लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under महत्वपूर्ण लेख, राजनीति.


-सुरेश हिन्दुस्थानी-

arvind kejrival rally- Farmer-suicide-l-reuters

दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आम आदमी पार्टी के एक आंदोलनात्मक कार्यक्रम में जिस प्रकार से कथित जनहितैषी अरविन्द केजरीवाल के समक्ष एक किसान ने पेड़ से लटककर अपनी जीवन लीला समाप्त की है, उससे आम आदमी पार्टी की राजनीति की जमकर छीछालेदर हो रही है। वैसे वर्तमान में राजनीति का जो स्तर दिखाई देता है, उसमें जनभावना कम और स्वार्थ ज्यादा दिखाई देता है। आम आदमी पार्टी को कम से कम दिखावे के लिए ही सही अपनी सभा को निरस्त कर ही देना चाहिए था। लेकिन आम आदमी पार्टी के नेताओं ने ऐसा न करके जिस असंवेदनशीलता का परिचय दिया है, वह भारत की राजनीति में काले पन्ने पर जरूर दर्ज किया जाएगा।

आम आदमी पार्टी के इस कार्यक्रम में जहां दिल्ली की पूरी सरकार थी तो वहीं देशभक्ति जनसेवा की दुहाई देने वाली पुलिस भी उपस्थित थी। राजस्थान के किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने के इस मामले में किसको दोषी माना जाए, यह सवाल आज राजनीति की गहरी खाई में गोता लगाता हुआ दिखाई दे रहा है। आम आदमी पार्टी सहित सभी दलों को जैसे कुछ कहने का अवसर मिल गया हो। कांग्रेस, भाजपा सहित कई दल इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है, वहीं आम आदमी पार्टी के नेता इस मामले में भाजपा सरकार के कान खींचने पर उतारू दिखाई दे रही है। वैसे केजरीवाल की राजनीति का मुख्य केन्द्र भाजपा का विरोध ही रहा है। उन्हें आपनी पार्टी के अंदर किसी भी कमी में भी भाजपा का ही हाथ दिखाई देता है।

वर्तमान में आम आदमी पार्टी की राजनीति और उनके सरकार चलाने के तरीकों का अध्ययन किया जाए तो यह तो साबित हो रहा है कि केजरीवाल ने आम जनता को जिस प्रकार के सपने दिखाए थे, सरकार वैसा कुछ भी नहीं कर रही है। इतना ही नहीं अब तो आम आदमी पार्टी के नेताओं को भी यह स्पष्ट रूप से लगने लगा है कि हमने जनता से जो वादे किए हैं वे पूरे हो ही नहीं सकते। तभी तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने स्वये इस बात को स्वीकार किया है कि हमारी सरकार जनता से किए गए वादों को पूरा नहीं कर सकती। केजरीवाल की इस बात से यह साफ हो जाता है कि चुनाव के समय केजरीवाल ने आम जनता से झूठ बोला था, यानि राजनीति की शुरूआत ही झूंठ पर आधारित थी। इस प्रकार के राजनीतिक संत्रास से त्रस्त होकर ही दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को छप्पर फाड़कर समर्थन दिया, लेकिन केजरीवाल द्वारा इस प्रकार की स्वीकारोक्ति करना क्या जनता के साथ विश्वासघात नहीं है।

जंतर मंतर पर किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने को लेकर यह एक बार फिर से सिद्ध हो गया है कि केजरीवाल की सरकार को आम जनता के दर्द से कुछ भी वास्ता नहीं है, वे तो केवल सरकार बनाने भर की ही राजनीति कर रहे थे, अब सरकार बन गई तो केजरीवाल एंड कंपनी राजा बनकर राजनीति करने का खेल खेलने पर उतारू हो गई है।

