निर्भया को आखिर मिला इंसाफ

स्त्री की इस परिपक्वता और न्यायपालिका के दायित्व निर्वहन के बाद अब समाज की जिम्मेबारी बनती है कि वह समाज में उस मानसिकता को बदलने का काम करे, जो बलात्कार जैसे अपराधों का कारण बनती है। क्योंकि केवल सजा के जरिएं इस दुष्प्रवृत्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। समस्या के टिकाऊ हल के लिए उन पितृसत्तात्मक धारणाओं पर भी कुठाराघात करना होगा, जो स्त्री के साथ दुष्कृत्य करने की भावना को उत्तेजित करती हैं।

प्रमोद भार्गव

निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड़ की न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में निचली अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को ही बरकरार रखा है। एक ही परिणाम में आए ये फैसले इस बात के संकेत हैं कि निर्भया के साथ निष्पक्ष न्याय हुआ है और यह न्याय पीड़ित परिवार के साथ, इस मसले से जो लोग संवेदना के स्तर पर जुड़े रहकर सड़कों पर आकर आंदोलित हुए थे, उन्हें भी न्याय का आभास हो रहा है। अदालत ने 16 दिसंबर 2012 की रात चलती बस में हुए इस बलात्कार और हत्या की जघन्यतम घटना के चारों आरोपियों की फांसी की सजा को बहाल रखा है। साफ है, कि शीर्ष न्यायालय ने वक्त के तकाजे और समाज की मंशा एवं उम्मीदों के अनुरूप निर्णय सुनाया है। यह ऐतिहासिक फैसला एक मील का पत्थर साबित होगा। यह फैसला जहां बलात्कार की मंशा रखने वाले लोगों के लिए सबक है, वहीं स्त्री सुरक्षा और सम्मान के परिप्रेक्ष्य में भी एक मिसाल बनेगा।

निसंदेह निर्भया मामला उन बर्बर अपराधों में से एक है, जिससे पूरा देश ही नहीं, दुनिया भी कांप उठी थी। नतीजतन आम आदमी से लेकर संसद, कार्यपालिका, न्यायपालिका और खबरपालिका तक सबके सब अपनी सोच का तरीका बदलने को विवश हो गए थे। नौजवानों ने दिल्ली में जो आंदोलन किया, वह राष्ट्रीय राजधानी की सीमा लांघकर पूरे देश में फैल गया था। मुजरिमों को मृत्युदंड देने की मांग उठी। इसी दौर में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के अनुत्तरित प्रश्नों पर सारगर्भित बहसें हुईं। संसद के दोनों सदनों में स्त्री की असुरक्षा को लेकर माहौल गर्माया। इस यौन हिंसा के परिप्रेक्ष्य में महिला सांसद तो रो तक पड़ी थीं। इसी दबाव के चलते जस्टिस जेएस वर्मा आयोग का गठन हुआ और बलात्कार का कानून कड़ा किया गया। इस आयोग की रिपोर्ट को ‘महिला स्वतंत्रता घोषणा-पत्र’ की संज्ञा दी गई। बलात्कारियों को मृत्युदंड देने का ‘दंड प्रक्रिया संहिता’ में प्रावधान किया गया। आरोप लगने के साथ ही आरोपी की गिरफ्तारी संभव हुई। बेगुनाही साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर डाल दी गई। बाल अपराध और बाल अपराधियों की परिभाषा बदली गई। 16 साल के नाबालिगों पर मानसिक उम्र के हिसाब से मामला चलाने का प्रावधान किया गया। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को यह अधिकार दिया गया कि मामला अदालत में चलेगा या बोर्ड में सुनवाई होगी। यह बदलाव इसलिए किया गया, क्योंकि इस दुष्कर्म में एक नाबालिग भी शामिल था। इसे पुराने कानून के हिसाब से बाल अपराध न्यायालय ने तीन साल के लिए सुधारगृह भेजा दिया, जहां से यह नाबालिग सजा पूरी करके बाइज्जत बरी हो गया। अब किशोर कानून में बदलाव के बाद नाबालिग भी कठोर सजा से बच नहीं पाएंगे।

इस मामले में सजा तो अपनी जगह ठीक है ही, अदालत ने जो फैसले में टिप्पणियां की हैं, वे  इस तथ्य की प्रतीक हैं कि इस त्रासदी ने जिस तरह से देश की सामूहिक चेतना को झकझोरा, उससे अछूती न्यायालय भी नहीं रह पाई है। अदालत ने कहा है कि यह मामला ऐसी सुनामी थी, जिसने हमारे सामूहिक मानस को कई सदमें दिए। ऐसा लगा, जैसे मानवता तबाह हो गई है। बलात्कारियों ने जिस निर्ममता से अपराध को अंजाम दिया, उसका अंदाजा लगाते हुए ऐसा लगता है कि बलात्कारी दूसरी दुनिया के लोग थे। केवल सेक्स और हिंसा की भूख के चलते इस तरह के वीभत्स अपराध को अंजाम दिया गया। इसलिए इस मामले में दोषियों को माफी अथवा राहत की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई है। इस तरह के मामलों में उम्र, बच्चें, बूढे मां-बाप की जिम्मेबारी निभाने के बहाने सजा में रियायत के कारण नहीं बन सकते हैं।

