लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य
वेद की बोलें ऋचाएं सत्य को धारण करें

गतांक से आगे….

यह पावन देश भारत विश्व के सभी देशों का सिरमौर केवल इसलिए है कि यह सत्यव्रती लोगों का देश है। सत्य की खोज करने वालों का देश है। केवल यही देश है जो डंके की चोट कहता है:-
ओ३म् अग्ने व्रतपते! व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि।।

वेदमंत्र कह रहा है कि-‘हे सत्यस्वरूप अग्रणी व्रतपते परमात्मन! मैं आपसे सत्यभाषण अर्थात सदा सत्य बोलने और सत्य का ही अनुकरण करने का व्रत लेता हूं, किंतु साथ ही सत्यभाषी होने का सामथ्र्य भी चाहता हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप मेरी प्रार्थना को सुनेंगे और मुझ पर अपनी अपार कृपा की वर्षा करेंगे।’

भारत सत्योपासक इसलिए रहा कि उसने ही सर्वप्रथम इस तथ्य को समझा कि सत्य से ही न्याय निकलता है। पक्षपात रहित न्याय वही व्यक्ति कर सकता है जो सत्य को धारण करने वाला होगा, अथवा जो धर्मप्रेमी होगा। जो व्यक्ति मजहबी अर्थात साम्प्रदायिक होगा वह न्याय करने में भी पक्षपात कर जाएगा। आज विश्व की अधिकांश समस्याओं और कलह-क्लेशादि का कारण यही है कि न्याय करने वाले लोग भी पक्षपाती हो उठे हैं, वह धर्माचरण को पाप समझते हैं। जो असत्य है उसे सत्य और जो सत्य है उसे असत्य मानने की भूल करते हैं। इसी को अविद्या कहते हैं और इसी अविद्या ने हमारी न्यायप्रणाली और सत्ता प्रतिष्ठानों को भी जकड़ लिया है।

भारत ने स्वतंत्रता के पश्चात ‘सत्यमेव जयते’ को अपना आदर्श बनाया। देश के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति जहां बैठते हैं, वहां उनके सिर के ऊपर लिखा गया है :-

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्घा:
वृद्घा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।।
नासौ धर्मो पत्र न सत्यमस्ति,
न तत्सत्यं मच्छलेनाभ्युपेतम्।।

यह विदुर जैसे महाज्ञानी के वचन हैं। जिन्हें वह महाभारत में धृतराष्ट्र को समझाते हुए कह रहे हैं। उनका कहना है कि-‘‘हे महाराज धृतराष्ट्र! वह सभा सभा नही जिसमें वृद्घ पुरूष ना हों। वे वृद्घ नही जो धर्म ही की बात नही बोलते। वह धर्म ही क्या जिसमें सत्य ही नही और वह सत्य ही क्या जिसमें छल का समावेश हो, अर्थात वह सत्य ही नही जो छल से युक्त हो।’’

इस श्लोक को देश के राजा (राष्ट्रपति) की पीठिका (गद्दी) के पीछे लिखने का उद्देश्य है कि यह देश आज भी सत्य का अनुसंधान करने वाला और सत्योपासक देश है। यह देश सत्य को छल-छदमों में लपेटकर कहने की साधना करने वाला देश नही है यह तो सत्य को जैसा है वैसा ही परोसने वाला देश है। सत्य से कोई समझौता यह देश नही करेगा। इसके विपरीत सत्य को धारण करेगा और ‘सत्यमेव जयते’ की परंपरा को विश्व परंपरा बनाकर आगे बढ़ेगा।

यहां पर हम यह नही कहेंगे कि देश में आदर्श चाहे जो हों, पर व्यवहार में इनके विपरीत हो रहा है या ऐसा हो रहा है-वैसा हो रहा है। नकारात्मक चिंतन पर अपने आपको केन्द्रित करने से बचने की आवश्यकता है। इसलिए यहां केवल यह देखना है कि हमारा मौलिक चिंतन क्या है? हमारा मौलिक आदर्श क्या है? हमारे गणतंत्र का वास्तविक उद्देश्य क्या है? ये सारी चीजें तो एक बात से ही स्पष्ट हो जाती हैं कि हम सत्योपासक थे सत्योपासक हैं।
क्रमश:

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