भारत के सारे राजनीतिक दल मन से नहीं तो केवल दिखावे भर के लिए किसान आत्महत्या मामले को लेकर संवेदनशील हो जाते, लेकिन आम आदमी पार्टी के लिए इसके कोई मायने नहीं हैं। किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद भी उन्होंने अपना कार्यक्रम जारी रखा और अपनी भड़ास निकालने का असंवेदनशील खेल खेला। इससे यह भी प्रमाणित हो गया कि आम आदमी पार्टी को किसानों के जीवन से कोई मतलब नहीं हैं, उन्हें ता बस अपनी राजनीति ही करना है। अब सवाल उठता है कि जीवन महत्वपूर्ण है या फिर राजनीति? जाहिर है केजरीवाल ने राजनीति को प्रथम स्थान दिया। केजरीवाल साहब पहले तो किसान की आत्महत्या मामले को भाजपा और पुलिस का नाटक बता रहे थे, लेकिन किसान की जीवनलीला समाप्त हो गई तब भाजपा और पुलिस की साजिश का हिस्सा बता दिया। यहां पर यह सवाल भी पैदा होता है कि अगर यह पुलिस द्वारा रचा गया नाटक होता तो यह प्रकरण केवल नाटक तक ही सीमित रहता, किसान इसमें अपनी जान नहीं देता, केवल जान देने का नाटक ही करता, लेकिन किसान ने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। धन्य है केजरीवाल जी उन्हें तो अब भी इस खेल में नाटक ही दिखाई दे रहा है। जबकि सच तो यह है कि राजस्थान के गजेन्द्र नामक किसान केजरीवाल के कार्यक्रम में कुछ उम्मीदें लेकर गया था, कि शायद अब मेरी सुनवाई हो जाएगी, लेकिन किसान को लगा होगा कि केजरीवाल तो केवल भाषण के सहारे और एक दूसरे पर आरोप लगाने वाली राजनीति करके अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, तब किसान को उम्मीद के सारे रास्ते बन्द दिखाई दिए होंगे और उसने इस भयानक रास्ते पर चलने का मानस बनाया होगा। हद तो उस समय हो गई जब केजरीवाल के मुंह से किसानों के पक्ष में एक बात भी नहीं निकली।

आम आदमी पार्टी के कार्यक्रम में किसान द्वारा आत्महत्या करने के मामले में यह कहा जाए तो ज्यादा तर्कसंगत ही होगा कि यह मामला हत्या का ही है, क्योंकि कार्यक्रम स्थल पर जब बचाने के सारे इंतजाम मौजूद थे, तब किसान को बचाने के उपक्रम क्यों नहीं किए गए। मुख्यमंत्री केजरीवाल अग्रिशमन दल के कर्मियों को बुलाने का आदेश भी दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं, यह जांच के बाद ही चल पाएगा, लेकिन इस सारे मामले में केजरीवाल की सरकार पूरी तरह से दोषी है। पूरी सरकार के ऊपर हत्या का प्रकरण दर्ज होना चाहिए।

8 Responses to “संवेदनहीन होती आप की राजनीति”

  1. आर. सिंह

    आर. सिंह

    कल जंतर मंतर पर जो कुछ हुआ ,उसका चस्मदीद गवाह तो नहीं हूँ,पर मैं यह अवश्य कह सकता हूँ, कि वह आदमी पुलिस की लापरवाही का शिकार हो गया. मैं वहां करीब १२.४५ तक था और मैंने उमड़ता हुआ जन सैलाब देखा था.मैंने यह भी देखा था कि वहाँ पुलिस भारी संख्या में उपस्थित थी.पुलिस के पास ऐसा इंतजाम अवश्य होगा ,जिससे वह हर जगह नजर रख रही होगी.क्या रैली में पेड़ पर चढ़ने की अनुमति थी?पुलिस ने फिर उसे पेड़ पर चढ़ने से क्यों नहीं रोका?वह दो घंटें तक पेड़ पर बैठा रहा,फिर भी पुलिस ने उसपर ध्यान क्यों नहीं दिया? यहाँ तक मंच से लोग चिल्लाये तब भी पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की?क्या पुलिस यह उम्मीद कर रही थी कि जो लोग मंच पर थे,वेवहां से उतनी बड़ी भीड़ में उतर कर आएंगे और उसकी जान बचाएंगे?मैं मानता हूँ कि उस पेड़ के आसपास भी जनता अवश्य होगी,जिसमे आम आदमी पार्टी के कार्यकर्त्ता भी होंगे और शायद उन्ही में से कुछ पेड़ पर चढ़े भी,पर वे तो ऐसे मौको के लिए प्रशिक्षित नहीं होंगे न.
    दूसरा प्रश्न यह उठाया गया है कि रैली रोकी क्यों नहीं गयी?यह रैली रोकने वाली बात वही कह सकता है,जो या तो पक्षपात पूर्ण रवैया रखता है,या उसे भीड़ के मनोविज्ञान कोई अंदाज नहीं है.अगर रैली वहीँ रोक दी जाती और नेता मंच से उतरे होते ,तो वहां भगदड़ मच जाती और तब कितने अन्य लोगों की जाने जाती यह कोई अनुभवी ही बता सकता है. अगर अरविन्द केजरीवाल अपना भाषण बीच में छोड़ कर अस्पताल की और दौड़े होते तब भी कुछ वैसा ही होता.मैं तो दाद देता हूँ ,वहां उपस्थित भीड़ को और भीड़ प्रबंधन को जिसके चलते इतना बड़ा हादसा होने पर उनका सयंम बना रहा.ऐसे इसमे राजनीति की रोटियाँ तो सब सेंक रहे हैं.
    खैर नतो किसी को यह ध्यान आएगा कि इन हादसों की तह में जाय और न यह ध्यान आएगा कि आखिर राजस्थान का रहने वाला वह व्यक्ति किन कारणों से इतना दुखी था कि उसने यह भयानक कदम उठाया.कम से कम उसे दिल्ली की आआप की सरकार से तो कुछ लेना देना होगा नहीं.

