लेख समाज अतिथि शिक्षकों की यह कैसी मेहमाननवाजी September 3, 2025 / September 3, 2025 | Leave a Comment ओ पी सोनिक ऐसा माना जाता है कि भारतीय समाज के व्यवहार में अतिथि को देवता के समान मानने की भावना समाहित है। पिछले कई वर्षों से भारत की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों के लिए प्रयुक्त अतिथि शब्द जितना ट्रेंड करता रहा है, उतना पहले कभी नहीं देखा गया। जब शिक्षकों की भारी कमी का मुद्दा विभिन्न माननीय न्यायालयों में सरकारों के गले की फांस बनने लगा तो सरकारों द्वारा शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए एक ऐसा अस्थाई जुगाड़ ईज़ाद कर लिया जिससे देश की डगमगाती शिक्षा व्यवस्था फिर से चलने लगी। सरकारी शिक्षण संस्थानों में नियमित शिक्षकों की अपेक्षा अतिथि शिक्षकों की बढ़ती संख्या को देखकर लगता है कि फिर से चलने वाली व्यवस्था अब लंगड़ी व्यवस्था का रूप ले रही है। विभिन्न राज्यों में ऐसे शिक्षकों को अतिथि शिक्षक, शिक्षा मित्र, संविदा शिक्षक, पारा शिक्षक, शिक्षक सेवक और विद्या वालंटियर्स जैसे भावनात्मक नामों से जाना जाता है। काम चाहें चुनाव का हो या मतदाता सूचियों का या किसी अन्य गैर शैक्षिणिक गतिविधि का, आमतौर पर नियमित शिक्षक उक्त गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में बच्चों को पढ़ाने का ज्यादा दायित्व अतिथि शिक्षकों के कंधों पर टिका होता है। अधिकांश राज्यों में शिक्षकों के प्रति राजनीतिक उदासीनता ने उन्हें मजदूरों के स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। मजदूरों को भी कार्य दिवसों के हिसाब से पारिश्रमिक मिलता है और अतिथि शिक्षकों को भी। जिन राज्यों में मासिक आधार पर निर्धारित धनराशि देने का प्रावधान है भी तो वह अपर्यात है। मजदूरों और अतिथि शिक्षकों में बस फर्क सिर्फ इतना रह गया है कि अतिथि शिक्षकों को मजदूरों की तरह काम के लिए चौराहों पर खड़ा नहीं होना पड़ता। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में मजदूरों को वर्ष में 100 दिनों के रोजगार की सरकारी गारंटी है, लेकिन सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में काम करने वाले अतिथि शिक्षकों को वर्ष में कितने दिन का काम मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। लाला जी की दुकान पर काम करने वालों और घरों में काम करने वाली महिलाओं को महीने की तय धनराशि के आधार पर काम पर रखा जाता है। आमतौर पर इन्हें सप्ताह में एक दिन छुट्टी मिलती है जिसके पैसे नहीं कटते। और इन कार्यो को करने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता भी निर्धारित नहीं है, जो मानवीय पहलू के सकारात्मक पक्ष को दर्शाता है। शैक्षणिक योग्यता प्राप्त अतिथि शिक्षक विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। अधिकांश राज्यों में उन्हें कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता। रविवार एवं राजपत्रित अवकाशों के पैसे काट लिए जाते हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने वाले देश में क्या राज्य सरकारें आर्थिक रूप से इतनी कमजोर हो गयी हैं कि अतिथि शिक्षकों को रविवार एवं राजपत्रित अवकाशों के पैसे देने में असमर्थ हैं। अतिथि शिक्षकों पर कभी भी कार्यमुक्त होने का खतरा मंडराता रहता है। ऐसे शिक्षकों के रोजगार की अनिश्चितता शोले फिल्म के उस डायलाग की याद दिलाती है जिसमें गब्बर सिंह बसंती को