बदलाव के दौर से गुजरते शिक्षक

सरकार और समाज ने समय के साथ मिलकर शिक्षक की भूमिका में जो काट छाँट की है उसने शिक्षक को एक बहुत सीमित दायरे में धकेल दिया है। सूचना क्रांति के इस दौर में जब ज्ञान प्राप्ति के अनंत द्वार खुले हुए हैं शिक्षक का ज्ञान प्रदाता के तौर पर चला आ रहा वर्षों पुराना विशेषाधिकार छिन चुका है। शिक्षक की भूमिका अब इन सूचनाओं का विवेकपूर्ण उपयोग करने हेतु विद्यार्थियों को परामर्श देने तक सीमित रह गई है। हमारे देश में अभिजन वर्ग की शिक्षा अमेरिका के फ्लिपड क्लास रूम मॉडल की ओर तेजी से अग्रसर हो रही है जो वर्तमान प्रचलित शिक्षा के स्वरूप से बिल्कुल उलटा है। इस मॉडल में विद्यार्थी अपने घर पर अपने मोबाइल या लैपटॉप पर शिक्षकों के द्वारा रिकॉर्ड किए गए लेक्चर सुनते देखते हैं और क्लास रूम में विभिन्न प्रकार के प्रोजेक्ट और ग्रुप टास्क पर कार्य करते हैं। अर्थात पढ़ाई घर पर और होमवर्क स्कूल में। उच्च शिक्षा में भी ऑनलाइन शिक्षक रहित कक्षाओं और दूरवर्ती शिक्षा को बढ़ावा देना सरकार की प्राथमिकताएं हैं जिन पर ज़ोर शोर से काम चल रहा है।शिक्षा को शिक्षक केंद्रित के स्थान पर छात्र केंद्रित और अधिगम केंद्रित करने के प्रयास तो लम्बे समय से जारी थे। कुल मिलाकर इन परिवर्तनों ने शिक्षक को  फैसिलिटेटर की भूमिका में सीमित कर दिया है।

देश के छोटे शहरों और गांवों के सरकारी स्कूलों का शिक्षक बिल्कुल दूसरी दुनिया में रहता है। वह कई बार ऐसे अभावग्रस्त एवं दुर्गम क्षेत्रों के जर्जर स्कूलों में कार्य करता नजर आता है जहाँ पर उपलब्ध शिक्षा सुविधाएँ आधी सदी पूर्व के मानकों पर भी खरी नहीं उतरतीं। उसकी योग्यता और सफलता का आकलन-नितांत अनुचित एवं मूर्खतापूर्ण रूप से- परीक्षा परिणामों के आधार पर किया जाता है और सफल सिद्ध होने के लिए वह कई बार नकल को बढ़ावा देने जैसी आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है। प्रतिवर्ष उसे अपने वेतन भत्तों के लिए आंदोलनरत होना पड़ता है, उसके इन आंदोलनों की तीव्रता और अवधि चुनावी वर्षों में बढ़ जाती है। सरकार के मुखिया के अपने सपने, शौक और प्राथमिकताएं होती हैं जिनका स्वरूप प्रायः अप्रायोगिक और अयथार्थवादी होता है। इन्हें साकार करने के दबाव से परेशान सरकारी अधिकारियों की नजर में सरकारी स्कूल का मास्टर ही इतना निरीह नजर आता है जिस पर इनके क्रियान्वयन का बोझ डाला जा सके। विभिन्न सर्वेक्षणों और जनगणना आदि में भी शिक्षकों की सेवाएँ ली जाती हैं। शिक्षकों को संविदा पर रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है और यदि ये स्थायी हैं तब भी इन्हें शिक्षा मित्र या शिक्षा कर्मी जैसी संज्ञाओं से जाना जाता है जो इस बात को इंगित करती हैं कि ये शिक्षा की दुनिया के दोयम दर्जे के नागरिक हैं।

शिक्षक शिकायत करते हैं कि शाला में पढ़ाने के अतिरिक्त हर प्रकार के कार्य सरकार द्वारा उनसे लिए जाते हैं लेकिन सरकार का रवैया यह दर्शाता है कि शाला में पढ़ाने के अलावा हर प्रकार के कार्य(ट्यूशन,निजी व्यवसाय,खेती आदि) करने वाले शिक्षकों के बजाए संविदा पर रखे जाने वाले शिक्षक पैसे का ज्यादा मोल देते हैं और स्थायी शिक्षकों से लिया जाने वाला कार्य उनके वेतन की तुलना में बहुत कम है। शिक्षकों के सम्मान और शिक्षा पद्धति में उनके महत्व में गिरावट आई है इसमें कोई संदेह नहीं है किंतु इस गिरावट का कारण उनका स्वयं का अनुत्तरदायित्वपूर्ण और असमर्पित रवैया है या शासकीय नीतियाँ, यह विमर्श का विषय हो सकता है।

