अशोक चक्रधर को लेकर हंगामा क्यों बरपा है ?

हिन्दी अकादमी में विवाद गहराने लगा है। वजह बनी है एक ऐसा शक्स, जिस पर आरोप लगायें जा रहे है कि वह गंभीर नहीं है बल्कि हास्यवादी है। जो अपने चिंता और चिंतन को माथे के सिकन की लकीरों में तबदील होने नहीं देता बल्कि अपनी चुटिली अंदाजों से पल में हवा कर देता है। जी हाँ हम बात कर रहे है डाॅ. अशोक चक्रधर जी की।

ncr5हिन्दी अकादमी में विवाद गहराने लगा है। वजह बनी है एक ऐसा शक्स, जिस पर आरोप लगायें जा रहे है कि वह गंभीर नहीं है बल्कि हास्यवादी है। जो अपने चिंता और चिंतन को माथे के सिकन की लकीरों में तबदील होने नहीं देता बल्कि अपनी चुटिली अंदाजों से पल में हवा कर देता है। जी हाँ हम बात कर रहे है डाॅ. अशोक चक्रधर जी की। जिनके हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष बनते ही गंभीर साहित्यकार इस कदर तनाव में आ गये है कि उनकी सारी सुझ-बूझ इस्तीफे में तबदील होने लगी है। जी हां यह हादसा या कहे भारी-भरकम भूचाल आया है महा गंभीर मैन ज्योतिष जोशी के साथ। दरअसल इस विवाद की सबसे बड़ी वजह बनी है वो हिन्दी साहित्य जिसे चंद दकियानुसी साहित्यकार अपनी मुट्ठी में रखना चाहते है। आज देश की विडम्बना कहे या हिन्दी जगत के चंद सूरमाकारों की करतूत जिन्होंने हिन्दी साहित्य को गंभीर बनाने के चक्कर में इतनी जटीलता ला दी है कि लोग अब हिन्दी से कटने लगे है। और हिन्दी की जगह लोग अंग्रेजी का सहारा लेने लगे है। आज देश में जितने हिन्दी नहीं पढ़े जाते उससे कही अधिक लोगों में अंग्रेजी और अंग्रेजी साहित्य के प्रति रूचिया बढ़ने लगी है। जो हमारी कलिष्ठ हिन्दी भाषा या साहित्य से काफी सरल दिखाई पड़ती है। साथ ही हिन्दी साहित्यकारों के भारी-भरकम सोच और तेवरों के कारण ही आज के नवीन और उभरते साहित्यकार को उस कदर सफलता नहीं मिल पाई है जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी। क्योंकि आज के युवा जिस प्रवेश में पल-बढ़ रहे है, जिसमें अंग्रेजी, हिन्गलीश, क्षेत्रिय आदि भाषाओं का दबाव रहता है कि वह भारी-भरकम शब्दों का चयन अपने लेखनी में नहीं कर पाते। या कही न कही आर्थिक तंगी और जीविकोपार्जन में इस कदर जुझते रहते है कि वह न तो गंभीर और मंहगी साहित्य खरीद पाते है और ना ही उसे पढ़ने के लिए वक्त निकाल पाते है। ऐसे में जब उनकी आत्मिक और बौद्धिक चिंतन की तरंगे निकलती है जिसे वो किताबों के पन्नों पर लिख अपना नाम साहित्य जगत में गढ़ना चाहते है तो क्या उनका हक नहीं बनता। अगर कोई साहित्यकार व कवि अपनी पंक्तियों में कलिष्ठ भाषाओं का प्रयोग किये बगैर सरल भाषाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना चाहता है तो क्या उनका ये अधिकार नहीं बनता। मैं तो मानता हूं कि युग परिवर्तन के साथ ही साहित्य में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। जब देश और देशवासी ही पूर्ण हिन्दी भाषी नहीं रहे तो भला साहित्य को कलिष्ठ भाषी बनाये रखना कहा की समझदारी है। हम जैसे नवीन कवियों को इस बात की खुशी है कि अब हमारा भी पैरोकार करने वाला हिन्दी अकादमी के मंच पर जगमगाने वाला है। और आने वाले समय में कई नये साहित्यकार उभरकर सामने आयेंगे जिनकी सोच लिखे हुए किताबों के पन्नों पर इस कदर सरल भाषा में दिखाई पड़ेंगे, जिसे एक कार्यालय का चपरासी और अफसर दोनो आसानी से पढकर समझ पायंेगे। साहित्य को लेकर उनकी बीच की खाई को आसानी से पाट दिया जाएगा। इतना ही नहीं ऐसे भी लोग साहित्य से जुड़ने लगेंगे जो छोटे-छोटे शहरों और कसबों में रहते है। हिन्दी साहित्य जगत की एक और विडम्बना सुनी होगी कि भारत जैसे हिन्दी भाषी देश में हैरी पोर्टर की किताबें सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शामिल की गई। चलियें देर ही सही लेकिन कृष्ण के रूप में अशोक चक्रधर अपना चक्र चलाकर भारी-भरकम बोझ से झुके हिन्दी साहित्य के मकड़जाल को कांटकर सरल साहित्य का रूप देने में कामयाब रहे तो कई सारे प्रांतीय स्तर के रचनाकारों का भाग्य उज्जवल जरूर हो जाएगा। लेकिन देखना होगा कि वे जिस भारी-भरकम साहित्यकारों के चक्रव्यूह में फंसे हुए है, उसे अपने चक्र से कांट भी पाते है या अभिमन्यू की तरह बीच में ही दम तोड़ देते है। इसलिए जरूरत है कि तमाम साहित्य में रूचि रखने वाले नौजवान और नये-नये उभरते साहित्यकार और कवि जो जिस भी छंद में लेखन करते है, जिन्हे लगता हो कि साहित्य को कलिष्ठ बनाने की जगह सरस और सरल होना चाहिए, जिससे जन-जन तक साहित्य का प्रचार प्रसार हो सके। और देश में फिर से हिन्दी की दशा सुधरने लगे। डाॅ. अशोक चक्रधर की हौशला अफजाई या कहे उनके इस प्रयास के बढ़ते कदम में ताकत डालने के लिए समर्थन का बिगुल फुंकना बेहद जरूरी है। क्योंकि नेतृत्व करता में तब तक जोश नहीं आता जब तक की जय हो का जयकारा न लगे।
 
