट करने वाली है।

    हम सभी जानते हैं कि संघ का असल मकसद क्या है? उसी मकसद को पूरा करने के लिये संघ धर्म के उन्माद की आग का धधकाता रहता है। जिसके कारण संघ के लोग अब आतंकवादी कुकृत्यों तक में शामिल हो रहे हैं।

    मैं 1990 से 2002 तक मध्य प्रदेश में रहा हूँ और अनेक जिलों के अनेक गॉंवों में बार-बार गया हूँ। धर्म परिवर्तित कर चुके, धर्म परिवर्तन करने को आतुर और धर्म परिवर्तन की ओर देख रहे आदिवासी परिवारों के बीच रहा हूँ।

    मैं व्यक्तिगत रूप से हिन्दू धर्म को छोड़कर किसी भी धर्म को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हूँ। इसलिये मैं धर्म परिवर्तन को किसी भी कीमत पर जायज ठहराने के लिये प्रयास नहीं कर सकता, यद्यपि धर्म, आस्था और अपने विश्वास बदलने के लोगों के मूल अधिकारों की रक्षा का मैं सदैव से समर्थक रहा हूँ। जिसमें रोड़ा अटकाने वालों को देश, धर्म और संविधान का विरोधी मानता हँ, जिसमें सबसे पहला नाम संघ का है।

    मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में हिन्दू धर्म से ईसाई धर्म अपनाने वालों की संख्या काफी है, जिनमें से किसी ने भी एकान्त के क्षणों में भी नहीं स्वीकारा कि धर्म बदलने के लिये उनसे किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती की गयी या उन्हें बहला-फुसलाकर धर्म परिवर्तन करने के लिये बाध्य किया गया हो।

    झाबुआ में संघ के अनेकानेक संघ के लोग सेवा के नाम पर कार्यरत हैं, जिनमें से अनेकों की आदिवासियों द्वारा जमकर पिटाई की जाती रहती है, जिसकी पिटाई होती है, वह व्यक्ति वहॉं से हमेशा को गायब हो जाता है। पड़ताल करने पर पता चला कि पिटाई का कारण आदिवासी लड़कियों के साथ अश्लील हरकतें करना है!

    श्री सुनील अमर जी ने सही लिखा है कि आदिवासियों की मूल समस्या तो जीवन संग्राम में टिके रहने की है। श्री सुनील जी इस देश के हिन्दुओं का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक ढॉंचा आज भी धर्म और जाति पर आधारित है। जिसे संघ बदलने के पक्ष में नहीं है। यही नहीं, हिन्दू धर्म को मनुस्मृति के अनुसार चलाना चाहता है।

    आज मनुस्मृति की मानसिकता के शक्तिसम्पन्न हिन्दू ही आदिवासियों की धर्म-परिवर्तन की असली वजह हैं। जो हर क्षेत्र में सत्ता पर काबिज हैं, यहॉं तक कि न्यायपालिका में भी हैं, जो चाहते ही नहीं कि दबे-कुचले लोगों को न्याय, बराबरी, सम्मान और हक मिलें! ऐसे में हिन्दू एकता और हिन्दुत्व के नाम पर मजबूत भारत की बात करना केवल राजनैतिक मकसद है, जिसे धर्म की चासनी में लपेटकर संघ देश के लोगों को पिलाने का आपराधिक प्रयास करता रहता है।

    आज भारत को भ्रष्टाचार जैसी महामारी से एकजुट होकर लड़ने की जरूरत है, लेकिन संघ की ओर से इस बारे में कुछ भी नहीं करके भाजपा के लिये काम किया जा रहा है।

