लेखक परिचय

डॉ. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए, एमफिल और पीएचडी की उपाधि हासिल करने वाले मनीषजी राजनीतिक टिप्‍पणीकार के रूप में मशहूर हैं। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में लंबी पारी खेलने के बाद इन दिनों आप प्रिंट मीडिया में भी अपने जौहर दिखा रहे हैं। फिलहाल आप देश के पहले हिंदी साप्‍ताहिक समाचार-पत्र चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं।

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स्वतंत्रता संग्राम में किसने हिस्सा लिया? किस तरह से हिस्सा लिया? किसने क्या क्या कुर्बानी दी? किसने नहीं दी? इस पर विवाद या बहस करना उचित नहीं है क्योंकि उस संग्राम पर हर भारतीय का हक है. जिन लोगों ने उस वक्त अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलन किया, जो भी योगदान दिया, वो हमारे लिए गर्व का विषय होना चाहिए. उस पर टीका टिप्पणी करना उचित नहीं है क्योंकि अगर सब कुछ सच सच बताया जाने लगा तो स्वतंत्रता संग्राम को अपनी बपौती मानने वाली कांग्रेस की ही सबसे ज्यादा किरकिरी होगी. लेकिन, आज कल हर ऐरे-गैरे नत्थूखैरे से ये सुनने को मिलता है हिंदू संगठनों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा ही नहीं लिया. ये सिर्फ असत्य ही नहीं है बल्कि मूर्खतापूर्ण भी है.

स्वतंत्रता संग्राम में किसने हिस्सा लिया और किसने नहीं लिया ये क्या कांग्रेस सरकारों के टुकड़ों पर पलने वाले इतिहासकारों की किताबों से तय होगा? अगर कोई शख्स या घटना जिसका जिक्र स्कूल और कॉलेजों के टेक्स्टबुक में नहीं है तो क्या वो इतिहास का हिस्सा नहीं है? इतिहास के पन्नों से सच को छिपाने का दोषी कौन है? इतिहास को विचारधारा के जहर में डुबो कर देश के लोगों को गुमराह करने वाले कौन हैं? हिंदूत्व और भारतित्व के साथ वामपंथी इतिहासकारों ने जो साजिश की है उसका ये नतीजा है कि आज देश में हिंदू मुस्लिम के बीच एक खाई बन चुकी है.

वामपंथी इतिहासकारों ने स्वतंत्रता संग्राम को डाइलेक्टिकल मैटेरियलिज्म के ढांचे में फिट करने के चक्कर में इतिहास के साथ जो छेड़छाड़ की है उसका नतीजा ये है कि कई स्वतंत्रता सेनानियों को इनलोगों ने विलेन बना दिया. इसी का नतीजा है कि इतिहास की किताबों में भगत सिंह, चंद्रशेखर जैसे आंदोलनकारी को आतंकवादी बताया जाता है. हकीकत ये है कि वामपंथियों ने जो इतिहास लिखा वो महज एक थ्योरी है, ब्रह्मसत्य नहीं है. चुंकि, ये इतिहास कांग्रेस पार्टी को महान साबित करने के लिखा गया इसलिए दूसरों को विलेन बनाना जरूरी हो गया. इसलिए हिंदुत्व और मुस्लिम लीग को स्वतंत्रता संग्राम से बाहर निकाल दिया गया. अब इन्हें कौन समझाए कि किताबों में जगह नहीं मिलने से इतिहास नहीं बदल जाते हैं. सोशल मीडिया के जमाने इसलिए वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास लिखना ही बंद कर दिया है.

अगर हिंदूत्व और हिंदूवादी संगठनों का स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं था तो ये कैसे हो गया कि हिंदू महासभा के कई लीडर कांग्रेस के लिए काम करते रहे. इतना ही नहीं, कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने. सबसे बड़ा उदाहरण तो पंडित मदन मोहन मालवीय हैं. 1906 में मुस्लिम लीग बनने और फिर 1909 में मुसलमानों के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट के बाद कांग्रेस के कई नेता एकजुट हुए और हिंदुओं के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए हिंदू महासभा का गठन किया. पंडित मदन मोहन मालवीय इसके संस्थापकों में से एक थे. 1909 से संगठित होते होते 1915 में हिंदू महासभा की स्थापना हुई. अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सर्वोच्च नेता होते हुए पंडित मदन मोहन मालवीय 1909, 1918 और 1932 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. वामपंथी इतिहासकारों को बताना चाहिए कि अगर हिंदू महासभा एक सांप्रदायिक संगठन है तो इसका सर्वोच्च नेता कांग्रेस का अध्यक्ष कैसे बन गया?

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के दूसरे संस्थापक लाला लाजपत राय थे. वो भी हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे. लेकिन 1920 में लाला लाजपत राय भी कांग्रेस के अध्यक्ष बन जाते हैं. गौर करने वाली बात ये है कि ये दोनों हिंदू महासभा बनाने और उसमें रहते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष बने. इन्होंने हिंदू महासभा को कभी छोड़ा नहीं. इसी तरह, महान हिंदूवादी नेता स्वामी श्रद्धानंद का नाम भी इतिहास की किताबों से गायब है. वो कांग्रेस के सक्रिय नेता था. इनकी वजह से 1919 में अमृतसर में कांग्रेस का सेशन रखा गया था जबकि जलियांवाला कांड के बाद कांग्रेस कमेटी नहीं चाहती थी कि वहां सेशन रखा जाए.