:- नरेन्द्र निर्मल ( लेखक समाजिक कार्यकर्त्ता और कवि हैं )

5 thoughts on “अशोक चक्रधर को लेकर हंगामा क्यों बरपा है ?

  1. मेरी एक कविता इस सन्दर्भ मे …
    महज़ अलफाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता
    कोई पेशा ,कोई व्यवसाय नही है कविता ।
    कविता शौक से भी लिखने का काम नहीं
    इतनी सस्ती भी नहीं , इतनी बेदाम नहीं ।
    कविता इंसान के ह्रदय का उच्छ्वास है,
    मन की भीनी उमंग , मानवीय अहसास है ।
    महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नही हैं कविता
    कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥
    कभी भी कविता विषय की मोहताज़ नहीं
    नयन नीर है कविता, राग -साज़ भी नहीं ।
    कभी कविता किसी अल्हड यौवन का नाज़ है
    कभी दुःख से भरी ह्रदय की आवाज है
    कभी धड़कन तो कभी लहू की रवानी है
    कभी रोटी की , कभी भूख की कहानी है ।
    महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता,
    कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥
    मुफलिस ज़िस्म का उघडा बदन है कभी
    बेकफन लाश पर चदता हुआ कफ़न है कभी ।
    बेबस इंसान का भीगा हुआ नयन है कभी,
    सर्दीली रात में ठिठुरता हुआ तन है कभी ।
    कविता बहती हुई आंखों में चिपका पीप है ,
    कविता दूर नहीं कहीं, इंसान के समीप हैं ।
    महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता,
    कोई पेशा, कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥
    कवि दीपक शर्मा
    http://www.kavideepaksharma.कॉम