शिक्षा का उद्देश्य तो शिक्षकों की भूमिका का निर्धारक है ही। शिक्षा का उद्देश्य जब आजीविका के अर्जन पर एकपक्षीय रूप से केंद्रित हो जाता है तो शिक्षक की भूमिका भी अपने विद्यार्थी को आर्थिक जीवन में सफलता दिलाने तक सीमित हो जाती है। इस प्रकार शिक्षक, विद्यार्थी के जीवन को समग्रता से प्रभावित करने वाले पथप्रदर्शक के स्थान पर एक ऐसे प्रशिक्षक का रूप ले लेता है जो विद्यार्थी को किसी ऐसी प्रतियोगिता में सफलता हेतु सक्षम बनाता है जिससे उसकी आजीविका चल सके। जब शिक्षा का उद्देश्य डॉक्टर, इंजीनियर,कंपनी का सीईओ या कलेक्टर बनाना हो जाए तो विद्यार्थी के जीवन को समग्र रूप से प्रभावित करने वाले स्कूल-कालेज के व्यापक पाठ्यक्रम को पढ़ाने वाले हरफनमौला शिक्षक के स्थान पर विषय विशेषज्ञ प्रशिक्षक का महत्व बढ़ जाता है। यही कारण है कि स्कूल, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महज एक गेट पास बन गए हैं और कोचिंग संस्थानों का ग्लैमर सर चढ़कर बोल रहा है। जब डॉक्टरों की निर्दयता, इंजीनियरों के भ्रष्टाचार और कलेक्टरों की असंवेदनशीलता की घटनाएँ हमारे सामने आती हैं तो इन पर आक्रोशित होने के पूर्व हमें यह भी सोचना चाहिए कि इन्हें बुनियादी मानवीय मूल्यों की शिक्षा से वंचित करने वाले भी हम ही हैं।

शिक्षा, हमारी सरकारों के एजेंडे में कभी प्राथमिकता पर नहीं रही। कुल बजट व्यय का बहुत कम भाग शिक्षा पर खर्च किया जाता है। सरकारों द्वारा शिक्षा पर कम से कम व्यय करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यू पी ए सरकार के 2013-14 के अंतिम बजट में शिक्षा पर व्यय कुल बजट व्यय का 4.57 प्रतिशत था जो वर्तमान मोदी सरकार के 2016-17 के बजट में घटकर 3.65 प्रतिशत रह गया। देश में वर्तमान में लगभग 86 लाख शिक्षक प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा से तथा करीबन 15 लाख शिक्षक उच्च शिक्षा से जुड़े हुए हैं। किंतु इनके प्रशिक्षण पर किया जाने वाला व्यय नगण्य है। शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं का पाठ्यक्रम आज की आवश्यकताओं को देखते हुए वर्षों पीछे है। इनकी डिग्रियों का महत्व नौकरी और प्रमोशन पाने तक सीमित है। इनमें खुले भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं।दक्ष शिक्षकों की कमी भी है। देश में केवल 10 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जो विद्यार्थी- शिक्षक अनुपात की कसौटी पर खरे उतरते हैं।

1991  में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के पश्चात से ही शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी हाथों में सौंपने की कोशिशें होती रही हैं और शिक्षा की समस्याओं के समाधान के रूप में निजीकरण को पेश किया जाता रहा है। उदारीकरण के पश्चात जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति शिक्षा के क्षेत्र में भी सुविधा सम्पन्न निजी शिक्षण संस्थाओं और अभावग्रस्त सरकारी शैक्षिक संस्थानों का विभाजन उत्पन्न हुआ है जो बढ़ता ही जा रहा है। ऐसा नहीं हैं कि निजी संस्थानों के शिक्षक पूंजीपतियों और कॉरपोरेट मालिकों के शोषण से मुक्त हैं किन्तु इनमें एक एलिटिस्ट ईगो भी दृष्टिगत होता है। कॉरपोरेटीकरण और वैश्वीकरण ने जिस मानव मूल्यों से रहित, पैसे को सर्वोपरि मानने वाली चमकीली किन्तु खोखली दुनिया का सृजन किया है उस दुनिया में प्रवेश पाना हमारे मध्यम वर्ग की सर्वोपरि प्राथमिकता बना दी गई है। मध्यम वर्गीय पालकों का यह विश्वास कि निजी स्कूल और उनके शिक्षक ही इस दुनिया में प्रवेश दिलाने हेतु अधिकृत हैं इन शिक्षकों की बढ़ती सामाजिक प्रतिष्ठा का कारण है। लेकिन यह भी सत्य है कि जब भारी भरकम फीस देकर इन स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अपेक्षित परिणाम या वी आई पी ट्रीटमेंट नहीं मिलता तो वे और उनके पालक इन शिक्षकों से वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा एक कस्टमर अपने सर्विस प्रोवाइडर से सेवा में न्यूनता की दशा में करता है। शिक्षा के व्यवसायीकरण का यह एक अनिवार्य पक्ष है।