डांस करने को मजबूर करता है और फिर कहता है, कि जब तक तेरे पैर चलेंगे, तब तक उसकी यानी वीरू की सांसे चलेंगी। अतिथि शिक्षकों की नौकरी भी तभी तक लगातार चल पाती है जब तक कि उस पोस्ट पर कोई नियमित शिक्षक नहीं आ जाता। नियमित शिक्षक के आने पर अतिथि शिक्षक स्वतः ही कार्यमुक्त हो जाते हैं। उन्हें शिक्षक के रूप में फिर से काम करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों एवं कस्बों की ओर आए बेरोजगार युवक निराश होकर वापस गांव लौट जाते हैं। अतिथि शिक्षकों को उनके निवास से इतनी दूर के स्कूलों में नियुक्त कर दिया जाता है कि उनका अधिकांश समय आने जाने में ही व्यतीत हो जाता है। जब भी कभी अतिथि शिक्षकों का कोई आंदोलन सक्रिय होता है तो गिद्ध की दृष्टि लगाए बैठी राजनीति आंदोलन का राजनीतिक अपहरण कर उसको निष्प्रभावी बनाने का काम करती है। देश की राजधानी दिल्ली में अतिथि शिक्षकों के ऐसे कई आंदोलन राजनीतिक अपहरण का शिकार हो चुके हैं। यही वजह है कि दिल्ली में अतिथि शिक्षकों को पक्का करने की खोखली घोषणाएं कच्ची साबित हुई हैं। ऐसी घोषणाओं के लगे पोस्टर कई स्कूलों में आज भी देखे जा सकते हैं। अतिथि शिक्षकों की कुंठा एक ऐसी असमंजसता में फंसी है जो उन्हें न तो रोजगार में होने की अनुभूति होने देती है और न ही बेरोजगार होने की। भारत में हर वर्ष परीक्षा पर चर्चा होती है पर नौकरियों के लिए आयोजित उन प्रतियोगी परीक्षाओं पर चर्चा नहीं होती जिनमें पेपर लीक होने के कारण नियुक्तियों की प्रक्रिया को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है। समय समय पर देश के कई राज्यों में अतिथि शिक्षकों के मामले माननीय न्यायालयों में सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ जाते हैं। भारत में सरकारी क्षेत्र में बढ़ती ठेकेदारी प्रथा ने एक अलग तरह के सामन्तवाद को जन्म देने का काम किया है। शिक्षा से संबंधित संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में शिक्षकों के करीब दस लाख पद खाली पड़े हैं। चौंकाने वाली यह भी है कि केन्द्रीय सरकार द्वारा संचालित केन्द्रीय विद्यालयों और जवाहर नवोदय विद्यालयों में रिक्त पद अपेक्षाकृत अधिक हैं। उक्त आंकड़ों के आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि दूर दराज के क्षेत्रों में शिक्षकों के रिक्त पदों की हालत क्या होगी। उक्त संसदीय समिति ने जल्द ही खाली पदों को भरने को कहा है ताकि शिक्षा व्यवस्था की सुचारूता को सुनिश्चित किया जा सके। भारत जिस शिक्षा व्यवस्था के दम पर विश्व गुरू बनने के सपने देख रहा है, वह अभी कोसों दूर नजर आता है। जब शैक्षणिक संस्थानों में बच्चों को पढ़ाने वाले पर्याप्त संख्या में नियमित गुरू ही नहीं होंगे तो भारत विश्व गुरू कैसे बन पाएगा। अतिथि शिक्षकों की यह कैसी मेहमाननवाजी है जो उन्हें बेरोजगारी से जूझने को विवश कर रही है। चंद राज्यों ने अस्थाई शिक्षकों के हित के लिए सराहनीय प्रयास भी किए हैं पर यह समस्या राष्ट्रीय स्तर की है तो इसके समाधान भी राष्ट्रीय स्तर के होने चाहिए। बेहतर होगा कि अतिथि या अस्थाई शिक्षकों के लिए स्थाई रोजगार की व्यवस्था पर अधिक ध्यान दिया जाए। ओ पी सोनिक Read more » What kind of hospitality is this from guest teachers अतिथि शिक्षक
