लेखक परिचय

मनोहर पुरी

मनोहर पुरी

करीब चालीस वर्षों से पत्रकारिता में व्यस्त। विशेष संवाददाता, सह संपादक, संपादक के पद पर रह चुके हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन। दो सौ से अधिक वार्ताओं, संसद समीक्षाओं और समसामयिक टिप्पणियों का प्रसारण। पांच सौ से अधिक कहानियाँ, कविताएँ, व्यंग्य एवं समसामयिक लेख देश विदेश की ख्याति लब्ध पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित। समालोचनात्मक, सृजनात्मक, विवरणात्मक लेखन में रुचि।

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 आमिर भार्इ! सत्यमेव जयते के लिए आपको अपने किये पर पूरी तरह से शर्मिन्दा होना ही चाहिए। जो सत्यमेव जयते बोलेगा उसे तो एक न एक दिन लजिजत होना ही पड़ता है। आखिर क्या सोच कर आपने नंगों को उनकी नंगार्इ दिखाने का साहस किया। आप जानते ही हैं कि हमारी सभ्यता और संस्कृति इस बात की इजाजत नहीं देती कि किसी को उसका घिनौना चेहरा और नंगा बदन सार्वजनिक रूप से दिखाया जाये। हमारे यहां तो अन्धों को सूरदास कह कर मान दिया जाता है। आपने न जाने क्या सोच कर ‘काने को ‘काना कह डाला। मुर्दों को उनका चेहरा वैसे भी दिखाया नहीं जा सकता और जिनकी आत्मा ही मर चुकी होती है उन्हें दिखाने का कोर्इ लाभ नहीं। भला इससे आपको क्या हासिल होने वाला है। आप अपने व्यवसाय में सूरज की भांति चमक रहें हैं। आपको क्या आवष्यकता थी कि आप डाक्टरों की काली कोठरी में रोशनी की किरण ले कर घुस गये। सारी दुनिया जानती है, और आप भी जानते ही होंगे, कि हमाम में सभी नंगे होते हैं इसलिए हमाम के भीतर ‘क्लोजअप वाली ‘शूटिंग नहीं की जाती। अच्छा हुआ आपने भी नहीं की अन्यथा परिणाम और भी भंयकर हो सकते थे। आप की सबसे बड़ी गलती यह है कि आप उस ड्रांर्इंग रूम में कैमरा ले कर पहुंच गये जहां हर एक शख्स को बहुत ही सभ्य तरीके से सजा संवरा बैठा हुआ होना चाहिए था परन्तु न जाने क्यों आपने जिस भी कोण पर अपना कैमरा घुमाया वहां पर नंगार्इ के अतिरिक्त कुछ भी नजर नहीं आया।

आमिर भार्इ ! हिन्दू धर्म की इस एक आस्था पर मेरा कतर्इ विश्वास नहीं है कि आत्मा कभी मरती नहीं। यदि किसी ने मरी हुर्इ आत्माओं का जुलूस निकलते हुए देखना हो तो उसे कहीं दूर जाने की आवष्यकता नहीं है, किसी भी सरकारी अस्पताल में टहलते हुए चले जायें,ढेर सारी मरी आत्माओं के दर्षन हो जायेंगे। वहां तो शायद गलती से कोर्इ एक आध डाक्टर अपनी आत्मा के साथ जीवित मिल भी जायेगा परन्तु यदि पूरी तरह से आत्माओं के शमशान के दर्षन करने हों तो किसी भी प्राइवेट कत्लखाने अर्थात हस्पताल में चले जायें वहां पर आप को मरी हुर्इ आत्माओं का दिलकश नजारा पल प्रति पल देखने को मिलेगा। वैसे हर कालोनी और हर गली के मुहाने पर ऐसी आत्मायें अपनी अपनी दुकानें सजा कर बैठीं हैं। आपकी सबसे बड़ी गलती यह है कि आपने यह मान लिया कि कहीं कहीं डाक्टरों में अभी भी आत्मायें जिंदा हैं। कुछ को आपने दिखाया भी और कुछ के साथ आपका वास्ता भी पड़ा होगा। ये शायद वे डाक्टर होंगे जिनके संस्कारों पर अभी हमारी अध्यातिमकता का थोड़ा बहुत प्रभाव शेष है और वे ईश्वर के असितत्व में विश्वास करते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं न कहीं उन्हें भगवान को भी मुंह दिखाना ही पड़ेगा। नहीं तो ज्यादातर डाक्टर भगवान का सहारा तब लेते हैं जब वह रोगी को मौत के द्वार तक पहुंचा चुके होते हैं और मरीज के संबधियों को कहने के लिए उनके पास कुछ भी शेष नहीं बचता और यह कह कर वह अपने दायित्व से मुक्त हो जाते हैं कि अब तो सब कुछ भगवान के हाथ में है। अथवा जिन्हें अपने जीवन में ऐसा कटु अनुभव हुआ होगा जब किसी डाक्टर ने उनके किसी प्रिय जन का चिकित्सा के नाम पर बेरहमी से कत्ल किया होगा अथवा इलाज के नाम पर उनका घर किसी निर्मम डाकू की तरह से लूट लिया होगा। मैं मानता हूं कि ऐसे भुक्तभोगी डाक्टरों की भी कमी नहीं होगी। शायद ऐसे ही डाक्टरों के बल पर अभी तक मरीज बच जाते होंगे। पर ऐसे डाक्टरों का अपने ही व्यावसायिक समाज में कितना आदर है यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है। उनकी इस सोचनीय स्थिति के लिए किसे माफी मांगनी चाहिए यह भी आप स्वयं माफी मांगने से पहले तय करवा लें।

