लोकसभा चुनाव 2019  में  2004 की भांति पराजय से बचें… 

क्या ‎गोरखपुर , फूलपुर व अररिया के उपचुनावों में भाजपा की पराजय ने हमको इतना निराश हो जाना चाहिये कि 2019 के चुनावों की सफलता का विश्लेषण करने के लिए किन्तु-परंतु व अगर-मगर की गर्मा-गर्म टीवी चैनलों पर चर्चाएं हो और पत्र-पत्रिकाओं में छोटे-बड़े लेख प्रकाशित होने लगें। यह उचित है कि भाजपा को ऐसी पराजयों को भी बहुत गंभीरता से लेना होगा और भविष्य में किसी भी परिस्थिति में विपक्ष की संभावित राजनैतिक चालों को समझ कर अपनी नीतियां निर्धारित करनी होगी। विपक्ष की मिथ्या धारणा बन चुकी है कि भाजपा सरकार आरएसएस के हिंदुत्व वाले अभियान को गति दें रही हैं और वह साम्प्रदायिकता भड़का कर बहुसंख्यक हिदुओं के ध्रुवीकरण से चुनावों में विजयी होती हैं। जबकि वर्तमान मोदी सरकार सबका साथ व सबका विकास के नारे को आगे बढ़ाते हुए मुस्लिम सशक्तिकरण के लिए भी अत्यधिक सक्रिय हैं। मोदी सरकार ने अपने वर्तमान कार्यकाल में अल्पसंख्यक मंत्रालय के पूर्व बजट में प्रतिवर्ष लगभग 400-500 करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी करके मुस्लिम समाज को आकर्षित करने का प्रयास किया हैं। साथ ही भरी सभा में मुस्लिम टोपी से दूर रहने वाले मोदी जी के कुछ दिन पूर्व अपने भाषण के मध्य में “अजान के मधुर स्वर” सुनने को सहर्ष रुकना भी आश्चर्यजनक लगा । जबकि देश का चुनावी इतिहास साक्षी हैं कि अधिकांश मुस्लिम समाज का मुख्य लक्ष्य भाजपा को पराजित करने का ही होता है इसीलिए वे अपना वोट केवल उस प्रत्याशी को देना चाहते है जो भाजपा के प्रत्याशी को हरा सकें। अब मुस्लिम समाज भी विपक्ष की इस जीत से उत्साहित होकर भाजपा को भविष्य में और अधिक जनून से हराने के लिये प्रयास कर सकता हैं ? इसीलिए भाजपा की इस हार से विभिन्न विपक्षी दल भी अति उत्साहित हो कर मुस्लिम समाज के व्यापक सहयोग से अपने को पुनः स्थापित करने के लिये एकजुट होने लगे हैं। इसमें कोई संदेह नही कि गैर भाजपा दल अपने अहम को त्याग कर परस्पर होने वाले मतभेदों को भुला कर संगठित हो जाये तो भाजपा को अपनी जीत के अभियान को आगे बढ़ाने में केवल राष्ट्रवादियों से ही आशा रहेगी ?
यह भी विचार करना होगा कि 2014 के लोक सभा चुनावों में ऐतिहासिक विजय के उपरांत भाजपा सांसद के बीस उपचुनावों में से केवल तीन पर ही विजयी हो पायी, क्यों ? जबकि यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस जीत-हार के चुनावी रण में राष्ट्रवादी भावना से आज भाजपा 21 राज्यों में अकेले व गठबन्धन के साथ सरकार बनाने में सफल हुई हैं । उसमें चाहे जम्मू-कश्मीर में घोर विरोधी महबूबा मुफ्ती की पीडीपी का ही साझीदार क्यों न बनाना पड़ गया हो ? पिछले दिनों पूर्वोत्तर राज्यों में त्रिपुरा की ऐतिहासिक विजय व नागालैंड एवं मेघालय में गठबंधन से सरकारें गठित करना अपने आप में एक विशिष्ट राजनैतिक सूझ-बूझ का परिचय कराती हैं। अतः इन उपचुनावों में हार को सीधे सीधे भाजपा की असफलता मानने की शीघ्रता न करें तो भी इन चुनावी परिणामों से भविष्य की चुनावी रणनीति अवश्य प्रभावित होगी।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह सोचना उचित होगा कि राष्ट्रवादियों ने 2014 में  मोदी जी को प्रबल राष्ट्रवादी मान कर धर्म और देश की रक्षार्थ कार्य करने के लिए भाजपा को ऐतिहासिक विजय दिलवायी थी ।  परंतु इसका अर्थ यह नही होना चाहिए कि सत्ता मिलते ही अपने राष्ट्रवादी सिद्धांतों और विचारों पर कुछ समझौतावादी दृष्टिकोण अपना कर मोदी सरकार दीमक के समान साम्प्रदायिक सौहार्द को नष्ट करने वाली वर्षों पुरानी मुस्लिम उन्मुखी नीतियों का सशक्तिकरण करने में ही अपनी कुशलता समझें ? साथ ही यह भी विचार करना होगा कि अन्य राजनैतिक दलों को शक्तिहीन करने के लिए उनके सिद्धान्तहीन और विरोधी नेताओं के स्वागत से क्या भाजपा के दशकों पुराने नेतागण एवं कार्यकर्ता संतुष्ट होगें ? क्या भ्रष्टाचार व ढोंगी धर्मनिरपेक्षता वाली छवि के नेताओं का भाजपा में सम्मलित होने से उनकी विचारधारा में कोई परिवर्तन हो सकेगा ? जबकि यह सर्वविदित है कि देश में भाजपा ही एकमात्र ऐसा राजनैतिक दल है जो राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रबल समर्थक है , तो फिर उपरोक्त परिस्थितियों में राष्ट्रवादियों को कोई सकारात्मक संदेश मिल पायेगा ? ‎मोदी-शाह की जोड़ी विपक्ष को समाप्त करने के लिए कितनी ही व्यूह रचना बनालें परंतु निस्वार्थ भावना से समर्पित कार्यकर्ताओं व समर्थकों की विशाल सेना के अभाव में वे कैसे सफल हो सकेंगी ? फिर भी यह कहना अनुचित है कि आज भाजपा मोदी-शाह की जोड़ी के जबड़े में जकड़ने को विवश हो रही हैं ? क्योंकि स्वस्थ व सिद्धान्त आधारित राजनीति भाजपा की एक विशिष्टता हैं जिससे किया जाने वाला कोई भी समझौता भोले-भाले सजग देशभक्तों को आहत करके उन्हें चुनावी राजनीति के प्रति उदासीन ही करता हैं। इसलिये यह भी सोचें कि कोई भी सेनानायक चाहे वह कितना ही वीर, चतुर व बुद्धिमान हो बिना समर्पित व संगठित सैनिकों के युद्ध में कैसे विजयी हो सकता है ? अतः ऐसे में समर्पित कार्यकर्ताओं व छोटे-बड़े नेताओं की उपेक्षा करके अति आत्मविश्वास में अधिनायकवादी बनना मोदी जी व उनके चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह लोकतांत्रिक राजनीति के स्थान पर सामंतवाद की ओर ले जाने की भूल कैसे कर सकते हैं ?
कृपया सभी राष्ट्रवादी ध्यान दें कि  शाइनिंग इंडिया का भ्रमित नारा देने वाले अटल जी व आडवाणी जी के नेतृत्व में भाजपा लगातार 2004  व 2009  के चुनावों में पराजित हुई और अब सबका साथ व सबका विकास के भ्रम में मुस्लिम सशक्तिकरण करने वाली मोदी सरकार की कुछ ऐसी ही त्रुटियां भाजपा के विजयी अभियान में रोड़ा न बन जायें ? इसलिये 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के प्रति सतर्क रहने के लिए अटल जी की गलतियों को न दोहराया जाय क्योंकि उस काल में हुई कुछ त्रुटियों के कारण असंतुष्ट राष्ट्रवादियों के उदासीन होने से ही सोनियानीत गठबंधन इन दोनों लोकसभा के आम चुनावों में विजयी हुआ था। जिससे अतिउत्साहित होकर सोनियानीत संप्रग की सरकार ने अल्पसंख्यकवाद को निरंतर बढ़ावा देकर व उनको सशक्त करके राष्ट्रवादियों को आहत किया और भ्रष्टाचार को भरपूर फूलने-फलने दिया । परिणामतः अत्यधिक पीड़ित होने के कारण बहुसंख्यकों ने धर्म व देश रक्षा के प्रति आक्रामक मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा  को  2014 में विजय दिलाने के लिए अथक परिश्रम किया था । यहां यह भी कहना उचित होगा कि यह केवल भाजपा व संघ परिवार के सहयोग का परिणाम नही था बल्कि करोड़ों भारत भक्त हिन्दू समाज की पीड़ा से उपजी लोक सभा चुनावों में उनकी अथक सक्रियता की सफलता थी ।अतः करोड़ों राष्ट्रभक्तों की भावनाओं का सम्मान करके उन्हें पुनः धर्मांधों के षड़यंत्रों से बचाने के लिए अब मोदी-शाह-योगी की तिकड़ी को राष्ट्रवादी नीतियों को प्रोत्साहित करना चाहिये । उन्हें अपनी संशोधित टीम के साथ समर्पित व परम्परागत मतदाताओं की पीड़ा के प्रति संवेदनशील होकर राष्ट्रव्यापी संपर्क अभियान चलाना होगा । साथ ही वर्तमान परिस्थितियों का विस्तृत विश्लेषण करके भविष्य की रणनीति बनाने के लिए अपने चारों ओर मंडराने वाले चाटूकार व अवसरवादी तत्वों से भी सतर्क रहना होगा। क्योंकि आज के अवसरवादी युग में होने वाली अत्यधिक प्रशंसा, स्तुति व आत्मप्रवंचना भी प्रगति में बाधक बनती जा रही हैं।

आपको स्मरण होगा कि राष्ट्रवादी मोदी जी ने पिछले चुनावों में अत्यधिक आक्रामक होकर समाज में एक विशेष आशा का संचार किया था परंतु पिछले 65 वर्षों की नकारात्मकता को मात्र 5 वर्षों में सकारात्मक बना देना कैसे संभव हैं ? क्योंकि जब देशद्रोही व भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय शक्तियां सैकड़ों षड़यंत्र रच कर हमको आहत करने में लगी रहेंगी तो मोदी सरकार अपनी सीमित अवधि व सामर्थ्य  की विवशता में कैसे ऐसे षड़यंत्रों को कुचल पायेगी ? आज प्रायः सभी विपक्षी व कुछ राष्ट्रवादी यह कहते नही थकते कि मोदी जी ने अपने चार वर्षों के कार्यकाल में क्या किया हैं ? अधिक विस्तार में न जाते हुए हमको यह नही भूलना चाहिये कि कम से कम मोदी सरकार में  बहुसंख्यक विरोधी “साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम अधिनियम-2011” विधेयक की चर्चा तो दूर किसी ने इससे संबंधित एक बिंदू को भी छेड़ने का दुःसाहस नही किया ।आपको ध्यान होगा कि इस विधेयक में पिछली कांग्रेसनीत सरकार ने सोनिया मंडली की हिन्दू विरोधी घीनौनी मानसिकता को आगे बढ़ाने के लिये हिंदुओं के राष्ट्र भारत में ही हिंदुओं का सत्यानाश करने के लिए षड्यंत्र रचा था। जरा यह तो सोचो कि कांग्रेस जैसे प्रमुख राजनैतिक दल की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी क्यों ऐसा अधिनियम बनवाने का दुःसाहस कर रही थी कि जिससे भारत भूमि को संम्भवतः हिन्दुविहीन बना देने का षडयंत्र स्पष्ट हो रहा था ?
अतः आज आपकी__सोच__आपकी__समझ का बहुत महत्व हैं इसलिये सभी राष्ट्रवादियों को मोदी जी के राष्ट्रवादी स्वरुप को चेताना होगा । भारतभक्ति को ठेस पहुचानें वाली विभिन्न गतिविधियों के प्रति उन्हें सतर्क भी करना होगा। आज हम सब की यह विवशता समझो या राष्ट्रभक्ति हमें मोदी जी के नेतृत्व में ही आशा व विश्वास बनायें रखकर भविष्य में पुनः भाजपा को ही विजयी बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने होंगे । तभी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में  2004  की भांति अप्रत्याशित पराजय की पुनःवर्ती से भाजपा को बचाया जा सकेगा।

विनोद कुमार सर्वोदय

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