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  2. suresh karmarkar

    सत्ता और सुख सुविधा के लिए ये कितने लालायित थे इसका उदाहरण देखिए. सभी (१ )सभी ६७ विधायकों को आवास औरवाहन की मंज़ूरी (२) १४/२/१५ को ६ ”आप”विषयक मंत्री बने. (३)१५/३/१५ २१ ”आप” विधायक संसदीय सचिव बने. मंत्री का दर्ज़ा होने से शासकीय वाहन और आवास मुफ्त,(४)१० ”आप” विधायकों को स्वस्थ विभाग का जिला प्रभारी होने से आवास और वाहन की पात्रता. (५) २८ विधायकों को रोगी कल्याण समिति का अध्यक्ष बनाये जाने से आवास और वाहन की सुविधा. इस प्रकार ६ +२१ + ३८ =६५ विधायकों को शासकीय वाहन और आवास, टेलीफोन ,ड्राइवर मुफ्त बचे दो विधायक। अगर इन्हे कुछ नहीं मिला और इन्होने चूं चपड़ की तो भूषण और योगेन्द्र की तर्ज पर बाहर. यह इनकी संवदन शीलता है. आशुतोष का बयान और माफ़ी सब चुहलबाजियां हैं, जब किसान पेड़ पर था ६५ विधायक पेड़ पर नहीं चढ़ सकते. मगर दो विधायक तो ”आम” रह गए थे . वे या कोई और अन्य कार्यकर्त्ता क्यों नहीं चढ़ा?पुलिस पर ही निर्भर रहेंगे क्या?

