लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

Posted On by &filed under समाज.


yamunaजब सैंया भये कोतवाल, तो डर काहे का

उम्मीद थी कि लोगों को जीवन जीने की कला सिखाने वाला ’आर्ट आॅफ लिविंग’, यमुना के जीवन जीने की कला में खलल डालने से बचेगा; साथ ही वह भी यह भी नहीं चाहेगा कि उनके आयोजन में आकर कोई यमुना प्रेमी खलल
डाले। किंतु इस लेख के लिखे जाने तक जो क्रिया और प्रतिक्रिया हुई, उससे इस उम्मीद को झटका लगा है।

हरित पंचाट पहुंची यमुना

गौरतलब है कि आर्ट आॅफ लिविंग की 35 वीं सालगिरह मनाने के लिए, मयूर विहार फेज-एक (दिल्ली) मेट्रो स्टेशन और डीएनडी फलाईओवर के बीच के यमुना खादर में आयोजन को मंजूरी दिए जाने के विरोध में ’यमुना जिये
अभियान’ संयोजक श्री मनोज मिश्र ने राष्ट्रीय हरित पंचाट में अपनी याचिका दायर कर दी है। याचिका में कहा गया
है कि प्रतिबंध के बावजूद यमुना खादर की करीब 25 हेक्टेयर पर मलबा डंप किया जा रहा है। उन्होने इसे यमुना के

पर्यावास के लिए घातक बताया है। गौरतलब है कि पंचाट के ही एक पूर्व आदेशानुसार, ऐसा करने पर 50 हजार रुपये जुर्माना किया जाना चाहिए। पंचाट ने याचिका स्वीकार करते हुए आर्ट आॅफ लिविंग फाउंडेशन तथा दिल्ली विकास
प्राधिकरण..दोनो को नोटिस थमा दिया है। न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने आई आई टी, दिल्ली
के प्रो. ए. के गोसांई को आदेश दिए हैं कि वह डी डी ए के वकील के साथ जाकर मौके का मुआइना करें और एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट दें। अगली सुनवाई के लिए 17 फरवरी की तारीख तय कर दी गई है।

प्रतिक्रिया: खूंटा यहीं गङेगा

इस बीच मलबा डालने की तसवीरें जारी करने के बावजूद श्री श्री ने दैनिक भास्कर के प्रतिनिधि श्री अनिरुद्ध शर्मा को दिए अपने साक्षात्कार में
मलबा डालने की खबर को गलत करार दिया है। आयोजन से यमुना क्षति का पाश्चाताप् करने
की बजाय, उलटे उन्होने दावा किया है कि उनके आयोजन से यमुना को नुकसान की बजाय, फायदा होगा। आयोजन में आ रहे लोग, एक ऐसा एंजाइम लेकर आयेंगे, जिससे दिल्ली की यमुना मंे गिरने वाले 17 नालों में बहाया
जायेगा। दिलचस्प है कि उन्होने यह भी कहा कि यमुना की ज़मीन का चुनाव इसलिए भी किया गया है, ताकि लोगों का ध्यान यमुना की ओर आकर्षित हो।

रिकार्ड बनाने की तैयारी

यमुना जी को लेकर ’आर्ट आॅफ लिविंग’ की यह नजर और नजरिये को जीवन जीने की किस कला श्रेणी मंे रखें; पाठक बेहतर तय कर सकते हैं। आर्ट आॅफ लिविंग की तरफ से तय है कि इसमें भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी और माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी से लेकर देश-विदेश की बङी हस्तियां भी शामिल होंगी। 11 से 13 मार्च के बीच इसे विश्व सांस्कृतिक महोत्सव की तरह मनाये जाने की योजना है। 35 हजार कलाकार, 40 से ज्यादा वाद्य यंत्रों के लिए एक ऐसा विशाल मंच बनाया जाना है कि उसका नाम गिनीज बुक आॅफ रिकार्डस् में शामिल हो जाये। अपेक्षित 35 लाख आगुन्तकों के लिए शेष व्यवस्था को लेकर करीब एक हजार एकङ ज़मीन पर तैयारियां जोरो पर हैं।
इस परिदृश्य के मद्देनजर मैं तो मैं तो सिर्फ यहां यह लिखना चाहूंगा कि ठीक ही है कि जब सत्ता साथ हो, तो कोई
क्यो परवाह करें ? जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का। शायद यही है इस 21वीं सदी के दूसरे दशक में जीवन जीने की असली कला।