खेल जगत हॉकी और हनुमानगढ़… बल्ले बल्ले! August 28, 2025 | Leave a Comment राष्ट्रीय खेल दिवस ( 29 अगस्त) हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद को समर्पित ~साधना सोलंकी स्वतंत्र पत्रकार सचमुच…हॉकी और हनुमानगढ़ की सरजमीं का कुछ ऐसा ही नाता है कि जिसने भी इसे जाना- समझा… इसके नशे को घूंट घूंट पिया तो मुंह से उल्लास की बोली पंजाबियत की महक लिए फूट पड़ी…बल्ले बल्ले! दरअसल यह शहर […] Read more » राष्ट्रीय खेल दिवस
कला-संस्कृति गणेश वंदना August 27, 2025 / August 28, 2025 | Leave a Comment वक्रतुण्ड महाकाय,तेज तुम्हारा अनुपम छाय।सूर्यकोटि सम प्रभु दाता,विघ्न हरन जग के त्राता॥ गणपति बाप्पा मोरया,विघ्न विनाशक मोरया।सर्वकार्य सिद्धि कराओ,करुणा धारा बरसाओ॥ जहाँ तुम्हारा नाम लिया जाए,वहाँ न संकट पास आए।भक्ति-दीप हम जलाएँ,मन मंदिर में तुम्हें समाएँ॥ ज्ञान-विवेक का दीप जलाओ,भक्तों को सुख-शांति दिलाओ।मंगल-कथा सदा सुनाएँ,सिद्धि विनायक घर बसाएँ॥ गणपति बाप्पा मोरया,विघ्न विनाशक मोरया।सर्वकार्य सिद्धि कराओ,करुणा […] Read more »
लेख पंख और उड़ान – भारत की स्वतंत्रता और आत्मविकास August 25, 2025 / August 25, 2025 | Leave a Comment बोधार्थी रौनक़ भारत की आज़ादी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक चेतना है — वह चेतना जिसने सदियों की पराधीनता के अंधेरे को चीरकर इस राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा होने का साहस दिया। 15 अगस्त 1947 का वह प्रभात केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि स्वतंत्र आत्मा का जागरण था। यह दिन […] Read more »
लेख सफाई कर्मियों को भी चाहिए मौत के खतरों से आजादी August 8, 2025 / August 8, 2025 | Leave a Comment ओ पी सोनिक राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में 120 से अधिक सीवर कर्मियों की मौतें हो चुकी हैं जो देश के विभिन्न शहरों की अपेक्षा सबसे ज्यादा हैं, यानी कि देश की राजधानी दिल्ली सीवर कर्मियों की मौतों के मामले में डैथ केपिटल बनती नजर आ रही है। दिल्ली उन […] Read more » Sanitation workers also need freedom from the dangers of death दिल्ली सीवर कर्मियों की मौतों के मामले में डैथ केपिटल
राजनीति कंबोडिया-थाईलैंड के बीच तनाव से चीन को होगा फायदा July 30, 2025 / July 30, 2025 | Leave a Comment राजेश जैन दक्षिण-पूर्व एशिया एक बार फिर अशांत है। कंबोडिया और थाईलैंड खतरनाक सीमा संघर्ष में उलझ गए हैं। अब तक 27 लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं।इस बार भी विवाद की जड़ वही पुरानी है—प्रीह विहेयर मंदिर। हजारों साल पुराना यह मंदिर खमेर साम्राज्य की धरोहर है लेकिन इस […] Read more » China will benefit from tension between Cambodia and Thailand कंबोडिया-थाईलैंड के बीच तनाव
राजनीति संयुक्त राष्ट्र: दंतहीन, विषरहित July 2, 2025 / July 2, 2025 | Leave a Comment सचिन त्रिपाठी दुनिया जब जलती है तो कोई ऐसा मंच चाहिए जो केवल आग बुझाने की अपील न करे बल्कि पानी लेकर पहुंचे लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में जब-जब युद्धों की चिंगारियां उठीं, तब-तब संयुक्त राष्ट्र केवल बयानों और प्रस्तावों की राख उड़ाता नजर आया। क्या यह वही संस्था है जिसे 1945 में […] Read more » United Nations: Toothless संयुक्त राष्ट्र