  22. हिन्दू समाज अपनी संस्कृति और मान्यताओं के बल पर जीता है ,नर्बदा कुम्भ इसी लिए मंडला में आयोजित है ,संघ अपने धर्म कर्म और संस्कारों के कारण दुनिया में सबसे बड़ा मानवीय संगठन है ,समय समय पर अनेक प्रकार के लांछन लगा कर इसे बदनाम करने का असफल प्रयास किया जाता है,यहाँ तक की कई आतंकवादी संगठनो से इसकी बेमेल तुलना तक कर दी जाती है ,इसी प्रकार के ओछी मानसिकता के लोगों को ये समझाना और बताना ज़रूरी है की संघ के बारे में बोलने से पहले इसके अन्दर आना ज़रूरी है इसे जानना ज़रूरी है ,जहाँ तक अनेक ज्वलंत मानवीय समस्याओं का सवाल है तो संघ कभी भी इसके निराकरण के लिए पीछे नहीं हटा है और ना कभी हटेगा इसलिए आप सभी आमंत्रित हैं माँ नर्बदा में आयोजित कुम्भ में सभी आमंत्रित हैं …..विजय सोनी अधिवक्ता दुर्ग

  23. संघ एक वैचारिक संगठन है जिसके अपने मुद्दे हैं . इसलिए उससे महंगाई और बाकी मुद्दे पर सक्रियता की आशा करना ठीक भी नहीं। जहाँ तक सवाल धर्मांतरण का है, तो यह कितनी बड़ी समस्या है, इसका अंदाजा उत्तर पूर्वी राज्यों में उठ रही विभाजनकारी मांगों से लगाया जा सकता है। भारत का बँटवारा, कश्मीर समस्या आदि इसी की उपज हैं।

  24. धर्म-परिवर्तन और वह भी खाली पेट का ! इससे बड़ा प्रहसन और क्या हो सकता है भला?
    प्रिय संपादक जी ,
    संजय दिवेदी जी का लेख पढ़ा, बल्कि दो बार पढ़ा! बहुत करीने से , बहुत विस्तार से और बहुत सिलसिलेवार व्याख्या की है उन्होंने धर्म-परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर. वर्तमान से होते हुए अतीत तक जाकर उन्होंने यह बताया है कि धर्म कैसे एक निहायत व्यक्तिगत मामला है और कैसे प्रजा से लेकर राजाओं तक ने अपनी मर्जी और पसंद के मुताबिक धर्म-परिवर्तन किया है! अच्छा लगा!
    लेख जब पढ़ना शुरू किया तो लगा था कि आदिवासियों पर संघ द्वारा किये जा रहे तमाम कार्यक्रमों को लेकर एक आदिवासी-बहुल इलाके में जो कुम्भ सरीखा आयोजन होने जा रहा है, जरुर ही उसमें उन्ही को केन्द्रीय तत्व के तौर पर रखा गया होगा . लेख का शीर्षक भी यह बताता लग रहा था कि अवश्य ही इसमें आदिवासियों की मूलभूत समस्याओं पर चर्चा होगी, लेकिन यह चर्चा -जल, जंगल, जमीन जैसी संज्ञाओं से आगे नहीं गयी! मैं बहुत आशान्वित था कि तथाकथित विकास के नाम पर आदिवासियों का जिस तरह उच्छेदन किया जा रहा है, और जिस वजह से वे नक्सालियों से सहानुभूति रखने को विवश हैं , उस पर भी रौशनी जरुर डाली गयी होगी, लेकिन निराश ही हुआ! यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ कि आदिवासियों की समस्याएँ सिर्फ जल-जंगल-जमीन तक ही सीमित नहीं हैं. उनके साथ भी उसी तरह का दोहरा अत्याचार हो रहा है, जैसा कि जम्मू-कश्मीर के निवासियों के साथ आतंकवादी और सेना के जवान कर रहे हैं !संपादक जी , मैं संजय जी से कहना चाहता हूँ कि आदिवासियों का मूल सवाल धर्म-परिवर्तन है ही नहीं ! धर्म रोटी से बढ़कर नहीं हो सकता ! रोटी के बाद ही धर्म का नंबर आता है! और आदिवासियों की मूल समस्या तो Survival यानि जीवन-संग्राम में टिके रहने की है !
    क्या ही अच्छा होता, अगर इस मौके पर इन्ही मूल समस्याओं को लेकर एक Eye -Opener मार्का लेख लिखा गया होता, जो हो सकता है कि महा-कुम्भ में कुछ लोगों की निगाह से जरुर गुज़रता और अपना काम कर जाता!
    मैं संजय जी की कई बातों से बहुत संजीदगी से सहमत हूँ, जैसे इस लेख का अंतिम पैराग्राफ ! वास्तव में इस लेख का उपसंहार ही इसका समूचा धड़ बन गया है! संजय जी अगर अन्यथा न लें तो मैं आग्रह करना चाहता हूँ कि वे, जब भी समय और सहूलियत पायें, इस पैराग्राफ को अपनी लेखनी चलाकर जरा बड़ा फलक दें तो हम लोग उस पर नए सिरे से बहस शुरू करें!
    धर्म-परिवर्तन और वह भी खाली पेट का ! इससे बड़ा प्रहसन और क्या हो सकता है भला? यह दूसरे धर्म के प्रति ललक नहीं बल्कि एक सड़े धर्म से उपजी जुगुप्सा पर प्रतिक्रिया और कहीं रोटी मिल जाने की उम्मीद भर ही है! जहाँ भी यह उम्मीद दिखेगी, जुगुप्सित और भूखे लोग वहां-वहां आते-जाते रहेंगें ! उन्हें कोई भी मिशनरी या संघ रोक नहीं पायेगा.
    संजय जी को साधुवाद ! बहुत सही समय पर उन्होंने एक राष्ट्रीय मसले को बहस की शक्ल दी है. उम्मीद है कि उक्त कार्यक्रम संपन्न हो जाने के बाद एक बार फिर उनकी प्रतिक्रिया जानने को मिलेगी !