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    • शिवचरण जांगड़ा

      मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी।
      इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं की एक आतंकवादी अगर मृतक किसान के स्थान पर उसी पेड पर चढ़कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को निशाना बनाना चाहता तो बड़े आराम से बना सकता था। क्योकि पेड और मंच की दुरी बहुत ज्यादा नहीं थी। ये मात्र एक पार्टी का कार्यक्रम नहीं था। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों का जमघट था। जब मोदीजी मात्र गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उनकी रैलियों के लिए पुलिस बाकायदा तलाशी अभियान चलाती थी तो केजरीवाल की रैली में लापरवाही क्यों?
      क्या उस पेड के आस पास एक भी पुलिसवाला नहीं था? यदि वास्तव में ऐसा ही था तो ये घोर लापरवाही का मामला है जिसके लिये वहां के बड़े छोटे सब पुलिसकर्मी जिम्मेदार हैं। टीवी पत्रकारों ने जो ड्रामा चला रखा है वो किसान की मौत पर विचार या जो जिन्दा हैं उनकी समस्या से कोई सरोकार नहीं रखता। ये लोग चापलूसी में लगे हैं। बस किसी तरह टीआरपी और भारत सरकार की मेहरबानियाँ बनी रहें। क्या एक पत्रकार के अंदर इंसान नहीं होता? क्या साड़ी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री निभाएगा? उनके हाथ सिर्फ माइक या कैमरा पकड़ने के लिए बने हैं? शर्म उनको भी आणि चाहिए। वो भी तो आगे बढ़कर घटना को रोक सकते थे। पर घटना रुक जाती तो टीआरपी का क्या होता? एक धटना जो मेरे इलाके में घटी थी मैं यहाँ उसका जिक्र करना चाहूँगा। मैं उस वक्त क्राइम फ्री इंडिया नामक पत्रिका का मुख्य संवाददाता होता था मुझे सुचना मिली की द्वारका में पानी की टंकी के पास एक प्लेन क्रेश हो गया है तो मैं 15 मिनट में ही मौके पर पहुँच गया और सबसे पहले अपने मोबाइल से पुलिस को सूचना दी। फिर जलते हुए जहाज़ में घुस गया और एक फ़ौज़ी को बाहर निकाल लाया तब तक पुलिसवालों ने पुरे क्षेत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया और मुझे वहॉं से हटने को कहा। तब मैंने अपना पहचान पत्र उनको दिखाया। लेकिन उस वक़्त के डीसीपी प्रदीप भारद्वाज जी ने मेरा कार्ड अपने पास रख लिया और मेरा कैमरा भी छिनवा दिया। बाद में मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जी को मैंने पूरी घटना बताई तो उन्होंने भारद्वाज जी से मेरा पहचान पत्र और कैमरा वापस देने के लिए कहा। कार्ड तो मुझे तभी मिल गया पर कैमरा आज तक नहीं मिला। ये खबर सभी दैनिक समाचार पत्रों में छपी कि पुलिस ने पत्रकारों से छीना झपटी की पर 1998 से आज 2015 चल रहा है। 17 वर्ष बाद भी मैं नहीं बदला आज भी किसी घटना के होने पर या संभावना को रोकने के लिए मैं आगे रहता हूँ। पहले किसी की जान बचानी चाहिए खबर अपने आप बन जायेगी पर जान बच गयी तो टीआरपी का क्या होगा? ये फ़र्क़ है। जो वहां उपस्थित लोगों को गुनाह का सीधे ज़िम्मेदार बनाता है।

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    • शिवचरण जांगड़ा

      मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी।
      इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं की एक आतंकवादी अगर मृतक किसान के स्थान पर उसी पेड पर चढ़कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को निशाना बनाना चाहता तो बड़े आराम से बना सकता था। क्योकि पेड और मंच की दुरी बहुत ज्यादा नहीं थी। ये मात्र एक पार्टी का कार्यक्रम नहीं था। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों का जमघट था। जब मोदीजी मात्र गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उनकी रैलियों के लिए पुलिस बाकायदा तलाशी अभियान चलाती थी तो केजरीवाल की रैली में लापरवाही क्यों?
      क्या उस पेड के आस पास एक भी पुलिसवाला नहीं था? यदि वास्तव में ऐसा ही था तो ये घोर लापरवाही का मामला है जिसके लिये वहां के बड़े छोटे सब पुलिसकर्मी जिम्मेदार हैं। टीवी पत्रकारों ने जो ड्रामा चला रखा है वो किसान की मौत पर विचार या जो जिन्दा हैं उनकी समस्या से कोई सरोकार नहीं रखता। ये लोग चापलूसी में लगे हैं। बस किसी तरह टीआरपी और भारत सरकार की मेहरबानियाँ बनी रहें। क्या एक पत्रकार के अंदर इंसान नहीं होता? क्या साड़ी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री निभाएगा? उनके हाथ सिर्फ माइक या कैमरा पकड़ने के लिए बने हैं? शर्म उनको भी आणि चाहिए। वो भी तो आगे बढ़कर घटना को रोक सकते थे। पर घटना रुक जाती तो टीआरपी का क्या होता? एक धटना जो मेरे इलाके में घटी थी मैं यहाँ उसका जिक्र करना चाहूँगा। मैं उस वक्त क्राइम फ्री इंडिया नामक पत्रिका का मुख्य संवाददाता होता था मुझे सुचना मिली की द्वारका में पानी की टंकी के पास एक प्लेन क्रेश हो गया है तो मैं 15 मिनट में ही मौके पर पहुँच गया और सबसे पहले अपने मोबाइल से पुलिस को सूचना दी। फिर जलते हुए जहाज़ में घुस गया और एक फ़ौज़ी को बाहर निकाल लाया तब तक पुलिसवालों ने पुरे क्षेत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया और मुझे वहॉं से हटने को कहा। तब मैंने अपना पहचान पत्र उनको दिखाया। लेकिन उस वक़्त के डीसीपी प्रदीप भारद्वाज जी ने मेरा कार्ड अपने पास रख लिया और मेरा कैमरा भी छिनवा दिया। बाद में मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जी को मैंने पूरी घटना बताई तो उन्होंने भारद्वाज जी से मेरा पहचान पत्र और कैमरा वापस देने के लिए कहा। कार्ड तो मुझे तभी मिल गया पर कैमरा आज तक नहीं मिला। ये खबर सभी दैनिक समाचार पत्रों में छपी कि पुलिस ने पत्रकारों से छीना झपटी की पर 1998 से आज 2015 चल रहा है। 17 वर्ष बाद भी मैं नहीं बदला आज भी किसी घटना के होने पर या संभावना को रोकने के लिए मैं आगे रहता हूँ। पहले किसी की जान बचानी चाहिए खबर अपने आप बन जायेगी पर जान बच गयी तो टीआरपी का क्या होगा? ये फ़र्क़ है। जो वहां उपस्थित लोगों को गुनाह का सीधे ज़िम्मेदार बनाता है।

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    • शिवचरण जांगड़ा

      मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी।
      इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं की एक आतंकवादी अगर मृतक किसान के स्थान पर उसी पेड पर चढ़कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को निशाना बनाना चाहता तो बड़े आराम से बना सकता था। क्योकि पेड और मंच की दुरी बहुत ज्यादा नहीं थी। ये मात्र एक पार्टी का कार्यक्रम नहीं था। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों का जमघट था। जब मोदीजी मात्र गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उनकी रैलियों के लिए पुलिस बाकायदा तलाशी अभियान चलाती थी तो केजरीवाल की रैली में लापरवाही क्यों?
      क्या उस पेड के आस पास एक भी पुलिसवाला नहीं था? यदि वास्तव में ऐसा ही था तो ये घोर लापरवाही का मामला है जिसके लिये वहां के बड़े छोटे सब पुलिसकर्मी जिम्मेदार हैं। टीवी पत्रकारों ने जो ड्रामा चला रखा है वो किसान की मौत पर विचार या जो जिन्दा हैं उनकी समस्या से कोई सरोकार नहीं रखता। ये लोग चापलूसी में लगे हैं। बस किसी तरह टीआरपी और भारत सरकार की मेहरबानियाँ बनी रहें। क्या एक पत्रकार के अंदर इंसान नहीं होता? क्या साड़ी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री निभाएगा? उनके हाथ सिर्फ माइक या कैमरा पकड़ने के लिए बने हैं? शर्म उनको भी आणि चाहिए। वो भी तो आगे बढ़कर घटना को रोक सकते थे। पर घटना रुक जाती तो टीआरपी का क्या होता? एक धटना जो मेरे इलाके में घटी थी मैं यहाँ उसका जिक्र करना चाहूँगा। मैं उस वक्त क्राइम फ्री इंडिया नामक पत्रिका का मुख्य संवाददाता होता था मुझे सुचना मिली की द्वारका में पानी की टंकी के पास एक प्लेन क्रेश हो गया है तो मैं 15 मिनट में ही मौके पर पहुँच गया और सबसे पहले अपने मोबाइल से पुलिस को सूचना दी। फिर जलते हुए जहाज़ में घुस गया और एक फ़ौज़ी को बाहर निकाल लाया तब तक पुलिसवालों ने पुरे क्षेत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया और मुझे वहॉं से हटने को कहा। तब मैंने अपना पहचान पत्र उनको दिखाया। लेकिन उस वक़्त के डीसीपी प्रदीप भारद्वाज जी ने मेरा कार्ड अपने पास रख लिया और मेरा कैमरा भी छिनवा दिया। बाद में मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जी को मैंने पूरी घटना बताई तो उन्होंने भारद्वाज जी से मेरा पहचान पत्र और कैमरा वापस देने के लिए कहा। कार्ड तो मुझे तभी मिल गया पर कैमरा आज तक नहीं मिला। ये खबर सभी दैनिक समाचार पत्रों में छपी कि पुलिस ने पत्रकारों से छीना झपटी की पर 1998 से आज 2015 चल रहा है। 17 वर्ष बाद भी मैं नहीं बदला आज भी किसी घटना के होने पर या संभावना को रोकने के लिए मैं आगे रहता हूँ। पहले किसी की जान बचानी चाहिए खबर अपने आप बन जायेगी पर जान बच गयी तो टीआरपी का क्या होगा? ये फ़र्क़ है। जो वहां उपस्थित लोगों को गुनाह का सीधे ज़िम्मेदार बनाता है।