आमिर भार्इ, अधिकांश डाक्टरों अथवा उनकी संस्थाओं में तो इतना साहस ही नहीं है कि वे आप से माफी मांगने की बात करते परन्तु जिन कुछ गिने चुने डाक्टरों ने यह हिम्मत दिखार्इ है इसके लिए उनकी प्रषंसा की जानी चाहिए। जहां तक मेरा अनुभव है यदि उनकी भी जांच पड़ताल की जायेगी तो वह भी ऐसे ही शूर वीर निकलेंगे जो युद्ध भूमि में कटे हुए शवों का रक्त अपने हाथों पर लगा कर अपने आपको विजेता सिद्ध किया करते हैं। अथवा ऐसे धर्मात्मा जो दिन रात गरीबों का खून चूस कर उसका एक छोटा सा अंश भगवान के मंदिर में चढ़ाते हैं अथवा सार्वजनिक स्थानों पर लंगर लगवा कर गरीबों को भोजन बंटवाते हैं। मेरा दावा है कि इनमें से अधिकांश नौ सौ चूहे खा कर हज करने वाली बिलिलयों सरीखे ही निकलेंगे। इस पर भी यदि उनका आग्रह है तो आपको माफी मांगने में परहेज नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि आपको एक जगह ऐसा करना भी पड़ेगा तो डाक्टरों की दिन रात माफी मांगते मांगते पहले से ही डेढ़ी हुर्इ कमर टूट ही जायेगी।

भैया आमिर, बताओ आखिर डाक्टर किस किस बात के लिए समाज और मानवता से माफी मांगेंग, जिसका वह दिन रात कत्ल करते हैं। हो सकता है कि कभी किसी डाक्टर का किसी मरीज के रिश्तेदारों ने किसी परिस्थितिवश घेर कर अपमान किया हो परन्तु दिन रात मरीज और उनके रिश्तेदारों का पग पग पर होने वाला अपमान किस से छिपा है। मरीजों के प्रिय जनों का अपमान तो किसी भी हस्पताल में डाक्टरों, क्लर्कों और चपरासियों द्वारा दिन रात होता दिखार्इ देता है। बेबस प्रियजन, जिनके मरीज के प्राण उनके कत्लखानों में डाक्टरों के हाथों में बंधक होते हैं, कुछ कह सकने की स्थिति में भी नहीं होते और निरन्तर पैसे देने और घिघियाने के अतिरिक्त उनके पास करने को कुछ होता ही नहीं। डाक्टरों की लापरवाही से मारे गये अपने संबंधी की लाश तक लेने के लिए उन्हें एडियां रगड़नी पड़ती हैं। मरे हुए व्यकित को ‘वेंटीलेटर पर रख कर कितने हस्पताल कितना पैसा लूटते हैं क्या इस बात की जानकारी उन डाक्टरों को नहीं है जो माफी मांगने की बात करते हैं। ऐसे किसी एक कांड़ के लिए भी यदि पूरा डाक्टर समूह माफी मांगे तो क्या वह पर्याप्त होगा। डाक्टरों का यह कहना कि हो सकता है कि उनके व्यवसाय में कुछ काली भेड़ें होंगी जिनके लिए पूरे व्यवसाय को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, उचित ही है। पर लगता है उन्होंने इस कहावत को सिरे से ही भुला दिया है कि एक सड़ी हुर्इ मछली पूरे तालाब को गंदा करती है फिर जिस तालाब में अधिकतर मछलियां सड़ी हुर्इ हों तो उसकी हालत का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

