बांग्लादेश अवैध घुसपैठियों की वापसी को तैयार

प्रमोद भार्गव

बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने कहा है कि ‘उनके देश ने भारत से अनुरोध किया है कि यदि उनके यहां अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की सूची है तो सरकार को उपलब्ध कराएं। इन नागरिकों को हम वापस लेने को तैयार हैं।’ मोमेन ने राष्ट्रीय नागरिक पंजी और नागरिकता संशोधन विधेयक को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए कहा कि ‘बांग्लादेश-भारत के द्विपक्षीय संबंध बहुत मधुर हैं। लिहाजा इन मुद्दों को लेकर उनके परस्पर संबंधों पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है।’ बेशक, बांग्लादेश ने समस्या की गंभीरता को अनुभव करते हुए शालीनता का परिचय दिया है। म्यांमार से जब 10 लाख रोहिंग्या मुस्लिमों को वहां की सेना ने खदेड़ा था, तब भी सात लाख रोहिंग्याओं को बांग्लादेश ने शरण देकर उदारता का परिचय दिया था, जबकि पाकिस्तान व अन्य मुस्लिम देशों ने उन्हें अपनी सीमा में घुसने ही नहीं दिया। मोमेन ने यह भी कहा कि जो भारतीय नागरिक आर्थिक कारणों से बिचौलिये के जरिये अवैध रूप से बांग्लादेश में घुस आए हैं, उन्हें हम भारत भेज देंगे। उनकी यह बात तर्कसम्मत है।दरअसल, घुसपैठ की समस्या विभाजन के समय से ही शुरू हो गई थी। बड़ी संख्या में अलग-अलग धर्मों के लोग पाकिस्तान से भारत आए थे। इनमें हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई थे। कुछ लोग भारत से पाकिस्तान भी गए थे। उन लोगों को भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 के माध्यम से भारतीय नागरिकता दी गई थी। उधर, 1948 में जिन्ना की मौत के बाद पाकिस्तान पूरी तरह कट्टर मुस्लिम राष्ट्र में बदल गया। नतीजतन जो भी गैर-मुस्लिम समुदाय के थे, उन्हें प्रताड़ित करने के साथ उनकी स्त्रियों के साथ दुराचार व धर्म-परिवर्तन का सिलसिला तेज हो गया। ऐसे में वे पलायन कर भारत आने लगे। उन गैर-मुस्लिमों का भारत के अलावा कोई दूसरा ठिकाना इसलिए नहीं था, क्योंकि पड़ोसी अफगानिस्तान भी कट्टर इस्लामिक देश बन गया था। 1955 तक ही करीब 45 लाख हिन्दू और सिख भागकर भारत आ गए थे।1971 में जब पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना तो हिन्दू समेत अन्य गैर-मुस्लिमों पर विकट अत्याचार हुए। फलतः उनके पलायन और धर्मस्थलों को तोड़ने का सिलसिला और तेज हो गया। नतीजतन, बड़ी संख्या में हिन्दुओं के साथ बांग्लादेशी एवं पाकिस्तानी मुस्लिम भी बेहतर भविष्य के लिए भारत चले आए। जबकि वे धर्म के आधार पर प्रताड़ित नहीं थे। ये घुसपैठिए बनाम शरणार्थी पूर्वोत्तर के सातों राज्यों समेत पश्चिम बंगाल में भी घुसे चले आए। इनकी संख्या तीन करोड़ तक बताई जाती है। शरणार्थियों की तो सूची है, लेकिन घुसपैठिए केवल अनुमान के आधार पर हैं। इन घुसपैठियों और शरणार्थियों की सही पहचान करने की दृष्टि से ही यह नागरिकता संशोधन कानून लाया गया है।वैसे तो मुस्लिम घुसपैठियों को बाहर करने की बात इनकी भारत में दस्तक शुरू होने के साथ ही हो गई थी। 26 सितम्बर 1947 को एक प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान में जो हिन्दू एवं सिख प्रताड़ित किए जा रहे हैं, उनकी मदद हम करेंगे। 