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      मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी।
      इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं की एक आतंकवादी अगर मृतक किसान के स्थान पर उसी पेड पर चढ़कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को निशाना बनाना चाहता तो बड़े आराम से बना सकता था। क्योकि पेड और मंच की दुरी बहुत ज्यादा नहीं थी। ये मात्र एक पार्टी का कार्यक्रम नहीं था। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों का जमघट था। जब मोदीजी मात्र गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उनकी रैलियों के लिए पुलिस बाकायदा तलाशी अभियान चलाती थी तो केजरीवाल की रैली में लापरवाही क्यों?
      क्या उस पेड के आस पास एक भी पुलिसवाला नहीं था? यदि वास्तव में ऐसा ही था तो ये घोर लापरवाही का मामला है जिसके लिये वहां के बड़े छोटे सब पुलिसकर्मी जिम्मेदार हैं। टीवी पत्रकारों ने जो ड्रामा चला रखा है वो किसान की मौत पर विचार या जो जिन्दा हैं उनकी समस्या से कोई सरोकार नहीं रखता। ये लोग चापलूसी में लगे हैं। बस किसी तरह टीआरपी और भारत सरकार की मेहरबानियाँ बनी रहें। क्या एक पत्रकार के अंदर इंसान नहीं होता? क्या साड़ी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री निभाएगा? उनके हाथ सिर्फ माइक या कैमरा पकड़ने के लिए बने हैं? शर्म उनको भी आणि चाहिए। वो भी तो आगे बढ़कर घटना को रोक सकते थे। पर घटना रुक जाती तो टीआरपी का क्या होता? एक धटना जो मेरे इलाके में घटी थी मैं यहाँ उसका जिक्र करना चाहूँगा। मैं उस वक्त क्राइम फ्री इंडिया नामक पत्रिका का मुख्य संवाददाता होता था मुझे सुचना मिली की द्वारका में पानी की टंकी के पास एक प्लेन क्रेश हो गया है तो मैं 15 मिनट में ही मौके पर पहुँच गया और सबसे पहले अपने मोबाइल से पुलिस को सूचना दी। फिर जलते हुए जहाज़ में घुस गया और एक फ़ौज़ी को बाहर निकाल लाया तब तक पुलिसवालों ने पुरे क्षेत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया और मुझे वहॉं से हटने को कहा। तब मैंने अपना पहचान पत्र उनको दिखाया। लेकिन उस वक़्त के डीसीपी प्रदीप भारद्वाज जी ने मेरा कार्ड अपने पास रख लिया और मेरा कैमरा भी छिनवा दिया। बाद में मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जी को मैंने पूरी घटना बताई तो उन्होंने भारद्वाज जी से मेरा पहचान पत्र और कैमरा वापस देने के लिए कहा। कार्ड तो मुझे तभी मिल गया पर कैमरा आज तक नहीं मिला। ये खबर सभी दैनिक समाचार पत्रों में छपी कि पुलिस ने पत्रकारों से छीना झपटी की पर 1998 से आज 2015 चल रहा है। 17 वर्ष बाद भी मैं नहीं बदला आज भी किसी घटना के होने पर या संभावना को रोकने के लिए मैं आगे रहता हूँ। पहले किसी की जान बचानी चाहिए खबर अपने आप बन जायेगी पर जान बच गयी तो टीआरपी का क्या होगा? ये फ़र्क़ है। जो वहां उपस्थित लोगों को गुनाह का सीधे ज़िम्मेदार बनाता है।

