अटल जी, बातें और यादें

 

 विजय कुमार

बात संभवतः सितम्बर 1983-84 की है। मैं उन दिनों बरेली में प्रचारक था। पश्चिमी उ.प्र. के सभी जिला प्रचारकों की एक बैठक मथुरा में हुई। स्व. दीनदयाल उपाध्याय का पैतृक गांव नगला चंद्रभान मथुरा जिले में ही है। उनके निधन के बाद वहां उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष मेला होता है। अनेक तरह के सेवा और ग्राम्य विकास के काम भी चल रहे हैं। उनकी पैतृक झोंपड़ी को संरक्षित करते हुए एक स्मृति भवन बनाया गया है। उसका संचालन जो समिति करती है, उन दिनों उसके अध्यक्ष अटल जी ही थे।

बैठक के अंतिम दिन उन कार्यों को देखने और समझने के लिए सभी जिला प्रचारक वहां गये थे। उस दिन समिति की बैठक भी थी। अतः अटल जी भी आये हुए थे। उनके साथ सभी प्रचारकों की गपशप और प्रश्नोत्तर हुए। उन दिनों पंजाब में आतंक का बोलबाला था। उस पर लिखी अपनी कविता ‘‘दूध में दरार पड़ गयी, खून क्यों सफेद हो गया, भेद में अभेद खो गया…’’ भी अटल जी ने सुनायी। भाऊराव भी वहां उपस्थित थे। काफी अनौपचारिक वातावरण था।

इसके बाद सबने साथ-साथ भोजन किया। ब्रज की प्रसिद्ध दाल, बाटी, चूरमा आदि बना था। गांव के भी कई लोग वहां थे। अटल जी सबसे बड़ी सहजता से मिल रहे थे। एक सज्जन के साथ एक छोटा बालक भी था। अटल जी ने उससे नाम पूछा। उसने नाम बताकर कहा – राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, शिशु मोर्चा। अटल जी ने पूछा, ‘‘तुम अध्यक्ष हो, तो तुम्हारे बाकी साथी कहां हैं ?’’ उसे जो सिखाकर लाया गया था, उसमें ये प्रश्न शामिल नहीं था। अतः वह बालसुलभ सहजता से बोला, ‘‘मोय का पतो।’’ इस पर अटल जी और बाकी सब लोग खूब हंसे।

अटल जी ‘राष्ट्रधर्म’ के प्रथम सम्पादक रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री रहते हुए वे राष्ट्रधर्म कार्यालय में आये भी थे; पर प्रधानमंत्री रहते हुए भी वे आयें, ऐसी हम सबकी इच्छा थी। लखनऊ के सांसद होने के नाते वे प्रायः लखनऊ आते भी थे। एक बार राजभवन में उनसे मिलकर हम लोगों ने बड़ा आग्रह किया। दबाव बनाने के लिए हम श्री वचनेश त्रिपाठी को भी साथ ले गये थे। वचनेश जी उनसे बड़े थे। अतः वे उनका बहुत आदर करते थे और उनकी बात टालते नहीं थे। कुछ देर तो वे चुप रहे, फिर बोले, ‘‘भाई मेरे आने से पूरे मोहल्ले वाले परेशान हो जाएंगे।’’ हमने उन्हें राष्ट्रधर्म का ताजा अंक, लोकहित प्रकाशन की कुछ पुस्तकें भेंट की और लौट आये।

एक बार पता लगा कि उनका कार्यक्रम बन गया है। सप्ताह भर पहले से कई तरह के सुरक्षाकर्मी राष्ट्रधर्म कार्यालय में आने-जाने लगे। वहां और आसपास रहने वालों की सूचियां बनने लगीं। सड़कें साफ होने लगीं। एक दिन दिल्ली से सीधे बातचीत के लिए एक ‘हाॅटलाइन फोन’ भी लग गया। हम सब बड़े उत्साहित थे; पर दो दिन पूर्व फिर कार्यक्रम निरस्त हो गया। पता लगा कि प्रधानमंत्री के विशेष सुरक्षा दस्ते ने इतनी पतली गली में आने की अनुमति नहीं दी। पश्चिमी उ.प्र. में एक कहावत है, ‘‘काणी के ब्याह को सौ जोक्खो..।’’ यहां भी ऐसा ही हुआ।

प्रधानमंत्री रहते हुए वे लखनऊ में राष्ट्रधर्म के किसी विशेषांक का लोकार्पण करें, हमारी यह इच्छा भी अधूरी ही रही। लखनऊ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन सर्वेसर्वा तैयार ही नहीं होते थे, और उनकी सहमति के बिना अटल जी का कार्यक्रम नहीं बनता था। जैसे-तैसे एक बार यह तय हुआ कि लखनऊ संसदीय क्षेत्र के कार्यकर्ता सम्मेलन में ही अटल जी एक विशेषांक का लोकार्पण करें। सब तैयारी हो गयी; पर उस दिन अटल जी बीमार हो गये और दिल्ली से आये ही नहीं। क्या कहें, हमारा भाग्य ही साथ नहीं दे रहा था –

किस्मत की खूबी देखिये, टूटी कहां कमन्द
दो चार हाथ जब कि लबे बाम रह गया।।

वर्ष 2006 में ‘जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रा’ पर राष्ट्रधर्म ने एक विशेषांक निकाला। उन दिनों अटल जी प्रधानमंत्री नहीं थे। उनका स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं रहता था। अतः उसका लोकार्पण दिल्ली में भा.ज.पा. के केन्द्रीय कार्यालय में ही हुआ। अटल जी के साथ आडवाणी जी भी मंच पर थे। उस दिन अटल जी ने लिखित भाषण पढ़ा। जिनकी वाणी पर सरस्वती विराजती हो, उन्हें लिखा हुआ भाषण पढ़ता देख हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। फिर ध्यान में आ गया कि अब उनका स्वास्थ्य ही नहीं, स्मृति भी उतार पर है। इसके बाद तो वे सार्वजनिक जीवन से दूर ही होते गये।

 

 

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