अरुण तिवारी

नर्मदा कार्ययोजना : कुछ विचारणीय सुझाव

किसी भी कार्ययोजना के निर्माण से पहले नीति बनानी चाहिए। नीतिगत तथ्य, एक तरह से स्पष्ट मार्गदर्शी सिद्धांत होते हैं। एक बार दृष्टि साफ हो जाये, तो आगे विवाद होने की गुंजाइश कम हो जाती है। इन सिद्धांतों के आलोक में ही कार्ययोजना का निर्माण किया जाना चाहिए। कार्ययोजना निर्माताओं और क्रियान्वयन करने वालों को किसी भी परिस्थिति में तय सिद्धांतों की पालना करनी चाहिए। ऐसा करने से कार्ययोजना हमेशा अनुकूल परिणाम लाने वाली होती है।

एकमात्र तैरती झील लोकटक

वनस्पतियों की वृद्धि को स्थानीय लोकटक पनबिजली परियोजना ने एक और तरह से दुष्प्रभावित किया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पहले जब स्थानीय नदी – खोरदक तथा अन्य धाराओं में बाढ़ आती थी, तो उनका प्रवाह उलट जाता था। वह उलटा प्रवाह आकर लोकटक की सतह पर फैल जाता था। नदियों से आया यह जल कई ऐसे पोषक और धातु तत्व अपने साथ लाता था, जो सूखे मौसम में नीचे जमकर उर्वरा क्षमता बढ़ाते थे। वनस्पतियों की वृद्धि अच्छी होती थी; अब कम होती है।

आइये, संजो लें विरासत के ये निशां

आंकङों से इतर विरासत का वैश्विक पक्ष चाहे जो हो, भारतीय पक्ष यह है कि विरासत सिर्फ कुछ परिसंपत्तियां नहीं होती। बाप-दादाओं के विचार, गुण, हुनर, भाषा, बोली और नैतिकता भी विरासत की श्रेणी में आते हैं। संस्कृृृृृति को हम सिर्फ कुछ इमारतों या स्थानों तक सीमित करने की भूल नहीं कर सकते। भारतीय संास्कृतिक विरासत का मतलब ‘अतिथि देवो भवः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ से लेकर ‘प्रकृति-माता, गुरु-पिता तक है। गौ, गंगा, गीता और गायत्री आज भी हिंदू संस्कृति के प्रमुख निशान माने जाते हैं।

घर-घर शौचालय पर बहस ज़रूरी

समझने की बात है कि एकल होते परिवारों के कारण मवेशियों की घटती संख्या और परिणामस्वरूप घटते गोबर की मात्रा के कारण जैविक खेती पहले ही कठिन हो गई है। कचरे से कंपोस्ट का चलन अभी घर-घर अपनाया नहीं जा सका है। अतः गांधी जयंती पर स्वच्छता, सेहत, पर्यावरण, गो, गंगा और ग्राम रक्षा से लेकर आर्थिकी की रक्षा के चाहने वालों को पहला संदेश यही है कि गांवों में ‘घर-घर शौचालय’ की बजाय, ‘घर-घर पानी निकासी गड्ढा’ और ‘घर-घर कंपोस्ट’ के लक्ष्य पर काम करें।

जलमंत्री कपिल मिश्रा को भी लगा राजरोग

गौरतलब है कि पिछले साल श्री श्री रविशंकर की अगुवई में दिल्ली में विश्व सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया गया था। यह आयोजन मयूर फेज वन के सामने यमुना डूब क्षेत्र पर हुआ था। इसे लेकर यमुना जियो अभियान के श्री मनोज मिश्र ने राष्ट्रीय हरित पंचाट में अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। आपत्तियों को महत्वपूर्ण मानते हुए हरित पंचाट ने आयोजकों को दोषी करार दिया था और एक विशेषज्ञ समिति को यह जिम्मा सौंपा था कि वह आकलन कर बताये कि यमुना पारिस्थितिकी को कितना नुकसान हुआ है और उसकी भरपाई में कितना खर्च व वक्त लगेगा। विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता भारत सरकार के जलसंसाधन मंत्रालय के सचिव शशिशेखर को सौंपी गई थी।

मंदाकिनी रूठी, तो क्या रूठ नहीं जायेंगे श्रीराम ?

सरकारी तौर पर नदी-पानी बचाने की जो कुछ कोशिशें शुरु हुईं; वे इतनी अनियोजित व अनिश्चयात्मक रहीं कि नतीजा सिफर रहा। भारत सरकार की रेनफेड अथारिटी का आरोप गलत नहीं कि बुंदेलखण्ड पैकेज का पैसा सही समय पर खर्च नहीं किया गया। सरकार के पास तो नदियों की वस्तुस्थिति के नामवार रिकार्ड भी नहीं है।

भूले नहीं कि एक मां गंगा भी है

दरअसल हमने गंगा को अपनी मां नहीं, अपनी लालच की पूर्ति का साधन समझ लिया है; भोग का एक भौतिक सामान मात्र! मां को कूङादान मानकर हम मां के गर्भ में अपना मल-मूत्र-कचरा-विष सब कुछ डाल रहे हैं। अपने लालच के लिए हम मां को कैद करने से भी नहीं चूक रहे। हम उसकी गति को बांध रहे हैं। मां के सीने पर बस्तियां बसा रहे हैं। अपने लालच के लिए हम मां गंगा के गंगत्व को नष्ट करने पर उतारू हैं। हम भूल गये हैं कि एक संतान को मां से उतना ही लेने का हक है, जितना एक शिशु को अपने जीवन के लिए मां के स्तनों से दुग्धपान।

विश्व जल दिवस : समाधान सुझाती परंपरायें

दुर्योग से सरकारी विज्ञापनों जल उपभोग में बचत के हमारे नुख्से अभी मुंह, बर्तन, गाङी धोते वक्त नल खुल रखने की बजाय, मग-बाल्टी और सिंचाई में मजबूत मेड़बंदी, फव्वारा व टपक बूंद पद्धति के उपयोग तक सीमित हैं। इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय नजरिया ज्यादा व्यापक है। वे मानते हैं कि पानी…ऊर्जा है और ऊर्जा…पानी। यदि पानी बचाना है तो ऊर्जा बचाओ, उपभोग घटाओ। यदि ऊर्जा बचानी है, तो पानी की बचत करना सीखो। हमें भी अपना नजरिया ज्यादा व्यापक करना होगा।

कभी इन असली जंगलियों से भी मिलिए

बांस, बहेड़ा, टीम, गांभरी, सेब, गुलमोहर, आम, बरगद… जादव द्वारा लगाये वृक्षों की सूची विविध और इतनी लंबी है कि आप हम पढ़ते-पढ़ते भले ही थक जायें; श्री जादव इन्हे लगाते-पालते-पोषते अभी भी नहीं थके हैं। उनकी सुबह आज भी तीन बजे शुरु होती है। यूं श्री जादव अभी भी दूध बेचते हैं, पर अब वह साधारण दूध विक्रेता नहीं हैं। मवेशी इनकी रोजी-रोटी भी हैं और इनके वृक्षारोपण को मिलने वाली खाद का स्त्रोत भी। पिछले 35 वर्षों मंे राॅयल बंगाल टाइगरों ने उनकी 85 गायों, 95 भैंसों और 10 सुअरों का शिकार किया है; बावजूद इसके जादव को टाइगर सबसे प्रिय हैं। अगस्त, 2012 में एक गैंडे का शिकार होने पर श्री जादव और उनके सबसे छोटे बेटे ने कई दिन तक खाना नहीं खाया।