    “एक बात और बस याद रखिये ”

    जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है
    न जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है

    झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं
    सच कहते हैं तो बगा़वत कि बू आती है

    फ़र्क कुछ भी नहीं अमीरी और ग़रीबी में
    अमीरी रोती है ग़रीबी मुस्कुराती है

    अम्मा ! मुझे चाँद नही बस एक रोटी चाहिऐ
    बिटिया ग़रीब की रह – रहकर बुदबुदाती है

    ‘दीपक’ सो गई फुटपाथ पर थककर मेहनत
    इधर नींद कि खा़तिर हवेली छ्टपटाती है
    http://www.kavideepaksharma.com
    http://kavideepaksharma.blogspot.com

  2. वामपंथी साहित्यकार हमेशा ही अकादमियों पर कब्जा जमाकर अपनी दुकानदारी चलाना चाहते हैं. ऐसे में निष्पक्ष छवि के चक्रधरजी के आने से अनेक साहित्यिक ठेकेदारों के पेट में मरोड़ आ गयी है.

  3. narendra nirmalji,

    hindi akaadmi ko ak aadmi dhang ka mil raha hai toh use sweekaar

    karne me baadhaa kya hai ?

    ashok chakradhar ko hindi akaadami ka upaadhyaksh banana na keval

    akaadmi balki samooche hindi jagat ke liye laabh ka sauda rahega

    aisaa mera dridh vishwas hai

    halanki na toh mera akaadmi se koi kaam padne wala hai aur na hi

    ashokji se meri koi mitrata hai, na toh maine kabhi unkaa charan-

    vandan kiya hai aur na hi ve apne kavi-sammelanon me mujhe bulaate

    hain is ke baavjood main ashok chakradhar ka isliye pakshdhar hoon

    ki ve samay ke saath chalne wale, taknik ke sath chalne wale aur

    prabal vyapaarik buddhi waale suljhe hue vyakti hain

    ve apni medha se aise kai kam karne me saksham hain jinhen kar

    paana theth guru gambheer saahityakaaron ke bas ki baat nahion

    lihaza mera poora samarthan ashok ji ke saath hai aur is muhim me

    main poori urja aur paraakram ke saath aapkaa jhanda le kar khadaa

    hoon

    bahut bahut shubh kaamnaayen aur agrim badhaaiyan

    sadaiv vinamra,

    ALBELA KHATRI
    http://www.albelakhatri.com

  4. मैं आपके विचार से पूरी तरह सहमत हूँ | अशोक चक्रधर जैसे हिंदी साहित्य के मनीषी का विरोध दुर्भाग्यपूर्ण है | नए नए कवियों, लेखकों को उचित सम्मान मिलना ही चाहिए तभी हिंदी आगे बढेगी | इस क्रम मैं कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना होगा की गुणवत्ता और भाषा की अपनी पहचान बनी रहे | ऐसा ना हो की हिंदी मैं इतना अंग्रेजी घुसेड दिया जाये जिससे हिंदी मर ही जाए |

    आज कल ज्यादातर (हिंदी मैं ) जो लिखा जा रहा है वो अजीब सा है | ढेर सारे लोग अपने आप को साहित्यकार बोंल अपने मुह मियां मिट्ठू हो रहे हैं | आज मैंने birth day मनाया इसपे कुछ लिख दिया और कहते हैं इसे भी साहित्य मनो | साहित्य क्या है वो समय बताएगा |

  5. डा. अशोक चक्रधर का हिंदी साहित्य के लिए एक महत्तवपूर्ण योगदान है . कालांतर में भाषाओँ में स्वत: बदलाव आता है.और उस बदलाव को को सहर्ष दिल से स्वीकार करना चाहिए. इंडी के महा -पंडितों से यही ही अनुरोध है कि बेवजह किसी विवाद को जन्म न दे ,जो कि किसी के आपसी ईर्ष्या से पैदा हुआ हो .

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