पं. दीनदयाल उपाध्‍याय : मानव से महामानव : डॉ.मयंक चतुर्वेदी 

डॉ.मयंक चतुर्वेदी
महामानव वो होता है, जिसे अपने दुखों से ज्यादा दूसरों के दुख-दर्द की चिंता होती है। महामानव बनने की प्रक्रिया में वही लोग सफल होते हैं जो समाज के अंतिम छोर पर खड़े हुए सबसे कमजोर व्यक्ति की चिंता सबसे अधिक करते हैं और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने का ना केवल स्वप्न देखते हैं बल्कि उसे हकीकत में बदलने का पुरुषार्थ भी रखते हैं। जिसका हृदय दूसरों के दुख से दुखी और दूसरे के सुख में स्वयं को आनंदित अनुभूत करता है वास्तव में वही महामानव है । पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी भारत के ऐसे ही महामानव हैं, जिनके लिए ‘परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ ही राष्ट्र का उत्कर्ष और जीवन का आधार रहा। 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन सीधे आपको प्रखरता के साथ राष्ट्रभक्ति से जोड़ता है । जिसका सार है कि तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहे ना रहें। वस्‍तुत: दीनदयालजी की राष्ट्रभक्ति हमसे कहती है, हम करें राष्ट्र आराधन तन से, मन से, धन से,  तन-मन-धन, जीवन से श्रद्धा से नस्तक मत से हम करें राष्ट्र का चिंतन..
पंडित दीनदयाल उपाध्याय, जिनका जीवन कहना चाहिए कि जन्म भी कष्टों के बीच हुआ और जब मृत्यु भी आई तो ऐसी आई कि उनसे जुड़े लोगों को यह भरोसा ही नहीं हो रहा था कि अब पंडितजी हमारे बीच नहीं रहे। पण्डितजी का जीवन इस बात के लिए बड़ा उदाहरण है कि कोई व्यक्ति चाहे तो अपने छोटे से जीवन में क्या कुछ नहीं कर सकता, अर्थात् व्यक्ति ठान ले तो बहुत कुछ कर सकता है।  वह दुनिया को एक ऐसा विचार भी दे सकता है जो न केवल भविष्य में एक क्रान्ति कर दे बल्कि  आने वाली शताब्दियां भी उसकी ऋणी हो जाएं । पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बारे में जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी बिल्कुल सही कहते हैं कि “यदि मुझे दो या तीन और दीनदयाल मिल जाएं तो में भारत का राजनीतिक नक्शा बदल दूंगा।’’  पंडित दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व कितना विशाल और जीवन कितना महान था, इसे उन तमाम श्रेष्ठ राजनेताओं की वाणी से समझा जा सकता है जो उन्हें नजदीक से जानते थे ।
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तरह ही हाल में दिवंगत हुए उनके उत्तराधिकारी एवं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने उनके बारे में कुछ इस प्रकार कहा था कि “एक दीपक बुझ गया है, चारो ओर अंधकार है, श्री उपाध्याय दूर दृष्टि वाले और संपूर्ण देश का विचार करने वाले राजपुरुष थे, वे भौतिक विचारक, कुशल संगठनकर्ता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे । जनसंघ बनाने का श्रेय भी उन्हें है।
इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जनसंघ की घोर विरोधी होने के बाद भी कहती हैं कि ‘‘उपाध्याय देश के राजनीतिक जीवन में एक प्रमुख भूमिका अदा कर रहे थे, कांग्रेस और उनके बीच मतभेद चाहे जो हों श्री उपाध्याय सार्वजनिक तौर पर सम्मानपात्र नेता थे और उन्होंने अपना जीवन देश की एकता एवं संस्कृति को समर्पित कर दिया था।’’
दीनदयाल उपाध्याय 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवनव्रती प्रचारक बने थे और आगे आजीवन प्रचारक रहे। पंडितजी के जीवन में और उनके ह्दय में राष्ट्रभक्ति का भाव किस तरह से हिलोरे ले रहा था इसका पता उनके इस समय अपने मामा नारायण शुक्ल को लिखे पत्रों से भी चलता है। वे अपने मामा को 21 जुलाई 1942 को लिखते हैं…परसों आपका पत्र मिला, तभी से विचारों और कर्तव्यों का तुमुल युद्ध चल रहा है। एक ओर तो भावना और मोह खींचते हैं तो दूसरी और प्राचीन ऋषियों, हुतात्माओं और पुरुखों की अतृप्त आत्माएं पुकारती हैं।…..संघ के स्वयंसेवक के लिए पहला स्थान समाज और देशकार्य का ही रहता है और फिर अपने व्यक्तिगत कार्य का। अत: मुझे अपने समाज कार्य के लिए जो आज्ञा मिली थी उसका पालन करना पड़ा।…मैं यह मानता हूं कि मेरे इस कार्य से आपको कष्ट हुआ होगा। परन्तु आप जैसे विचारवान एवं गंभीर पुरुषों को भी समाज कार्य में संलग्न रहते देखकर कष्ट हो तो फिर समाज कार्य करने के लिए कौन आगे आएगा।
व्यक्ति कितना भी क्यों न बढ़ जाए जब तक उसका समाज उन्नत नहीं होता तब तक उसकी उन्नति का कोई अर्थ नहीं है। यही कारण है कि हमारे यहां के बड़े-बड़े नेताओं का दूसरे देशों में जाकर अपमान होता है। हरि सिंह गौर जोकि इतने बड़े व्यक्ति  हैं वे जब इंग्लैण्ड के होटल में गए तो वहां उन्हें ठहरने का स्थान नहीं दिया गया, क्योंकि वे भारतीय थे।
हमारे यहां हर एक व्यक्ति स्वार्थों में लीन है तथा अपनी ही सोचता है। नाव में छेद हो जाने पर अपने अंगोछे को आप कितना भी ऊँचा क्यों न उठाइए, वह तो आपके साथ डूबेगा ही ।….जब किसी मनुष्य के किसी अंग को लकवा मार जाता है तो वह चेतना शून्य हो जाता है। इसी भांति हमारे समाज को लकवा मार गया है, उसको कोई कितना भी कष्ट क्यों न दे पर महसूस ही नहीं होता। हरेक तभी महसूस करता है जब चोट उसके सिर पर आकर पड़ती है। हमारे पतन का कारण हममें संगठन की कमी ही है। बाकी बुराईयां अशिक्षा आदि तो पतित अवस्था के लक्षण मात्र ही हैं। इसलिए संगठन करना ही संघ का ध्येय है । इसके अतिरिक्त और यह कुछ भी नहीं करना चाहता है। मेरा खयाल है कि एक बार संघ के रूप को देखकर तथा उसकी उपयोगिता समझने के बाद आपको हर्ष ही होगा कि आपके एक पुत्र ने भी इसी कार्य को अपना जीवन कार्य बनाया है। परमात्मा ने हम लोगों को सब प्रकार समर्थ बनाया है, क्या फिर हम अपने में से एक को भी देश के लिए नहीं दे सकते हैं?
आपने मुझे शिक्षा-दीक्षा देकर सब प्रकार से योग्य बनाया, क्या अब मुझे समाज के लिए नहीं दे सकते हैं ? जिस समाज के हम उतने ही ऋणी हैं। यह तो एक प्रकार से त्याग भी नहीं है, विनियोग है। समाजरूपी भूमि में खाद देना है। आप यकीन रखिए कि मैं कोई ऐसा कार्य नहीं करुंगा, जिससे कोई भी आपकी ओर अंगुली उठाकर देख भी सके। उलटा आपको गर्व होगा कि आपने देश और समाज के लिए अपने एक पुत्र को दे दिया है। बिना किसी दवाब के केवल कर्तव्य के खयाल से आपने मेरा लालन-पालन किया, अब क्या अंत में भावना कर्तव्य को धन दबाएगी।
भावना से कर्तव्य सदैव ऊँचा रहता है। आपके पासके पास एक के स्थान पर तीन-तीन पुत्र हैं, क्या‍उनमें आप एक को समाज के लिए नहीं दे सकते हैं? मैं जानता हूँ कि आप नहीं, नहीं कहेंगे। इस परम पवित्र कार्य के लिए आपकी हां, मेरे लिए सदैव रहेगी।
आपका
भांजादीना
जुलाई 21, 1942
पण्डित दीनदयाल से जुड़ा यह एक पत्र नहीं, ऐसे अनेक पत्र हैं जो उन्होंने समय-समय पर अपने परिवारजनों और मित्रों को लिखे हैं। इन सभी पत्रों का सार सिर्फ एक ही है । भारत, भारत और भारत का परम वैभव और अपने समाज का कल्याण ।
दीनदयाल उपाध्याय के जीवन में एक संघ प्रचारक के अलावा जीवंत पत्रकार रूप भी हमें देखने को मिलता है। वास्तव में एक राजनेता और एक पत्रकार के रूप में उनकी दृष्टि स्पष्ट थी कि यदि देश में आमूलचूल परिवर्तन करना है तो पहले शिक्षा का भारतीयकरण होना चाहिए। पत्रकारिता में भी बदलाव के लिए वे शिक्षा पद्धति में बदलाव पर बल देते थे, उनका विश्वास था कि किसी भी देश की संस्कृति को समझने के लिए वहां की शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप उस संस्कृति के अनुरूप होना चाहिए। देखा जाय तो यही वह कारण है कि उनके लेखन में हिन्दुत्व एवं भारतीय और सभ्यता की स्पष्ट झलक मिलती है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय देश और दुनिया को वह दर्शन दे गए हैं जिस पर चलकर समूचा विश्व मानवता की सांसे ले सकता है, जहां पर परहित ही पहला धर्म है और जहां परपीड़ा ही अपनी स्वयंक की वेदना है। उनका यह दर्शन स्वतंत्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टी प्रदान करता है। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करने का साहस दिखाया है। उनकी इस प्रगतिशील विचारधारा ने भारत को आर्थिक मोर्चे पर रचनाकार बनाया है। वे कहते थे कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है। वे कहते थे.. विचार-स्वातंत्र्य के इस युग में मानव कल्याण के लिए अनेक विचारधाराओं को पनपने का अवसर मिला है। इसमें साम्यवाद, पूंजीवाद , अन्त्योदय, सर्वोदय आदि मुख्य हैं। किन्तु चराचर जगत को सन्तुलित ,स्वस्थ व सुंदर बनाकर मनुष्य मात्र पूर्णता की ओर ले जा सकने वाला एकमात्र प्रक्रम सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित जीवन-विज्ञान, जीवन-कला व  जीवन–दर्शन है।
संस्कृति निष्ठा दीनदयालजी के द्वारा निर्मित राजनैतिक जीवनदर्शन का पहला सूत्र है। उन्हीं के शब्दों में कहें तो “भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन है, उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है।  इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा”।पंडित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानववाद में जो सबसे बड़ा कार्य करते दिखाई देते हैं, वह है आधुनिक एवं पुरातन की आपस में तुलना। वह कहते हैं कि देश की दिशा में विचार करने वाले दो प्रकार के लोग दिखाई देते हैं, एक वह लोग हैं जो भारत की हजारों वर्षों से चली आनेवाली प्रगति की दिशा जोकि पराधीन होने में जहां वह रुक गया वहां से उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं तो दूसरे वे लोग हैं जो भारत में उस पुरानी संस्कृति को ना मानते हुए पश्चिम में जो आधुनिक आंदोलन हुए और जो परिवर्तन आया, उसके हिसाब से भारत को आगे बढ़ाने में विश्वास करते हैं।  पंडितजी कहते हैं कि यह दोनों ही विचार अपने आप में पूर्ण सत्य नहीं किंतु कुछ सत्य अवश्य है।..इसलिए इसका जो सत्य है उसको धारण करके आगे हमको चलने की नीति बनानी चाहिए।

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