  25. शानदार, अतिप्रसंन्‍नता हुई आपका यह लेख । आपके अन्‍य लेखों से एकदम हटकर है। आपका एक एक शब्‍द को बार पढने की जरूरत है फिलहाल लिंक को सुरक्षित कर लिया है।

  26. धर्मांतरण के अलावा और भी बहुत कुछ है दुनिया में। आरएसएस के लोग आदिवासी कुंभ का आयोजन कर रहे हैं, छत्‍तीसगढ के कई इलाकों में आदिवासियों को इसाई मिशनरी बहकाने में लगी है। क्‍या इससे देश का कल्‍याण हो जाएगा। इस समय देश महंगाई, भ्रष्‍टाचार के आगोश में समाया हुआ है, उस पर किसका ध्‍यान है।
    बहरहाल, अच्‍छा आलेख। आदरणीय संजय जी, आपको एक बार और बधाई हो।

  27. मध्यप्रदेश शायद संघ और उसके बड़े नेताओं के लिए धर्मांतरण के मुद्दे को उठाने का सही स्थान है। हालांकि, संघ को इस समय महंगाई जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने के लिए आगे आना चाहिए था लेकिन शायद अपने भगवा रंग में संघ कुछ ज्यादा ही डूब गया है। लेकिन संघ की चिंता भी जायज है। भोपाल में काम करते हुए मैने भी यह महसूस किया मध्यप्रदेश में धर्मांतरण कुछ ज्यादा ही तेज गति से हो रहा है। समस्या अभी भी बनी हुई है और अपने इस कुंभ के सहारे संघ शायद इसका समाधान निकालने की कोशिश करे। अच्छा है किसी समस्या का समाधान तो निकले।
    संजय सर को बधाई। इस शानदार लेख के लिए। संजय सर की लेखनी से निकला हुआ हर शब्द आपको सोचने पर मजबूर करेगा। हम क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे।
    सादर
    अंकुर विजयवर्गीय
    हिन्दुस्तान टाइम्स
    देहली

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