राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

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उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

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लेखक - राकेश कुमार आर्य - के पोस्ट :

समाज

भारत की जाति व्यवस्था और मनु

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डा. भीमराव अंबेडकर भारत में जातिवाद के घोर विरोधी थे और वह इसे भारतीय समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा मानते थे। डा. अंबेडकर उन लोगों की मानसिकता के भी विरोधी थे, जिन्होंने अपनी दुकानदारी को चमकाने और निहित स्वार्थों की पूत्र्ति के लिए भारतीय समाज में जातिवाद को प्रोत्साहित किया और समाज में ऊंच-नीच व छुआछूत की बीमारी को भी फैलाया। डा. अंबेडकर मनु को जातिवाद का प्रणेता नहीं मानते थे और वह महर्षि दयानंद जी महाराज की जाति विषयक अवधारणा से तथा मनु के सिद्घांतों की आर्य समाजी व्याख्या से भी सहमत व संतुष्ट थे। वह चाहते थे कियह परम्परा आगे बढ़े और भारतीय समाज में समरसता का परिवेश सृजित हो।

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समाज

सर्वोदयवादी और अन्त्योदयवादी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए था हमारा संघर्ष

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भारतीय लोगों पर और विशेषत: हिंदुओं पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे मुस्लिम शासकों का इसलिए विरोध कर रहे थे कि वे मुस्लिम थे, यह आरोप भी मिथ्या है, क्योंकि मुस्लिम शासक हिंदुओं के इसलिए विरोधी थे कि वे हिंदू हैं। राजा का अनुकरण जनता किया करती है। राजा कभी प्रजा का अनुयायी नही होता है। इतिहास को स्वाभाविक और सहज रूप से अपनी दिशा निर्धारित करने देनी चाहिए। यदि इतिहास को सत्य बोलने दिया जाए तो सल्तनत काल में हिंदू प्रतिरोध के हर अवसर से लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग के लिए उठते स्वरों को देखकर हर भारतीय को गर्व होगा कि हमारे पूर्वज सर्वोदयवादी और अन्त्योदयवादी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए उस समय कितना महत्वपूर्ण संघर्ष कर रहे थे, जिस समय शेष विश्व इनके विषय में कुछ भी नही जानता था।

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विधि-कानून विविधा

अलविदा-तीन तलाक

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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब तीन तलाक की वर्तमान में जारी प्रक्रिया को सुधारने की दिशा में मौलवियों और काजियों को दिशा-निर्देश जारी करेगा। इन दिशा-निर्देशों को पूर्णत: लोकतांत्रिक और एक उदार सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप बनाने व ढालने का प्रयास किया जाएगा। अब विवाद होने पर पति पत्नी पारस्परिक सहमति से हल निकालेंगे। यदि उनकी पारस्परिक सहमति से हल नहीं निकलता है तो कुछ समय के लिए वे अस्थायी रूप से अलग हो जाएंगे जिससे कि परिस्थितियों की उत्तेजना शांत हो सके और दोनों को एक दूसरे को समझते हुए अपनी गलती का अहसास करने का अवसर मिल सके।

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लेख साहित्‍य

1857 की क्रान्ति का नायक धनसिंह गुर्जर कोतवाल

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कोतवाल धनसिंह ने इन आजादी के दीवानों की सेना का रामराम करके स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या चाहते हो? उसने अपनी ओर से लोगों से कहा कि-'मारो फिरंगी को और देश को आजाद कराओ।' हनुमान की जय बोलकर इन सिरफिरे देशभक्तों की सेना कोतवाल धनसिंह के घोड़े के पीछे-2 चल दी, वह पुलिस जो इनके विशाल दल को रोकने के लिए तैनात थी, वह भी अपने कोतवाल के पीछे पीछे चल पड़ी। इन्होंने पहला धावा मेरठ की नई जेल पर बोल दिया। इन्होंने जेल से 839 कैदियों को मुक्त कराया और वे भी मुक्त होकर स्वतंत्रता सेनानियों के इस दल के साथ मिल गए और अंग्रेेजों की मेरठ जेल तोड़ दी । वहां से यह भीड़ मेरठ शहर और सिविल लाइन में घुस गई और अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों को आग लगाना और उन्हें मारना शुरू कर दिया।

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राजनीति

कपिल मिश्रा और अरविन्द केजरीवाल की कलंक कथा

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आज केजरीवाल की कलंक कथा और कपिल के आरोप चर्चा का विषय हैं। केजरीवाल मौन हैं। हो सकता है कि वह सोच रहे हैं कि धीरे-धीरे सब शांत हो जाएगा। हम भी मानते हैं कि सब धीरे-धीरे शांत हो जाएगा, पर सत्यनिष्ठा पर जो प्रश्नचिन्ह एक बार लग जाता है वह तो चरित्र पर लगे एक दाग की भांति होता है, जिसे धोने वाली कोई साबुन आज तक नही बनी है। समाचार पत्रों को चार दिन बाद हो सकता है कि लिखने पढऩे के लिए फिर कोई 'केजरीवाल ' का 'पिता' मिल जाए या और कोई ऐसा धमाका हो जाए कि सारी मीडिया आप की सडांध मारती लाश को छोडक़र उधर को भाग ले पर दिल्ली की जनता के हृदय में तो इतनी देर में गांठ लग चुकी होगी, जिसे खोलना अब केजरीवाल के वश की बात नहीं होगी। यह जनता है जो सब जानती है-यह भूलती नही है-अपितु हृदय में लगे एक एक शूल को उठा उठाकर सुरक्षित रखती जाती है। समय आने पर सबका हिसाब किताब गिन गिनकर पूरा कर देती है। अत: केजरीवाल ध्यान रखें कि पर्दे के पीछे के उनके कुकृत्यों को जनता अपने पर्दे (हृदय) के पीछे ले गयी है और अब पर्दे का हिसाब 'पर्दे' में ही होगा।.....राज को राज रहने दो।

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राजनीति

‘लहरी’ नही ‘प्रहरी’ बनें जनप्रतिनिधि

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सत्ता में अपने लिए 'प्रबंध' और दूसरे के लिए 'प्रतिबंध' का खेल चलता रहता है। जो थोड़े से मुखर जनप्रतिनिधि होते हैं वे इस खेल में पारंगत होते हैं। वे दूसरों का रास्ता रोकने (प्रतिबंध) और अपना रास्ता प्रशस्त करने (प्रतिबंध करने) की कला को जानते हैं। इस प्रकार के जनप्रतिनिधि सत्ता में लॉबिंग करते देखे जा सकते हैं। इसीलिए ये कुछ मुखर रहते हैं। पार्टी के भीतर पार्टी बनाकर ये लोग सत्ता को भ्रमित करने या अपने अनुसार हांकने का भी प्रयास करते हैं। ये ऐसी शक्ति भी रखते हैं कि चुनावों के समय किसी का टिकट भी कटवा सकते हैं। इनके चिंतन में भी राष्ट्रचिंतन कम और अपने आपको सत्ता हिलाने में समर्थ दिखाने की चाह अधिक होती है। इस प्रकार इनसे भी देश का भला नहीं हो पा रहा।

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