डाक्टरों का कहना है कि बहुत से डाक्टर अपनी सीमा रेखा को पार करके भी बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं और कर्इ तो अपनी जेब से निर्धन मरीजों का र्इलाज तक करते हैं। इस बात में किसी को अपत्ति नहीं है। स्वयं आपने भी माना है कि बहुत से डाक्टर अच्छा काम कर रहे हैं परन्तु क्या यह सच नहीं है कि सारे ही डाक्टर मोटी ‘कैपीटिशन फीस दे कर ही अपनी पढ़ार्इ पूरी नहीं करते। बहुत से ऐसे डाक्टर भी हैं जिन्हें समाज के बहुत से लोग अपनी जेब से धन दे कर शिक्षित करते हैं। कितनी ही संस्थायें इस कार्य में लगी हैं। इतना ही नहीं मोटी फीस देने के बाद भी उनकी पढ़ार्इ पर होने वाला भारी व्यय समाज ही वहन करता है। जब समाज का इतना धन खर्च करवा कर डाक्टर अधिक धन कमाने के प्रलोभन में विदेश चल देते हैं तो उनके इस कदम के लिए माफी मांगने के लिए कौन सामने आता है।

आमिर भार्इ! आप डाक्टरों को प्रसन्न करने के लिए माफी जरूर मांग लेना नहीं तो कभी आपका किसी हस्पताल से पाला पड़ा तो आपको आम आदमी की तरह नौ नौ आंसू रोना पड़ेगा। पर हां, आप माफी मांगने से पहले डाक्टरों से इतना अवश्य ही पूछ लेना कि वे स्वयं किस किस बात की माफी मांगेंगे। क्या स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी दस्त और उलिटयों के लिए होने वाली मौतों के लिए वे माफी मांगेंगे। दिन रात देश में होने वाली कन्या भ्रूण की हत्यायों के लिए कौन माफी मांगेंगा। भविष्य में लिंग अनुपात में आने वाली असमानता से जो समस्यायें पैदा होंगी उनके लिए दोषी कौन होगा। जैसा कि आपने अपने कार्यक्रम में दिखाया है , उनसे पूछना कि आंध्र प्रदेश के उस ग्रामीण क्षेत्र में प्राय: सभी महिलाओं के गर्भाशयों को निकाले जाने के लिए माफी किसे मांगनी होगी। सड़क,रेल अथवा वायुयानों की होने वाली दुर्घटनाओं में घायल लोगों को प्राथमिक चिकित्सा तक न देने के लिए किसे माफ करना होगा। डाक्टरों द्वारा हर आपरेशन पर ली और दी जाने वाली कमीशन की माफी किसे मिलेगी। प्रत्येक चाहे अनचाहे परीक्षण के लिए ली जाने वाली कमीशन की माफी का हकदार कौन होगा। हस्पतालों में आने वाली नकली दवाइयों के लिए शर्मसार किसे होना चाहिए। हस्पताल में आर्इ महंगी दवाइयों को मरीजों को न दे कर बाजार में बेचने के लिए माफी किस के हिस्से में आयेगी।

