-आर्यसमाज धामावाला, देहरादून का साप्ताहिक सत्संग-“माता-पिता व पितरों की सेवा से सन्तानों द्वारा उनका ऋण चुकता होता है : आचार्य वीरेन्द्र शास्त्री”

मनमोहन कुमार आर्य

आर्यसमाज, धामावाला, देहरादून सन् 1879 में महर्षि दयानन्द जी द्वारा स्थापित आर्यसमाज है जहां उन्होंने विश्व में पहली बार एक मुस्लिम मत के बन्धु मोहम्मद उमर व उसके परिवार को उसकी इच्छानुसार वैदिक धर्म में दीक्षित कर उसे अलखधारी नाम दिया था। आज रविवार के सत्संग में यहां आरम्भ में अग्निहोत्र हुआ जिसके बाद आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री ने एक मधुर भजन गाया जिसके बोल थे मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं, हे पावन परमेश्वर मेरे मन ही मन शरमाऊं भजन मधुर एवं प्रभावशाली स्वरों में गाया गया जिसे सभी श्रोताओं ने पसन्द किया। इसके बाद श्री स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम की एक बालिका सुरभि ने सामूहिक प्रार्थना कराई। पं. विद्यापति शास्त्री ने सत्यार्थप्रकाश के बारहवें समुल्लास का पाठ किया। उन्होंने कहा कि जैनी साधु पानी को गर्म करके पीते हैं। इसके जल के किटाणुओं के नष्ट होने व उनके शरीरों के पानी में घुल जाने का अनुमान होता है। यह जल पीने योग्य नहीं होता और किटाणुओं के मरने से हिंसा रूपी पाप होता है। शास्त्री जी ने अपने प्रवचन में जैन तीर्थंकरों के शरीरों का परिमाण व उनकी आयु के विषय में भी वर्णन किया और इन बातों को अतिश्योक्तिपूर्ण एवं असम्भव बताया। मुख्य वक्ता श्री वीरेन्द्र शास्त्री जी को आने में कुछ विलम्ब होने के कारण पं. विद्यापति शास्त्री जी ने अनेक विषयों पर अपने विचार भी प्रस्तुत किये। उन्होंने श्राद्ध की चर्चा की और कहा श्राद्ध पक्ष में हम पक्षियों को भोजन कराते हुए सोचते हैं कि शायद इन पक्षियों में से कोई हमारा पूर्वजन्म में पितर, माता-पिता-दादी-दादा-परदादी-परदादा रहा हो सकता है। उन्होंने बताया कि यह कल्पना मात्र है वास्तविकता नहीं। शास्त्री जी ने यज्ञ की चर्चा की और उस पर प्रकाश डाला। शास्त्री जी ने कहा कि हमें परमात्मा को याद करना चाहिये। उसका आभार एवं उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिये। जो परमात्मा का ध्यान व धन्यवाद नहीं करता उसे पाप लगता है। प्रातः जल्दी जाग कर सबसे प्रथम हमें ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिये। हमें पंच महायज्ञ करने चाहिये। उन्होंने कहा कि प्रथम महायज्ञ सन्ध्या करना व ईश्वर का ध्यान करना है जिसे सभी मनुष्य को अनिवार्य रूप से करना होता है। ब्रह्मयज्ञ-सन्ध्या के बाद देवयज्ञ भी सभी मनुष्यों व गृहस्थियों को करना चाहिये। उन्होंने कहा कि सन्ध्या व यज्ञ को जानना व उसका करना बहुत आवश्यक है। पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने कहा कि देवयज्ञ के बाद पितृ यज्ञ करना चाहिये। उन्होंने कहा कि अग्निहोत्र करने से यज्ञ सामग्री सूक्ष्म होकर वायुमण्डल में सभी दिशाओं में फैल जाती है। उससे वायु की सभी प्रकार की अशुद्धियों के दूर होने से मनुष्य एवं अन्य सभी प्राणियों को लाभ होता है।