1985 में केंद्र में जब राजीव गांधी की सरकार थी, तब असम में घुसपैठियों के विरुद्ध जबरदस्त प्रदर्शन हुए थे। नतीजतन राजीव गांधी और आंदोलनकारी संगठन असम गण परिषद के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें घुसपैठियों को क्रमबद्ध खदेड़ने की शर्त रखी गई। लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए सदन में कहा था कि यदि पाकिस्तान व बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यक प्रताड़ित किए जा रहे हैं और वे पलायन को मजबूर हुए हैं, तो उन्हें भारतीय नागरिकता दी जानी चाहिए। हालांकि मनमोहन सिंह ने लगातार दस साल प्रधानमंत्री बने रहने के बावजूद इस दिशा में कोई स्थाई पहल नहीं की। उधर, नेहरु और लियाकत अली के बीच हुए समझौते का पालन पाकिस्तान ने किया होता तो भारत को इस विधेयक को न तो 1955 में बनाने की जरूरत पड़ती और न ही इसमें अब संशोधन किया गया होता। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान ऐसे मुस्लिम बहुल देश हैं, जिनमें गैर-मुस्लिम नागरिकों पर अत्याचार और स्त्रियों के साथ दुष्कर्म किए जाते हैं। चूंकि ये देश एक समय अखंड भारत का हिस्सा थे। इसलिए इन तीनों देशों में हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी बड़ी संख्या में रहते थे। 1947 में जब भारत से अलग होकर पाकिस्तान नया देश बना था, तब वहां 20 से 22 प्रतिशत गैर-मुस्लिमों की आबादी थी, जो अब घटकर दो प्रतिशत रह गई है। अफगानिस्तान में 2 लाख हिंदू और सिख थे। जो निरंतर प्रताड़ना के चलते महज 500 रह गए हैं। उन्हें आज भी न तो वोट का अधिकार प्राप्त है और न ही वे वहां चल रही लोक-कल्याणकारी योजनाओं का लाभ ले पाते हैं। जब बांग्लादेश वजूद में आया, तब बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे मुक्ति संग्राम के जवानों ने गैर-मुस्लिम स्त्री व पुरुषों के साथ ऐसे दुराचार व अत्याचार किए कि वे भारत की ओर पलायन करने को मजबूर हुए। उनकी संख्या 10 लाख से ज्यादा थी। फिलहाल बांग्लादेशी घुसपैठियों की तादाद बक्सा, चिरांग, धुबरी और कोकराझार जिलों में सबसे ज्यादा है। इन्हीं जिलों में बोडो आदिवासी हजारों साल से रहते रहे हैं। लिहाजा बोडो और घुसपैठियों के बीच हिंसक वारदातें होती रहती हैं। घुसपैठ के कारण आदिवासियों की आजीविका के संसाधनों पर कब्जा हुआ और इनका जनसंख्यात्मक घनत्व भी बिगाड़ता चला गया। बांग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ के दुष्प्रभाव पहले अलगाववाद के रूप में देखने में आए थे। बाद में राजनीति में प्रभावी हस्तक्षेप के रूप में देखने में आए। इन दुष्प्रभावों को कांग्रेस का तत्कालीन केंद्रीय व प्रांतीय नेतृत्व जान-बूझकर वोट बैंक बनाए रखने की दृष्टि से अनदेखा करता रहा। लिहाजा, धुबरी जिले से सटी बांग्लादेश की जो 134 किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा है, उस पर कोई चौकसी नहीं रखी गई। नतीजतन घुसपैठ आसानी से जारी रहा। असम को बांग्लादेश से अलग ब्रह्मपुत्र नदी करती है। बांग्लादेश के साथ भारत की कुल 4097 किलोमीटर लंबी सीमा-पट्टी है, जिस पर जरूरत के मुताबिक सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। इस कारण गरीबी और भुखमरी के मारे बांग्लादेशी असम और पश्चिम-बंगाल समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में फैलते रहे हैं। यहां इन्हें कांग्रेसी और यूडीपी अपने-अपने वोट बैंक बनाने के लालच में भारतीय नागरिकता का सुगम आधार उपलब्ध कराते रहे। इन इलाकों के मूल निवासी जब घुसपैठियों के वर्चस्व से तंग आ गए तो इनमें परस्पर संघर्ष तो जारी रहा ही, कालांतर में ये भाजपा की ओर मुड़ गए। इसी कारण भाजपा को असम समेत अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों में सफलता मिली। लिहाजा इनकी पहचान कर, इनकी सम्मानजनक वापसी ही इस समस्या का व्यावहारिक व स्थाई समाधान है।

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