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    • शिवचरण जांगड़ा

      मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी।
      इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं की एक आतंकवादी अगर मृतक किसान के स्थान पर उसी पेड पर चढ़कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को निशाना बनाना चाहता तो बड़े आराम से बना सकता था। क्योकि पेड और मंच की दुरी बहुत ज्यादा नहीं थी। ये मात्र एक पार्टी का कार्यक्रम नहीं था। एक प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों का जमघट था। जब मोदीजी मात्र गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उनकी रैलियों के लिए पुलिस बाकायदा तलाशी अभियान चलाती थी तो केजरीवाल की रैली में लापरवाही क्यों?
      क्या उस पेड के आस पास एक भी पुलिसवाला नहीं था? यदि वास्तव में ऐसा ही था तो ये घोर लापरवाही का मामला है जिसके लिये वहां के बड़े छोटे सब पुलिसकर्मी जिम्मेदार हैं। टीवी पत्रकारों ने जो ड्रामा चला रखा है वो किसान की मौत पर विचार या जो जिन्दा हैं उनकी समस्या से कोई सरोकार नहीं रखता। ये लोग चापलूसी में लगे हैं। बस किसी तरह टीआरपी और भारत सरकार की मेहरबानियाँ बनी रहें। क्या एक पत्रकार के अंदर इंसान नहीं होता? क्या साड़ी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री निभाएगा? उनके हाथ सिर्फ माइक या कैमरा पकड़ने के लिए बने हैं? शर्म उनको भी आणि चाहिए। वो भी तो आगे बढ़कर घटना को रोक सकते थे। पर घटना रुक जाती तो टीआरपी का क्या होता? एक धटना जो मेरे इलाके में घटी थी मैं यहाँ उसका जिक्र करना चाहूँगा। मैं उस वक्त क्राइम फ्री इंडिया नामक पत्रिका का मुख्य संवाददाता होता था मुझे सुचना मिली की द्वारका में पानी की टंकी के पास एक प्लेन क्रेश हो गया है तो मैं 15 मिनट में ही मौके पर पहुँच गया और सबसे पहले अपने मोबाइल से पुलिस को सूचना दी। फिर जलते हुए जहाज़ में घुस गया और एक फ़ौज़ी को बाहर निकाल लाया तब तक पुलिसवालों ने पुरे क्षेत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया और मुझे वहॉं से हटने को कहा। तब मैंने अपना पहचान पत्र उनको दिखाया। लेकिन उस वक़्त के डीसीपी प्रदीप भारद्वाज जी ने मेरा कार्ड अपने पास रख लिया और मेरा कैमरा भी छिनवा दिया। बाद में मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जी को मैंने पूरी घटना बताई तो उन्होंने भारद्वाज जी से मेरा पहचान पत्र और कैमरा वापस देने के लिए कहा। कार्ड तो मुझे तभी मिल गया पर कैमरा आज तक नहीं मिला। ये खबर सभी दैनिक समाचार पत्रों में छपी कि पुलिस ने पत्रकारों से छीना झपटी की पर 1998 से आज 2015 चल रहा है। 17 वर्ष बाद भी मैं नहीं बदला आज भी किसी घटना के होने पर या संभावना को रोकने के लिए मैं आगे रहता हूँ। पहले किसी की जान बचानी चाहिए खबर अपने आप बन जायेगी पर जान बच गयी तो टीआरपी का क्या होगा? ये फ़र्क़ है। जो वहां उपस्थित लोगों को गुनाह का सीधे ज़िम्मेदार बनाता है।

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    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      सुरेश जी,आपने लांछन तो लगा दिया,पर कभी पता लगाने का प्रयत्न किया कि मंत्रियों के अतितिक्त अन्य विधायकों को अतिरिक्त जिम्मेदारी के साथ क्या अतिरिक्त सुविधाएं भी मिली या आपने योंही हवा में छलांग लगा दी?

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