पं. विद्यापति शास्त्री ने कहा कि हवन सामग्री में लगभग 65 प्रकार के पदार्थ व ओषधियां मिलाई जाती हैं। अग्निहोत्र यज्ञ के दूषित वातावरण को शुद्ध व पवित्र करता है। यज्ञ करने से चेतन व जड़ देवताओं का सत्कार व सेवा होती है। पितृ यज्ञ के सन्दर्भ में पुरोहित जी ने कहा कि माता-पिता की सेवा करना हमारा कर्तव्य है। इससे पुण्य नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि माता-पिता का हम पर ऋण है जिसको हमें अपने इस जन्म में चुकाना है। हम उनकी सेवा करके उन पर कोई अहसान नहीं करते अपितु उन्होंने हमें जन्म देकर व उसके बाद हमारा जो पालन पोषण व शिक्षा की व्यवस्था की है, उसके ऋण को ही चुकाने का प्रयत्न करते हैं। माता-पिता की सेवा करने से पुण्य तो नहीं होता परन्तु सेवा न करने से पाप अवश्य होता है क्योंकि हमने उनके ऋण को नहीं चुकाते है। पण्डित विद्यापति जी ने आपत्ति करते हुए कहा कि कुछ लोग दूसरों को प्रायः यह कहते हैं कि माता-पिता हमारे साथ रहते हैं। उन्हें यह कहना चाहिये कि हमारा सौभाग्य है कि हमारे माता-पिता हमारे साथ रहकर हमें सेवा का अवसर देते हैं और हमें निरन्तर उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। पुरोहित जी ने कहा हम माता-पिता की भोजन, वस्त्र व ओषधि आदि से सेवा तो करें ही, इसके साथ हमें उनके साथ समय बिताना चाहिये और उनके जीवन की वह बातें ध्यान से सुननी चाहिये जो वह हमें बताना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वह सन्तान भाग्यशाली होते हैं जो माता-पिता की सेवा करते हैं और उनकी बातें सुनते व उन्हें पूर्णतः सन्तुष्ट रखते हैं। जीवित माता-पिता व अतिथियों की सेवा को ही श्राद्ध कहते हैं और इसे सबको पूरे वर्ष भर प्रतिदिन करना चाहिये। शास्त्री जी ने श्राद्ध विषयक कई प्रश्न भी प्रस्तुत किये। एक प्रश्न था कि क्या ब्राह्मणों को भोजन कराने से हमारे मृत माता-पिता व उनसे पूर्व के पितरों को भोजन पहुंचता है? आचार्य विद्यापति जी ने इसका अनेक तर्कों व प्रमाणों से खण्डन किया। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों को भोजन कराने से वह भोजन हमारे माता-पिता व पितरों को पहुंचना असम्भव है। मृत पितरों को भोजन कराने व पहुंचाने की आवश्यकता भी नहीं है। 18 पुराणों की चर्चा कर आचार्य विद्यापति शास्त्री ने कहा कि उसमें असम्भव, असत्य व काल्पनिक बातें भरी हुई हैं। उन्होंने कहा कि जिससे किसी को कोई हानि न हो अपितु लाभ हो, उसका नाम क-हानी है।

 

इसी बीच लगभग 90-100 किमी. का सफर करके आचार्य वीरेन्द्र शास्त्री जी आर्यसमाज पहुंच गये। प्रधान डॉ. महेश कुमार शर्मा ने उनका प्रवचन कराया। उन्होंने कहा कि आज तेज वर्षा व बसों की उपलब्धता में व्यवधान होने के कारण उन्हें पहुंचने में देर हो गई। आचार्य वीरेन्द्र शास्त्री जी को प्रवचन के लिये पूरा समय दिया गया। उन्होंने अपना व्याख्यान आरम्भ करते हुए श्राद्ध पर चल रही चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि श्राद्ध झूठ की नींव खड़े़ हुए भवन के समान है। हमें नींव को समझना चाहिये। उन्होंने कहा झूठ की नींव पर सत्य का भवन खड़ा नहीं हो सकता। श्राद्ध सत्य+धा अर्थात् श्रद्धा शब्द से बना है। श्रद्धापूर्वक अपने जीवित पितरों पूर्वजों की सेवा करना श्राद्ध कहलाता है। उन्हें तृप्त करने को तर्पण कहा जाता है। यदि हमारे मातापिता परिवार के अन्य बड़े सदस्य हमारी सेवा से सन्तुष्ट हैं तो यह तर्पण कहा जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य की चर्चा कर शास्त्री जी ने कहा कि शतपथ ब्राह्मण में श्राद्ध का सत्यस्वरूप वर्णित है। शास्त्रों में पितरों का आह्वान करने की चर्चा है। पण्डित वीरेन्द्र शास्त्री जी ने कहा कि जीवितों को ही बुलाया जाता व बुलाया जा सकता है, मृतकों को नहीं बुलाया जा सकता। उन्होंने कहा कि परमात्मा सर्वव्यापक होने से हमारी आत्मा के भीतर हर समय विद्यमान रहते हैं। अतः ज्ञानियों द्वारा उनका आह्वान करना व बुलाना नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि कुछ मन्त्रों में ईश्वर के आह्वान की चर्चा है। यह आह्वान उन आज्ञानियों के लिये है जो ईश्वर के विषय में जानते नहीं है। इस विषय में उन्होंने पिता व पुत्र का एक उदाहरण दिया और कहा कि जब दोनों एक स्थान पर होते हैं तो वह एक दूसरे को बुलाते नहीं अपितु नाम व सम्बन्ध का उल्लेख कर अपनी बातें कहा करते हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने जीवित पितरों का आह्वान करना चाहिये और अतिथियों को बुलाकर उनका आतिथ्य करना चाहिये। घर में उपस्थित माता-पिता आदि पितरों को प्रतिदिन भोजन आदि से हमें सन्तुष्ट करना चाहिये।