अदालत ने पीड़िता के संकेतों में दिए गए उस बयान को भी महत्वपूर्ण माना, जो उसने मृत्यु पूर्व दिया था। निर्भया की हालत नाजुक होने के बाबजूद उसके बयान में घटना का सिलसिलेवार ब्योरा था। जिसे अदालत ने किसी भी संदेह से परे माना। इस मामले में पीड़िता और दोषियों की डीएनए प्रोफाइलिंग जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य भी घटनास्थल पर उनके मौजूद होने के प्रमाण की पुष्टि माने गए। स्वाभाविक है, मामले को न्यायिक प्रक्रिया के अंतिम चरण से निकलने में 5 साल जरूर लगे, लेकिन मामले को पूरे धैर्य और विवेक से सुना के बाद ही अदालत ने यह फैसला सुनाया है। बाबजूद हमारे यहां न्याय प्रक्रिया इतनी पेचीदा और लंबी है कि अभी सजा पाए दोषियों को बचने के अवसर शेष हैं।

फैसले के खिलाफ चारों आरोपी सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर सकते हैं। पुनर्विचार याचिका पर कार्यवाही करने वाली पीठ में, फांसी की सजा सुनाने वाली पीठ से ज्यादा सदस्य होते हैं। इस मामले में, तीन और जजों को पुनर्विचार याचिका पर कार्यवाही करने वाली पीठ में शामिल होना होगा। अगर इस याचिका के बावजूद फांसी की सजा स्थगित नहीं होती है, तो बचाव पक्ष न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन दायर कर सकता है। 2002 में रूपा अशोक हुर्रा और अशोक हुर्रा मामले में भी बचाव पक्ष ने इसी याचिका का इस्तेमाल किया था। अंत में दोषियों के पास फांसी की सजा के खिलाफ राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने का भी विकल्प होगा। संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार राष्ट्रपति फांसी की सजा को माफ कर सकते हैं, दोषियों को क्षमा दे सकते हैं, सजा को खारिज कर सकते हैं या फिर उसे बदल भी सकते हैं। हालांकि राष्ट्रपति गृह मंत्रालय की सिफारिश के मुताबिक फैसला लेते हैं, किंतु इस मामले में गृह मंत्रालय स्त्री सुरक्षा के प्रति संवेदनशील है और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ऐसी याचिकाओं पर त्वरित निर्णय लेते हैं।

विडंबना है कि कठोर कानून बन जाने के बाबजूद स्त्रीजन्य यौन हिंसा पर अंकुश नहीं लगा है। असुरक्षा और हादसे बढे हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक बलात्कार के अब पहले से कहीं ज्यादा मामले समाने आ रहे हैं। दुष्कर्म की घटनाओं मंे बढ़ोतरी के चलते दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ तक कहा गया है। आए दिन छोटी बच्चियों और बृद्ध महिलाओं के साथ दुष्कर्म की खबरें आ रही है। दिल्ली पुलिस के पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के महज 29.37 प्रतिशत मामलों में आरोपियों को दोशी ठहराया जा सका है। कानून के जरिए बलात्कार का जुर्म साबित कर पाने का यह आंकड़ा पिछले पांच सालों में न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। साल 2011 में बलात्कार का अपराध साबित कर पाने में पुलिस को 41.52 प्रतिशत मामलों में सफलता मिली थी। एक साल बाद, यानी निर्भया कांड के साल में यह आंकड़ा बढ़कर 49.25 फीसदी हो गया था। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि दुष्कर्म से जुड़ी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। बढ़ते दुष्कर्म के परिप्रेक्ष्य में सिर्फ यह कहा जा सकता है कि बदले माहौल में महिलाओं का थाने में रिपोर्ट लिखाने में अब संकोच नहीं होता है। परिवार और संगठन उनका हौसला बढ़ाने का काम करने लगे हैं। शारीरिक शुचिता की वर्जनाएं टूटी हैं। शुचिता की रूढ़िवादी धारणा अब स्त्री की मानसिका बेचैनी नहीं बढ़ाती।

स्त्री की इस परिपक्वता और न्यायपालिका के दायित्व निर्वहन के बाद अब समाज की जिम्मेबारी बनती है कि वह समाज में उस मानसिकता को बदलने का काम करे, जो बलात्कार जैसे अपराधों का कारण बनती है। क्योंकि केवल सजा के जरिएं इस दुष्प्रवृत्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। समस्या के टिकाऊ हल के लिए उन पितृसत्तात्मक धारणाओं पर भी कुठाराघात करना होगा, जो स्त्री के साथ दुष्कृत्य करने की भावना को उत्तेजित करती हैं। निर्भया दुष्कर्म के समय शासन-प्रशासन ने अनेक वायदे किए थे। डाॅ मनमोहन सिंह सरकार ने एक हजार करोड़ की धनराशि से ‘निर्भया-निधि’ बनाई। नरेंद्र मोदी सरकार ने भी अपने पिछले बजट में इतनी ही धनराशि दी। लेकिन इस धन का उपयोग कितना और कैसे हुआ, इसकी कोई संतोषजनक जानकारी नहीं है। महिलाओं के लिए शुरू की गई हेल्पलाइन ठीक से काम नहीं कर रही है। सड़कों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में सीसीटीवी कैंमरे नहीं लग पाए हैं। सिटी बसों में सुरक्षाकर्मी तैनात करने का वायदा किया गया था, लेकिन पूरा नहीं हुआ। जाहिर है, दोषी की पहचान मुक्मल करने और कानून का डर पैदा करने के पुख्ता इंतजाम पांच साल में भी पूरे नहीं हुए। गोया, फिलहाल यह मुमकिन नहीं लग रहा है कि भविष्य में महिलाओं को यौन हिंसा से छुटकारा मिल जाएगा ?

 

Leave a Reply

%d bloggers like this: