आयुष्मान भारत : बेचारों-बेसहारों की पुनर्जन्म योजना

आयुष्मान भारत या प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) की घोषणा मोदी सरकार नें पिछले साल 1 अप्रैल 2018 वाले बजट में कर दी थी.

वैसे सभी सरकारें अपने नफ़े-नुकसान को देखकर समय समय पर योजनाएँ लांच करती रही हैं. हालाँकि असल मुद्दे की बात तो योजनाएँ की लांचिंग के बाद ही आती है. प्रश्न उठता है कि क्या यह योजना उसके घर तक पहुंची जिसने उसी की आस में अपना कीमती वोट डाला था? अक्सर जब भी यह प्रश्न उठता है तो उस गरीब के चेहरे में मानों घोर अंधियारी छा गई हो. मतलब समझे या नहीं? दरअसल उस योजना या उसकी राशि को बीच गली में भ्रष्टाचारी नामक असुरों नें सीधा ही डकार मार लिया.

ये बात वैसे एक आदमी ही नहीं कहता बल्कि उसी संसद, उसी दिल्ली के सफेद कुर्ता वाले नेता जी भी कह चुके हैं | दरअसल मैं बात कर रहा हूँ देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के एक बयान की, बात है 1989 की जब राजीव जी मध्यप्रदेश के खरगोन में आमसभा में स्थानीय युवाओं को संबोधित कर रहे थे उसी दौरान भ्रष्टाचार पर कहा था कि “दिल्ली से गाँव एक रुपया भेजता हूँ तो गाँव तक सिर्फ 15 पैसे ही पहुँचते हैं.”

इस घटनाक्रम से एक बात तो सीसे की तरह साफ हो गई कि पहले योजनाएँ भी थीं लेकिन उन्हीं के बीच भ्रष्टाचार रुपी काले साँप-सपोले भी चिपके रहते थे. दरअसल देश की जनता इन्ही काले साँपों से छुटकारा पाने के लिए आजादी के 70 वर्षों से इंतजार कर रही थी.

इसी के जवाब में मैं बात करूँगा वर्तमान सरकार यानी मोदी सरकार की एक योजना जिसे सरकार नें विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना बताया. जी हाँ बात कर रहा हूँ आयुष्मान भारत या प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) की जिसकी घोषणा मोदी सरकार नें पिछले साल 1 अप्रैल 2018 वाले बजट में ही कर दी थी. फिर 25 सितंबर 2018 के दिन इसका शुभारम्भ किया गया, मौका था पंडित दीनदयाल की जयंती का, जिनका सपना था कि “विकास उस व्यक्ति तक पहुँचे जो इस कड़ी में अंतिम पायदान पर है.”

हालांकि सभी सरकारों की तरह मोदी सरकार नें भी बड़े लाव लश्कर के साथ इसे लांच कर दिया लेकिन सवाल फिर वहीं आता था कि क्या यह योजना दिल्ली दरबार की फाइलों के बाहर जमीन पर उतरेगी या वही चार दिवारी ही इस योजना की भी अंतिम सीमा होगी?

इसके एक और जवाब में सरकार में स्वास्थ्य मंत्री जय प्रकाश नड्डा 27 दिसंबर 2018 को एक ट्वीट में सरकार की इस योजना के बारे में एक आकड़ा पेश करते हुए कहते हैं कि ” आयुष्मान भारत योजना नें एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है । इस योजना को अभी 100 दिन भी नहीं हुए हैं और 6 लाख से अधिक लोगों नें अपना मुफ़्त उपचार कराया है.”

ठीक अभी हम इसे मान कर चलते हैं कि सरकार के आकड़े हैं तो अपने मुंह मियाँ मिट्ठू भी हो सकता है! लेकिन जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी व हाई-फाई तकनीकी कंपनी यानी माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट्स नें योजना के बारे में कसीदे पढ़े और बोले कि ” भारत सरकार को आयुष्मान योजना के पहले 100 दिन पूरे होने पर बधाई, यह देखकर अच्छा लग रहा है कि इतनी संख्या में लोग इस स्कीम का लाभ उठा चुके हैं.”

अब सवाल था कि दिल्ली से दूर आकर इस योजना का लिटमस टेस्ट क्यों न किया जाए ? क्योंकि 12 मार्च 2019 तक उपलब्ध आकड़ों में आधिकारिक तौर पर बताया गया कि अब तक आयुष्मान योजना से 15,27,053 लोग मुफ़्त उपचार से लाभान्वित हो चुके हैं, इसके अलावा 2,48,32,493 गरीब परिवार के लोगों को ई-कार्ड दिए जा चुके हैं. इसके लिए 14,865 सरकारी और कुछ निजी अस्पतालों को नामांकित किया गया है. वैसे यह एक ऐसी योजना है जिसमें जात-पात, धरम, लिंग, उम्र का रोड़ा अटकाए बिना सबको बराबर लाभ देने की बात कही गई थी क्योंकि इसको हालिया सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) के आधार जारी किए गए आकड़ों पर ही लांच किया गया था.

हमनें असल भारत यानी ग्रामीण लोगों से इस योजना के बारे में असलियत जानने की कोशिश की तो कुछ ऐसी बातें निकलकर आईं. एमपी के सतना जिले के टिकुरी गाँव निवासी 21 वर्षीय दिव्य प्रकाश कहते हैं ” पहले तो गरीबों के लिए प्राइवेट हास्पिटलों में इलाज करना वश का ही नहीं था लेकिन आयुष्मान योजना से ये बात अब सच हो गई है.”

26 वर्षीय, चूल्ही निवासी, रीना द्विवेदी कहती हैं “गरीब परिवारों के लिए अब इस योजना के बाद पैसे के लिए किसी का मुंह न ताकना पड़ेगा.”

इसके बाद बात करने पर उन्होंने अपने ही परिवार की उस घटना का जिक्र भी किया जिसमें पैसों के चलते ही उनके करीबी रिश्तेदार के इलाज में देरी हुई और खामियाजा मौत. उन्होंने बताया “मेरे रिश्तेदार श्री बद्रीनारायण द्विवेदी (60 वर्षीय) को पिछले कुछ सालों से एक गंभीर बीमारी नें जकड़ रखा था बाद में जब इसके बारे में लोगों को पता चला तो उन्होंने सतना के ही एक निजी अस्पताल में हल्का-फुल्का इलाज कराया लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन इस गंभीर बीमारी के लिए लाखों की व्यवस्था भी इतनी जल्दी नहीं हो पाई कि किसी बड़े अस्पताल में इलाज कराया जाता | हालांकि बाद में उन्हें इलाहाबाद फिर नागपुर ले जाया गया तब तक काफ़ी देर हो गई थी | अंत में पिछले साल 20 जुलाई 2018 को उनकी मौत हो गई.”

इसके आगे उन्होंने कहा कि ” अगर आयुष्मान जैसी कोई योजना पहले होती तो शायद मेरे रिश्तेदार का पुनर्जन्म हो जाता.”

अब इन घटनाओं से 24 कैरेट शुद्धता वाली बात निकलकर आई कि मोदी सरकार की ये महत्वाकांक्षी योजना यानी आयुष्मान भारत बेचारों/गरीबों व बेसहारों के लिए एक तरह से पुनर्जन्म योजना है.

वैसे दुनिया में अमेरिका जैसे देशों की इतनी आबादी भी नहीं है जितने लोगों को इस योजना के तहत लाभ देने की बात कही गई थी.

एक बात तो तय है कि अगर आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं विकास के रास्ते यानी गाँव तक पहुंच जाएंगी तो वो दिन दूर नहीं जब भारत एक बार फिर समृद्ध और सशक्त बनकर उभरेगा.

शिवेंद्र तिवारी, दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म (डीएसजे) के छात्र हैं

साभार : Academics4Namo

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