शिक्षकों पर होने वाला विमर्श दो अतिरेकों का शिकार रहा है। एक ओर तो शिक्षकों को महिमा मंडित करने वाला पारंपरिक विमर्श है जिसका प्रारम्भ शिक्षा एवं शिक्षक की संस्कृत और अंग्रेजी की शाब्दिक व्युत्पत्तियों से होता है, फिर यह स्कूलों को गुरुकुल और शिक्षकों को गुरु के समतुल्य ठहराते हुए उनके पुराने गौरव की पुनर्स्थापना का उद्घोष करते हुए समाप्त होता है। यह विमर्श शिक्षक दिवस अथवा गुरुपूर्णिमा जैसे विशिष्ट अवसरों के लिए सुरक्षित रखा जाता है और जिन महान दार्शनिक-शैक्षिक मूल्यों का इसमें गुणगान किया जाता है उन पर हमारी अनास्था इतनी जगजाहिर है कि इससे ऊब और वितृष्णा सी होती है। दूसरी ओर शिक्षकों को अक्षम, अकर्मण्य और अप्रतिबद्ध मानने वाला चिंतन है जो इन्हें अपने हितों के लिए सजग किन्तु अपने कर्त्तव्यों से मुख मोड़ने वाला मानता है। यह इन पर दंडात्मक अनुशासन की सिफारिश करता है और इन्हें जनप्रतिनिधियों और पालकों के सम्मुख जवाबदेह बनाने का पक्षधर है।

शिक्षकों के लिए हमारी तलाश केवल शिक्षण संस्थाओं तक सीमित होकर रह गई है। जबकि हमारे दैनंदिन जीवन में ही ऐसे कितने ही अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने आचार,व्यवहार,व्यक्तित्व और कृतित्व से समाज तथा देश को उन बुनियादी जीवन मूल्यों की शिक्षा दी है जिनकी कमी हमारे अस्तित्व को ही संकट में डालने वाली बन गई है। ये बहुत सामान्य लोग भी हो सकते हैं-श्रमिक या किसान या उद्यमी या गृहणियां भी- जिन्होंने बिना विचलित हुए अपने कर्त्तव्य का पालन किया और अभावों के बीच भी अपनी ईमानदारी, जिंदादिली और इंसानियत को बचाए रखा। शिक्षक दिवस ऐसी अचर्चित विभूतियों की तलाश और उनके सम्मान का अवसर होना चाहिए।

आज शिक्षकों के सम्मुख वास्तविक चुनौती शिक्षा से जुड़े गहरे दार्शनिक प्रश्नों को सुलझाने की है। माइकल फूको 18 वीं सदी में विकसित की गई उस चिंतन प्रणाली की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं जो द्विध्रुवीय शब्द युग्मों पर आधारित थी यथा स्त्री-पुरुष,काला-गोरा,पूर्व-पश्चिम आदि। जिस द्विध्रुवीय शब्द युग्म पर आधारित चिंतन प्रणाली के हम अभ्यस्त बना दिए गए हैं वह किसी निर्णय तक हमें पहुंचाने में सहायता करती प्रतीत होती है किंतु ऐसा करते हुए वह बहुत सी संभावनाओं का गला घोंट देती है और विकल्पों को खत्म कर देती है। इसी प्रकार हमारे पाठ्यक्रम में,हमारी भाषा में  अनेक ऐसे विषय और शब्द समाविष्ट हैं जो पुरुषवाद, रंगभेद,जातिवाद और धार्मिक श्रेष्ठता को पुष्ट करने वाले विमर्श की उपज हैं और बहुलताओं के सहअस्तित्व के लिए घातक हैं किन्तु इनकी ओर हमारा ध्यान नहीं जाता और वे हमारे अवचेतन में प्रवेश कर जाते हैं। एक सजग शिक्षक ही पाठ्यक्रम के ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें हटा सकता है।

1948 में गठित राधाकृष्णन कमीशन की रिपोर्ट की मूल आत्मा थी -शिक्षा को मानवीय गुणों से परिपूर्ण  उदार,सहिष्णु एवं सेवाभावी विश्व नागरिक के सृजन हेतु सक्षम बनाना। आज भी ऐसे ही शिक्षकों की आवश्यकता है जो मनुष्य को मानव संसाधन न समझ कर उसकी पूरी गरिमा के साथ केवल मनुष्य समझें और उसकी विलक्षणता की रक्षा करें।

डॉ राजू पाण्डेय

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