अरुण तिवारी

विश्व जल दिवस : समाधान सुझाती परंपरायें

दुर्योग से सरकारी विज्ञापनों जल उपभोग में बचत के हमारे नुख्से अभी मुंह, बर्तन, गाङी धोते वक्त नल खुल रखने की बजाय, मग-बाल्टी और सिंचाई में मजबूत मेड़बंदी, फव्वारा व टपक बूंद पद्धति के उपयोग तक सीमित हैं। इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय नजरिया ज्यादा व्यापक है। वे मानते हैं कि पानी…ऊर्जा है और ऊर्जा…पानी। यदि पानी बचाना है तो ऊर्जा बचाओ, उपभोग घटाओ। यदि ऊर्जा बचानी है, तो पानी की बचत करना सीखो। हमें भी अपना नजरिया ज्यादा व्यापक करना होगा।

कभी इन असली जंगलियों से भी मिलिए

बांस, बहेड़ा, टीम, गांभरी, सेब, गुलमोहर, आम, बरगद… जादव द्वारा लगाये वृक्षों की सूची विविध और इतनी लंबी है कि आप हम पढ़ते-पढ़ते भले ही थक जायें; श्री जादव इन्हे लगाते-पालते-पोषते अभी भी नहीं थके हैं। उनकी सुबह आज भी तीन बजे शुरु होती है। यूं श्री जादव अभी भी दूध बेचते हैं, पर अब वह साधारण दूध विक्रेता नहीं हैं। मवेशी इनकी रोजी-रोटी भी हैं और इनके वृक्षारोपण को मिलने वाली खाद का स्त्रोत भी। पिछले 35 वर्षों मंे राॅयल बंगाल टाइगरों ने उनकी 85 गायों, 95 भैंसों और 10 सुअरों का शिकार किया है; बावजूद इसके जादव को टाइगर सबसे प्रिय हैं। अगस्त, 2012 में एक गैंडे का शिकार होने पर श्री जादव और उनके सबसे छोटे बेटे ने कई दिन तक खाना नहीं खाया।

नदी जीवंतता को मिला अदालती आधार

योगेन्द्र नाथ नसकर बनाम आयकर आयुक्त कोलकोता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि हिदुओं की देव प्रतिमायें न्यायाधिकार धारण करने की क्षमता रखने वाली सत्ता हैं। इसलिए समाज की आस्था और उसकी मान्यता की रक्षा करने के लिए गंगा और यमुना को जीवित व्यक्ति या न्यायाधिकार प्राप्त व्यक्ति के रूप मेें घोषित करने की ज़रूरत है। नदियों की जीवंतता को संवैधानिक दर्जा दिलाने के विचार और मांग की पूर्ति का संकल्प पहली बार तब सार्वजनिक हुआ, जब वर्ष 2013 के इलाहाबाद कुंभ के दौरान ’गंगा संसंद आयोजित की गई।

भारत का पहला नदी द्वीप ज़िला माजुली

माजुली में वर्षा काफी होती है और प्रदूषक औद्योगिक इकाइया हैं नहीं। इस कारण माजुली में प्रदूषण का संकट तो नहीं है, लेकिन जीवन की असुरक्षा और अनिश्चितता यहां एक बड़ा संकट है। एक आकलन के मुताबिक, बीसवीं सदी के अंत तक माजुली की 33 प्रतिशत भूमि ब्रह्यपुत्र के प्रवाह में समा चुकी थी। ब्रह्यपुत्र, हर वर्ष माजुली का बड़ा टुकड़ा निगल जाता है। 1991 से लेकर अब तक 35 गावों का नामोनिशां मिट चुका है।

मावफलांग के खासी

दैवशक्ति लबासा की निगाह में पवित्र जंगल का बुरा करना अथवा जंगल के भीतर बुरा सोचना-बोलना किसी बड़े अपराध से कम नहीं। इसकी सजा अत्यंत घातक होती है। इसी विश्वास और जंगल पर सामुदायिक हकदारी ने लंबे अरसे तक मावफलांग के जंगल बचाये रखे। जंगलों पर हकदारी और जवाबदारी दोनो ही हिमाओं के हाथ में है।

कितना असाधारण अब सौ फीसदी कुदरती हो जाना

परिस्थिति के हिसाब से किसानों के तर्क व्यावहारिक हैं। उनकी बातों से यह भी स्पष्ट हुआ कि वे केचुंआ खाद, कचरा कम्पोस्ट आदि से परिचित नहीं है। गोबर गैस प्लांट उनकी पकड़ में नहीं है। हरी खाद पैदा करने के लिए हर साल जो अतिरिक्त खेत चाहिए, उनके पास उतनी ज़मीन नहीं है। ज़िला कृषि कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी गांव में आते-जाते नहीं। सच यही है कि जैविक खेती के सफल प्रयोगों की भनक देश के ज्यादातर किसानों को अभी भी नहीं है।