स्ंावेदनहीन दिल्लीवासी

अनुयायियों से सवाल है कि बाकेंबिहारी को पूजने वाले भला कैसे भूल सकते हैं कि कालियादेह पर नन्हे कान्हा का
मंथन-नृतन कृष्ण की कृष्णा को विषमुक्त कराने की ही क्रिया थी! दिल्ली वालों को भी भूलने का हक नहीं कि
तुगलकाबाद के किले से लाकर कश्मीरी गेट से अजमेरी गेट के बीच देल्ही को बसाने वाली यमुना ही थी। जिस
लालकिले की प्राचीर से उगते हुए आजादी का सूरज कभी सारी दुनिया ने देखा था, उसकी पिछली दीवार से जिसने
इश्क किया, वे लहरें भी इसी यमुना की थी। कोई हिन्दुस्तानी भला यह कैसे भूल सकता है !

आखिरकार दिल्लीवासी खुद कैसे भूल सकते हैं कि यमुना, दिल्ली की लाइफलाइन है ? कैसे भूल सकते हैं कि वजीराबाद पुल से ओखला बैराज के बीच की 22 किलोमीटर के बीच यह दूरी, दुनिया में किसी भी नदी की तुलना में
यमुना के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। इसी हिस्से में यमुना सबसे ज्यादा प्रदूषित है। इसी हिस्से में आकर यमुना सिकुङकर डेढ से तीन कि.मी. चैङी रह जाती है। यही वह हिस्सा है, जिसने 1947 से 2010 के मध्य नौ बाढ.
देखी हैं – 1947, 1964, 1977, 1978, 1988, 1995, 1998, 2008 और 2010। देखें तो, इस हिस्से को सबसे ज्यादा
धमकी सरकारी एजेन्सियों ने ही दी है – यमुना में गिरने वाले 17 नाले, 100 एकङ पर शास्त्री पार्क मेट्रो, 100 एकङ में यमुना खादर आई टी ओ मेट्रो, 100 एकङ में खेलगांव व उससे जुङे दूसरे निर्माण, 61 एकङ में इन्द्रपस्थ बस डिपो, एक निजी ट्रस्ट द्वारा 100 एकङ में बनाया अक्षरधाम मंदिर, और अब भी यह आयोजन भी सरकारी सहमति का ही नतीजा है।

क्या ये धमकियां अनसुनी करने योग्य हैं ? नहीं!

पर्यावरण संरक्षण कानून – 1986 की मंशा के मुताबिक, नदियों को ’रिवर रेगुलेशन जोन’ के रूप में अधिसूचित कर
सुरक्षित किया जाना चाहिए था। 2001-2002 में की गई पहल के बावजूद, पर्यावरण मंत्रालय आज तक ऐसा करने में अक्षम साबित हुआ है। बाढ़ क्षेत्र को ’ग्राउंड वाटर सैन्चुरी’ घोषित करने के केन्द्रीय भूजल आयोग के प्रस्ताव को हम कहां लागू कर सके ? नदी भूमि पर निर्माण की मनाही वाली कई सिफारिशें हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने नदी भूमि को
जलनिकाय के रूप में सुरक्षित रखने कहा; हमने नहीं सुना। हम सुन तो आज भी नहीं रहे हैं। ज़मीन यमुना की है; इसलिए शायद हमे दर्द नहीं होता। हम यमुना को मां कहते जरूर हैं, किंतु मां के दर्द से दुखी नहीं होते। ऐसे ही हैं हम दिल्ली वाले…संवेदनाशून्य !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *