“ऋषि दयानन्द के एक जीवनीकार बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय”

मनमोहन कुमार आर्य,

ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) की अनुसंधानपूर्ण मौलिक जीवनी लेखकों में बंगाल निवासी बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय का नाम सम्मिलित है। आपने 10 वर्षों तक देश भर में घूम कर ऋषि जीवन की सामग्री का संग्रह किया था। उन्होंने ही ऋषि दयानन्द के जन्म स्थान टंकारा की खोज की और ऋषि दयानन्द के बाल्यकाल के नामों दयाराम वा मूल जी का पता लगाया था। बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी और उनकी ऋषि जीवनी का ऋषि जीवन सहित्य लेखकों में महत्वपूर्ण स्थान है। आपने जो सामग्री एकत्र की थी उससे आप ग्रन्थ की भूमिका एवं ग्रन्थ के आरम्भ के चार अध्याय ही लिख पाये थे। आपको वाराणसी में अधरंग रोग हो गया था जिसके परिणाम स्वरूप दिनांक 17 जनवरी सन् 1916 को आपका देहावसान हो हुआ। ऋषि भक्त पं. घासीराम, मेरठ ने आपके द्वारा संग्रहीत सामग्री का सदुपयोग कर जीवन चरित को पूरा किया। आपका ग्रन्थ ऋषि जीवन साहित्य का अनमोल रत्न है। पं. घासीराम जी ने ग्रन्थ की भूमिका में बाबू देवेन्द्रनाथ जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला है। हम वहीं से उनका जीवन कथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय एक बंगीय सज्जन थे, वे आर्यसमाजी न थे। हम नहीं कह सकते कि उनके हृदय में ऋषि दयानन्द के प्रति श्रद्धा का उदय किस प्रकार हुआ। (इसका कुछ उल्लेख डा. भवानीलाल भारतीय जी ने आर्य-लेखक-कोश ग्रन्थ में किया है जिसे हम आगे प्रस्तुत करेंगे।) एक बार श्रद्धा का अंकुर जम जाने के पश्चात् वह पल्लवित होता ही गया। उन्हें ऋषि काजीवनचरितलिखने की लौ लग गई। उन्हेंने सन् 1894 ई0 में ही दयानन्द-चरित के नाम से एक छोटी पुस्तक दो भागों में बंगला भाषा में प्रकाशित की। (इसका हिन्दी अनुवाद आर्य प्रकाशक मैसर्स विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली से प्रकाशित है।) उसका विज्ञापन किसी बंगला समाचार-पत्र में देखकर मैंने (पं0 घासीराम जी ने) उसे मंगाकर पढ़ा। मैंने उसे अत्यन्त रोचक पाया और मन में उसका आर्य-भाषानुवाद प्रकाशित करने की इच्छा उत्पन्न हुई, परन्तु कई वर्ष तक यह इच्छा कार्य में परिणत न हो सकी। सन् 1900-1910 के बीच में वे किसी समय मेरठ आये और मुझसे मिले। उनके मिलने पर मैंने देखा कि वे दयानन्द के पीछे वास्तव में पागलसे हैं। उन्हें दिनरात दयानन्द की चिन्ता घेरे रहती थी। वे दयानन्द के जीवन की एकएक घटना का पता लगाने के लिए सैकड़ों कोस की यात्रा करने और सैकड़ों रुपया व्यय करने के लिए उद्यत रहते थे।

 

मुझे अच्छी तरह स्मरण है कि मेरठ के कुछ आर्यसमाजियों से बात-चीत करते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘आप लोग दयानन्द के अनुयायी होने का दम्भ करते हैं। आप दयानन्द से प्रेम नहीं करते। क्या आपमें से कोई उनके नाम पर मरने को तय्यार है? मैं गर्व नहीं करता, परन्तु आवश्यकता हो तो मैं दयानन्द के नाम पर अपना शिरश्छेद कराने (शिर कटाने) में इतस्ततः नहीं करूंगा। देवेन्द्र बाबू निर्धन पुरुष थे। उन्हें अपनी पुस्तकों की बिक्री से ही थोड़ी-सी आय थी। कुछ उनके बंगाली साहित्यप्रिय मित्र भी उनकी सहायता करते रहते थे। कहीं-कहीं आर्यसमाजियों से भी उन्हें कुछ मिल जाता था और इस प्रकार जो धन प्राप्त होता था, उसी से वे अपना निर्वाह भी करते थे और ऋषि-जीवन-चरित लिखने के लिए सामग्री एकत्र करने में भी व्यय करते थे। सम्भवतः सन् 1931 में मेरठ के भास्कर प्रेस के अध्यक्ष स्वर्गीय बाबू रघुवीरशरण दुबलिश ने मुझसे पूर्वोल्लिखित दयानन्द-चरित का बंगला से आर्यभाषा में अनुवाद कराया और देवेन्द्रबाबू की आज्ञा लेकर उसे प्रकाशित किया। उस समय ही आर्यजनता को पता लगा कि कोई बंगाली ऋषिभक्त भी संसार में है। देवेन्द्रबाबू एक बृहत् सर्वांग-पूर्ण दयानन्द-चरित बंगला में प्रकाशित करने के नितान्त इच्छुक थे। इसी के लिए उन्होंने असीम कष्ट सहन किया। वह उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन गया था। मुझे उसी समय यह निश्चय हो गया था कि मैं उसका आर्यभाषा में अनुवाद करूं और बंगला और आर्यभाषा की पुस्तकें एक साथ प्रकाशित हों। सन् 1915 वा 1916 में वे सब सामग्री संग्रह कर चुके थे और निश्चिन्त होकर जीवन-चरित लिखने बैठ गये थे। यह जीवन चरित सन् 1933 में आर्यसाहित्य मण्डल, अजमेर से प्रकाशित हुआ था।

 

यों तो देवेन्द्रबाबू की संगृहीत सामग्री में अनेक ऐसी घटनाएं हैं जिनका उनके अनुसन्धान के पूर्व आर्यसमाजियों को कुछ पता न था, परन्तु सबसे अधिक मूल्यवान् उनका ऋषि के पिता और जन्मस्थान का पता लगाना है। उससे पूर्व पण्डित लेखराम ने किसी से सुन-सुनाकर बिना अधिक अनुसंधान के ऋषि के पिता का नाम अम्बाशंकर और ऋषि का नाम मूलशंकर लिख दिया था और यही नाम आर्यसमाज में प्रचरित हो गये थे। देवेन्द्रबाबू ने अत्यन्त सावधानी और परिश्रम से खोज करके बताया कि वास्तव में उनके पिता का नाम कर्शनजी लालजी त्रिवाड़ी और उनका नाम दयाराम वा मूलजी (मूलशंकर का संक्षिप्त रूप) था और उनका जन्म स्थान मौर्वी राज्य के अन्तर्गत टंकारा था। इस विषय पर उन्होंने वैदिकमैगजीन गुरुकुल कांगड़ी में एक लेख भी लिखा था और एक पैम्फलेट भी प्रकाशित किया था। (इसका 17 पृष्ठीय आर्यभाषानुवाद ऋषि जीवनी के अन्त में परिशिष्ट-1 के रूप में दिया गया है।) देवेन्द्रबाबू प्रस्तावित दयानन्दचरित की भूमिका और पहले चार अध्याय ही लिख सके। वे ज्योंकेत्यों प्रकाशित किये जाते हैं। इसके पश्चात् उन्हें अर्धांग रोग ने दबाया और उसी में उनका देहान्त हो गया। यह कितने दुःख की बात है कि न तो पण्डित लेखराम ही और न देवेन्द्रबाबू ही अपने कार्य को पूरा कर सके। यदि वे दयानन्दचरित को पूरा लिख पाते तो इसमें सन्देह नहीं कि क्या साहित्य की दृष्टि से और क्या इतिहास की दृष्टि से वह एक अलौकिक ग्रन्थ होता। बहुत-सी बातें और विचार उनके मस्तिष्क में ही होंगे जो उनकी मृत्यु के साथ लुप्त हो गये। उनकी मृत्यु के पश्चात् मैंने अपने स्वर्गीय मित्र बाबू ज्वालाप्रसाद एम0ए0 की सहायता और उद्योग से जो काशी में डिप्टी कलक्टर थे, सम्भवतः सन् 1917-18 में देवेन्द्रबाबू की संगृहीत सामग्री प्राप्त की जो विचित्र दशा में थी। वह सैकड़ों छोटे-बड़े कागज के टुकड़ों, नोट-बुकों, पत्रों, पोस्टकार्डों, समाचार पत्रों के कतरनों के रूप में थी, जो कहीं पेंसिल से और कहीं स्याही से बंगाली अथवा अंग्रेजी अक्षरों में लिखी हुई थी। मैंने पहले उन सबको पढ़ा, फिर आर्यभाषा में उनका अनुवाद किया और फिर उन्हें एक क्रम में लिखा। इस प्रकार पं. घासीराम जी ने बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी द्वारा लगभग 10 वर्ष लगाकर संग्रहीत सामग्री के आधार पर ‘‘महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित नाम से जीवनचरित लिखा। पं. घासीराम जी ने एक महत्वपूर्ण बात यह लिखी है कि देवेन्द्रबाबू को जो सुविधा अंग्रेजी जानने के कारण थी वह न पण्डित लेखरामजी को और न स्वामी सत्यानन्द जी (स्वामी दयानन्द के अन्य जीवनीकार) को ही प्राप्त थी।

 

पंडित घासीराम जी ने भूमिका में यह भी बताया है कि (ऋषि दयानन्द जी विषयक) यह मिथ्या विश्वास फैला है कि महाराज को विष जगन्नाथ रसोइये ने दिया था और उसने अपना दुष्कर्म स्वीकार भी कर लिया था। इस पर भी ऋषि दयानन्द ने अपनी परम दयालुता से उसे कुछ रुपया देकर जोधपुर से भगा दिया। यह सर्वथा निराधार है। उनके (ऋषि दयानन्द के) पास किसी जगन्नाथ रसोइये के होने का पता नहीं चला। इसी प्रकार देवेन्द्रबाबू ने कितने ही भ्रमों का संशोधन किया है। हम यह बता दें कि पंडित घासीराम लिखित महर्षि दयानन्द चरित का प्रकाशन दो खण्डों में आर्य साहित्य मण्डल अजमेर से हुआ था। इसकी समाप्ती के 61 वर्षों बाद स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती के सम्पादन में यह ग्रन्थ सन् 1994 में आर्य साहित्य के प्रसिद्ध प्रकाशक गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। हमने भी इससे पूर्व इस जीवनचरित के प्रकाशन के लिये आर्यसमाज की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में पत्र आदि भेजकर प्रकाशित कराये थे। वर्तमान में इस पुस्तक का एक संस्करण प्रसिद्ध ऋषिभक्त श्री प्रभाकरदेव आर्य द्वारा मैसर्स घूड़मल प्रहलादकुमार आर्य धर्मार्थ न्यास, हिण्डोन सिटी से भी प्रकाशित होकर उपलब्ध है। डा. भवानीलाल भारतीय जी ने अपनी पुस्तक आर्य लेखक कोश में बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी की जीवन की घटनाओं एवं उनके ग्रन्थों पर प्रकाश डाला है। हम उसे भी यहां प्रस्तुत कर रहें हैं जिससे पाठक देवेन्द्र बाबू के विषय में कुछ अधिक जान सकें।

 

डॉ. भारतीय जी ने लिखा है कि स्वामी दयानन्द के जीवन के सम्बन्ध में गम्भीर अन्वेषण करने तथा उनके व्यक्तित्व को विराट् फलक पर प्रस्तुत करने का अनन्य प्रयास करने वाले बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय के स्वयं के जीवन के बारे में हमारी जानकारी नगण्य ही है। वे जीवन के आरम्भ में ब्रह्मसमाज के अनुयायी रहे, किन्तु दयानन्द के वैचारिक सम्पर्क में आकर वैदिक धर्मानुयायी कहलाने में वह गौरव का अनुभव करते थे। तथापि वे सक्रिय या पंजीकृत आर्यसमाजी कभी नहीं रहे। उन्होंने प्रसिद्ध बंगाली लेखक तथा राजनैतिक श्री रमेशचन्द्र दत्त के अनुरोध पर दयानन्द जीवन विषयक शोध कार्य किया। अपने जीवन के बहुमूल्य 10 वर्षों को उन्होंने स्वामी दयानन्द के जीवन विषयक तथ्यों के अन्वेषण तथा संग्रह में लगा दिया। एतदर्थ उन्होंने देश के विभिन्न भागों में भ्रमण किया। आर्यसमाज कलकत्ता के प्रधान राजा तेजनारायण सिंह ने इस कार्य में उनकी आर्थिक सहायता की थी। उन्होंने दयानन्दीय जीवन विषयक तथ्यों एवं सामग्री संकलन करने के लिये दयानन्द के समकालीन लोगों से भेंट की, सैकड़ों से पत्र व्यवहार किया तथा तत्कालीन पत्रपत्रिकाओं में छपे दयानन्द विषयक तथ्यों, समाचारों तथा संदर्भों का संग्रह किया। 17 जनवरी, 1916 को वाराणसी में उनका उस समय निधन हुआ, जब वे जीवनचरित विषयक सामग्री का संग्रह कर चुके थे। तब तक स्वामी जी का यह विशद जीवन चरित भूमिका तथा चार अध्याय पर्यन्त ही लिखा गया था।

 

बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय द्वारा लिखे गये बंगला के मूल ग्रन्थ: 1- दयानन्द चरित, 2- दयानन्द हिन्दुर आदर्श संस्कारक, 3- दयानन्द सरस्वती का स्वलिखित जीवन वृतान्त, 4- महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित-भूमिका तथा चार अध्याय (अपूर्ण तथा अप्रकाशित), 5- स्वामी दयानन्द जन्मस्थानादि निर्णय एवं 6- विरजानन्द चरित (अप्रकाशित)। उक्त ग्रन्थों के हिन्दी अनुवाद हैं: दयानन्द चरित, आदर्श सुधारक दयानन्द, विरजानन्द चरित, महर्षि दयानन्द का जीवन चरित, 2 भाग, देवेन्द्र बाबू के इस अपूर्व ग्रन्थ को पं. घासीराम ने पूरा किया। बाबू देवेन्द्रनाथ जी के तीन ग्रन्थों का गुजराती अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है जिसका उल्लेख आर्य-लेखक कोश में किया गया है।

 

आर्यसमाजी न होते हुए भी देवेन्द्र बाबू ने ऋषि दयानन्द के जीवन चरित को लिखकर एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। आर्यसमाज उनका इस कार्य के लिये चिरऋणी है। काश वह कुछ वर्ष और जीवित रहते तो उनकी लेखनी से लिखा यह जीवन और अधिक महत्वपूर्ण होता। लेख को विराम देते हुए बाबू देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी के ऋषि के विषय में कहे कुछ प्रभावशाली वचन प्रस्तुत हैं ‘‘यह हैं भारतदिवाकर दयानन्द, जिन्होंने इस पाप परिपुष्ट युग में जन्म लेकर जीवन भर निष्कण्टक ब्रह्मचर्य का पालन किया, जो विद्या में, वाक्पटुता में, तार्किकता में, शास्त्रदर्शिता में, भारतीय आचार्य मण्डली के बीच में शंकराचार्य के ठीक परवर्ती आसन पर आरूढ़ होने के सर्वथा योग्य थे, वेद निष्ठा में, वेद व्याख्या में, वेद ज्ञान की गम्भीरता में, जिनका नाम व्यासादि महर्षिगण के ठीक नीचे लिखे जाने योग्य था, जो अपने को हिन्दुओं के आदर्श सुधारक पद पर प्रतिष्ठित कर गये हैं, और इस मृत प्रायः आर्यजाति को जागरित करके उठाने के उद्देश्य से मृत संजीवनी औषध के भाण्ड को हाथ में लेकर जिन्होंने भरतखण्ड में चतुर्दिक् परिभ्रमण किया था।

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