स्वामी श्रद्धानंद 1923 के बाद से शुद्धि आंदोलन में जुट गए. उन्होंने हजारों लोगों को वापस हिंदू बनाया. यही वजह है कि अब्दुल राशिद नाम के एक शख्स ने 1926 में उनकी हत्या कर दी. वामपंथी इतिहासकारों ने भी उन्हें भुला दिया. सरकारी किताबों और स्कुल के सिलेबस में इनका नाम ऩहीं आता है इसलिए लोग न स्वामी श्रद्धानंद को जानते हैं और न ही अब्दुल राशिद को. स्वामी श्रद्धानंद 1922 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे.

बालकृष्ण शिवराम मूंजे यानि बी एस मूंजे का नाम प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में आता है. वो हिंदुत्व के एक महान पुरोधा थे. वो कांग्रेस के नेता भी थे. लेकिन जब 1907 के सूरत सेशन में नरम दल और गरम दल के बीच अध्यक्ष पद की नियुक्ति को लेकर विवाद हुआ तो तिलक को सुरक्षा देकर वहां से बाहर निकाल ले गए क्योंकि बाल गंगाधर तिलक पर नरम दल के लोग कुर्सी और पत्थर से हमला करने लगे थे. उसके बाद से वो तिलक के साथ ही रहे. स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेते रहे. वो सेंट्रल इंडियन प्रोविंसियल कांग्रेस के जनरल सेक्रटरी रहे साथ ही वो हिंदू महासभा के 1927 से 1937 तक अध्यक्ष भी रहे.

इसी तरह बालगंगाधर तिलक, एस श्रीनिवास अयंगर, पुरुषोत्मत दास टंडन, एन सी केलकर, आशुतोष लाहिरी, भाई परमानंद जैसे कई स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्हें हिंदूवादी कह कर इतिहास की किताबों में जगह नहीं मिली है. इतना ही नहीं, आरएसएस के संस्थापक डा. के बी हेडगेवार भी कांग्रेस के साथ साथ हिंदू महासभा के सदस्य थे. वो खिलाफत आंदोलन के वक्त जेल भी गए. इसके अलावा इतिहासकारों को ये भी बताना चाहिए कि भगत सिहं और चंद्रशेखर जैसे नेशनल हीरो को स्वाधीनता संग्राम में कूदने की प्रेरणा किनसे मिली? ये लोग नेहरू के नाम पर या कांग्रेस के नाम पर अपनी जानें नहीं दी. इनलोगों ने सावरकर और लाला लाजपत राय के सानिध्य में आकर देश के लिए कुर्बानी दी. ये कोई वामपंथी इतिहासकार नहीं बतायेगा कि सावरकर की प्रतिबंधित पुस्तक – The Indian War of Independence –1857 – को भारत में चोरी छिपे छपवाने वाले कोई और नहीं बल्कि भगत सिंह थे. यही किताब भारत के कई आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणा थी.

ये बातें सरकार के पैसे पर लिखी गई इतिहास के किताबों में दर्ज नहीं है. इसकी वजह वैचारिक दरिद्रता है. हो सकता है कि वामपंथी इतिहासकारों को लगता हो कि हिंदूवादी संगठनों का स्वतंत्रता संग्राम में खराब रोल था. तो कम से कम इतनी ईमानदारी तो दिखानी चाहिए कि हिंदू सगंठनों के खराब रोल को ही लिखते. लेकिन, बड़ी होशियारी से इन लोगों ने हर हिंदूवादी नेताओं को, अच्छा या बुरा, कहीं जगह ही नहीं दी. इसी फरेब की वजह से लोग ये पूछते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में हिंदूवादी संगठनें कहां थी?

अगर पाठ्यक्रम के पढ़ाए जाने वाली किताबों को ही ब्रह्म सत्य मान लें तो पूरे नॉर्थ इस्ट में स्वतंत्रता संग्राम हुआ ही नहीं क्योंकि आज तक हमें नार्थ इस्ट के बारे में कुछ बताया ही नहीं गया. समझने वाली बात बस इतनी है कि वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास की घटनाओं और महापुरुषों के बारे में झूठ बोला है. अपनी थ्योरी को सिद्ध करने के लिए इतिहास बताने से ज्यादा छिपाने का काम किया है. वामपंथियों ने इतिहास के नाम पर एक मिथक बनाया है जिसका मकसद राजनीतिक फायदा उठाना है… हकीकत ये है कि 1947 से पहले कांग्रेस कोई पार्टी नहीं थी, एक आंदोलन था जिसमें हर किस्म की विचारधारा को मानने वाले, हिंदू संगठन, मुस्लिम लीग, कन्युनिस्ट, सोशलिस्ट आदि आदि … सब इसमें जुड़े हुए थे.

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