 

आचार्य वीरेन्द्र शास्त्री ने कहा कि वानप्रस्थी एवं संन्यासी हमारे पितर हैं। हमें वानप्रस्थियों व संन्यासियों का आह्वान करना चाहियें। वह आयें तो भोजन, वस्त्र व धन आदि के दान से उनकी सेवा करनी चाहिये और उनके अनुभव से लाभ उठाने के साथ उनसे पारिवारिक समस्याओं के निवारणों में सुझाव व परामर्श लेना चाहिये। उन्होंने कहा कि अनुभव रूपी डिग्री किसी विश्वविद्यालय में नहीं अपितु पितरों के पास होती है। वानप्रस्थियों के पास कम से कम पचास वर्ष का अनुभव तो होता ही है। आचार्य जी ने कहा कि मरने के बाद मनुष्य को मनुष्य योनि व अन्य किन्हीं योनियों में जन्म मिल जाता है। आत्मा का एक नाम क्रतु है। आत्मा बिना कर्म किये नहीं रह सकती। कर्म शरीर से ही होता है। इसलिये कर्म करने के लिये परमात्मा मनुष्य की मृत्यु के बाद उसे शीघ्र पुनर्जन्म प्रदान करते हैं। विद्वान वक्ता श्री वीरेन्द्र शास्त्री ने कहा कि मैं यहां आया हूं। आप मेरे भोजन का प्रबन्ध करेंगे, पीछे मेरे घर से मेरा भोजन यहां नहीं आयेगा। शास्त्री जी ने कहा कि जीवित माता-पिता की सेवा करो। उन्हें सदा सन्तुष्ट रखो यही श्राद्ध है। उन्होंने कहा कि पुत्र वह होता है जो माता-पिता को दुःख न होने दे व यदि दुःख आ जाये तो उन्हें दुःखों से छुड़ाये। मरने के बाद मृतक आत्मा का अपने परिवार के लोगों के साथ किसी प्रकार से कोई सम्बन्ध नहीं रहता। सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। शास्त्री जी ने पुनः कहा कि जीवित माता-पिता व पितरों की सेवा-सुश्रुषा करो। आचार्य जी ने व्यंग में कहा कि यदि मरने के बाद हमारा कोई पितर हाथी बन जाये और मान लेते हैं कि पितरों को भोजन पहुंचता है, तो हमारे श्राद्ध से हमारे उस हाथी पितर का भला होने वाला नहीं है। आचार्य वीरेन्द्र शास्त्री जी ने लोगों को वेद ज्ञान की ओर बढ़ने का आह्वान किया। इसी के साथ शास्त्री जी का प्रवचन समाप्त हुआ।

 

संगठन सूक्त व शान्ति पाठ से पूर्व जिन सदस्यों के आगामी सप्ताह जन्म दिवस हैं, उन्हें उनके जन्म दिवस की बधाई दी गई। समाज को दान देने वालों की जानकारी भी दी गई। कार्यक्रम का संचालन समाज के युवा एवं ऊर्जावान मंत्री श्री नवीन भट्ट ने किया। आर्यसमाज के प्रधान श्री महेश कुमार शर्मा कार्यक्रम में उपस्थित थे। उन्होंने जन्म दिवस की बधाई, दानियों के सूचना देने सहित 26 सितम्बर से 30 सितम्बर, 2018 तक पारिवारिक सत्संगों की सूचना दी। कार्यक्रम के अन्त में प्रसाद वितरण हुआ। प्रसाद के रूप में आज केलों का वितरण किया गया।

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