पुस्तक समीक्षा मन को तृप्त करने वाली पुस्तक; भारतीय संत परम्परा : धर्मदीप से राष्ट्रदीप June 27, 2025 / June 27, 2025 | Leave a Comment समीक्षक – सचित्र मिश्रा विगत दिनों डॉ. सौरभ मालवीय जी की पुस्तक ‘भारतीय संत परम्परा : धर्मदीप से राष्ट्रदीप’ पढ़ने का सुअवसर मिला। इस पुस्तक को दिल्ली के शिल्पायन पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने प्रकाशित किया है। पुस्तक पढ़कर मन तृप्त हो गया। भागदौड़ के समय में संतों के विषय में पढ़कर चित्त को शांति प्राप्त […] Read more » भारतीय संत परम्परा : धर्मदीप से राष्ट्रदीप
मनोरंजन सिचुएशनशिप: रिश्ता जिसमें किन्तु-परन्तु नहीं June 27, 2025 / June 27, 2025 | Leave a Comment सचिन त्रिपाठी प्रेम संबंधों की परिभाषाएं समय के साथ बदलती रही हैं। पहले ‘प्रेम’ एक स्थायी, सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति वाला संबंध था। फिर प्रेम विवाह, लिव-इन रिलेशनशिप और अब ‘सिचुएशनशिप’ जैसे नए रूप सामने आए हैं। सिचुएशनशिप कोई पारंपरिक प्रेम संबंध नहीं है, न ही यह पूर्णतः मित्रता है। यह उन दो लोगों के बीच का अनिश्चित-सा, पर भावनात्मक रूप से गहरा जुड़ा हुआ रिश्ता है जिसमें स्पष्टता की बजाय धुंध, स्थायित्व की जगह अस्थाई होना और भरोसे की जगह संभावनाएं होती हैं लेकिन क्या सिचुएशनशिप सिर्फ भ्रम है? या यह आज की पीढ़ी का आत्म-स्वतंत्र और यथार्थवादी प्रेम है? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए हमें इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को गहराई से समझना होगा। आज के युवा स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हैं चाहे वह करियर हो, स्थान चयन हो या रिश्ते। सिचुएशनशिप इस आज़ादी को जगह देता है। इसमें दोनों व्यक्ति एक-दूसरे की कंपनी पसंद करते हैं, लेकिन अपने जीवन के निर्णय स्वतंत्र रूप से लेते हैं। कोई सामाजिक दबाव नहीं, न ही विवाह का अनावश्यक तनाव। यह रिश्ता उन्हें भावनात्मक संबल देता है जो अभी जीवन में स्थायित्व के लिए तैयार नहीं हैं। युवा जो पढ़ाई, करियर या निजी हीलिंग के दौर से गुजर रहे हैं, वे किसी गंभीर संबंध में बंधे बिना भी साथी के साथ जुड़ सकते हैं। अक्सर सिचुएशनशिप में दोनों पक्ष शुरू से स्पष्ट होते हैं कि वे अभी किसी परिभाषित रिश्ते में नहीं हैं। यह पारदर्शिता कई बार उस झूठ और छल से बेहतर होती है जो परंपरागत प्रेम संबंधों में दिखावे के रूप में होता है। आज की पीढ़ी अपने करियर और आत्म-विकास को पहले स्थान पर रखती है। विवाह या रिश्तों की स्थायित्वपूर्ण जिम्मेदारियों को टालते हुए भी वे एक भावनात्मक सहारा चाहते हैं। सिचुएशनशिप इस जरूरत को पूरा करता है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसमें न कोई वचन होता है, न कोई भविष्य की रूपरेखा। कई बार एक व्यक्ति अधिक जुड़ जाता है जबकि दूसरा असमंजस में रहता है। इससे भावनात्मक असुरक्षा, ईर्ष्या और दुख जन्म लेते हैं। सिचुएशनशिप में वर्षों निकल जाते हैं, और जब अंत में कोई एक व्यक्ति दूर चला जाए तो दूसरे के लिए यह गहरे आघात का कारण बनता है। कई युवाओं के लिए यह एक ‘इमोशनल इंवेस्टमेंट’ होता है जिसकी कोई निश्चित परिणति नहीं होती। भले ही शहरी युवा वर्ग इसे स्वीकार कर चुका हो, लेकिन सामाजिक ढांचे में यह अब भी अजीब या ‘अधूरा’ माना जाता है। परिवार, समाज और रिश्तेदारों के सवालों का उत्तर नहीं होता: ‘क्या चल रहा है?’ ‘क्या रिश्ता है?’ “कब शादी करोगे?’ बहुत से लोग सिचुएशनशिप की आड़ में किसी को ‘टाइम पास’ समझने लगते हैं। वे यह रिश्ता तब तक बनाए रखते हैं जब तक कोई बेहतर विकल्प न मिल जाए। इसमें भावनात्मक धोखा मिलने की संभावना बहुत अधिक रहती है। भारत में मेट्रो शहरों, विश्वविद्यालय परिसरों और मल्टीनेशनल कंपनियों के युवाओं में यह रिश्ता तेजी से बढ़ रहा है। टिंडर, बम्बल जैसे डेटिंग ऐप्स पर कई युवा अब ‘सिचुएशनशिप’ को रिश्ता मानते हैं। 2024 के एक ऑनलाइन सर्वे के अनुसार, 18 से 30 वर्ष की आयु के 42% युवाओं ने स्वीकार किया कि वे ‘डेट कर रहे हैं पर कमिटेड नहीं हैं’। इसका अर्थ स्पष्ट है; रिश्तों की दिशा बदल रही है। हाल ही में एक सोशल मीडिया घटना वायरल हुई जहां एक युवती ने ‘ब्रेकअप नहीं हुआ पर अब हम स्ट्रेंजर हैं’ जैसी पोस्ट लिखी। इसने हज़ारों युवाओं के दिल की आवाज़ को शब्द दे दिए। क्या यह संबंध भविष्य है? इसका उत्तर ‘हां’ और ‘ना’ दोनों हो सकता है। हां, क्योंकि यह उन युवाओं के लिए एक विकल्प है जो फिलहाल स्थायित्व नहीं चाहते, पर अकेलेपन से जूझ रहे हैं। ना, क्योंकि यह संबंध देर-सवेर किसी एक को पीड़ा जरूर देता है, क्योंकि इंसान का मन किसी न किसी बिंदु पर स्पष्टता और सुरक्षा चाहता है। सिचुएशनशिप न तो पूर्णतः अनुचित है, न ही पूर्णतः आदर्श। यह उस दौर की उपज है जिसमें हम प्रेम को परिभाषाओं की कैद से बाहर निकालकर उसके अनुभव की ओर ले जा रहे हैं। पर यह भी सच है कि प्रेम की सबसे मौलिक आवश्यकता ‘स्पष्टता’ है। जिसकी कमी इस रिश्ते को एक ‘चुभता हुआ धुंधलका’ बना देती है। इसलिए यह जरूरी है कि यदि आप सिचुएशनशिप में हैं या उसमें जाने की सोच रहे हैं, तो ईमानदारी, संवाद और सीमाओं की स्पष्टता को सर्वोपरि रखें वरना यह रिश्ता, जिसमें कोई ‘किन्तु-परन्तु’ नहीं होना चाहिए, खुद एक अंतहीन ‘किन्तु-परन्तु’ बन सकता है। सचिन त्रिपाठी Read more » a relationship with no ifs and buts Situationship सिचुएशनशिप
खान-पान आपका सादा खाना भी काफ़ी ‘ओइली’ है! June 27, 2025 / June 27, 2025 | Leave a Comment क्या आप जानते हैं कि आपका सादा खाना भी काफ़ी ‘ओइली’ है?नहीं, हम घी या सरसों तेल की बात नहीं कर रहे—हम बात कर रहे हैं उस कच्चे तेल की जिसकी कीमत इज़राइल-ईरान जैसे युद्धों से तय होती है, और जिसकी लत में डूबी है आज की पूरी खाद्य प्रणाली. आज चावल से लेकर चिप्स के पैकेट तक, खेत से […] Read more » सादा खाना भी काफ़ी ‘ओइली’ है
राजनीति वैश्विक शांति और वर्तमान युद्ध परिप्रेक्ष्य June 25, 2025 / June 25, 2025 | Leave a Comment विवेक रंजन श्रीवास्तव शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् एक नए शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था के उदय की आशा थी परन्तु इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक में दुनियां एक विडंबनापूर्ण वास्तविकता के समक्ष आ खडी हुई है । ऐसा युग जहाँ अंतर्संबंध और तकनीकी प्रगति की अभूतपूर्व ऊँचाइयों के बावजूद, युद्ध और संघर्ष पहले से कहीं […] Read more » Global Peace and Current War Perspective
पुस्तक समीक्षा फैसला: लघुकथा नहीं, संवेदना का साहसी दस्तावेज़ June 21, 2025 / June 22, 2025 | Leave a Comment — डॉ. अमित तिवारी, समीक्षक एवं साहित्यकार “मैंने जो देखा, महसूस किया, और भीतर जिया — उसे ही इन पन्नों पर उतार दिया।” डॉ. सत्यवान सौरभ की यही पंक्ति उनके लघुकथा संग्रह “फैसला” की आत्मा बनकर उभरती है। जब समकालीन हिंदी साहित्य में लघुकथा को महज़ लघुता का पर्याय मान लिया गया है, ऐसे समय […] Read more » फैसला