आमिर जी, उनसे यह जरूर पूछ लेना कि सरकार से गरीबों के नाम पर सस्ती दरों पर आवंटित करवार्इ गर्इ भूमि के बदले गरीबों को इलाज के लिए भिखारियों की तरह दर दर भटकाने की जिम्मेदारी कौन लेगा। बिना आवष्यकता ही किसी भी मरीज का मन चाहा आपरेशन करने का दोश किस के माथे पर मढ़ा जायेगा। अंग प्रत्यारोपण के नाम पर अंगों के व्यापार के लिए किस किस को माफी दी जाये। सरकारी हस्पतालों में करोड़ों रुपए के उपकरणों को नकारा बना कर मरीजों को खुले बाजार से परीक्षण करवाने के लिए बाध्य किये जाने का दायित्व किस पर डाला जाये। उपकरणों और दवाइयों की होने वाली भारी चोरी का जिम्मेदार कौन होगा। बाथरूम में पानी के स्थान पर तेजाब की बोतल रखे जाने का दोश किस के माथे जायेगा। आपरेशन के दौरान रोगी के शरीर में कैंची,रूर्इ, पटिटयां और न जाने क्या छोड़ने की गलतियों की मांफी कौन मागेंगा। बायें की बजाय दायें गुर्दे को बाहर निकालने का दोषी कौन होगा। बिना ‘एंजयोग्राफी के दिल का बार्इपास आपरेशन करने वाले डाक्टरों को क्या र्इनाम दिया जाये। ‘एंजयोग्राफी की टेबल से बार्इ पास सर्जरी की टेबल तक मरीज को नाहक ही ले जाने का पाप करने वाले कितने ही डाक्टरों की ओर से माफी कौन सी संस्था मांगेंगी। एक हर्निया निकालने के नाम पर दो तीन हर्नियां निकलने की फीस वसूलने वाले डाक्टरों को लूटने और धोखा देने वालों की किस श्रेणी में रखा जायेगा।

भार्इ साहब! यह भी जान लेना कि मानव अंगों की तस्करी के बड़े बड़े घोटाले करने वाले डाक्टर किस देश के वासी हैं। नकली मरीजों, प्राध्यापकों, उपकरणों और भवनों के दम पर नये नये कालेज खोलने की मान्यता किस प्रकार दी जाती रही है। मोटी मोटी रिष्वतें स्वीकार करके किस प्रकार मैडीकल कालेज असितत्व में आते हैं इसके विशय में सभी जानते हैं। इसके लिए जिम्मेदार लोग जेल जाने पर भी शर्मसार क्यों नहीं होते। डाक्टरों की भीशण लापरवाही के वावजूद आज तक एक भी डाक्टर की मान्यता को रदद न किया जाना क्या दर्षाता है। दवाइयों की कालाबाजारी और नाहक ही ऊल जलूल दवाओं कें मरीजों के शरीर में प्रवेश के लिए किसे दंडित किया जाये। मान्यता प्राप्त डाक्टरों से कर्इ गुना अधिक झोलाछाप डाक्टरों द्वारा मरीजों के जीवन से किए जाने वाले खिलवाड़ का दायित्व किस पर होगा। अच्छी और सस्ती दवायों के होते हुए भी बहुराष्ट्रीय अथवा बड़ी बड़ी कम्पनियों की दवाओं की बिक्री को कौन बढ़ावा दे रहा है। ऐसी कम्पनियों से किसी न किसी प्रकार की रिश्वत अथवा प्रलोभन स्वीकार करने के लिए दोषी कौन है।

मुझे आशा नहीं बलिक पूरा विश्वास है कि आपको अपने इन सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर प्राप्त हो जायेंगे। हो सकता है कि कोर्इ उत्साही डाक्टर अथवा डाक्टरों की संस्था आपको यह आष्वासन भी दें दे कि भविष्य में ऐसा कोर्इ काम नहीं होने दिया जायेगा तो इससे समाज और मानवता का बहुत भारी कल्याण होगा। ऐसी कल्याणकारी हस्ती से माफी मांगने में क्या शर्म। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि यदि एक भी ऐसी संस्था भविष्य में यह सब न होने देने का भरोसा दिलाये तो आपके साथ पूरा राष्ट्र उनसे माफी मांगने के लिए तैयार हो जायेगा। इसलिए आप कृपया माफी मांगने में गुरेज न करना। प्लीज।

आपका

मनोहर पुरी

 

One Response to “मुर्दों से माफी मांगने में कैसी शर्म/मनोहर पुरी”

  1. बी एन गोयल

    BNGoyal

    ऐसा नहीं की आमिर खान के इस कार्यक्रम के बाद किसी को कोई शर्म या लज्जा लगी हो | मरीजों के प्रति लापरवाही का वोही आलम है | अभी दो दिन पहले चंडीगढ़ के पी जी आयी में एक लड़की की इस लिए मृत्यु हूँ गयी की उस लड़की के इलाज के लिए अस्पताल के पास समय नहीं था | कुछ दिन पहले दिल्ली के अस्पताल के गेट पर ही एक मरीज़ की इस लिए मृत्यु हो गयी की उस अस्पताल में आपरेशन की सुविधा नहीं थी और दुसरे अस्पताल में ले जाने के लिए उन के पास अम्बुलेंस नहीं थी | धन्य हैं ये अस्पताल – और ये डाक्टर |

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